देहरी की छाँव
ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मयंक की उँगलियाँ लगातार अपनी हथेलियों को मसल रही थीं। बाहर तेजी से पीछे छूटते हरे-भरे खेत, आम की अमराइयां और धूल उड़ाती पगडंडियाँ गवाह थीं कि उसका पैतृक कस्बा अब बस चंद मिनटों की दूरी पर था। पूरे आठ साल बीत चुके थे इस रास्ते से गुजरे … Read more