प्रायश्चित की छांव

 आज जब मैं अपने बेटे आरव को देखता हूं, तो सोचता हूं कि जमाना कितना बदल गया है। आज भौतिक चीजों की कोई कद्र नहीं बची। बच्चे गलतियां करते हैं, चीजें गंवाते हैं और हम माता-पिता अपनी आधुनिकता और लाड़-प्यार के नाम पर उन्हें तुरंत नई चीजें दिलाकर उनकी गलतियों पर पर्दा डाल देते हैं। न आज बच्चों में उस नुकसान का कोई मलाल दिखता है, न ही माता-पिता में अनुशासन का वह पुराना भाव। बेशक, मेरे पिता का वह तरीका अमानवीय और अत्यधिक कठोर था, जिसे आज का कोई भी समाज सही नहीं ठहरा सकता। लेकिन उस दौर की सादगी और उस कठोरता के पीछे छिपी सच्चाई की खोज ने मुझे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया था।

दिन ढल चुका था और ड्राइंग रूम की नर्म पीली रोशनी में मेरा चौदह साल का बेटा आरव सोफे पर बैठा अपने नए स्मार्टफोन पर उंगलियां दौड़ा रहा था। अभी दो दिन पहले ही उसका महंगा टैबलेट स्कूल की बस में कहीं छूट गया था। जब उसने सहमी हुई नजरों से अपनी मां को यह बात बताई, तो मुझे लगा था कि कम से कम डांट तो पड़ेगी ही। पर उसकी मां ने बस प्यार से उसके बाल संवारे, हल्की सी मुस्कान बिखेरी और अगले ही दिन उससे भी बेहतर नया मॉडल लाकर उसके हाथों में थमा दिया। आरव हंस पड़ा और कमरे में सामान्य चहल-पहल लौट आई। पर उस हंसी के पीछे, मेरे भीतर का एक कोना अचानक सुन्न पड़ गया। समय के पर्दे तेजी से पीछे हटने लगे और मैं वर्तमान से खिंचकर सीधे पैंतीस साल पीछे, अपने कस्बे जबलपुर के उस पुराने खपरैल वाले घर में जा खड़ा हुआ, जहां संस्कारों की कीमत किसी भी दौलत से बड़ी मानी जाती थी।

वह उन्नीस सौ अस्सी के दशक की एक तपती हुई दोपहरी थी। घर में सादगी ऐसी थी कि हर पैसे का हिसाब चूल्हे की राख के पास रखी डायरी में दर्ज होता था। मेरे पिता, जिन्हें पूरा कस्बा ‘पंडित हरिशंकर जी’ के नाम से जानता था, बेहद उसूलपसंद और कड़क मिजाज इंसान थे। वे कस्बे के गल्ला मंडी में मुनीमी का काम करते थे। उनकी ईमानदारी की मिसालें पूरे बाजार में दी जाती थीं। घर में नियम था कि अगर राह चलते किसी का गिरा हुआ एक पैसा भी मिल जाए, तो उसे हाथ नहीं लगाना है। मैं, यानी देवांग, तब मुश्किल से बारह-तेरह साल का रहा होऊंगा। सातवीं कक्षा में पढ़ता था और पिता के सख्त अनुशासन के साए में पलते हुए भी मन में उनके प्रति अगाध आदर रखता था। हमारे साथ घर में मेरी मां जानकी, बुआ जी प्रभावती और बुआ के देवर का बेटा सुमित भी रहता था। सुमित मुझसे तीन साल बड़ा था, दसवीं की पढ़ाई के सिलसिले में गांव से हमारे यहां आया हुआ था। उसकी आदतें थोड़ी लापरवाह थीं, पर घर में उसे मेहमान की तरह ही देखा जाता था।

उस मनहूस दिन की शुरुआत सामान्य ही हुई थी। बाबूजी को मंडी के किसी बड़े लेन-देन के लिए अपनी संदूकची से निकाल कर पचास रुपये का एक नया कड़कड़ाता नोट कुर्ते की जेब में रखना था। वह जमाना ऐसा था जब पचास रुपये में महीने भर का राशन आ जाया करता था। दोपहर को जब बाबूजी खाना खाने घर लौटे, तो उनका चेहरा तमतमाया हुआ था। आंगन में कदम रखते ही उन्होंने खूंटी पर टंगा अपना कुर्ता उतारा और जोर से चिल्लाए। जेब खाली थी। पचास का वह नोट गायब था। पूरे घर में सन्नाटा पसर गया। मां चूल्हा छोड़कर बाहर भागी आईं, बुआ जी पूजा की थाली लिए चौके से निकलीं। बाबूजी ने गरजते हुए कहा कि घर में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं आया, नोट यहीं से गायब हुआ है।

सुमित उस वक्त बरामदे में बैठकर अपनी गणित की किताब पलट रहा था। बाबूजी ने जब उससे पूछा तो उसने बहुत ही मासूमियत से अपनी आंखें झुका लीं और धीरे से कहा कि उसने देवांग को सुबह संदूकची के आसपास देखा था। बाबूजी की लाल-पीली आंखें मुझ पर टिक गईं। मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा। उन्होंने तुरंत मेरा पुराना कैनवास का बस्ता मंगवाया। जैसे ही बस्ता उल्टा गया, किताबों और कॉपियों के बीच से वही मुड़ा-तुड़ा पचास का नोट फर्श पर गिर पड़ा। उस नोट का गिरना मेरे लिए किसी पहाड़ के टूटने जैसा था।

मेरी दुनिया एक पल में बिखर गई। मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि बाबूजी, मुझे नहीं पता यह नोट मेरे बस्ते में कैसे आया। मैंने कोई चोरी नहीं की। पर उस वक्त बाबूजी के सिर पर ईमानदारी की प्रतिष्ठा का ऐसा भूत सवार था कि उनका विवेक पूरी तरह खो चुका था। उन्हें लगा कि उनका अपना बेटा न केवल चोर निकला, बल्कि पकड़े जाने पर सफेद झूठ बोलकर उनकी आंखों में धूल झोंकने की धृष्टता भी कर रहा है। बिना एक पल सोचे, उन्होंने आंगन में रखे अमरूद के पेड़ से तोड़ी गई पतली लचीली छड़ी उठाई और मुझ पर टूट पड़े। छड़ी की हर मार के साथ मेरी चमड़ी पर लाल धारियां उभर रही थीं और मैं चीख-चीख कर अपनी बेगुनाही की दुहाई दे रहा था। मां रोते हुए मेरे आगे आंचल फैलाकर गिर पड़ीं, पर बाबूजी के गुस्से के आगे उनकी एक न चली।

बाबूजी इतने पर ही नहीं रुके। क्रोध के उस उन्माद में उन्होंने रस्सी से मेरे दोनों हाथ पीछे बांधे और घर के पिछले हिस्से में बनी अनाज और उपलों की अंधेरी कोठरी में मुझे खींच ले गए। वहां छत से लटकती लोहे की कड़ी से मेरे बंधे हाथों को इस तरह बांध दिया कि मेरे पैरों के अंगूठे जमीन से महज कुछ इंच ऊपर हवा में झूलते रहे। उन्होंने मां को सख्त चेतावनी दी कि सूरज ढलने से पहले इस कोठरी का दरवाजा खुला तो अंजाम बहुत बुरा होगा। भारी लकड़ी का दरवाजा धड़ाम से बंद हुआ और सांकल चढ़ा दी गई।

उस सीलन भरी, घुटन और अंधेरे से घिरी कोठरी में मैं अकेला था। हाथों में खिंचाव की वजह से कंधों में असहनीय दर्द हो रहा था। पैरों के अंगूठों से मैं नीचे की ठंडी मिट्टी को छूने की लाख कोशिश करता, ताकि शरीर का थोड़ा भार संभल सके, पर हर प्रयास व्यर्थ जाता। मेरी आंखों से आंसू बह-बह कर गालों पर सूख रहे थे। मुझे उस शारीरिक मार से ज्यादा इस बात की पीड़ा थी कि जिस पिता को मैं ईश्वर तुल्य मानता था, उन्होंने मेरी एक न सुनी। चीखते, रोते और सिसकते हुए कब मेरी चेतना लुप्त हो गई और मैं बेहोश होकर उस रस्सी के सहारे झूल गया, मुझे इसका भान ही नहीं रहा।

जब मेरी आंखें खुलीं, तो कोठरी का दरवाजा खुला हुआ था और शाम की ठंडी हवा अंदर आ रही थी। कोई मेरे बंधे हाथों की रस्सी को बहुत आहिस्ता से खोल रहा था। वह बुआ जी थीं। उनके आंसुओं की गर्म बूंदें मेरी पीठ पर गिर रही थीं। मां पास ही बैठी कांपते हाथों से मेरे होंठों पर पानी की कटोरी छुआ रही थीं। बुआ जी रोते हुए बाबूजी की कठोरता को कोस रही थीं और बार-बार कह रही थीं कि भगवान ऐसी अंधी सजा किसी को न दे। रस्सी खुलते ही मैं बेदम होकर मां की गोद में गिर पड़ा। शरीर का हर जोड़ दुख रहा था, पर मन की चोट उससे कहीं ज्यादा गहरी थी।

होश में आने के बाद धीरे-धीरे मुझे असलियत पता चली। बाबूजी के मंडी लौट जाने के बाद घर का माहौल असहज था। बुआ जी जानती थीं कि मेरा स्वभाव कैसा है; मैंने कभी किसी की पेंसिल तक बिना पूछे नहीं ली थी। उन्होंने घर में ही अपनी जांच शुरू की। जब उन्होंने सुमित के कमरे की तलाशी ली, तो उसके संदूक में रखे कपड़ों के नीचे से कुछ बीड़ी के बंडल और कस्बे के मेले में खरीदे गए फालतू सामान की रसीदें मिलीं। बुआ जी ने जब उसे अकेले में बिठाकर सख्ती से पूछा और गंगाजल हाथ में उठाने को कहा, तो सुमित टूट गया। उसने रोते हुए स्वीकार कर लिया कि उसने पहले भी कई बार पैसे चुराए थे। इस बार पचास का नोट देखकर उसका लालच बढ़ गया था, लेकिन जब उसे लगा कि पकड़े जाने का खतरा है, तो उसने मौका पाकर नोट देवांग के बस्ते में सरका दिया ताकि सारा दोष मेरे सिर मढ़ जाए और वह साफ बच निकले।

शाम को जब बाबूजी थके-हारे घर लौटे, तो घर का सन्नाटा सामान्य दिनों जैसा नहीं था। बुआ जी आंगन में उनका इंतजार कर रही थीं। जैसे ही बाबूजी ने जूते उतारे, बुआ जी ने सुमित को खींचकर उनके सामने खड़ा कर दिया और पूरी सच्चाई उगलवा दी। सुमित सिर झुकाए थर-थर कांपते हुए अपनी गलती कबूल कर रहा था। उस क्षण बाबूजी का चेहरा देखने लायक था। क्रोध की जगह एक ऐसी आत्मग्लानि, शर्म और पश्चाताप ने ले ली थी, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उनकी मजबूत देह जैसे एकदम से झुक गई। बुआ जी ने उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई कि उन्होंने बिना सोचे-समझे अपने ही मासूम बेटे की आत्मा को छलनी कर दिया। बाबूजी एक शब्द भी न बोल सके। वे पत्थर की मूरत बने सिर झुकाए खड़े रहे और उनकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली।

उस रात घर में चूल्हा नहीं जला। रात के सन्नाटे में, जब पूरा घर सो चुका था, मेरी आंख खुली। मेरे बदन पर हल्दी और तेल का लेप लगा हुआ था। कमरे में मद्धम लालटेन जल रही थी। मैंने देखा कि बाबूजी मेरी खाट के नीचे फर्श पर बैठे हुए थे। उनके हाथ मेरे सूजे हुए नन्हे पैरों पर रखे थे और वे बच्चों की तरह हिचकियां ले-लेकर रो रहे थे। एक सख्त, स्वाभिमानी और कड़क पिता को इस तरह अपनी संतानों के कदमों में टूटते देखना मेरे लिए बहुत भारी था। जैसे ही उन्होंने देखा कि मैं जाग गया हूं, उन्होंने कांपते हाथों से मेरा माथा छू लिया। उनके होंठ हिले, पर आवाज नहीं निकली। बस उनकी आंखों में क्षमा की ऐसी भीख थी, जिसने मेरे दिल के सारे दर्द को एक पल में धो दिया। मैंने अपना हाथ उनके आंसुओं से भीगे गालों पर रख दिया। उस रात बिना एक शब्द बोले, पिता और पुत्र के बीच एक ऐसा अदृश्य और अटूट रिश्ता बन गया, जो उनकी अंतिम सांस तक कायम रहा।

बुआ जी के फैसले के अनुसार, सुमित को अगली ही सुबह पहली बस से वापस उसके गांव भेज दिया गया। उस घटना के बाद बाबूजी का व्यवहार मेरे प्रति पूरी तरह बदल गया। वे पहले जैसे कड़क मुनीम जरूर रहे, पर मेरे लिए वे एक ऐसे ढाल बन गए जिस पर कभी अविश्वास की खरोंच तक नहीं आ सकती थी। बड़े होकर जब भी मुझसे कोई चूक हुई, उन्होंने कभी मुझ पर हाथ नहीं उठाया, बल्कि मुझे पास बिठाकर समझाया। उन्हें मुझ पर इतना अटूट विश्वास था कि दुनिया चाहे कुछ भी कहे, वे हमेशा मेरी सच्चाई के साथ खड़े रहे। उस एक गलत सजा के प्रायश्चित ने उन्हें एक सख्त पिता से मेरा सबसे सच्चा, सबसे संवेदनशील मित्र बना दिया था।

आज जब मैं अपने बेटे आरव को देखता हूं, तो सोचता हूं कि जमाना कितना बदल गया है। आज भौतिक चीजों की कोई कद्र नहीं बची। बच्चे गलतियां करते हैं, चीजें गंवाते हैं और हम माता-पिता अपनी आधुनिकता और लाड़-प्यार के नाम पर उन्हें तुरंत नई चीजें दिलाकर उनकी गलतियों पर पर्दा डाल देते हैं। न आज बच्चों में उस नुकसान का कोई मलाल दिखता है, न ही माता-पिता में अनुशासन का वह पुराना भाव। बेशक, मेरे पिता का वह तरीका अमानवीय और अत्यधिक कठोर था, जिसे आज का कोई भी समाज सही नहीं ठहरा सकता। लेकिन उस दौर की सादगी और उस कठोरता के पीछे छिपी सच्चाई की खोज ने मुझे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया था।

सच्चा अनुशासन किसी वस्तु के नुकसान पर चीखने-चिल्लाने में नहीं, बल्कि सच और झूठ की परख करने के धैर्य में होता है। माता-पिता का क्रोध अगर अनियंत्रित हो जाए, तो वह बच्चों के मन में कभी न भरने वाले घाव छोड़ सकता है। पर साथ ही, अगर गलती का अहसास होने पर पिता अपने अहंकार को त्यागकर बच्चे के सामने झुक जाए, तो वही पश्चाताप रिश्तों को अमर बना देता है। काश, आज की पीढ़ी भी यह समझ पाती कि रिश्तों की बुनियाद महंगे खिलौनों या गैजेट्स से नहीं, बल्कि आपस के अटूट विश्वास, समय और सच्ची समझ से बनती है।

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