दौलत का अंधापन

इस विचार मात्र से ही प्रकाश की रूह काँप उठी। उसे अपने बाबूजी के वो आखिरी शब्द याद आने लगे—’जब ठोकर लगेगी तब समझ आएगा’। आज उसे वो ठोकर लग चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि जिस पेड़ से टूटकर वह खुद को आज़ाद समझ रहा था, असल में वह सूख रहा था। … Read more

रिश्ते की डोर

कैफे के शीशे वाले दरवाजे से बाहर निकलते हुए समीर की पीठ धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही थी, और अंदर बैठी काव्या को ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर से उसकी रूह निकलकर जा रही हो। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, लेकिन उसके अंदर का अहंकार उसे रोने … Read more

ज़िंदगी की ढलती शाम

 निर्मला ने अपने पति को बड़े गौर से देखा। जैसे यह समझने की कोशिश कर रही हो कि यह आदमी आज अचानक यह कैसी बातें कर रहा है। फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई और वह एक समझदार मां की तरह बोली, “आपको सच में बहुत फुर्सत मिल गई है बैठे-बैठे। … Read more

सच्ची तीर्थयात्रा

 “आप कहीं नहीं जाएंगे बाबूजी,” विक्रम ने दृढ़ता से कहा। उसने पीछे मुड़कर देखा और आवाज दी, “मीरा! जरा स्टोर रूम से वह कमोड वाली कुर्सी तो जल्दी से लेकर आना।” “जी, मैं अभी लाई,” मीरा तुरंत कुर्सी लेने दौड़ पड़ी। दीनानाथ जी ने विक्रम का हाथ पकड़ लिया और कांपती हुई आवाज में बोले, … Read more

सीरत का गहना

रश्मि जी ने मीरा के खून से सने माथे को चूम लिया। “मेरी दीदी मेरे लिए मेरी माँ के समान हैं। अगर आज तू अपने महँगे कपड़ों और इस दिखावे की परवाह करती, जैसे बाकी भीड़ कर रही थी, तो आज मैं अपनी माँ जैसी बहन को खो देती। तूने आज सिर्फ मेरी दीदी की … Read more

मृगतृष्णा और बरगद की छांव

नीता ने अपने आँसू पोंछे और अपने पिता के खुरदरे हाथों को अपने गालों से लगा लिया। “बाबूजी… मैं भी उस छोटी बच्ची की तरह खो गई थी। लेकिन भगवान ने और आपके संस्कारों ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मैं वापस आपके पास लौट आई। मुझे कभी खुद से दूर मत करना बाबूजी।” रामदीन … Read more

उजड़ते आंगन में उम्मीद की वापसी

कौशल्या जी ने कांपते हाथों से देवांश का चेहरा उठाया और उसे सीने से लगा लिया। “तू आ गया मेरे बच्चे… तू आ गया। लेकिन तू था कहाँ? हमने तुझे कितना ढूंढा। अंजलि ने तुझे हज़ारों मेल किए, सैकड़ों फोन किए, लेकिन तेरा कोई अता-पता नहीं था। क्या तू हमसे इतना खफा था कि हमारी … Read more

तुम्हारे साथ, ढलती शाम तक…

 आदित्य ने मीरा की आँखों में गहराई से देखते हुए कहा, “मीरा, तुमने कल कहा था कि मैंने तुम्हें कभी प्रपोज नहीं किया। सच कहूँ तो, मुझे वो भारी-भरकम शब्द और फिल्मी डायलॉग बोलने नहीं आते। मुझे नहीं पता कि चाँद-तारे कैसे तोड़े जाते हैं, क्योंकि मुझे पता है कि हकीकत में हमें इसी ज़मीन … Read more

रिश्तों की नई परिभाषा: जब कमियों को मिला प्यार

 “मुझे तुम्हारी ईमानदारी बहुत पसंद आई मीरा,” सुमित्रा जी की आवाज में एक अजीब सी नरमी थी। उन्होंने अपनी जगह से उठकर मीरा के पास आकर उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “तुम्हें पता है? जब मेरी शादी श्रीकांत जी से हुई थी, तब मैं अपने कॉलेज की एथलेटिक्स चैंपियन थी। दिन भर ग्राउंड … Read more

“आँगन की छाँव”

शिखा अपनी माँ की बात सुनकर सन्न रह गई। उसे पहली बार एहसास हुआ कि मायका सिर्फ बेटियों के आरामगाह का नाम नहीं है। उसे याद आया कि कैसे पिछली बार उसने अंजलि को कितना परेशान किया था। सुमित्रा देवी ने बहुत ही शांति से अपनी बेटी को जीवन का एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ा … Read more

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