सावन का महीना अपने पूरे शबाब पर था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और मिट्टी की सौंधी महक से पूरा वातावरण महक रहा था। आज हरियाली तीज का त्योहार था। महिलाओं के लिए यह दिन सुहाग और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। शहर की हर सड़क, हर मोहल्ले में सुहागिनें हरे रंग की साड़ियों और चूड़ियों में सजी-धजी नजर आ रही थीं। इसी शहर के एक पॉश इलाके में स्थित एक खूबसूरत से घर में भी तीज की तैयारियां चल रही थीं। कमरे में आईने के सामने काव्या बैठी थी। उसने गहरे हरे रंग की बनारसी साड़ी पहनी थी, हाथों में कुंदन के कंगन और हथेलियों पर गहरी रची हुई मेहंदी उसकी सुंदरता में चार चांद लगा रही थी। वह अपनी मांग में सिंदूर भरने ही जा रही थी कि तभी दरवाजे पर उसकी बचपन की सहेली और चचेरी बहन राधिका आकर खड़ी हो गई।
राधिका की आंखों में अचरज और गुस्सा दोनों एक साथ तैर रहे थे। उसने काव्या के हाथ से सिंदूर की डिब्बी लगभग छीनते हुए कहा, “काव्या, क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? तुम यह सब क्या कर रही हो? जिस आदमी ने तुम्हारी जिंदगी नर्क बना दी, जिसने तुम्हें हर कदम पर धोखा दिया, उसके लिए तुम आज भी सज-संवर रही हो? पिछले हफ्ते ही तो तुमने डिवोर्स के पेपर पर साइन किए हैं, फिर यह तीज का व्रत और यह सोलह श्रृंगार किसके लिए?”
काव्या ने बहुत ही शांत भाव से राधिका की तरफ देखा। उसकी आंखों में न तो कोई आंसू था और न ही कोई पीड़ा। एक अजीब सा सुकून था उसके चेहरे पर। उसने सिंदूर की डिब्बी वापस ली, उसे बंद करके मेज पर रख दिया और मुस्कुराते हुए बोली, “शांत हो जा राधिका। बैठ पहले।”
राधिका बेताबी से बिस्तर पर बैठ गई, लेकिन उसकी नजरें काव्या से ही चिपकी थीं। वह समझ नहीं पा रही थी कि सात साल की मानसिक प्रताड़ना सहने के बाद, जो काव्या बड़ी मुश्किल से उस घुटन भरे रिश्ते से बाहर निकलने की हिम्मत जुटा पाई थी, वह आज फिर से उसी दलदल में क्यों गोते लगा रही है।
कहानी सात साल पहले शुरू हुई थी। काव्या और समीर की मुलाकात कॉलेज के अंतिम वर्ष में हुई थी। समीर कॉलेज का सबसे होनहार, आकर्षक और लोकप्रिय लड़का था। उसकी बातों में एक ऐसा जादू था कि कोई भी उसकी तरफ खिंचा चला आता। काव्या, जो हमेशा से एक शांत और अपने में खोई रहने वाली लड़की थी, समीर के उस आकर्षण से बच नहीं पाई। समीर ने भी काव्या को इस कदर प्यार का अहसास कराया कि काव्या को लगने लगा जैसे उसे दुनिया की हर खुशी मिल गई हो। जब बात शादी की आई, तो काव्या के पिता ने साफ इंकार कर दिया। उन्होंने समीर के बारे में कुछ ऐसी बातें सुनी थीं जो एक पिता के रूप में उन्हें डरा रही थीं। उन्होंने काव्या को समझाया था कि समीर का स्वभाव ठीक नहीं है, उसका नाम कई और लड़कियों के साथ जुड़ चुका है और वह बहुत महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ रिश्तों को लेकर लापरवाह है।
लेकिन काव्या उस वक्त प्यार के खुमार में थी। उसने अपने परिवार से बगावत कर ली। “पापा, आप लोगों की बातों में आ रहे हैं। समीर ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैं उसे जानती हूँ, वह मुझसे बहुत प्यार करता है,” काव्या ने रोते हुए अपने पिता से कहा था। आखिरकार, एक पिता अपनी बेटी की जिद के आगे हार गया और दोनों की शादी हो गई।
शुरुआती कुछ महीने किसी खूबसूरत सपने की तरह बीते। लेकिन जल्द ही समीर के असली रंग सामने आने लगे। उसका देर रात तक घर आना, फोन पर पासवर्ड लगाकर रखना और बात-बात पर काव्या को नीचा दिखाना आम बात हो गई थी। काव्या जब भी उससे सवाल करती, वह बहुत ही चालाकी से उसे ही दोषी ठहरा देता। “काव्या, तुम बहुत शक्की हो गई हो। मैं ऑफिस के काम से बाहर रहता हूँ और तुम मुझ पर शक कर रही हो? तुम मेरे प्यार के लायक ही नहीं हो।” समीर की इन बातों ने धीरे-धीरे काव्या का आत्मविश्वास तोड़ दिया। उसे लगने लगा कि शायद उसी में कोई कमी है। वह समीर को खुश करने के लिए हर संभव कोशिश करती, लेकिन समीर की मांगें और उसका दुर्व्यवहार कभी खत्म नहीं हुआ।
फिर एक दिन वो हुआ, जिसने काव्या की आंखों पर बंधी प्यार की पट्टी को हमेशा के लिए खोल दिया। काव्या को समीर के लैपटॉप में कुछ ऐसी तस्वीरें और चैट्स मिलीं, जो उसके ऑफिस की ही एक नई कर्मचारी, माया के साथ थीं। चैट्स में साफ दिख रहा था कि समीर और माया पिछले दो साल से रिश्ते में थे। वे दोनों साथ में छुट्टियां बिताने गए थे, जब समीर ने काव्या से कहा था कि वह कंपनी के किसी जरूरी टूर पर जा रहा है। काव्या के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस इंसान के लिए उसने अपने माता-पिता, अपना करियर और अपना आत्मसम्मान सब कुछ दांव पर लगा दिया था, वह उसे इतनी बेरहमी से धोखा दे रहा था।
जब काव्या ने समीर से उन सबूतों के साथ जवाब मांगा, तो समीर बिल्कुल नहीं घबराया। उसने बहुत ठंडे दिमाग से काव्या की तरफ देखा और कहा, “काव्या, तुम राई का पहाड़ बना रही हो। वह सिर्फ एक कैजुअल फ्लर्ट है। मैंने उसके साथ कोई घर नहीं बसाया है। मैं वापस तुम्हारे ही पास आता हूँ ना? मेरी कुछ जरूरतें हैं जो तुम पूरी नहीं कर पाती, इसलिए मैं बाहर गया। पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं तुमसे रिश्ता तोड़ रहा हूँ।”
समीर के वे शब्द काव्या के दिल में किसी खंजर की तरह उतरे थे। “महज एक कैजुअल फ्लर्ट? समीर, तुम माया के साथ होटल के कमरों में रातें गुजारते हो, उसे कीमती तोहफे देते हो, और उसे कैजुअल कहते हो? तुम इंसान हो या कोई पत्थर?”
“सुनो काव्या,” समीर ने ऊंची आवाज में उसे डराते हुए कहा था, “अगर तुम यह बात बाहर ले गई, तो बदनामी तुम्हारी ही होगी। लोग कहेंगे कि अपने परिवार से लड़कर लव मैरिज की थी, अब निभा नहीं पा रही। चुपचाप रहो और इस घर की सुख-सुविधाओं का मजा लो। तुम्हें पैसे की कोई कमी नहीं है।”
उस रात काव्या बहुत रोई। उसे अपने पिता की कही हर बात याद आ रही थी। वह खुद को कोस रही थी। उसे लग रहा था कि उसकी जिंदगी अब खत्म हो चुकी है। वह डिप्रेशन में चली गई। कई दिनों तक उसने खुद को कमरे में बंद रखा। लेकिन फिर एक सुबह, जब वह आईने के सामने खड़ी हुई, तो उसे अपनी सूजी हुई आंखें और उतरा हुआ चेहरा देखकर खुद पर घिन आने लगी। उसने खुद से सवाल किया, “क्या मेरी जिंदगी का मकसद सिर्फ इस आदमी की ज्यादतियों को सहना है? क्या मेरा अपना कोई वजूद नहीं है? अगर कल को मेरी कोई बेटी होती, तो क्या मैं उसे भी यही समझौता करना सिखाती?”
उसी पल काव्या के अंदर का मरा हुआ आत्मसम्मान फिर से सांस लेने लगा। उसने अपने आंसू पोंछे और एक बड़ा फैसला लिया। उसने अपने माता-पिता को सब कुछ सच बता दिया। हालांकि उसे लगा था कि उसके पिता ताना मारेंगे, लेकिन उन्होंने कहा, “बेटा, घर के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा खुले हैं। इंसान से गलती होती है, लेकिन उस गलती को ढोते रहना कायरता है।” काव्या ने समीर को तलाक का नोटिस भेज दिया। समीर ने पहले उसे धमकाया, फिर झूठे आंसू बहाकर ब्लैकमेल करने की कोशिश की, लेकिन इस बार काव्या पिघलने वाली नहीं थी। उसने अपना बैग पैक किया और उस आलीशान घर को हमेशा के लिए छोड़ दिया।
अब काव्या अपने खुद के एक छोटे से फ्लैट में रहती थी और एक स्कूल में टीचर की नौकरी कर रही थी। जिंदगी संघर्ष से भरी थी, लेकिन उस संघर्ष में एक सुकून था।
वर्तमान में लौटते हुए, राधिका अभी भी काव्या के जवाब का इंतजार कर रही थी। काव्या ने राधिका का हाथ अपने हाथों में लिया और बहुत ही कोमलता से कहा, “राधिका, तुम्हें किसने कहा कि मैं आज का यह त्योहार या यह व्रत समीर के लिए कर रही हूँ?”
राधिका कन्फ्यूज हो गई, “तो फिर किसके लिए? तीज का व्रत तो पति की लंबी उम्र के लिए होता है ना?”
काव्या उठी और खिड़की के पास जाकर बाहर हो रही बारिश को देखने लगी। एक गहरी और संतुष्ट मुस्कान उसके होठों पर तैर गई। उसने पीछे मुड़कर राधिका की तरफ देखा और कहा, “हां, बचपन से यही सुना है कि यह व्रत पति की लंबी उम्र के लिए होता है। लेकिन आज मैं यह व्रत किसी और के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए कर रही हूँ। यह मेहंदी मैंने किसी के नाम की नहीं लगाई है, बल्कि यह मेरे जीवन में आए नए रंगों का प्रतीक है। यह हरा रंग मेरी उस नई शुरुआत का जश्न है जो मैंने अपने लिए चुनी है।”
वह वापस आईने के सामने आकर खड़ी हुई और अपनी परछाई को गर्व से देखते हुए बोली, “मैंने सालों तक खुद को एक घुटन भरे पिंजरे में कैद रखा। अपने सपनों को, अपनी मुस्कान को मार दिया था। आज मैं उस मरी हुई काव्या का शोक नहीं मना रही, बल्कि आज मैं अपने अंदर जन्म लेने वाली उस नई और मजबूत औरत की लंबी उम्र की कामना कर रही हूँ, जिसने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत की। मैं अपने उस आत्मसम्मान की लंबी उम्र के लिए व्रत कर रही हूँ, जो अब कभी किसी के पैरों तले नहीं कुचला जाएगा।”
राधिका की आंखों में आंसू आ गए। उसने आगे बढ़कर काव्या को कसकर गले लगा लिया। “मुझे तुम पर बहुत गर्व है काव्या। तुमने सही कहा, एक औरत का वजूद सिर्फ किसी की पत्नी होने में नहीं है। तुम्हारा यह रूप, तुम्हारी यह सोच सच में बहुत खूबसूरत है।”
उस दिन काव्या ने तीज की पूजा की, लेकिन किसी और की जिंदगी की भीख मांगने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खुद की जिंदगी को पूरे सम्मान और आज़ादी के साथ जीने का संकल्प लेने के लिए। शाम को जब वह अपनी बालकनी में खड़ी होकर आसमान में छंटे हुए बादलों के बीच से झांकते चांद को देख रही थी, तो उसे लगा जैसे वह चांद भी आज सिर्फ उसी की इस नई आज़ादी पर मुस्कुरा रहा हो। काव्या को अब किसी के सहारे की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उसने खुद अपनी उड़ान का आसमान ढूंढ लिया था।
क्या आपको नहीं लगता कि हर इंसान को सबसे पहले खुद से प्यार करना चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो इसे लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसे ही मार्मिक और प्रेरणादायक कहानियां पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”