समर्पण का दूसरा नाम

अगर यह व्रत प्रेम का प्रतीक है, अगर यह दो आत्माओं के एक होने का उत्सव है, तो फिर तपस्या सिर्फ एक तरफ से क्यों? अगर अनन्या उसके स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए प्यासी रह सकती है, तो क्या उसका यह कर्तव्य नहीं बनता कि वह भी उस पीड़ा और उस भाव का भागीदार बने? प्रेम में बराबरी केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण की भी होनी चाहिए। अर्णव ने चुपचाप फैसला कर लिया। सुबह सरगी के बाद उसने भी चाय के अलावा कुछ नहीं खाया था, अब उसने तय किया कि जब तक अनन्या का व्रत नहीं खुलेगा, वह भी अन्न या जल का एक घूंट तक गले से नीचे नहीं उतारेगा।

कार्तिक के आते ही गुलाबी ठंड ने जयपुर की आबोहवा में एक अनोखी मिठास घोल दी थी। हवेलीनुमा पुराने मकान के दालान में खड़ी धूप अब चुभती नहीं, बल्कि मन को एक रेशमी गर्माहट से भर देती थी। आंगन के बीचों-बीच लगे पारिजात के पेड़ से रात भर सफेद-नारंगी फूल झड़ते रहते और सुबह पूरा फर्श एक सुगंधित चादर की तरह महक उठता। पहली मंजिल की बालकनी में खड़ा अर्णव हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए नीचे आंगन की चहल-पहल को निहार रहा था। उसका मन किसी अनकहे, भीने-भीने उत्साह के झूले में झूल रहा था। शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी बीते अभी दो ही दिन हुए थे और हवेली की दीवारों में एक अलग ही त्योहार की गूंज सुनाई देने लगी थी। परसों करवाचौथ था।

अर्णव और अनन्या के विवाह को अभी बमुश्किल चार महीने ही बीते थे। यह अर्णव के जीवन का वह मोड़ था, जहां उसने एक अल्हड़ लड़के से एक जिम्मेदार, संवेदनशील साथी बनने का सफर शुरू किया था। वह मन ही मन सोच रहा था कि अब तक हर साल यह दिन उसके लिए केवल स्वादिष्ट पकवानों, नए कुर्ते और मां की सजी-धजी थाली तक सीमित रहता था। लेकिन इस बार, पहली बार, कोई उसके लिए निर्जल उपवास रखने जा रहा था। अनन्या, उसकी जीवनसंगिनी, उसकी लंबी उम्र और सलामती के लिए दिन भर भूखी-प्यासी रहेगी। यह विचार आते ही अर्णव के होंठों पर एक मीठी सी मुस्कान तैर गई, पर उस मुस्कान के पीछे एक हल्की सी लकीर चिंता की भी खिंच गई।

बचपन की यादें किसी चलचित्र की भांति अर्णव की आंखों के आगे घूमने लगीं। हर साल उसने अपनी मां, कल्याणी जी को देखा था। सुबह भोर में चार बजे उठकर सरगी खाना, फिर दिन भर बिना पानी की एक बूंद पिए पूरे घर की व्यवस्था देखना। पिताजी, पंडित उमाकांत जी, यूं तो बड़े शांत और गंभीर स्वभाव के थे, पर करवाचौथ वाले दिन उनके चेहरे पर मां के प्रति जो मौन कृतज्ञता और स्नेह दिखता था, वह अद्भुत होता था। शाम ढलते ही छत पर फेरे लगना शुरू हो जाते थे। मां हर दस मिनट में अर्णव और उसकी छोटी बहन को छत पर दौड़ाती थीं कि देखो तो जरा, चांद कहीं बादलों के पीछे से झांक रहा है क्या। और वो नटखट चांद भी जैसे साल भर इसी दिन का इंतजार करता था, ताकि सज-धज कर बैठी सुहागिनों को अपनी एक झलक के लिए तरसा सके। जब आखिरकार चांद निकलता, तो मां छलनी में दिया रखकर पहले उस गगन के चांद को देखतीं, फिर छलनी घुमाकर अपने सामने खड़े पिताजी को निहारतीं। पिताजी के चेहरे पर उस वक्त जो गर्व और प्रेम का भाव होता था, अर्णव उसे कभी भूल नहीं पाया था। पारण के बाद हवेली की छत पर देर रात तक हंसी-ठिठोली और पकवानों का दौर चलता रहता था।

लेकिन आज अर्णव के दिल में एक गहरा द्वंद्व था। मां की पीढ़ी और अनन्या की पीढ़ी में जमीन-आसमान का फर्क था। अनन्या एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में डेटा एनालिस्ट थी। उसकी जिंदगी स्क्रीन्स, डेटा फाइल्स, डेडलाइन्स और तय घंटों के बीच चलती थी। वह कभी सुबह की ब्लैक कॉफी छोड़े बिना काम नहीं शुरू कर सकती थी, और अगर दोपहर के खाने में एक घंटा भी देर हो जाए तो उसका सिर दर्द से फटने लगता था। वह नाजुक थी, दिल की बेहद साफ, आधुनिक सोच वाली, पर शारीरिक रूप से उपवास की अभ्यस्त बिल्कुल नहीं थी। शादी के बाद उसने हर पारिवारिक परंपरा को खुले दिल से अपनाया था, कभी किसी बात पर नाक-भौं नहीं सिकोड़ी थी। पर क्या वह सचमुच पूरे दिन बिना अन्न-जल के रह पाएगी? अगर ऑफिस के काम के तनाव के बीच उसकी तबीयत बिगड़ गई तो?

अर्णव नीचे उतरा। बैठक में कल्याणी जी चांदी की पूजा की थाली को चमकाने में व्यस्त थीं। पास ही लाल, सुनहरी और गोटा-पत्ती वाली साड़ियां फैली हुई थीं। अनन्या की पहली करवाचौथ के लिए मां का उत्साह देखते ही बनता था। उन्होंने शहर के सबसे मशहूर सुनार से बहू के लिए करवे के डिजाइन वाले कुंडल बनवाए थे। अर्णव धीरे से मां के पास जाकर बैठ गया और संकोच से बोला, “मां… एक बात पूछनी थी।”

कल्याणी जी ने चश्मे के ऊपर से बेटे को देखा और मुस्कुराईं, “बोल लल्ला, आज सुबह-सुबह इतना गंभीर चेहरा क्यों बना रखा है?”

अर्णव ने अपनी उंगलियां आपस में उलझाते हुए कहा, “मां, अनन्या के लिए यह सब बहुत नया है। उसने कभी कॉलेज के दिनों में भी कोई व्रत नहीं रखा। ऊपर से इस हफ्ते उसके प्रोजेक्ट की बड़ी रिलीज है। क्या उसके लिए पूरा दिन निर्जला रहना जरूरी है? कहीं उसकी तबीयत खराब हो गई तो? अगर वह सिर्फ पूजा में बैठ जाए और व्रत न रखे तो क्या कोई अनर्थ हो जाएगा?”

कल्याणी जी ने हाथ में पकड़ा हुआ काम रोक दिया। उन्होंने अर्णव के चेहरे पर तैरती गहरी फिक्र को देखा। पहले तो उनके चेहरे पर एक बनावटी शिकायती भाव आया, “अरे वाह रे मेरे श्रवण कुमार! जब तक शादी नहीं हुई थी, तब तक तो कभी नहीं पूछा कि मां सुबह से प्यासी है, तेरे सिर में दर्द तो नहीं हो रहा? और आज बहू के लिए अभी से कलेजा मुंह को आ रहा है?”

अर्णव झेंप गया, “मां, मेरा वो मतलब नहीं था… आप तो बचपन से अभ्यस्त हैं।”

कल्याणी जी हंस पड़ीं और बेटे के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलीं, “पगले, मैं तो तुझे छेड़ रही थी। मुझे खुशी है कि तू अपनी पत्नी की तकलीफ को समझता है। एक पति वही सच्चा होता है जो केवल परंपराओं की दुहाई न दे, बल्कि साथी की सामर्थ्य को भी समझे। तू बिल्कुल चिंता मत कर। मैंने कल रात ही अनन्या से कह दिया है कि हमारे यहां कोई जबरदस्ती की लकीर का फकीर नहीं है। यह व्रत प्रेम का उत्सव है, किसी परीक्षा का अखाड़ा नहीं। मैंने उससे साफ कह दिया है कि दोपहर में फल, मेवे और नारियल पानी ले लेना। शरीर को कष्ट देकर भगवान को खुश करने का ढोंग हमारे घर में कभी नहीं हुआ।”

मां की बातें सुनकर अर्णव के सीने से एक भारी बोझ उतर गया। उसने मां के हाथ चूम लिए और सोचा कि पीढ़ियों का फासला केवल सोच से मिटता है, और उसकी मां ने कितनी सहजता से इस फासले को पाट दिया था।

शाम को जब अनन्या ऑफिस से थकी-हारी लौटी, तो अर्णव ने उसके लिए चाय बनाई। दोनों बालकनी में बैठे। अर्णव ने मुस्कुराते हुए कहा, “मां ने तुम्हें रियायत दे दी है। तुम्हें निर्जला रहने की कोई जरूरत नहीं है। आराम से फल खाना, जूस पीना और जब भूख लगे तो हल्का खाना खा लेना। मैं नहीं चाहता कि परंपरा के नाम पर तुम बीमार पड़ो।”

अनन्या ने चाय का घूंट भरा और अर्णव की आंखों में देखा। उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों में एक अजीब सा ठहराव था। उसने धीमी आवाज में कहा, “अर्णव, मां का बड़प्पन है कि उन्होंने मेरी सेहत की चिंता की। और तुम्हारी मोहब्बत है कि तुमने मेरे दर्द को अपना समझा। लेकिन क्या प्रेम में सिर्फ रियायतें ही सब कुछ होती हैं? मैंने बचपन से अपनी नानी और मां को देखा है। यह व्रत किसी के थोपने से नहीं होता। जब आप किसी इंसान को अपनी पूरी जिंदगी मान लेते हैं, तो उसके लिए एक दिन खुद को तपाना बोझ नहीं, एक आत्मिक सुख बन जाता है। मैं कोई हठ नहीं कर रही, पर मैं इस परंपरा को उसकी पूरी पवित्रता के साथ जीना चाहती हूं। अगर मेरी तबीयत सचमुच बिगड़ेगी, तो मैं खुद पानी पी लूंगी, वादा करती हूं। लेकिन शुरुआत से ही मन में छूट लेकर मैं इस भाव को अधूरा नहीं छोड़ना चाहती।”

अर्णव अवाक रह गया। जिस लड़की को वह केवल आधुनिक और स्वतंत्र विचारों वाली प्रोफेशनल समझ रहा था, उसके भीतर भारतीय संस्कारों और प्रेम की गहराई इतनी गहरी होगी, उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसने अनन्या के हाथ को अपने हाथों में थाम लिया। उसके पास कहने को शब्द नहीं थे, बस आंखों में एक असीम आदर उमड़ आया था।

करवाचौथ का दिन आ पहुंचा। भोर के सन्नाटे में अलार्म बजने से पहले ही हवेली में हलचल शुरू हो गई थी। कल्याणी जी ने बड़े जतन से सरगी तैयार की थी—दूध की फेनियां, सूखे मेवे, ताजे फल और अनन्या की पसंद की मिठाइयां। अनन्या लाल रंग के बांधनी सूट में सजी हुई नीचे आई। उसकी मांग में हल्का सा सिंदूर और हाथों में रची गाढ़ी लाल मेहंदी उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी। सबने साथ बैठकर सरगी खाई। भोर की पहली किरण फूटने से पहले पानी पिया गया और इसके साथ ही संकल्प शुरू हो गया।

दिन चढ़ने के साथ ही अर्णव की बेचैनी बढ़ने लगी। उसने उस दिन ऑफिस से छुट्टी ले ली थी ताकि वह घर पर रहकर अनन्या का ध्यान रख सके। दोपहर बारह बजे तक तो सब ठीक रहा, लेकिन जैसे ही दो बजे, अनन्या के चेहरे पर थकान की परतें साफ दिखने लगीं। लैपटॉप की स्क्रीन देखते-देखते उसकी आंखें लाल हो रही थीं और उसने अनजाने में ही कई बार अपने माथे को दबाया। अर्णव तुरंत रसोई से सेब काटकर और एक गिलास मौसमी का जूस लेकर कमरे में पहुंचा।

“अनन्या, जिद छोड़ो। तुम्हारा सिर दर्द कर रहा है, मैं तुम्हारी आंखों में देख सकता हूं। यह लो जूस पियो, मां ने भी कहा है,” अर्णव ने आग्रह भरे स्वर में कहा।

अनन्या ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया, “अर्णव, बस कुछ ही घंटों की तो बात है। शाम की कथा का समय हो ही गया है। थोड़ा सिर दर्द तो सामान्य है, मुझे कुछ नहीं होगा।”

अर्णव को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। वह कमरे से बाहर निकला। उसने देखा कि आंगन में शाम की पूजा की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। मोहल्ले की अन्य महिलाएं भी सज-धज कर आने लगी थीं। पीतल की थालियों में रोली, अक्षत, धूप और मीठे करवे सज चुके थे।

तभी अर्णव के मन में एक बिजली सी कौंधी। अगर यह व्रत प्रेम का प्रतीक है, अगर यह दो आत्माओं के एक होने का उत्सव है, तो फिर तपस्या सिर्फ एक तरफ से क्यों? अगर अनन्या उसके स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए प्यासी रह सकती है, तो क्या उसका यह कर्तव्य नहीं बनता कि वह भी उस पीड़ा और उस भाव का भागीदार बने? प्रेम में बराबरी केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण की भी होनी चाहिए। अर्णव ने चुपचाप फैसला कर लिया। सुबह सरगी के बाद उसने भी चाय के अलावा कुछ नहीं खाया था, अब उसने तय किया कि जब तक अनन्या का व्रत नहीं खुलेगा, वह भी अन्न या जल का एक घूंट तक गले से नीचे नहीं उतारेगा।

शाम को हवेली का दालान मंगल गीतों से गूंज उठा। कल्याणी जी और अनन्या लाल और सुनहरी साड़ियों में साक्षात लक्ष्मी का रूप लग रही थीं। अनन्या ने जब करवाचौथ की कथा सुनी और थाली फेरी, तो उसके चेहरे पर एक अलौकिक तेज था, हालांकि होंठ प्यास से थोड़े सूख चुके थे। कथा समाप्त हुई, बड़ों का आशीर्वाद लिया गया। अब सिर्फ एक ही इंतजार बाकी था—चांद का दीदार।

रात के आठ बज चुके थे। हवेली की छत पर कुर्सियां लग गई थीं। बच्चे मुंडेर पर खड़े होकर पूरब की दिशा में टकटकी लगाए बैठे थे। हवा में हल्की सिहरन थी। अनन्या शॉल ओढ़े एक कुर्सी पर बैठी थी। उसका शरीर कमजोर पड़ रहा था, पर उसकी नजरें आसमान पर टिकी थीं। अर्णव चुपचाप उसके पीछे खड़ा था, उसने अपनी हथेलियों से अनन्या के कांधों को हौले से थाम रखा था, मानो अपना सारा संबल उसे सौंप रहा हो।

“चांद निकल आया! वो देखो, नीम के पेड़ के पीछे!” बच्चों का शोर गूंजा।

छत पर अचानक एक नई ऊर्जा दौड़ गई। थालियां उठाई गईं, दीये जलाए गए। बादलों की ओट से रूपहला चांद मंद-मंद मुस्कुराता हुआ बाहर आ रहा था। कल्याणी जी ने हमेशा की तरह सबसे पहले अर्णव के पिता की पूजा की। पिता जी ने मुस्कुराते हुए पानी का लोटा उठाया और कल्याणी जी को पिलाया।

अब अनन्या की बारी थी। उसने कांपते हाथों से जलता हुआ दीपक छलनी में रखा। अर्णव उसके ठीक सामने खड़ा हो गया। अनन्या ने पहले उस दूर गगन में चमकते चांद को देखा, फिर धीरे से छलनी का रुख अर्णव के चेहरे की ओर किया। छलनी की महीन जालियों और दिए की लौ के पार जब अनन्या की आंखें अर्णव की आंखों से मिलीं, तो दोनों के बीच जैसे समय ठहर गया। अर्णव की आंखों में कोई औपचारिकता नहीं थी, बस एक अगाध, पवित्र प्रेम और कृतज्ञता का समंदर लहरा रहा था। अनन्या ने झुककर अर्णव के पैर छूने चाहे, पर अर्णव ने तुरंत उसके हाथ थामकर उसे रोक दिया और गले से लगा लिया।

अर्णव ने थाली से चांदी का लोटा उठाया। उसने अनन्या के सूखे होंठों से लोटा लगाया और उसे एक घूंट पानी पिलाया। फिर एक टुकड़ा मिठाई का उसके मुंह में डाला। अनन्या का चेहरा खिल उठा, उसकी आंखों से खुशी का एक आंसू फिसलकर गाल पर आ गिरा।

“अब तुम कुछ खा लो, सुबह से परेशान हो रहे हो,” अनन्या ने राहत की सांस लेते हुए कहा।

अर्णव मुस्कुराया और उसने लोटे का बचा हुआ जल अपने मुंह से लगा लिया और पूरा पी गया।

अनन्या चौंक गई, “अर्णव… तुमने पानी अभी क्यों पिया? क्या तुमने दोपहर से कुछ नहीं खाया था?”

अर्णव ने अनन्या के दोनों हाथ अपने हाथों में लेते हुए बहुत ही शांत और भावुक स्वर में कहा, “अनन्या, जब तुमने कहा था कि यह व्रत किसी के दबाव में नहीं, बल्कि दिल के जुड़ाव से होता है, तब मुझे समझ आया कि प्रेम कोई एकतरफा यात्रा नहीं है। अगर तुम मेरी सलामती के लिए भूखी रह सकती हो, तो क्या मेरा यह फर्ज नहीं बनता कि मैं भी तुम्हारी हर तकलीफ में बराबर का साझीदार बनूं? हमारे समाज ने यह रीत शायद सिर्फ औरतों के हिस्से लिख दी थी, लेकिन मेरे लिए हमारा रिश्ता बराबरी के सम्मान पर टिका है। अगर तुम्हारी प्रार्थनाएं मेरे लिए हैं, तो मेरी आत्मा का समर्पण भी सिर्फ तुम्हारे लिए है। इसलिए मैंने भी दोपहर से अन्न-जल का त्याग कर दिया था।”

यह सुनते ही अनन्या स्तब्ध रह गई। उसकी आंखें भर आईं। पास ही खड़े कल्याणी जी और उमाकांत जी ने जब यह सुना, तो उमाकांत जी की आंखों में गर्व की चमक तैर गई। कल्याणी जी आगे आईं और उन्होंने अपने बेटे और बहू दोनों को एक साथ अपने आंचल में समेट लिया।

कल्याणी जी ने भीगी आवाज में कहा, “आज मुझे गर्व है कि मैंने एक ऐसा बेटा पाला है जो अपनी पत्नी को सिर्फ अर्धांगिनी नाम से नहीं, बल्कि कर्म से भी मानता है। परंपराएं तभी तक सुंदर हैं जब तक वे प्रेम को जोड़ती हैं, जब उन पर अहंकार या असमानता की धूल चढ़ जाती है तो वे बोझ बन जाती हैं। आज मेरे बेटे ने इस त्योहार को उसके सच्चे अर्थों में जिया है।”

उस रात छत पर जब सबने मिलकर भोजन किया, तो हवा में घुली ठंडक भी रिश्तों की उस गर्माहट के आगे फीकी लग रही थी। पुराने जमाने की निष्ठा और नए जमाने की बराबरी ने मिलकर उस आंगन में एक ऐसा संसार रच दिया था, जहां परंपराएं किसी बंधन की तरह नहीं, बल्कि प्यार के पंखों की तरह महसूस हो रही थीं। आसमान का चांद भी बादलों से निकलकर पूरी चमक के साथ उन दोनों को निहार रहा था, जिन्होंने साबित कर दिया था कि समर्पण जब दोनों तरफ से हो, तभी कोई रिश्ता अमर बनता है।

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