अपना आसमान

कौशल्या देवी की आँखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उन्होंने झुककर अपने घर की उस पावन चौखट को चूमा। दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से उस नेमप्लेट को छुआ। अपनी खुरदुरी उंगलियों से उन्होंने अपने नाम के एक-एक अक्षर को ऐसे महसूस किया जैसे कोई अंधा व्यक्ति वर्षों बाद अचानक रोशनी देख ले।

शहर की पुरानी संकरी गलियों में जब भी किसी मकान मालिक के कड़े कदमों की आहट होती थी, तो दीनानाथ जी के दिल की धड़कनें अपने आप तेज हो जाती थीं। पिछले पैंतीस सालों से यह सिलसिला यूं ही बदस्तूर चला आ रहा था। महीने की एक तारीख आते ही उनके चेहरे पर चिंता की जो गहरी लकीरें उभरती थीं, वे किसी भी मौसम की मार से कहीं ज्यादा तकलीफदेह होती थीं। एक साधारण से सरकारी दफ्तर में क्लर्क की मामूली नौकरी, सीमित वेतन और असीमित जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे दीनानाथ जी ने कभी अपने लिए सोचना सीखा ही नहीं था। उनके जीवन का फलसफा बेहद सीधा था—जब भी खुद की ख्वाहिशों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच चुनाव करना पड़ा, उन्होंने हमेशा अपनी ख्वाहिशों की बलि देकर जिम्मेदारियों को सिर-माथे लगाया।

दीनानाथ जी की शादी जब कौशल्या देवी से हुई थी, तब वे आँखों में एक छोटे से, पर अपने खुद के घर का सपना संजोए शहर आए थे। उस दौर में उन्होंने एक छोटी सी डायरी में पाई-पाई जोड़कर मकान के लिए जमीन खरीदने का हिसाब लगाना शुरू किया था। लेकिन जिंदगी कभी भी सीधी लकीरों में नहीं चलती। पहले छोटे भाई की इंजीनियरिंग की पढ़ाई का पूरा खर्च उनके कंधों पर आ गिरा। भाई को काबिल इंजीनियर बनाने में दीनानाथ जी की पहली जमा-पूँजी का बड़ा हिस्सा पानी की तरह बह गया। भाई नौकरी पाकर अपने परिवार के साथ दूसरे बड़े शहर में बस गया और अपनी जिंदगी में मगन हो गया। दीनानाथ जी ने कभी उससे कोई शिकायत नहीं की, बल्कि अपने सीने पर हाथ रखकर संतोष कर लिया कि चलो, परिवार का एक चिराग तो रोशन हुआ।

अभी भाई की पढ़ाई का बोझ हल्का ही हुआ था कि दो छोटी बहनों की शादियों का समय आ गया। समाज की रीत, बिरादरी की नाक और बहनों के सम्मान के खातिर दीनानाथ जी ने बैंक से लोन लिया, भविष्य निधि से पैसे निकाले और पूरे मान-सम्मान के साथ दोनों बहनों की विदाई की। घर खरीदने के लिए जो भी थोड़ी-बहुत रकम बची थी, वह दहेज, गहनों और बारात के स्वागत में खर्च हो गई। जब भी कौशल्या देवी उदास होकर दीवारों पर सीलन लगे किराए के मकान को देखतीं, दीनानाथ जी बस फीकी मुस्कान के साथ कहते, “कौशल्या, जिम्मेदारियों और घर की बारी आएगी तो इंसान पहले अपनी जिम्मेदारियां ही निभाएगा। छत आज किराए की है तो क्या, बहनों और भाइयों की जिंदगी तो आबाद हो गई। हमारा भी वक्त आएगा।”

पर वक्त तो अपनी रफ्तार से बीतता गया, उनका वक्त कभी नहीं आया। इसी कशमकश के बीच उनके आंगन में एक नन्ही परी ने जन्म लिया, जिसका नाम उन्होंने रखा अनन्या। अनन्या जब होश संभालने लगी, तो उसने खिलौनों से ज्यादा अपने पिता के संघर्षों को देखा। उसने देखा कि हर दो-तीन साल में कैसे मकान मालिक का नोटिस आते ही उसका पूरा परिवार बोरिया-बिस्तर समेटकर एक नए किराए के आशियाने की तलाश में निकल पड़ता था। कभी मकान मालिक का यह कहना कि दीवारों पर कील मत ठोकना, कभी पानी के लिए तय समय की पाबंदी, तो कभी बच्चों के खेलने पर लगाई जाने वाली बंदिशें। अनन्या ने अपने पिता को मकान मालिकों के सामने हाथ जोड़ते और किराए के लिए मोहलत मांगते कई बार देखा था।

दीनानाथ जी हमेशा फटे हुए तलवों वाले जूते पहनते थे और उनके पास केवल दो ही अच्छे कुर्ते थे जो वे खास मौकों पर पहनते थे। लेकिन अनन्या की पढ़ाई में उन्होंने कभी कोई कमी नहीं आने दी। शहर के सबसे अच्छे स्कूल में उसका दाखिला कराया गया। अनन्या जब भी पिता से पूछती, “पापा, हमारा अपना घर कब होगा? जहाँ हम अपनी मर्जी से दीवारों पर रंग कर सकें, जहाँ मुझे अपने खिलौने छुपाने न पड़ें?” तो दीनानाथ जी उसकी पीठ थपथपाकर कहते, “बिटिया, जब तू पढ़-लिखकर बड़ी होगी, तब हम एक बहुत सुंदर घर बनाएंगे।” अनन्या ने अपने पिता की उन नम आँखों में छुपी बेबसी को बहुत गहराई से महसूस कर लिया था। उसने बचपन में ही अपने मन में यह गाठ बाँध ली थी कि वह अपने पिता के इस अधूरे सपने को कभी मरने नहीं देगी।

अनन्या पढ़ाई में हमेशा अव्वल आती रही। उसने दिन-रात एक कर दिया। जब बाकी लड़कियाँ नए कपड़ों और घूमने-फिरने में मगन रहती थीं, अनन्या देर रात तक टेबल लैंप की मद्धिम रोशनी में किताबों से जूझती रहती थी। उसने राज्य स्तरीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। कॉलेज के चार साल उसने स्कॉलरशिप के दम पर पूरे किए ताकि पिता पर उसकी पढ़ाई का जरा भी बोझ न पड़े। कॉलेज के अंतिम वर्ष में जब देश की एक जानी-मानी बहुराष्ट्रीय कंपनी कैंपस प्लेसमेंट के लिए आई, तो अनन्या की प्रतिभा, मेहनत और तीक्ष्ण बुद्धि देखकर उसे सबसे ऊँचे पैकेज पर नौकरी का प्रस्ताव मिला।

दीनानाथ जी के रिटायरमेंट का दिन भी नजदीक आ रहा था। जिस दिन दीनानाथ जी अपने दफ्तर से विदा हुए, उनके हाथ में एक शॉल, एक श्रीफल और रिटायरमेंट की जो थोड़ी-बहुत रकम मिली थी, उससे उन्होंने सबसे पहले अपने पुराने कर्जों को चुकता किया। अब उनके पास सिर्फ एक मामूली पेंशन बची थी। उस शाम वे बालकनी में बैठकर ढलते हुए सूरज को देख रहे थे। उनके चेहरे पर जीवन भर की थकान और एक गहरा खालीपन साफ झलक रहा था। उन्होंने कौशल्या देवी से धीरे से कहा, “पूरी जिंदगी दूसरों के आशियाने सजाने में निकाल दी कौशल्या। अब जब हाथ खाली हो गए हैं, तो लगता है कि मैंने अपने परिवार के लिए कुछ नहीं किया। आज भी हम इस किराए के मकान में ही हैं। अगर कल मुझे कुछ हो गया, तो तुम दोनों के सिर पर किसकी छत होगी?”

दरवाजे के पीछे खड़ी अनन्या ने अपने पिता की ये बातें सुन ली थीं। उसका कलेजा चीर उठा। उसने उसी पल तय किया कि अब और नहीं। अब उसके पिता को उनके हिस्से का सुकून और स्वाभिमान लौटाने का वक्त आ चुका था।

अनन्या ने नौकरी के पहले दिन से ही अपनी सुख-सुविधाओं पर लगाम कस रखी थी। वह अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा एक अलग खाते में जमा करती रही। उसने शहर के एक शांत, हरे-भरे और प्रतिष्ठित इलाके में एक खूबसूरत तीन कमरों वाले फ्लैट को पसंद किया। उसने बैंक से अपने दम पर होम लोन स्वीकृत कराया और अपनी सारी जमा-पूँजी डाउन पेमेंट में लगा दी। उसने घर की एक-एक दीवार, बालकनी और कमरों को अपने पिता की पसंद के अनुसार सजवाया। बैठक में वही हल्का नीला रंग करवाया जो उसके पिता को बेहद पसंद था, और बालकनी में तुलसी के पौधे और हरी-भरी लताओं के लिए खास जगह बनवाई ताकि शाम को उसके पिता आराम से चाय पी सकें। यह सब कुछ उसने इतनी खामोशी से किया कि घर में किसी को कानों-कान खबर तक नहीं हुई।

अगले महीने दीनानाथ जी का पैंसठवां जन्मदिन था। हर साल की तरह इस साल भी वे इस दिन को सादगी से मंदिर जाकर बिताने की सोच रहे थे। सुबह जब वे पूजा करके लौटे, तो अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा, “पापा, आज मेरे एक पुराने कॉलेज के दोस्त ने अपने नए घर की गृहप्रवेश पूजा रखी है। उसने हम सबको विशेष रूप से आमंत्रित किया है। आपको और माँ को मेरे साथ चलना ही होगा।”

दीनानाथ जी ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “बेटा, मुझे इन बड़ी-बड़ी सोसायटियों में जाना अच्छा नहीं लगता। तुम दोनों हो आओ।” लेकिन अनन्या के प्यार भरे हठ के आगे उनकी एक न चली। कौशल्या देवी ने अपनी पुरानी संभली हुई साड़ी पहनी और दीनानाथ जी ने अपना वही पुराना साफ-सुथरा कुर्ता। तीनों एक कैब में बैठकर उस नई सोसाइटी की ओर चल पड़े।

सोसाइटी के मुख्य द्वार पर पहुँचते ही दीनानाथ जी ने चारों तरफ देखा। ऊँची-ऊँची भव्य इमारतें, सुंदर बगीचे और बच्चों के खेलने के झूले। वे मन ही मन सोच रहे थे कि बड़े भाग्यशाली होते हैं वे लोग जो ऐसे घरों में रहते हैं। लिफ्ट पाँचवीं मंजिल पर रुकी। फ्लैट नंबर 502 के सामने खड़े होकर अनन्या ने अपने बैग से चाबियों का एक गुच्छा निकाला।

दीनानाथ जी ने अचरज से पूछा, “बेटा, तू चाबी क्यों निकाल रही है? तेरे दोस्त का घर है तो घंटी बजा ना।”

अनन्या ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने मुस्कुराते हुए ताला खोला और दरवाजा एक झटके में खोल दिया। सामने का नजारा देखकर दीनानाथ जी और कौशल्या देवी ठगे से रह गए। मुख्य दरवाजे के ठीक सामने दीवार पर एक बहुत ही सुंदर नेमप्लेट टंगी थी, जिस पर सुनहरे और उभरे हुए अक्षरों में लिखा था—’दीनानाथ कुटीर’। उसके ठीक नीचे लिखा था—’गृहस्वामी: दीनानाथ शर्मा एवं कौशल्या शर्मा’।

दीनानाथ जी को लगा जैसे उनकी आँखों के सामने कोई भ्रम हो। उन्होंने अपने चश्मे को उतारकर पोंछा और फिर से उस नेमप्लेट को पढ़ा। उनके पैर वहीं चौखट पर जम गए। वे कांपते होठों से बोले, “अनन्या… यह… यह क्या मजाक है? यह किसका घर है?”

अनन्या आगे बढ़ी। उसकी आँखों में खुशी और गर्व के आँसू छलक रहे थे। उसने अपने पिता के दोनों हाथों को अपने हाथों में थामा और उनके कांपते हाथों में उस नए घर की सुनहरी चाबियाँ रख दीं। उसने अपने पिता के सीने से सिर टिकाते हुए रुंधे हुए गले से कहा,

“पापा, यह आपका घर है। यह कोई किराए का मकान नहीं है जहाँ किसी मकान मालिक का डर हो। यहाँ कोई आपको दीवारों पर कील ठोकने से नहीं रोकेगा। यह आपकी उस बेटी का छोटा सा नजराना है, जिसकी उंगली पकड़कर आपने उसे दुनिया में चलना सिखाया था। आपने अपनी पूरी जिंदगी अपनों की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए कुर्बान कर दी, कभी अपने लिए एक ईंट तक नहीं खरीदी। आज आपकी बेटी आपके सिर पर आपकी अपनी छत सौंप रही है। यह आपका अपना आसमान है, पापा।”

उस एक पल में उस घर की चौखट पर जो सन्नाटा छाया, वह लाखों शब्दों पर भारी था। दीनानाथ जी की आँखें, जो पिछले पैंतीस सालों से सिर्फ आँसुओं को पीती आई थीं, आज बाँध तोड़कर बह निकलीं। उनके घुटने कमजोर पड़ गए और वे वहीं फर्श पर बैठने लगे, लेकिन अनन्या और कौशल्या देवी ने उन्हें दोनों तरफ से कसकर थाम लिया। दीनानाथ जी ने अपनी बेटी को दोनों बाहों में भींच लिया। वे एक बच्चे की तरह सिसक-सिसक कर रो रहे थे। उनकी छाती से एक ऐसा बोझ उतर गया था जो उन्होंने दशकों से अपने सीने में दबा रखा था।

कौशल्या देवी की आँखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उन्होंने झुककर अपने घर की उस पावन चौखट को चूमा। दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से उस नेमप्लेट को छुआ। अपनी खुरदुरी उंगलियों से उन्होंने अपने नाम के एक-एक अक्षर को ऐसे महसूस किया जैसे कोई अंधा व्यक्ति वर्षों बाद अचानक रोशनी देख ले।

“बेटी…” दीनानाथ जी की आवाज आंसुओं में डूब रही थी, “लोग कहते हैं कि कुलदीपक सिर्फ बेटे होते हैं जो वंश और घर को सहारा देते हैं। लेकिन आज तूने साबित कर दिया कि बेटियाँ सिर्फ पराई अमानत नहीं होतीं, वे तो वह मजबूत स्तंभ होती हैं जो गिरते हुए पिता को भी सहारा देकर खड़ा कर देती हैं। मुझे आज अपनी गरीबी पर नहीं, अपनी इस दौलत पर नाज है जो ईश्वर ने मुझे तेरे रूप में दी है।”

अनन्या ने अपने पिता के आँसू पोंछे और उन्हें मुस्कुराते हुए घर के अंदर ले गई। उसने बालकनी का दरवाजा खोला। सामने खुला आसमान था, दूर तक फैली हरियाली और ताजी हवा के झोंके। दीनानाथ जी बालकनी की रेलिंग पकड़कर खड़े हो गए। आज उनकी रीढ़ की हड्डी में कोई झुकाव नहीं था, उनका सिर गर्व से ऊंचा था और आँखों में एक असीम आत्मसंतुष्टि थी। वर्षों की भटकन के बाद आज एक मुसाफिर को अपनी मंजिल मिल गई थी।

शाम ढलने लगी थी, पर उस नए घर के हर कोने में एक अलौकिक रोशनी फैली हुई थी—एक ऐसी रोशनी जो ईंट और गारे से नहीं, बल्कि एक बेटी के समर्पण, त्याग और अटूट प्रेम से रोशन हुई थी।

प्रिय पाठकों,

क्या आपको भी लगता है कि बेटियाँ किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होतीं और अगर उन्हें पंख दिए जाएँ तो वे अपने माता-पिता के हर अधूरे सपने को सच कर सकती हैं? एक पिता के इस मूक त्याग और बेटी के इस अनमोल फर्ज पर आपकी क्या राय है? अपने दिल के भाव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!