“पापा कहाँ हैं माँ?” घर की दहलीज पर कदम रखते ही सुमित ने अपनी माँ, सुलोचना जी से पूछा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी थकावट और आँखों में एक छिपी हुई उलझन थी।
सुलोचना जी बरामदे में बैठी स्वेटर बुन रही थीं। उन्होंने सुमित की आवाज़ सुनकर एक बार नज़र उठाई, लेकिन अगले ही पल फिर से अपनी सलाईयों में उलझ गईं। “अपने कमरे में हैं। लेकिन क्यों? अचानक बिना बताए आना हुआ, क्या काम आ पड़ा उनसे?” सुलोचना जी के स्वर में एक तीखी बेरुखी और ताना साफ़ झलक रहा था।
“अरे कुछ नहीं माँ, बस… ऐसे ही मिलना था पापा से,” सुमित ने अपनी घबराहट को छुपाते हुए और थोड़ा नम्र होने का दिखावा करते हुए कहा। वह अपनी माँ की आँखों में देखने से बच रहा था।
“अच्छा!” इतना कहकर सुलोचना जी उठीं और रसोई की तरफ चली गईं, जैसे उन्हें सुमित के आने से कोई खास फर्क न पड़ा हो। सुमित ने राहत की सांस ली और दबे पाँव, अपनी माँ से आँख बचाकर अपने पिता दीनानाथ जी के कमरे की ओर खिसक गया।
इधर रसोई में जाते ही सुलोचना जी का माथा ठनक गया। उनके मन में पुराने घाव ताज़ा हो गए। “हो न हो, आज फिर यह अपने पापा से पैसे ऐंठने आया है,” उन्होंने मन ही मन बुदबुदाया। सुलोचना जी को याद था कि तीन साल पहले सुमित ने अपना नया बिज़नेस शुरू करने के लिए दीनानाथ जी के रिटायरमेंट के सारे पैसे ले लिए थे। उस वक्त दीनानाथ जी ने बिना सोचे-समझे अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई बेटे के हाथ में रख दी थी। लेकिन उसके बाद सुमित जैसे इस घर को ही भूल गया। ना कभी समय पर मिलने आता, ना फोन करता। जब भी आता, तो किसी न किसी बहाने से पैसे ही मांगता। सुलोचना जी को लगता था कि उनका बेटा शहर की चकाचौंध में अंधा होकर पूरी तरह से स्वार्थी हो चुका है।
“आज मैं भी देखती हूँ कि यह बाप-बेटे क्या खिचड़ी पका रहे हैं,” सुलोचना जी ने गैस धीमी की और दबे पाँव सुमित के पीछे-पीछे दीनानाथ जी के कमरे के दरवाज़े तक पहुँच गईं। दरवाज़ा आधा खुला था। सुमित पीठ किए हुए अपने पिता के बिस्तर के पास बैठा था और सुलोचना जी दरवाज़े की ओट में छुपकर खड़ी हो गईं। सुमित उन्हें देख नहीं पाया।
दीनानाथ जी अपने बिस्तर पर लेटे हुए कोई किताब पढ़ रहे थे। सुमित को देखकर उनके चेहरे पर एक कमज़ोर सी मुस्कान आ गई। “अरे सुमित! आ गया बेटा? आज अचानक कैसे आना हुआ? सब ठीक तो है न?” दीनानाथ जी ने अपनी ऐनक उतारते हुए पूछा।
सुमित ने आगे बढ़कर पिता के पैर छुए और उनके पास ही ज़मीन पर बैठ गया। सुलोचना जी बाहर से कान लगाए सुन रही थीं। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि अभी सुमित अपने बिज़नेस में घाटे का रोना रोएगा और कुछ पैसों की मांग करेगा।
“पापा, आप कैसे हैं? आपकी खांसी कैसी है अब?” सुमित ने पिता के कमज़ोर हाथों को अपने हाथों में लेते हुए पूछा।
“मैं तो ठीक हूँ बेटा। उम्र का तकाज़ा है, थोड़ी बहुत खांसी तो रहेगी ही। तू अपनी बता, बिज़नेस कैसा चल रहा है? तुझे कोई परेशानी तो नहीं है?” दीनानाथ जी ने हमेशा की तरह अपनी तकलीफ छुपाते हुए बेटे की फिक्र की।
सुमित कुछ पल चुप रहा। कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। बाहर खड़ी सुलोचना जी का गुस्सा और बढ़ने लगा कि अब यह अपनी पैसों की मांग शुरू करेगा।
तभी सुमित ने अपने बैग से एक खाकी रंग का लिफाफा निकाला और दीनानाथ जी के हाथों में रख दिया। दीनानाथ जी ने हैरानी से लिफाफे को देखा, “यह क्या है बेटा?”
“खोल कर देखिए पापा,” सुमित की आवाज़ में एक अजीब सा कंपन था।
दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। उसमें कुछ कानूनी कागज़ात और एक बैंक का ड्राफ्ट था। कागज़ात देखकर दीनानाथ जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। “सुमित… ये… ये तो हमारे पुश्तैनी मकान के कागज़ हैं! और ये बैंक ड्राफ्ट…”
सुमित की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने पिता के घुटनों पर अपना सिर रख दिया और रुंधे हुए गले से बोला, “हाँ पापा, ये उसी पुश्तैनी मकान के कागज़ हैं जिसे मेरे बिज़नेस के लिए आपको गिरवी रखना पड़ा था। और यह बैंक ड्राफ्ट उन पैसों का है जो मैंने आपसे तीन साल पहले लिए थे। मुझे माफ़ कर दीजिए पापा।”
बाहर खड़ी सुलोचना जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह अवाक रह गईं।
सुमित सुबकते हुए कह रहा था, “पापा, आप और माँ सोचते होंगे कि मैं बहुत स्वार्थी हूँ। पैसे लेकर आपको भूल गया। लेकिन सच यह है पापा कि बिज़नेस के शुरुआती दो सालों में मुझे इतना भयंकर घाटा हुआ था कि मैं कर्ज़ में डूब गया था। मेरी हिम्मत नहीं होती थी कि मैं आपके और माँ के सामने आकर यह बता सकूँ कि मैंने आपकी जीवन भर की कमाई डुबो दी है। मैं दिन-रात पागलों की तरह काम करता था। मैंने अपना फ्लैट छोड़ दिया, एक छोटे से कमरे में रहकर पैसे बचाए ताकि एक दिन आपका सम्मान वापस लौटा सकूँ। मैं माँ की नफरत और आपके इंतज़ार को सहता रहा, सिर्फ इसलिए कि जब आऊँ, तो आपके हाथ खाली न हों।”
दीनानाथ जी की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। उन्होंने झुककर सुमित का माथा चूम लिया और उसे सीने से लगा लिया। “पगले! तूने ऐसा क्यों सोचा कि मैं और तेरी माँ तुझे पैसों के तराज़ू में तौलेंगे? पैसा तो आनी-जानी चीज़ है बेटा, लेकिन ये जो तू इतने सालों तक घुट-घुट कर जीता रहा, उसका क्या? तू अगर खाली हाथ भी आ जाता, तो क्या हम तुझे गले नहीं लगाते?”
दरवाज़े के बाहर खड़ी सुलोचना जी अब अपने आँसू नहीं रोक पा रही थीं। उनका दिल ग्लानि और दर्द से भर गया। जिस बेटे को वह स्वार्थी समझ रही थीं, वह तो अपने माता-पिता के स्वाभिमान को वापस लाने के लिए अकेले ही दुनिया से लड़ रहा था। उसकी बेरुखी असल में उसकी शर्मिंदगी थी।
सुलोचना जी से और नहीं रुका गया। उन्होंने दरवाज़ा खोला और अंदर आ गईं। सुमित ने चौंककर पीछे देखा। सुलोचना जी दौड़कर सुमित के पास गईं और उसे ज़मीन से उठाकर अपने गले से लगा लिया।
“माँ…” सुमित बस इतना ही कह पाया और फूट-फूट कर रोने लगा।
“चुप कर जा मेरे लाल! मुझे माफ़ कर दे,” सुलोचना जी रोते हुए सुमित के बाल सहलाने लगीं। “मैं तेरी खामोशी को नहीं समझ पाई। मैं एक माँ होकर भी तुझे पहचानने में धोखा खा गई। मुझे लगा तू हमसे दूर चला गया है, पर तू तो हमेशा हमारे सम्मान के लिए लड़ रहा था। मुझे कोई घर, कोई पैसा नहीं चाहिए। मुझे बस मेरा बेटा चाहिए।”
कमरे में तीनों की आँखों में आँसू थे, लेकिन ये आँसू अब दुख के नहीं, बल्कि सालों की गलतफहमी मिट जाने के सुकून के थे। दीनानाथ जी ने प्यार से अपनी पत्नी और बेटे को देखा। आज उस घर की दीवारें भी मुस्कुरा रही थीं, क्योंकि आज सिर्फ गिरवी रखा हुआ मकान ही वापस नहीं आया था, बल्कि एक परिवार का खोया हुआ प्यार और विश्वास हमेशा के लिए लौट आया था।
***
आपको यह पारिवारिक कहानी कैसी लगी? क्या आपने भी कभी अपने किसी करीबी के मौन को गलत समझा है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।