“भाभी, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी बच्चियों को इस तरह मनहूस और बोझ कहना बंद कर दीजिए। जब मुझे और इनके पिता को इनका कोई भार नहीं लगता, तो आप लोग क्यों इनके भविष्य की चिंता में अपना खून जला रही हैं?” सुमेधा ने अपनी तीन छोटी-छोटी बेटियों को सीने से चिपकाते हुए रुंधे हुए गले से कहा। उसकी आँखों से बहते आंसू उसकी बेटियों के गालों को भिगो रहे थे।
सुमेधा की बड़ी जेठानी, विमला ने मुंह बनाते हुए एक तीखा ताना मारा, “अरे रहने दे सुमेधा! ज्यादा ममता की मूरत बनने की जरूरत नहीं है। तूने और तेरे पति ने जरूर पिछले जन्म में कोई भारी पाप किए होंगे, तभी तो भगवान ने लाइन से तीन-तीन लड़कियां तुम्हारे गले में बांध दी हैं। हमारी मानती तो एक बेटे के लिए मन्नत मांगती। अब देखना, सारी उम्र तुम दोनों पति-पत्नी इन तीनों का दहेज जोड़ते-जोड़ते चप्पलें घिस दोगे और फिर भी लड़के वालों के सामने हाथ बांध कर, सिर झुका कर ही खड़ा रहना पड़ेगा। बेटियां तो होती ही हैं दूसरों के घर की खेती, और तुम जैसे अभागों को उम्र भर इनके ससुराल वालों के तलवे ही चाटने पड़ेंगे।”
पास ही बैठी सास ने भी विमला की बात में हामी भरते हुए कहा, “बड़ी बहू बिल्कुल सौ टके की बात कह रही है। देख मेरे बड़े बेटे को, भगवान ने कैसा चाँद सा बेटा दिया है, ‘आदित्य’। वही हमारे वंश का नाम रोशन करेगा। और तुम्हारे पति सुधीर ने तो अपनी जिंदगी इन तीन लड़कियों के चक्कर में नरक बना ली है।”
सुमेधा का दिल इन कड़वी बातों से छलनी हो गया था। वह बिना कोई जवाब दिए अपनी तीनों बेटियों—नीता, नव्या और निहारिका—को लेकर अपने कमरे में आ गई। रात को जब सुधीर काम से लौटा, तो सुमेधा की लाल आंखें देखकर सब समझ गया। उसने सुमेधा के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “सुमेधा, दुनिया क्या कहती है, इस बात से हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। लोग कहते हैं बेटियां पराया धन होती हैं, लेकिन मैं कहता हूँ मेरी बेटियां मेरी दौलत नहीं, मेरा अभिमान हैं। हम इनके लिए दहेज नहीं जोड़ेंगे, बल्कि हम उस पैसे से इन्हें इतनी तालीम देंगे कि ये खुद अपना कल लिखें। ये किसी के आगे नहीं झुकेंगी।”
समय अपनी गति से बीतता रहा। सुधीर और सुमेधा ने अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। सुधीर ने ओवरटाइम करना शुरू किया और सुमेधा ने घर पर सिलाई का काम पकड़ लिया। घर में कई बार ऐसा होता कि वे दोनों सूखी रोटी खाकर सो जाते, लेकिन बेटियों की किताबों और ट्यूशन की फीस में कभी कोई कमी नहीं आने दी। दूसरी तरफ, विमला और उनके पति अपने इकलौते बेटे आदित्य के हर नखरे उठाते। आदित्य को महंगी बाइक दिलाई गई, उसे पॉकेट मनी के नाम पर हजारों रुपये दिए जाते। जब भी सुमेधा बेटियों के लिए किताबें लाती, विमला ताना मारती, “किताबों से घर नहीं बसते सुमेधा! लड़कियों को चूल्हा-चौका सिखाओ, वही उनके ससुराल में काम आएगा। मेरा आदित्य तो देखना एक दिन विदेश जाकर डॉलर कमाएगा।”
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। लाड-प्यार में बिगड़ा आदित्य पढ़ाई में फिसड्डी निकला। जैसे-तैसे उसने एक प्राइवेट कॉलेज से डिग्री ली और दोस्तों की देखा-देखी विदेश जाने की जिद पकड़ ली। विमला और उनके पति ने अपना आधा पुश्तैनी मकान गिरवी रखकर उसे कनाडा भेज दिया। उन्हें लगा कि अब उनका बेटा वहां से पैसों की बारिश करेगा।
इधर, सुमेधा की तीनों बेटियों ने अपनी मेहनत से आसमान छू लिया। बड़ी बेटी नीता मेडिकल की पढ़ाई पूरी करके शहर के सबसे बड़े अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट बन गई। मंझली नव्या ने सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली और शहर में ही प्रशासनिक अधिकारी बन गई। छोटी निहारिका एक नामी मल्टीनेशनल बैंक में ब्रांच मैनेजर की कुर्सी तक पहुँच गई। सुधीर और सुमेधा का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। अब समाज के जो लोग कल तक उनके तीन बेटियां होने पर ताने मारते थे, आज वही लोग उनकी मिसालें देते नहीं थकते थे।
कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब एक रात विमला के पति (सुधीर के बड़े भाई) को अचानक सीने में तेज दर्द उठा। उन्हें भयंकर हार्ट अटैक आया था। घर में अफरा-तफरी मच गई। विमला रोते-पीटते उन्हें पास के सरकारी अस्पताल ले गईं, जहाँ डॉक्टरों ने जवाब दे दिया और किसी बड़े प्राइवेट अस्पताल में ले जाने को कहा। विमला ने घबराकर अपने बेटे आदित्य को कनाडा फोन किया। आदित्य ने फोन उठाते ही झिड़क कर कहा, “माँ, मैं यहाँ अपना काम छोड़कर इंडिया नहीं आ सकता। मेरे पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि मैं वहाँ अस्पताल का बिल भर सकूँ। आप लोग खुद कुछ मैनेज कर लो।” इतना कहकर उसने फोन काट दिया। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी सारी जिंदगी की कमाई लुटा दी थी, उसने मुश्किल वक्त में उन्हें बेसहारा छोड़ दिया।
विमला अस्पताल के फर्श पर बैठकर फूट-फूट कर रो रही थी। उसे लगा कि अब उसके पति नहीं बचेंगे। तभी अस्पताल के कॉरिडोर में तेजी से कदमों की आहट हुई। सुमेधा और सुधीर अपनी तीनों बेटियों के साथ वहां खड़े थे। नीता जो खुद एक हार्ट स्पेशलिस्ट थी, उसने तुरंत अस्पताल के स्टाफ से बात की और अपने ताऊ जी को अपने ही बड़े अस्पताल में शिफ्ट करवाया। नव्या ने प्रशासनिक तौर पर सारी कागजी कार्रवाई चुटकियों में पूरी करवा दी, और निहारिका ने बैंक से तुरंत पैसों का इंतजाम करके अस्पताल के काउंटर पर लाखों रुपये का बिल बिना किसी झिझक के जमा कर दिया।
अगले 48 घंटे नीता ने खुद ऑपरेशन थियेटर और आईसीयू में खड़े रहकर अपने ताऊ जी की जान बचाई। जब विमला के पति को होश आया और डॉक्टर ने बताया कि उनकी जान उनकी भतीजी की वजह से बची है, तो उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले।
विमला भारी कदमों से चलकर सुमेधा के पास आई। जो सुमेधा कभी उसके तानों के आगे सिर झुकाए खड़ी रहती थी, आज विमला उसके पैरों में गिर पड़ी। “मुझे माफ कर दे सुमेधा! मैंने सारी जिंदगी तेरी बेटियों को कोसा, उन्हें पत्थर और बोझ कहा। जिस बेटे को मैंने अपने बुढ़ापे की लाठी समझा था, वो तो दूर देश में बैठकर मेरी मौत का तमाशा देख रहा है। और जिन बेटियों को मैंने पराया धन कहा, आज वही मेरे पति की जान बचाकर मेरे लिए भगवान बन गई हैं। तूने कोई पाप नहीं, बल्कि बहुत बड़े पुण्य किए थे जो तुझे ये तीन बेटियां मिलीं।”
सुमेधा ने तुरंत विमला को उठाया और गले से लगा लिया। “दीदी, बेटियां कभी बदला नहीं लेतीं, वो तो सिर्फ प्यार और सम्मान चाहती हैं। आज मेरी बेटियों ने साबित कर दिया कि वो बोझ नहीं, बल्कि इस परिवार का सबसे मजबूत आधार हैं।” उस दिन अस्पताल के उस कमरे में केवल आंसू थे, लेकिन ये आंसू पछतावे और एक नई सोच के जन्म के थे। बेटियों ने न सिर्फ जान बचाई थी, बल्कि एक सड़ी-गली सोच को भी जड़ से उखाड़ फेंका था।
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