अपराधबोध

आनंद और सुधा की कहानी भी उन हजारों प्रेम कहानियों जैसी ही थी, जिन्हें समाज और परिवार आसानी से स्वीकार नहीं करते। आज से पैंतीस साल पहले जब उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामा था, तो उनके परिवारों ने हमेशा के लिए उनसे अपने दरवाजे बंद कर लिए थे। बिना किसी सहारे के, एक अजनबी शहर में उन्होंने अपनी एक छोटी सी दुनिया बसाई। आनंद एक सरकारी बैंक में क्लर्क से भर्ती हुए और सुधा ने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर घर के खर्चों में हाथ बंटाया। जीवन की इसी जद्दोजहद के बीच उनके आँगन में दो फूल खिले—बड़ी बेटी श्रुति और छोटा बेटा कबीर। दोनों ने अपने बच्चों को वो हर खुशी देने की कोशिश की, जो उन्हें अपने बचपन में कभी नहीं मिली।

वक्त ने जैसे पंख लगा लिए थे। बच्चे पढ़-लिखकर बड़े हो गए। श्रुति की शादी हो गई और वह अपने ससुराल मुंबई चली गई, जबकि कबीर अपनी उच्च शिक्षा और शानदार नौकरी के चलते अमेरिका के सिएटल शहर में बस गया। कुछ ही सालों में आनंद भी अपनी नौकरी से रिटायर हो गए। कल तक जिस घर में सुबह से लेकर रात तक एक खुशनुमा शोर गूंजता रहता था, आनंद के ऑफिस जाने की जल्दी और बच्चों के करियर की भागदौड़ रहती थी, आज वहाँ सिर्फ एक खामोश सन्नाटा पसरा था। दीवार पर टंगी घड़ी की ‘टिक-टिक’ के अलावा उस बड़े से घर में कोई और आवाज़ नहीं थी।

शुरुआत के कुछ महीने तो आनंद और सुधा के लिए किसी सजा की तरह बीते। कोई काम नहीं था, कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी। चाय पीते हुए दोनों अक्सर एक-दूसरे का चेहरा देखते और पुरानी यादों में खो जाते। लेकिन इंसान का स्वभाव है कि वह हर परिस्थिति में जीने का रास्ता खोज ही लेता है। उनके इस खालीपन को भरने का काम किया उस छोटे से स्मार्टफोन ने, जो कबीर ने अपने पिछले भारत दौरे पर उन्हें दिया था।

शुरुआत में जिस तकनीक से उन्हें डर लगता था, धीरे-धीरे वही उनके जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन गई। सुधा ने फेसबुक पर पुराने स्कूल के उन दोस्तों को खोज निकाला, जिनसे बरसों पहले संपर्क टूट गया था। आनंद ने रिटायरमेंट के बाद अपनी पुरानी शौकिया कविताएं ब्लॉग और सोशल मीडिया ग्रुप्स में लिखनी शुरू कर दीं। अब उनका दिन बहुत ही मजे में गुज़रता था। सुबह उठकर व्हाट्सएप पर परिवार और दोस्तों को ‘सुप्रभात’ के संदेश भेजना, दोपहर में फेसबुक पर नए-नए लोगों के विचार पढ़ना, दुनिया भर की खबरें जानना और शाम को अपनी बेटी और नाती-पोतों से वीडियो कॉल पर घंटों बातें करना—यह उनकी नई दिनचर्या बन गई थी। वे अक्सर सोशल मीडिया पर उन बुजुर्गों के वीडियो देखते जो अपनी उम्र को भूलकर अपनी जिंदगी को खुल कर जी रहे थे, और उनसे प्रेरणा लेते।

एक दिन अचानक कबीर का फोन आया कि वह अपनी पत्नी निहारिका के साथ दो हफ्तों के लिए भारत आ रहा है। यह खबर सुनते ही आनंद और सुधा के चेहरे पर जो चमक आई, वह किसी दीवाली के त्योहार से कम नहीं थी। घर में फिर से रौनक आ गई। कबीर और निहारिका के आने पर घर खुशियों से भर गया। दोनों हफ्तों तक रिश्तेदारों से मिलना-जुलना, बाहर खाना और घूमने का सिलसिला चलता रहा।

इसी बीच कबीर ने एक बात बड़ी गहराई से नोटिस की। उसने देखा कि जब भी वो दोनों घर पर खाली होते, उसके माता-पिता अक्सर अपने फोन में खोए रहते थे। कभी सुधा फेसबुक पर किसी की पोस्ट पर लंबी सी टिप्पणी लिख रही होतीं, तो कभी आनंद यूट्यूब पर कोई भजन या कविता सुन रहे होते। एक शाम जब निहारिका और सुधा रसोई में रात का खाना बना रही थीं, कबीर अपने पिता के पास जाकर सोफे पर बैठ गया। आनंद अपने आईपैड पर अपने किसी पुराने दोस्त की तस्वीरें देख रहे थे।

कबीर ने बहुत ही संकोच और एक अजीब सी आत्मग्लानि के साथ अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा। “पापा…” कबीर की आवाज़ में एक हल्की सी उदासी थी। आनंद ने अपना चश्मा नीचे किया और मुस्कुराते हुए बेटे की तरफ देखा, “क्या हुआ मेरे शेर? कोई परेशानी है?”

कबीर ने गहरी सांस ली और बोला, “पापा, मुझे बहुत अपराधबोध होता है। हमने आपको इस उम्र में बिल्कुल अकेला छोड़ दिया है। आपके पास समय गुज़ारने के लिए अब कोई इंसान नहीं है, इसलिए आपको इस निर्जीव स्क्रीन और सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ता है। कितना मुश्किल और खाली लगता होगा ना आपको हमारा यूँ मीलों दूर रहना?”

बेटे की बात सुनकर आनंद ज़ोर से हंस पड़े। उनकी हँसी में कोई ताना या दुख नहीं था, बल्कि एक सच्चा सुकून था। तभी रसोई से सुधा भी बाहर आ गईं। उन्होंने कबीर की बात सुन ली थी। सुधा ने कबीर के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पागल लड़के! तू क्यों इतना सोचता है? ज़रा सोच, हमारे माँ-बाप के समय में जब बच्चे दूर चले जाते थे, तो वो क्या करते थे? वो बस दरवाजे की तरफ टकटकी लगाकर किसी चिट्ठी या तार का इंतज़ार करते थे। महीनों तक अपने बच्चों की आवाज़ नहीं सुन पाते थे, उनकी शक्ल देखने के लिए तरस जाते थे। उस दौर का अकेलापन असली अकेलापन था।”

आनंद ने सुधा की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रही है तुम्हारी माँ। हम तो उस खुशनसीब पीढ़ी के माता-पिता हैं जिन्हें तकनीक ने एक वरदान दिया है। हमें इस सोशल मीडिया और स्मार्टफोन का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। जब हमें तुम्हारी या श्रुति की याद आती है, हम एक बटन दबाते हैं और तुम दोनों मीलों दूर होकर भी हमारे सामने मुस्कुराते हुए नज़र आते हो। हम रोज़ देखते हैं कि मेरा बेटा अमेरिका में कैसी ज़िंदगी जी रहा है, मेरी नातिन आज स्कूल में क्या खेल रही है। यह स्क्रीन हमारे लिए दीवार नहीं, बल्कि एक पारदर्शी खिड़की है।”

सुधा ने मुस्कुराते हुए कबीर का गाल चूमा, “बेटा, तुम्हारी रोजी-रोटी और तुम्हारा भविष्य वहीं है। तुम अपनी नौकरी छोड़कर यहाँ हमारे पास खाली तो नहीं बैठ सकते, और इस उम्र में हमारा वहाँ जाकर उस अजनबी माहौल में बसना भी मुमकिन नहीं है। तुम अपनी ज़िंदगी में तरक्की कर रहे हो, यही हमारी सबसे बड़ी खुशी है। हमें तुम पर गर्व है। और रही बात हमारे समय गुज़ारने की, तो हमें तो जैसे एक पूरी नई दुनिया मिल गई है। यहाँ हमारे जैसे हज़ारों लोग हैं जिनसे हम रोज़ बातें करते हैं, सुख-दुख बाँटते हैं। हम अकेले नहीं हैं कबीर, हम बहुत खुश हैं।”

माता-पिता की इस गहरी समझ और उनकी सकारात्मक सोच को देखकर कबीर की आँखों में जो आँसू थे, वो अब खुशी के आँसुओं में बदल गए। निहारिका जो दरवाज़े के पास खड़ी यह सब सुन रही थी, उसके चेहरे पर भी एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। उन्हें समझ आ गया था कि उनके माता-पिता ने समय के साथ खुद को कितनी खूबसूरती से ढाल लिया है। वे किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से इस नई दुनिया का आनंद ले रहे थे। कबीर के दिल से वो सारा बोझ और अपराधबोध हमेशा के लिए मिट गया।

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दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या वाकई तकनीक और सोशल मीडिया ने आज के बुजुर्गों को अकेलेपन से लड़ने का एक नया और मजबूत हथियार दिया है? क्या आपके घर में भी बड़े-बुजुर्ग इस तरह तकनीक का इस्तेमाल करके खुश रहते हैं? अपने विचार हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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