संस्कारों की कमी 

अंजलि की आँखों में आँसू आ गए। वही गुस्सा जब रमन ने किया तो ‘काम का तनाव’ था। जब प्रिया ने किया तो ‘बचपन की आदत’ थी। लेकिन जब उसने अपनी जायज़ तकलीफ बताई, तो वह ‘बदतमीज़ी’ और ‘संस्कारों की कमी’ बन गई।

तभी घर के मुखिया, शर्मा जी, जो चुपचाप अखबार पढ़ रहे थे, उठे। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और सुमित्रा जी के सामने आकर खड़े हो गए।

“सुमित्रा,” उनकी आवाज़ में एक गंभीरता थी, “रमन ने अखबार पटका, तुम्हें प्यार आया। प्रिया ने कपड़े फेंके, तुम्हें हँसी आई। अंजलि ने सिर्फ अपनी तकलीफ बताई, तो तुम्हें उसके संस्कार याद आ गए?”

सुमित्रा जी चुप हो गईं।

शर्मा जी ने आगे कहा, “रमन का गुस्सा उसकी आदत है, प्रिया का गुस्सा उसका भोलापन, और अंजलि का गुस्सा बदतमीज़ी? यह दोहरा तराजू क्यों? क्या अंजलि इंसान नहीं है? 

रविवार की सुबह थी, लेकिन घर में शांति की जगह कोहराम मचा हुआ था। शर्मा जी के घर में आज खास मेहमान आने वाले थे। रसोई में बर्तनों की खनखनाहट और मसालों की खुशबू मिली-जुली आ रही थी।

घर का बड़ा बेटा, रमन, अभी-अभी सोकर उठा था। डाइनिंग टेबल पर बैठते ही उसने जोर से आवाज़ लगाई, “माँ! चाय कहाँ है? दस बार कह चुका हूँ कि उठते ही मुझे चाय चाहिए होती है। इस घर में किसी को मेरी परवाह है भी या नहीं?”

रमन ने गुस्से में न्यूज़पेपर सोफे पर पटक दिया।

रसोई से सुमित्रा जी दौड़ती हुई आईं, हाथ में गरमा-गरम चाय का प्याला था। “अरे मेरा राजा बेटा, गुस्सा क्यों करता है? बस दो मिनट की देरी हो गई। ले पी ले। तुझे पता है ना, ऑफिस के काम से तू कितना थक जाता है, इसलिए चिड़चिड़ा हो जाता है। कोई बात नहीं।”

सुमित्रा जी ने बड़े प्यार से बेटे के सिर पर हाथ फेरा। रमन का गुस्सा शांत हो गया, और वो चाय की चुस्कियाँ लेने लगा।

तभी सुमित्रा जी की बेटी, प्रिया, जो दो दिन के लिए मायके आई हुई थी, अपने कमरे से बाहर निकली। उसके हाथ में एक सूट था।

“माँ! आपने यह सूट प्रेस नहीं करवाया? मैंने कहा था ना मुझे आज यही पहनना है!” प्रिया ने पैर पटकते हुए कहा और सूट को कुर्सी पर फेंक दिया। उसकी भौहें तनी हुई थीं।

सुमित्रा जी हँस पड़ीं। “अरे पगली, इतनी सी बात पर मुँह लाल कर लिया? तू तो बचपन से ही ऐसी है, नाक पर गुस्सा धरा रहता है। ला, मैं अभी प्रेस कर देती हूँ। तू गुस्सा करते हुए भी कितनी प्यारी लगती है।”

सुमित्रा जी ने बेटी को गले लगाया और सूट लेकर अंदर चली गईं।

अब बारी थी घर की बहू, अंजलि की। अंजलि सुबह पाँच बजे से उठी हुई थी। नाश्ता बनाना, घर की सफाई, मेहमानों के लिए तैयारी—वह एक मशीन की तरह काम कर रही थी। पसीने से लथपथ अंजलि जब डाइनिंग टेबल साफ कर रही थी, तभी सुमित्रा जी ने आवाज़ दी।

“बहू, मेहमानों के लिए समोसे तलने हैं, कढ़ाई चढ़ा दी?”

अंजलि की कमर में दर्द था और सिर चकरा रहा था। उसने एक पल रुककर, थोड़े भारी स्वर में कहा, “माँ जी, अभी तो नाश्ते के बर्तन भी नहीं धुले हैं। मैं अकेली हूँ, रमन और प्रिया फ्री बैठे हैं, क्या वो थोड़ी मदद नहीं कर सकते? मैं थक गई हूँ, मुझे भी थोड़ा आराम चाहिए।”

अंजलि की आवाज़ में थकावट और हल्का सा आक्रोश था। बस, इतनी सी बात थी और घर का माहौल बदल गया। सुमित्रा जी के चेहरे की वो ममता, जो अभी रमन और प्रिया के लिए बह रही थी, अचानक कठोरता में बदल गई।

“आराम?” सुमित्रा जी ने व्यंग्य से कहा, “अभी दो साल हुए नहीं ब्याह को और ज़बान इतनी चलने लगी? इसे कहते हैं बड़ों के सामने बोलना। हम भी बहुएं थे, पर मजाल है कि सास के सामने उफ़ भी कर दें। यह सब तुम्हारे मायके की देन है। तुम्हारी माँ ने तुम्हें सहनशीलता नहीं सिखाई? जरा सा काम क्या बता दिया, तुम तो हम पर एहसान जताने लगीं।”

रमन भी बोल पड़ा, “अंजलि, तुम माँ से ऐसे कैसे बात कर सकती हो? तमीज़ नहीं है क्या?”

प्रिया ने भी नाक सिकोड़ी, “भाभी, आप तो बहुत रूड हो गई हैं।”

अंजलि की आँखों में आँसू आ गए। वही गुस्सा जब रमन ने किया तो ‘काम का तनाव’ था। जब प्रिया ने किया तो ‘बचपन की आदत’ थी। लेकिन जब उसने अपनी जायज़ तकलीफ बताई, तो वह ‘बदतमीज़ी’ और ‘संस्कारों की कमी’ बन गई।

तभी घर के मुखिया, शर्मा जी, जो चुपचाप अखबार पढ़ रहे थे, उठे। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और सुमित्रा जी के सामने आकर खड़े हो गए।

“सुमित्रा,” उनकी आवाज़ में एक गंभीरता थी, “रमन ने अखबार पटका, तुम्हें प्यार आया। प्रिया ने कपड़े फेंके, तुम्हें हँसी आई। अंजलि ने सिर्फ अपनी तकलीफ बताई, तो तुम्हें उसके संस्कार याद आ गए?”

सुमित्रा जी चुप हो गईं।

शर्मा जी ने आगे कहा, “रमन का गुस्सा उसकी आदत है, प्रिया का गुस्सा उसका भोलापन, और अंजलि का गुस्सा बदतमीज़ी? यह दोहरा तराजू क्यों? क्या अंजलि इंसान नहीं है? क्या उसे थकने का हक नहीं है? जब तुम्हारी बेटी ससुराल में थकी-हारी हो और अपनी सास से मदद मांगे, और उसकी सास उसे बदतमीज़ कहे, तो तुम्हें कैसा लगेगा?”

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी को जैसे आईना दिख गया हो। उन्हें एहसास हुआ कि जिसे वो ‘बहू’ कहकर एक ढांचे में कैद कर रही थीं, असल में वो भी किसी की बेटी है, और सबसे बड़ी बात, वो भी एक जीती-जागती इंसान है।

सुमित्रा जी धीरे से अंजलि के पास गईं। अंजलि ने डरते हुए नज़रें झुका लीं। सुमित्रा जी ने कढ़ाई अंजलि के हाथ से ले ली।

“तू जा, अपने कमरे में जाकर थोड़ा आराम कर ले। समोसे मैं और प्रिया मिलकर तल लेंगे। और रमन, तू बर्तन धो दे, आज संडे है, तेरा ऑफिस नहीं है।”

रमन और प्रिया एक-दूसरे का मुँह देखने लगे, लेकिन पिता की सख्त नज़रों के आगे उन्हें उठना पड़ा। अंजलि ने अपनी सास को देखा, उनकी आँखों में अब ताना नहीं, बल्कि एक नई समझदारी थी। उस दिन अंजलि को महसूस हुआ कि घर ईंट-गारे से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की भावनाओं को एक ही तराजू में तौलने से बनता है। गुस्सा सबका एक जैसा होता है, बस ज़रूरत है उसे अपनाने वाले दिल की।

दोस्तों, हमारे समाज की यह कड़वी सच्चाई है कि हम बहू को ‘बेटी’ बनाने का दावा तो करते हैं, लेकिन जब गलती करने या गुस्सा दिखाने की बारी आती है, तो नियम बदल जाते हैं। याद रखिये, बहू मशीन नहीं है। उसे भी थकने का, चिढ़ने का और अपनी बात कहने का उतना ही हक है जितना आपके बेटे या बेटी को। जिस दिन हम यह फर्क मिटा देंगे, उस दिन हर घर स्वर्ग बन जाएगा।

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