अकेलापन

कमरे में खामोशी इतनी गहरी थी कि दीवार पर टंगी घड़ी की सुइयों की टिक-टिक भी किसी हथौड़े की चोट की तरह महसूस हो रही थी। विक्रम बेड के किनारे बैठा था, उसके हाथों में एक अस्पताल की फाइल थी और उसकी नजरें सामने ड्रेसिंग टेबल के पास खड़ी काव्या पर टिकी थीं। काव्या अपने … Read more

मेरी बेटियां बोझ नहीं है

“भाभी, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी बच्चियों को इस तरह मनहूस और बोझ कहना बंद कर दीजिए। जब मुझे और इनके पिता को इनका कोई भार नहीं लगता, तो आप लोग क्यों इनके भविष्य की चिंता में अपना खून जला रही हैं?” सुमेधा ने अपनी तीन छोटी-छोटी बेटियों को सीने से चिपकाते … Read more

गिरवी रखा हुआ मकान

“पापा कहाँ हैं माँ?” घर की दहलीज पर कदम रखते ही सुमित ने अपनी माँ, सुलोचना जी से पूछा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी थकावट और आँखों में एक छिपी हुई उलझन थी। सुलोचना जी बरामदे में बैठी स्वेटर बुन रही थीं। उन्होंने सुमित की आवाज़ सुनकर एक बार नज़र उठाई, लेकिन अगले ही … Read more

अपनों का साथ ही सबसे बड़ी दौलत है – हिमानी बंसल

“रिश्ते अपने आप नहीं टूटते। वे तब टूटते हैं जब बात करना बंद हो जाता है, एक-दूसरे को समझना बंद हो जाता है और ‘मैं’ की जगह ‘हम’ खो जाता है।” नैना बचपन से ही मेधावी, आत्मविश्वासी और स्पष्टवादी थी। वह हर बात साफ़-साफ़ कहती थी। उसका उद्देश्य कभी किसी का दिल दुखाना नहीं होता … Read more

कब तक आत्मसम्मान खोकर जीऊँ – मंजू ओमर

विवेक मुझे ₹200 दे देना ऑफिस जाने से पहले इतना कह के काजल विवेक का खाना पैक करने लगी । और जब विवेक का ऑफिस जाने के लिए कमरे से बाहर आया तो काजल ने उसका टिफिन देते हुए बोली विवेक वह ₹200 दे दो मुझे जाने से पहले। अरे क्या है यह रोज तुम … Read more

*भगवान के घर देर है पर अंधेर नही* – तोषिका

“क्या हुआ बेटा, ऐसे रो क्यों रहा है?” सुनीता ने अपने बेटे अंश से पूछा। अंश ने बोला “कुछ नहीं मा, बस ऐसा लग रहा है कि जिंदगी साथ नहीं दे रही है।” “ऑफिस में कुछ ठीक नहीं चल रहा है क्या?” उसकी मां ने अंश के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला। नहीं मा … Read more

 सच्चे धागे

विशाखा जब से अनुराग के घर ब्याह कर आई थी, पूरे घर में अक्सर उसी के स्वभाव की चर्चा दबी जुबान में होती रहती थी। विशाखा एक बहुत ही शांत, गंभीर और कम बोलने वाली लड़की थी। वह पेशे से एक बैंक अधिकारी थी और उसे फालतू की गपशप, मोहल्ले की औरतों के साथ बैठकर … Read more

 बहू कम और बेटी ज्यादा

“रोहन, तुम किसी भी गलतफहमी में मत रहना। मैं तुम्हारी माँ की तीमारदारी करने के लिए वहाँ बिल्कुल नहीं जा रही हूँ।” श्रुति ने अपने बैग में लैपटॉप रखते हुए बहुत ही सपाट और कठोर स्वर में कहा। रोहन ने अभी-अभी फोन रखा था और वह गहरी चिंता में था। फोन उसके गृहनगर से था। … Read more

दुख का भारी पत्थर

आज माधवी और राघव की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह—सिल्वर जुबली—थी। पिछले एक हफ्ते से दोनों के बच्चे, आर्यन और शिखा, इस पार्टी की तैयारियों में दिन-रात एक किए हुए थे। शहर के सबसे बड़े बैंक्वेट हॉल से लेकर मेहमानों की लिस्ट तक, सब कुछ तय हो चुका था। माधवी अपने कमरे में आईने के सामने … Read more

अपराधबोध

आनंद और सुधा की कहानी भी उन हजारों प्रेम कहानियों जैसी ही थी, जिन्हें समाज और परिवार आसानी से स्वीकार नहीं करते। आज से पैंतीस साल पहले जब उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामा था, तो उनके परिवारों ने हमेशा के लिए उनसे अपने दरवाजे बंद कर लिए थे। बिना किसी सहारे के, एक अजनबी शहर … Read more

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