पंखों को मिला आकाश

तान्या को अपने पास बुलाया और उसका हाथ पकड़कर भरे गले से कहा, “तान्या, देख अपनी बहन को। मैं सोचती थी कि तुझे काम न करने देकर मैं तुझे महारानी बना रही हूँ, लेकिन सच तो यह है कि मैंने तुझे अपाहिज बना दिया। ज़िंदगी में किताबें पढ़कर डिग्रियां हासिल कर लेना बहुत आसान है, लेकिन असली शिक्षा वह है जो हमें हर परिस्थिति में जीना, जूझना और दूसरों का सहारा बनना सिखाए। अनिका सिर्फ पढ़ नहीं रही है, यह ज़िंदगी जीना सीख रही है। यह कल जहाँ भी जाएगी, अपने दम पर अपना साम्राज्य खड़ा करेगी।”

चंडीगढ़ की गुनगुनी सुबह में रश्मि की नींद रसोई में बजती सीटी की आवाज से खुली। बालकनी में खड़े होकर उसने देखा कि गुलमोहर के पेड़ों पर ताज़ी धूप उतर आई थी। तभी फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘रागिनी दीदी’ का नाम चमक रहा था। रश्मि के चेहरे पर बरसों की आत्मीय मुस्कान तैर गई। रागिनी उसकी इकलौती ननद थी, जो शादी के बाद इंदौर बस गई थी। दोनों के बीच हमेशा से एक सहज और सखी जैसा रिश्ता रहा था, हालांकि ज़िंदगी की व्यस्तताओं, दूरियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते मिलना-जुलना बहुत कम हो पाता था।

“भाभी! सामान पैक हो चुका है। मैं और तान्या शाम की शताब्दी पकड़ रहे हैं। पूरे पंद्रह दिन आपके सिर पर डेरा डालने का इरादा है!” रागिनी की चहकती आवाज़ ने रश्मि का दिल खुशियों से भर दिया। रागिनी की बेटी तान्या और रश्मि की बेटी अनिका, दोनों ही लगभग तेरह-चौदह बरस की थीं, नवीं कक्षा में पढ़ती थीं। दोनों का जन्म भी बस चार महीने के अंतराल पर हुआ था। पिछले तीन सालों से रागिनी मायके नहीं आ पाई थी। कभी ससुराल में पारिवारिक शादियाँ, तो कभी किसी बुजुर्ग की बीमारी। ऐसे में इस बार उसका आना घर के सूने कोनों में जैसे रौनक भरने वाला था।

रश्मि ने तुरंत अपने पति आलोक को खबर दी। शाम होते-होते रेलवे स्टेशन से जब गाड़ी घर के दरवाजे पर रुकी, तो पूरा आँगन हँसी और बातों की खिलखिलाहट से गूँज उठा। रागिनी ने रश्मि को गले लगाया और आलोक के गाल खींचते हुए बोली, “अरे भाई साहब! इंदौर के पोहे खा-खाकर तुम लोगों की याद आती थी, अब यहाँ के हाथ का परांठा खाऊँगी।”

सामान ड्राइंग रूम में रखा ही जा रहा था कि अंदर से अनिका हाथ में ट्रे लिए मुस्कुराती हुई निकली। ट्रे में चार करीने से रखे काँच के गिलास थे, जिनमें नींबू-पुदीने का ताज़ा शिकंजी महक रहा था। अनिका ने झुककर बुआ के पैर छुए और बोली, “प्रणाम बुआ जी! सफर बहुत थका देने वाला रहा होगा न? यह पीजिए, बिल्कुल ताज़गी आ जाएगी।” फिर उसने तान्या को गले लगाते हुए शिकंजी का गिलास पकड़ाया।

तान्या सोफे पर धड़ाम से गिरते हुए मोबाइल में उलझ गई, “थैंक्स अनिका, बहुत गर्मी थी ट्रेन में।”

थोड़ी ही देर बाद अनिका रसोई में गई और प्लेट में बिस्कुट सजाकर, अदरक की कड़क चाय बनाकर ले आई। रागिनी यह सब देखकर भौंचक रह गई। उसने चाय का कप उठाते हुए रश्मि की ओर देखा और उसकी भौंहें तन गईं।

“अरे भाभी! यह क्या तमाशा है? इतनी सी बच्ची से गैस पर चाय बनवा ली? अगर हाथ जल जाता तो? खौलता हुआ पानी छलक जाता तो कौन जिम्मेदार होता? आप भी गजब करती हैं, इतनी लाड़ली बेटी से नौकरों की तरह काम करवा रही हैं!” रागिनी के लहजे में चिंता कम और एक तरह का उलाहना ज़्यादा था।

रश्मि ने सहजता से मुस्कुराते हुए कहा, “दीदी, चाय बनाना कोई आफत का काम नहीं है। अनिका अब नवीं में है, समझदार हो गई है। अपनी चाय, नाश्ता और खुद की ज़रूरतें संभालना सीखेगी नहीं तो कब सीखेगी? यह काम करवाना नहीं, जीवन जीना सिखाना है।”

रागिनी ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए चाय की चुस्की ली और अपनी बेटी तान्या के बालों में हाथ फेरते हुए बोली, “भाभी, आपकी अनिका क्या आगे चलकर कोई अफ़सर या डॉक्टर नहीं बनेगी? क्या उसे ज़िंदगी भर चूल्हा-चौका ही संभालना है? मेरी तान्या को देखिए, मैंने आज तक उसे अपने हाथ से एक गिलास पानी उठाकर पीने नहीं दिया। उसका काम सिर्फ पढ़ाई करना, कोडिंग सीखना और आराम करना है। हमने अपनी ज़िंदगी में बहुत बर्तन माँज लिए, बहुत रोटियाँ बेल लीं। कम से कम हमारी बेटियाँ तो महारानियों की तरह जिएँ! अगर ये भी वही घरेलू काम करेंगी, तो इनमें और पुराने ज़माने की अनपढ़ औरतों में क्या फर्क रह जाएगा?”

रश्मि ने रागिनी की बात का कोई तीखा जवाब नहीं दिया। उसने बस शांत स्वर में कहा, “दीदी, हर माँ की अपनी सोच होती है। आप तान्या को रानी बनाकर रखना चाहती हैं, यह आपका प्यार है। लेकिन मैं अनिका को केवल एक सफल इंसान नहीं, बल्कि एक सक्षम और आत्मनिर्भर इंसान बनाना चाहती हूँ। कल को वह आसमान छुए, लेकिन अगर कभी ज़मीन पर अकेले रहना पड़े, तो उसे किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।”

“रहने दीजिए भाभी, बड़ी-बड़ी बातें हैं। बच्चों का बचपन छीनना कोई आत्मनिर्भरता नहीं होती,” रागिनी ने बात काटते हुए मुँह फेर लिया।

अगली सुबह जब घर में दिन की शुरुआत हुई, तो रागिनी की आँखें अनिका की दिनचर्या देखकर खुली की खुली रह गईं। सुबह साढ़े छह बजे अनिका अपने कमरे से बाहर निकली। उसका बिस्तर बिल्कुल सलीके से सिमटा हुआ था, चादर में एक भी सिलवट नहीं थी। उसने रात के जूठे गिलासों को सिंक में रखा, पौधों में पानी डाला और फिर हल्के हाथों से ड्राइंग रूम की मेज और किताबों की रैक झाड़ दी। जब आलोक और रागिनी नहाकर निकले, तो अनिका ने बाथरूम के गीले तौलिए उठाकर बालकनी की धूप वाली रस्सी पर क्लिप लगाकर सुखा दिए।

तान्या उस वक्त तक बिस्तर में चादर ताने सो रही थी। रागिनी ने उसे तीन बार आवाज़ दी, “उठ जा बेटा, आठ बज गए।” लेकिन तान्या करवट बदलकर चिढ़ते हुए बोली, “मम्मी, प्लीज़ सोने दो! छुट्टियाँ हैं, मुझे डिस्टर्ब मत करो।”

रसोई में रश्मि नाश्ता बना रही थी। अनिका ने फुर्ती से वॉशिंग मशीन में धुले कपड़े निकाले और उन्हें धूप में फैलाने के बाद अपनी माँ के पास पहुँची। उसने चुपचाप अपने पापा का लंच बॉक्स बैग में डाला, पानी की बोतल भरी और डाइनिंग टेबल पर प्लेटें, चम्मच और नैपकिन सजा दिए। नाश्ते में उसने बुआ और तान्या के लिए गरमा-गरम इडली और सांभर परोसने में माँ का पूरा हाथ बँटाया। नाश्ता खत्म होते ही उसने टेबल को गीले कपड़े से पोंछकर एकदम चमका दिया।

रागिनी यह सब देख तो रही थी, पर उसके मन में बैठा पूर्वाग्रह उसे यही सोचने पर मजबूर कर रहा था कि रश्मि अपनी बेटी पर ज़ुल्म कर रही है। उसने सोचा कि दिन भर घर के काम करने वाली यह बच्ची पढ़ाई-लिखाई में तो पक्का फिसड्डी ही होगी।

दोपहर में जब बाहर तेज़ धूप थी और घर के सभी लोग बैठक में बैठे थे, तभी बातों-बातों में आलोक ने अनिका की अलमारी की तरफ इशारा किया। “दीदी, ज़रा देखो अपनी भतीजी का खज़ाना।”

अनिका संकोच से मुस्कुराई, लेकिन पिता के कहने पर उसने अपनी फाइल्स और ट्रॉफियां लाकर मेज पर रख दीं। रागिनी के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा जब उसने प्रमाण पत्रों का ढेर देखा।

अनिका न केवल अपनी कक्षा में लगातार टॉप करती आ रही थी, बल्कि वह राज्य स्तरीय रोबोटिक्स प्रतियोगिता की स्वर्ण पदक विजेता थी। उसके पास अंतर-विद्यालयी वाद-विवाद प्रतियोगिता की शील्ड थी, शास्त्रीय संगीत में उसका डिप्लोमा पूरा होने वाला था और स्कूल की बास्केटबॉल टीम की वह उप-कप्तान थी। उसकी दीवार पर टंगे पदकों की चमक रागिनी की आँखों को चौंधिया रही थी।

तान्या ने भी हैरानी से देखा। तान्या शहर के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ती थी, दिन-रात ट्यूशन और कोचिंग जाती थी, फिर भी उसके अंक हमेशा मध्यम आते थे और किसी एक्स्ट्रा-करिकुलर गतिविधि में उसका मन नहीं लगता था क्योंकि वह हमेशा थकी और ऊबी हुई रहती थी।

“अनिका बेटा, तुम यह सब कब कर लेती हो?” रागिनी के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा।

अनिका ने खिलखिलाते हुए कहा, “बुआ जी, माँ कहती हैं कि जो इंसान अपने समय और अपने माहौल को संभालना सीख जाता है, वह दुनिया की किसी भी चीज़ को संभाल सकता है। मुझे घर का काम करना बोझ नहीं लगता, बल्कि पढ़ाई के बीच में यह मेरा स्ट्रेस बस्टर बन जाता है। जब मैं अपना कमरा साफ करती हूँ या चाय बनाती हूँ, तो मेरा दिमाग तरोताज़ा हो जाता है। मेरा सपना भारतीय विदेश सेवा (IFS) में जाकर देश का प्रतिनिधित्व करने का है।”

उसकी आँखों में गजब का आत्मविश्वास और स्थिरता थी, जो किसी रटे-रटाए ज्ञान से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में मिली स्वावलंबन की सीख से आई थी। रागिनी ने कुछ नहीं कहा, पर उसके दिल में एक हलचल शुरू हो गई थी।

छुट्टियों के सातवें दिन एक अप्रत्याशित घटना घटी। रश्मि के मायके से अचानक खबर आई कि उसकी माँ की तबीयत बहुत बिगड़ गई है और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। रश्मि बुरी तरह घबरा गई। आलोक को तुरंत रश्मि को लेकर निकलना पड़ा। जाते-जाते रश्मि बेहद फिक्रमंद थी कि घर कैसे चलेगा, मेहमानों का क्या होगा।

अनिका ने अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखा और बेहद परिपक्व आवाज़ में कहा, “माँ, आप नानी के पास जाओ। बिल्कुल चिंता मत करना। मैं बुआ और तान्या का पूरा ख्याल रखूँगी और घर का एक भी काम नहीं रुकेगा। आप बस नानी का ध्यान रखना।”

रश्मि की आँखों में आँसू थे, पर अनिका के इस भरोसे ने उसके कदमों को हौसला दिया। दोनों माता-पिता तुरंत रवाना हो गए।

घर में अब रागिनी, तान्या और अनिका अकेले थे। उस दिन कामवाली बाई भी दो दिन की छुट्टी पर थी। रागिनी को अचानक गहरा सिरदर्द और बुखार चढ़ आया। सफर की थकान और बदलते मौसम ने उस पर असर कर दिया था। वह बिस्तर पर लेट गई और उठने की स्थिति में नहीं थी।

अब घर की असली परीक्षा शुरू हुई। तान्या कमरे में बैठी घबरा रही थी। “मम्मी, अब खाना कहाँ से आएगा? जोमैटो से ऑर्डर कर लें? मुझे बहुत भूख लगी है। और आपके सिर पर पट्टी कौन बाँधेगा?” तान्या असहाय होकर इधर-उधर घूम रही थी, उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि माँ की बीमारी में क्या किया जाए। वह पानी का थर्मस ढूँढने में भी नाकाम रही।

तभी अनिका ने स्थिति की बागडोर अपने हाथों में ली। उसने बिना किसी घबराहट के सबसे पहले अपनी बुआ के माथे को छुआ, थर्मामीटर से बुखार नापा और प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स से डॉक्टर की सुझाई पैरासिटामोल निकाली। उसने बुआ के सिर पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखीं। फिर वह तेजी से रसोई में गई।

तान्या रसोई के दरवाजे पर खड़ी देखती रही। अनिका ने पंद्रह मिनट के भीतर अदरक, तुलसी और काली मिर्च का कड़ा काढ़ा तैयार किया और बुआ को पिलाया। इसके बाद उसने कुकर में मूँग दाल की सुपाच्य खिचड़ी चढ़ाई, तान्या के लिए झटपट पोहा और ककड़ी का सलाद तैयार किया।

उसने घर के सारे काम इतनी शांति, व्यवस्था और तेजी से निपटाए जैसे कोई कुशल प्रबंधक किसी बड़ी कंपनी को संभाल रहा हो। रागिनी जब दर्द से कराह रही थी, तो अनिका उसके पैरों को दबाते हुए धीरे से बोली, “बुआ जी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मैंने डॉक्टर अंकल को फोन पर आपकी स्थिति बता दी है, उन्होंने कहा है कि यह साधारण वायरल है, दवा से शाम तक उतर जाएगा। आप आराम से सो जाइए।”

तान्या अपनी हमउम्र चचेरी बहन को देख रही थी और अपनी ही नज़रों में शर्मिंदा हो रही थी। जिस तान्या को लगता था कि वह मॉडर्न और एडवांस है, वह एक कप चाय बनाना या अपनी बीमार माँ की देखभाल करना तो दूर, अपने बिखरे हुए कपड़ों को समेटने में भी असमर्थ थी।

शाम होते-होते रागिनी का बुखार उतर गया। जब वह उठकर बैठी, तो पूरा घर शांत, साफ और सुगंधित था। डाइनिंग टेबल पर अनिका ने ढककर खाना रखा हुआ था और खुद ड्राइंग रूम में बैठकर शांति से अपनी रोबोटिक्स की किताब पढ़ रही थी।

रागिनी की आँखों से पश्चाताप के आँसू छलक पड़े। उसने अनिका को पास बुलाया और अपने सीने से लगा लिया।

“मुझे माफ कर दे अनिका… और मुझे माफ कर देना भाभी, जो मैंने तुम्हारी परवरिश पर सवाल उठाए थे,” रागिनी ने मन ही मन रश्मि से क्षमा माँगी।

उसने तान्या को अपने पास बुलाया और उसका हाथ पकड़कर भरे गले से कहा, “तान्या, देख अपनी बहन को। मैं सोचती थी कि तुझे काम न करने देकर मैं तुझे महारानी बना रही हूँ, लेकिन सच तो यह है कि मैंने तुझे अपाहिज बना दिया। ज़िंदगी में किताबें पढ़कर डिग्रियां हासिल कर लेना बहुत आसान है, लेकिन असली शिक्षा वह है जो हमें हर परिस्थिति में जीना, जूझना और दूसरों का सहारा बनना सिखाए। अनिका सिर्फ पढ़ नहीं रही है, यह ज़िंदगी जीना सीख रही है। यह कल जहाँ भी जाएगी, अपने दम पर अपना साम्राज्य खड़ा करेगी।”

तान्या ने भी अनिका का हाथ थाम लिया और नम आँखों से बोली, “अनिका, मुझे भी यह सब सिखा दे। मुझे भी तेरी तरह मजबूत और आत्मनिर्भर बनना है।”

तीसरे दिन जब रश्मि और आलोक लौटे, तो उन्होंने देखा कि घर बिल्कुल व्यवस्थित था और रसोई में अनिका और तान्या दोनों मिलकर हँसते-खिलखिलाते हुए शाम का नाश्ता तैयार कर रही थीं। रागिनी ने आगे बढ़कर रश्मि के हाथ थाम लिए और बोली, “भाभी, आज मैं यहाँ से अपनी बेटी के लिए एक नई सोच लेकर जा रही हूँ। आपने अनिका के पंख सिर्फ हवा में उड़ने के लिए नहीं तराशे, बल्कि उसे हर आँधी में ज़मीन पर मजबूती से खड़े रहने का हुनर भी सिखाया है।”

घर का आँगन एक बार फिर हँसी, सम्मान और अपनत्व की मीठी धूप से खिल उठा था।

दोस्तों, अगर आपको भी ऐसा लगता है कि बच्चों को (चाहे बेटा हो या बेटी) घरेलू काम सिखाना उन पर बोझ डालना नहीं, बल्कि उन्हें स्वावलंबी और मजबूत बनाना है, तो आपकी इस बारे में क्या राय है? क्या आज की पीढ़ी को पढ़ाई के साथ-साथ जीवन के बुनियादी काम सिखाना ज़रूरी है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।

error: Content is protected !!