बहू कम और बेटी ज्यादा

“रोहन, तुम किसी भी गलतफहमी में मत रहना। मैं तुम्हारी माँ की तीमारदारी करने के लिए वहाँ बिल्कुल नहीं जा रही हूँ।” श्रुति ने अपने बैग में लैपटॉप रखते हुए बहुत ही सपाट और कठोर स्वर में कहा। रोहन ने अभी-अभी फोन रखा था और वह गहरी चिंता में था। फोन उसके गृहनगर से था। उसकी माँ, विमला जी, बारिश के कारण आँगन में फिसल गई थीं और उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई थी। रोहन और श्रुति अपनी-अपनी कॉर्पोरेट नौकरियों के कारण पुणे में रहते थे, जबकि रोहन के माता-पिता, विमला जी और रमेश जी, बनारस के अपने पुराने पुश्तैनी मकान में अकेले ही अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे थे। दोनों बुजुर्ग अपनी दिनचर्या में खुश थे, लेकिन इस अचानक हुए हादसे ने सब कुछ बदलकर रख दिया था।

रोहन ने श्रुति की तरफ देखते हुए कहा, “श्रुति, माँ बिस्तर पर हैं। पिताजी अकेले सब कैसे संभालेंगे? मुझे लगा था कि ऐसे मुश्किल वक्त में तुम कम से कम एक महीने की छुट्टी लेकर मेरे साथ चलोगी।”

श्रुति ने गहरी सांस ली और मुड़कर रोहन की आँखों में देखा। “रोहन, मुझे पता है कि तुम्हें बुरा लग रहा है, लेकिन तुम उन दिनों को कैसे भूल सकते हो जब तुम्हारी माँ ने मुझे इस परिवार का हिस्सा मानने से ही इनकार कर दिया था? मेरी नौकरी, मेरे पहनावे, मेरे खाना बनाने के तरीके—हर चीज़ पर उन्होंने मुझे ताने दिए हैं। जब मैं बीमार पड़ी थी, तब तो वो देखने भी नहीं आईं। मैं कोई पत्थर की नहीं हूँ जिसे चोट नहीं लगती। तुम जा रहे हो, तुम जाओ, तुम उनके बेटे हो। पर मुझसे एक आज्ञाकारी बहू होने का नाटक नहीं होगा।”

रोहन के पास श्रुति की बातों का कोई ठोस जवाब नहीं था। वह जानता था कि विमला जी का स्वभाव थोड़ा तीखा था और उन्होंने शुरुआत में श्रुति को काफी परेशान किया था। रोहन ने बिना कोई और बहस किए अपना सूटकेस पैक किया, ऑफिस से इमरजेंसी छुट्टी ली और अकेले ही बनारस के लिए निकल गया।

श्रुति अब पुणे के उस बड़े से फ्लैट में अकेली थी। शुरुआत के दो दिन उसे लगा कि उसने सही फैसला लिया है। उसने अपनी आत्म-शांति को चुना है। वह समय पर ऑफिस जाती, घर लौटकर अपनी मनपसंद वेब सीरीज़ देखती और आराम से सो जाती। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, उस बड़े से घर का सन्नाटा उसे काटने लगा था। एक अजीब सी बेचैनी उसके मन में घर करने लगी थी। वह खुद को सही साबित करने की लाख कोशिशें करती, लेकिन कहीं न कहीं एक अपराधबोध उसके सीने में सुलग रहा था।

पाँचवें दिन की शाम थी। श्रुति ऑफिस से लौटकर सोफे पर बैठी ही थी कि उसका फोन बजा। स्क्रीन पर ‘ससुर जी’ लिखा आ रहा था। श्रुति का दिल ज़ोर से धड़क उठा। उसने सोचा कि शायद रमेश जी उसे ताना मारने या शिकायत करने के लिए फोन कर रहे हैं कि वह इस मुश्किल घड़ी में उनके पास क्यों नहीं आई। कुछ पल झिझकने के बाद उसने फोन उठा लिया।

“हैलो, पिताजी,” श्रुति ने धीमी आवाज़ में कहा।

उधर से रमेश जी की थकी हुई लेकिन बेहद शांत और स्नेह भरी आवाज़ आई, “कैसी हो बेटा? ऑफिस से आ गई?”

श्रुति थोड़ी हैरान हुई। “जी पिताजी, मैं ठीक हूँ। माँ जी की तबीयत अब कैसी है?”

रमेश जी ने एक हल्की सी आह भरते हुए कहा, “वो तो अब बिस्तर पर हैं बेटा, दर्द तो है ही। रोहन बहुत भागदौड़ कर रहा है। लेकिन मैंने तुम्हें इसलिए फोन नहीं किया था। रोहन बता रहा था कि तुम्हारे ऑफिस में कोई बहुत बड़ा प्रोजेक्ट चल रहा है। मैं बस यह कहने के लिए फोन कर रहा था कि तुम हमारी बिल्कुल चिंता मत करना। रोहन यहाँ है और मैं भी हूँ। तुम वहाँ अकेली हो, अपने खाने-पीने का ध्यान रखना बेटा। काम के चक्कर में खाना मत भूल जाना। अपना ख्याल रखना।”

श्रुति के गले में जैसे कुछ अटक सा गया। ससुर जी ने एक बार भी शिकायत नहीं की। उन्होंने यह नहीं पूछा कि वह क्यों नहीं आई। उलटा, वे उसकी चिंता कर रहे थे। उस एक फोन कॉल ने श्रुति के अंदर जमे हुए सालों के बर्फ को एक झटके में पिघला दिया। उसे अपने आप पर बहुत शर्मिंदगी महसूस होने लगी। उसने सोचा, “मैं कितनी स्वार्थी हो गई हूँ। मैंने माँ जी की कड़वी बातों को तो याद रखा, लेकिन पिताजी के इस निस्वार्थ प्रेम को कभी नहीं देखा। जब इंसान लाचार होता है, तब सारे गिले-शिकवे भुला देने चाहिए।”

उस रात श्रुति सो नहीं पाई। अगली सुबह उसने सबसे पहला काम अपने बॉस को फोन करके एक महीने की छुट्टी मंजूर करवाने का किया। उसने अपना सूटकेस पैक किया और बनारस की फ्लाइट पकड़ ली।

जब श्रुति बनारस वाले घर के दरवाजे पर पहुँची, तो शाम ढल रही थी। रोहन बाहर बरामदे में बैठा किसी डॉक्टर से फोन पर बात कर रहा था। श्रुति को सूटकेस के साथ दरवाजे पर खड़ा देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

“तुम… तुम यहाँ?” रोहन के मुँह से बस इतना ही निकला।

श्रुति हल्की सी मुस्कुराई, “पिताजी ने कहा था कि अपना ख्याल रखना, तो मैंने सोचा कि अपनों के बीच रहकर ख्याल रखना ज्यादा आसान होता है।”

श्रुति सीधे विमला जी के कमरे में गई। विमला जी दर्द से कराह रही थीं और उनकी आँखें बंद थीं। श्रुति ने धीरे से जाकर उनके पैरों के पास बैठ कर उनके पैरों को सहलाना शुरू किया। किसी अनजान स्पर्श को महसूस कर विमला जी ने आँखें खोलीं। अपने सामने श्रुति को देखकर वे अवाक रह गईं। उनके चेहरे पर आश्चर्य और अपराधबोध के भाव एक साथ तैरने लगे।

“तू… तू आ गई श्रुति?” विमला जी की आवाज़ कांप रही थी।

श्रुति ने उनके हाथ को अपने हाथों में लेते हुए कहा, “हाँ माँ जी, मैं आ गई। अब आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। आप जल्दी से ठीक हो जाइए, फिर हम मिलकर ढेर सारी बातें करेंगे।”

विमला जी की आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने अपने कांपते हाथों से श्रुति का सिर सहलाया और रुंधे हुए गले से कहा, “मुझे माफ कर दे बेटी। मैंने हमेशा तुझे एक बाहरी इंसान समझा, तेरे तौर-तरीकों पर ताने मारे। लेकिन आज मेरे अपने शरीर ने मेरा साथ छोड़ दिया है, और तू मेरे पुराने सारे कड़वे बोल भुलाकर मेरे पास दौड़ी चली आई। तू सच में मेरी बेटी है।”

श्रुति की आँखें भी नम हो गईं। उसने विमला जी के आँसू पोंछते हुए कहा, “माँ जी, पुरानी बातों को भूल जाइए। परिवार में शिकायतें तो होती ही हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हम एक-दूसरे का हाथ छोड़ दें। अब बस आप जल्दी से ठीक होने पर ध्यान दीजिए।”

दरवाजे पर खड़े रोहन और रमेश जी यह सब देख रहे थे। रमेश जी के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। उस दिन के बाद से घर का पूरा माहौल ही बदल गया। श्रुति ने न केवल विमला जी की शारीरिक सेवा की, बल्कि अपने प्यार और समर्पण से उनके दिल के सारे घाव भी भर दिए। विमला जी अब श्रुति को अपनी बहू कम और बेटी ज्यादा मानने लगी थीं। एक दुर्घटना ने भले ही विमला जी की हड्डी तोड़ी थी, लेकिन उसी दुर्घटना ने एक परिवार को हमेशा के लिए अटूट धागे में पिरो दिया था।

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