देहरी की छाँव

 ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मयंक की उँगलियाँ लगातार अपनी हथेलियों को मसल रही थीं। बाहर तेजी से पीछे छूटते हरे-भरे खेत, आम की अमराइयां और धूल उड़ाती पगडंडियाँ गवाह थीं कि उसका पैतृक कस्बा अब बस चंद मिनटों की दूरी पर था। पूरे आठ साल बीत चुके थे इस रास्ते से गुजरे … Read more

भारी मन (अर्चना सिंह)

कीर्ति भारी मन से अपनी पड़ोसन नैना के घर से लौट आई। घर आकर ना जाने क्यों आज कीर्ति के मन में अंतर्द्वंद चल रहा था और बहुत बोझिल सी स्थिति हो रही थी। इसका कारण खुद कीर्ति भी नहीं समझ पा रही थी। अचानक पौधों को बालकनी में लहराते देख कीर्ति को याद आया.. … Read more

मौन की दीवारें 

 अगले कुछ हफ़्ते उस छोटे से फ्लैट में एक दमघोंटू सन्नाटे की तरह गुज़रे। दोनों एक ही बिस्तर पर सोते थे, लेकिन उनके बीच अनकहे शब्दों की एक विशाल खाई बन चुकी थी। नयना को लगने लगा कि उसकी आधुनिकता, उसकी समझदारी और उसकी स्वतंत्रता शायद इस मौन के सामने हार रही थी। उसने महसूस … Read more

दहलीज की धूप

 “नहीं देवांश, मुझे आज अपनी बात पूरी करने दीजिए,” अवनि ने हाथ उठाकर बहुत शांति से अपने पति को रोका। फिर वह दीनानाथ जी की आँखों में आँखें डालकर बोली, “बाबूजी, आपने मुझे हमेशा बेटी कहा, लेकिन मुझे कभी उस बेटी जैसा अधिकार नहीं दिया जो आपकी विरासत को आगे बढ़ा सके। आपने मुझे एक … Read more

ढलती उम्र का हिसाब

वकील के भेजे हुए उस भारी-भरकम लीगल लिफाफे को हाथ में थामे मालती के चेहरे पर न तो कोई शिकन थी और न ही आंखों में आंसुओं की नमी। छब्बीस पन्नों के उस कानूनी मसौदे पर अंग्रेजी के बेजान अक्षरों में वैवाहिक अलगाव, भरण-पोषण और चल-अचल संपत्ति के अधिकारों की लंबी-चौड़ी दलीलें दर्ज थीं। जिंदगी … Read more

चौखट की लकीरें

 “वही रीत तो अब बदलनी है, भाई साहब,” कल्याणी ने हाथ में थामी एक पर्ची मेज पर रख दी। “यह उन चीजों की सूची है जो अनन्या को पसंद हैं। अनन्या पढ़ी-लिखी लड़की है, कॉलेज में पढ़ाती है। वह इस घर में किसी की मर्जी का खिलौना बनकर नहीं, बल्कि एक इंसान बनकर कदम रखेगी। … Read more

रेत पर खिली धूप

विनीता पहले तो झिझकी, पर अंदर से उसका मन भी इस घुटन भरी जिंदगी से थोड़ी देर के लिए बाहर निकलने को मचल रहा था। वह कैफे में एक कोने की मेज पर आमने-सामने बैठ गए। अपूर्व ने कॉफी का ऑर्डर दिया। उसने विनीता के चेहरे को ध्यान से देखा और बहुत ही संवेदनशील लहजे … Read more

पूर्णता की तलाश और मन का दर्पण

“मम्मी जी, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ, अगर आप बुरा न मानें तो,” अवनि ने बहुत आदर के साथ बात शुरू की। “जब से मेरी शादी हुई है, मैं पूरी कोशिश कर रही हूँ कि मैं इस घर के नियमों और आपकी प्राथमिकताओं को समझूँ। मैं आपकी उम्र और आपके तजुर्बे का दिल से … Read more

ममता की कोई जात नहीं होती

कौशल्या देवी ने बहुत ही गंभीर, मगर स्पष्ट और बुलंद आवाज में कहा, “कांति बहन, तुम हमारी समवयस्क हो, इसलिए तुम्हारी बात का मान रखते हुए बड़े प्यार से एक बात पूछना चाहती हूं। जब कोई बच्चा अपनी मां के गर्भ में नौ महीने पलता है, तो क्या उस मां का खून, उसकी हड्डियां और … Read more

दहलीज के पार का अपनापन

पंखुड़ी की बातों ने अर्णव के जमीर को झकझोर कर रख दिया। पंखुड़ी ने आगे कहा, “भैया, कल को जब मेरी शादी हो जाएगी और मैं सालों बाद तुम्हारे घर आऊंगी, और अगर तुम्हारे बच्चे मेरे साथ ऐसा ही अजनबियों जैसा बर्ताव करेंगे, तो सोचो मेरी रूह पर क्या गुजरेगी? क्या मायके का रिश्ता सिर्फ … Read more

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