एक बार फिर नंदनी गर्मी की छुट्टियां मनाने अपने मायके जा रही थी । वैसे तो वह हमेशा जब बच्चों की स्कूल की गर्मी की छुट्टी होती थी तो मायके जाने की योजना बना लेती थी । बच्चे भी नानी के घर जाने का जैसे इंतजार करते थे।
नंदनी के पति दिवाकर उन सबको रेलवे स्टेशन छोड़ने आए साथ-साथ नंदिनी को ढेर सारी हिदायतें भी दी,,,, मसलन.. अपना तथा बच्चों का ख्याल रखें । बच्चों को ज्यादा शैतानी न करने की हिदायत दी ।
ट्रेन चल पड़ी, नंदिनी खिड़की के पास बैठे बाहर के अनुपम नजारे को निहार रही थी। यद्यपि की उसके मुख मंडल पर अजीब शांति थी। किंतु उसके मन में ट्रेन की रफ्तार के साथ-साथ ढेर सारे सवाल उथल- पुथल कर रहे थे ,उसके मन मस्तिष्क में अजीब तरह के विचार,,, ट्रेन की रफ्तार से भी तेज कौध रहे थे।
पिछले साल मां का देहांत हो गया था, और अभी तक नंदिनी जब भी मायके गई तो मां जीवित थी । उनके ना रहने पर भाभी और भैया का उसके प्रति क्या प्रतिक्रिया होगी। उसका जाना उन लोगों को अच्छा ना लगे तो ?
इन सब उधेड़बुन में लगी थी l बच्चों को वहां के हरे-भरे बाग , ग्रामीण वातावरण, और आसपास की बच्चों के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता था। यहां के शहरी वातावरण से वहां का वातावरण बिल्कुल भी भिन्न रहता। इसलिए वे सब लगभग एक महीने घूमने की योजना बनाते है। वहां जाने के बाद सभी तनावमुक्त होकर खुशहाल जीवन जीते
यह छुट्टियां उन्हें पुनः तरोताजा कर देती है।
नंदनी को भी रोजमर्रा के जीवन की भागदौड़ से कुछ राहत एवं सुकून का अहसास होता है। किंतु पता नहीं? अब वहां किस तरह का व्यवहार होगा ? यही सब अनजाना सा डर घूमड़- घूमड़ कर नंदनी के मन मस्तिष्क को झकझोंर रहे थे। तभी उसके छोटे बेटे ने उसे हिलाते हुए कहा मा- मां- स्टेशन आ गया ।
नंदिनी की तंद्रा भंग हुई,वह अपना सामान उतारने लगी। जैसे ही स्टेशन पर उतरी उसका भाई अभय उसे स्टेशन पर लेने आया हुआ था ।
नंदिनी के आने की खुशी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी, उसने बड़ी आत्मीयता से कहा,,,,,,, मां के जाने के बाद तुम्हारे सिवा कौन है हमारा दी ? नंदिनी की आंखों से आंसू छलक उठा।
जब अभय नंदिनी और बच्चों को लेकर घर पहुंचा तो शोभा नंदिनी के इंतजार में पहले से बैठी थी। वह नंदिनी को देखते ही दौड़ कर उसके गले लग गई।
उससे कहा,,,, दीदी आप सब फ्रेश हो जाएं मैंने आप सबके मन पसंद का खाना तैयार किया है। , सभी ने हंसी एवं ठहाको के बीच खाने का आनंद लिया।
शाम को शोभा और नंदिनी तथा बच्चे बाग में सैर के लिये गये, वहां पर फल से लदे हुए पेड़ो को देख, ऐसा प्रतीत हो रहा था.. जैसे बच्चों को तो जन्नत मिल गई हो ।
अगले दिन नंदिनी भी शोभा के साथ -साथ किचन का काम जल्दी से करवाने लगती,, जब शोभा कहती है ,,,,दी, ” मैं सब कर लूंगी आप परेशान न हो”, इस पर नंदिनी कहती ,,,काम करते-करते थक जाओगी तो हम लोगों को घूमाने कैसे ले जाओगी “? और दोनों हंसने लगी।
हंसी खुशी के बीच कैसे एक महीने गुजर गए नंदिनी को पता भी नहीं चला । जब नंदिनी घर लौटने लगी ,,,,,,तब शोभा ने आम के अचार, मठरी ,गुड़ घी, आदि पैक कर झोले में रख दिया ।
नंदनी ने कहा, ,,,,, अरे,’ यह क्या भाभी ? तब शोभा ने कहा,,,,, दी, मां जी भी तो आपको जाते समय यह सब देती थी” । नंदिनी ने रोते हुए शोभा को गले लगा लिया ।
आज उसे महसूस हो रहा था जैसे ,,,,मां यहीं कहीं आसपास है । आज शोभा ने यह बता दिया ,,,,कि मां- बाप के ना रहने के बाद भी, लड़कियों का एक सुखी संसार है , वे बेझिझक जब चाहे तब आ सकती है। वह है,,,,,,” उनका मायका”
उसके मुंह से अनायास निकल आया ईश्वर ” ऐसी भाभियों सबको दे” ।
समाप्त
आराधना श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश