रिश्ते अधिकार से नहीं करूणा से निभते हैं। – परमा दत्त झा

नहीं चाचाजी हमारे साथ रहेंगे -यह करूणा थी जो अपने पति से लड़-झगड़कर उन्हें रखना चाहती थी जबकि उसका पति करूणेश उन्हें गांव भेजना चाहता था। ठीक है कहकर करूणेश अपने माता-पिता को लेकर गांव चला गया जबकि विजयी भाव से करूणा अपने पापा को फोन करने लगी। अरे यह क्या किया?-उस बूढे को क्यों … Read more

पहला प्यार – खुशी

दोस्तों प्यार एक ऐसा शब्द है जो किसी के जीवन में आये तो उसकी दुनिया बदल देता है सच्चा हो तो जीवन को स्वर्ग बनाता है और झूठा हो तो नर्क पर ये प्यार का मौसम है तो कहानी भी रूमानी सी होनी चाहिए। राज का बचपन का सपना था कि मैं आर्मी ऑफिसर बनूंगा।वो … Read more

सोने का दिल – अर्चना खंडेलवाल

*”हम अक्सर जिसे ‘कबाड़’ समझकर घर के कोने में फेंक देते हैं, मुसीबत के वक्त वही तिनका हमारी डूबती हुई नाव का सहारा बनता है। पढ़िए एक ऐसी सास की कहानी जिसने अपनी ‘कंजूसी’ से अपने बच्चों की दुनिया खरीद ली।”* “मम्मी जी, प्लीज! अब इस पुराने, जंग लगे लोहे के संदूक को स्टोर रूम … Read more

वंश का अभिमान – रश्मि प्रकाश

*समाज कहता था कि जिसका अपना खून नहीं, वह वारिस कैसा? लेकिन उस सास ने भरी पंचायत में अपनी बहू के आंसू पोंछकर साबित कर दिया कि माँ बनने के लिए कोख की नहीं, कलेजे की ज़रूरत होती है।* “राघव, आप दूसरी शादी कर लीजिये,” सुमन ने सिसकते हुए कहा। “मैं नहीं चाहती कि मेरी … Read more

**साजिशों के बीच पनपा विश्वास** – शुभ्रा बनर्जी 

*”एक सास ने हीरे की अंगूठी चुराकर रिश्तों में कांच की दरार डालनी चाही, पर उसे नहीं पता था कि उसकी बहुओं का विश्वास उस हीरे से भी ज्यादा खरा और अटूट है।”* रसोई घर से आती खिलखिलाहट की आवाजें गायत्री देवी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं। वह अपने … Read more

संस्कारों का मोल – आरती झा

*लिबास की चमक आँखों को धोखा दे सकती है, लेकिन संस्कारों की खुशबू रूह में उतर जाती है। देखिये कैसे एक सास ने दुनिया के ताने को अपनी समधन के सम्मान में बदल दिया!* “ये मेरी समधन, सावित्री जी हैं। अवनि आज जो कुछ भी है—इतनी समझदार, इतनी सहनशील, और घर को जोड़कर रखने वाली—ये … Read more

**खून के रिश्ते से बड़ा दिल का रिश्ता** – करुणा मलिक

*दुनिया की हर माँ अपने बेटे की ढाल बनती है, लेकिन वो माँ विरली ही होती है जो अपनी बहू के आत्मसम्मान के लिए अपने ही बेटे के खिलाफ तलवार बन जाए।* सावित्री जी उठीं और मेघा के पास जाकर खड़ी हो गईं। उन्होंने मेघा का हाथ अपने हाथ में लिया। वह हाथ कांप रहा … Read more

**कांच के टुकड़ों के लिए हीरा खो दिया** – लतिका अग्रवाल 

“जिस पत्नी को ‘अनपढ़’ और ‘गंवार’ समझकर उसने छोड़ दिया, यह सोचकर कि वह उसके ‘स्टेटस’ के लायक नहीं है, आज वही पत्नी जब सामने आई, तो उसकी कामयाबी ने पति के अहंकार को चकनाचूर कर दिया। क्या ‘स्टेटस’ ही सब कुछ होता है?” “पापा, आप नहीं समझेंगे। मुझे अपनी लाइफ में एक पार्टनर चाहिए, … Read more

मेरी अनपढ़ माँ का ओहदा – विभा गुप्ता

“जिस पत्नी को पति ने महफिल में ‘गंवार’ कहकर चुप करा दिया, उसी बेटे ने माइक थामकर पिता की सारी डिग्रियों को कागज का टुकड़ा साबित कर दिया। आखिर उस बेटे ने भरी सभा में ऐसा क्या कह दिया कि पिता की नजरें झुक गईं?” — “सोचना बंद करो तुम!” शेखर जी ने चिढ़कर उनकी … Read more

झूठी शान के खंडर – संगीता अग्रवाल

“अक्सर हम जिसे अपना खून कहते हैं, वही हमारी रूह को छलनी कर देता है, और जिसे पराया समझते हैं, वो हमारे स्वाभिमान की ढाल बन जाता है। क्या एक बेटे के लिए ‘सच’ बड़ा है या ‘परिवार की झूठी इज़्ज़त’?” — “तमीज़ तो मैं तब भूल गया था भैया, जब मैंने अपनी आँखों से … Read more

error: Content is protected !!