राख से उठी उड़ान

 “बाबूजी, मैं कोई भगवान या महान आत्मा नहीं हूँ। मैं बस समीर की पत्नी और अपने बच्चों की माँ हूँ। मैंने आपकी मदद इसलिए नहीं की कि मैं आपके किए गए उस अन्याय को भूल गई हूँ। वो ज़ख्म कभी नहीं भर सकते। मैंने आपकी मदद इसलिए की है क्योंकि मैं आप जैसी नहीं बन पाई। अगर आज मैं भी आपको धक्के मार कर निकाल देती, तो उस दिन के सुरेश जी और आज की मीरा में क्या फर्क रह जाता?”

मीरा का जीवन पुणे की एक शांत और हरी-भरी कॉलोनी के उस खूबसूरत घर में एक मीठे सपने की तरह बीत रहा था। उसके पति समीर एक बड़े बैंक में मैनेजर थे। उनका घर किसी मंदिर से कम नहीं था, जहाँ मीठी हंसी, बच्चों की किलकारियां और मीरा की रसोई से आती ताज़ा मसालों की खुशबू हमेशा तैरती रहती थी। मीरा एक बेहद साधारण, शांत और घरेलू महिला थी। उसकी दुनिया सिर्फ समीर और उसके दो बच्चों, सात साल के रोहन और चार साल की तारा तक ही सिमटी हुई थी। बैंक के काम से समीर भले ही कितना भी थक कर घर आएं, मीरा के हाथ की बनी चाय और उसकी एक मुस्कान उनकी सारी थकान मिटा देती थी। मीरा ने कभी दुनिया की ऊंच-नीच नहीं देखी थी। उसे लगता था कि जीवन इसी तरह समीर की उंगलियां पकड़े हुए सुरक्षित गुज़र जाएगा।

लेकिन वक्त को कुछ और ही मंजूर था। एक मनहूस सुबह, समीर को ऑफिस में एक भयंकर हार्ट अटैक आया और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया। मीरा के लिए तो जैसे आसमान फट पड़ा। जिस इंसान को वह अपना भगवान मानती थी, वह अचानक उसे एक अंतहीन अंधेरे में छोड़कर चला गया था। घर में मातम छा गया। मीरा की तो सुध-बुध ही छिन गई थी।

समीर के जाने के अभी पंद्रह दिन भी नहीं बीते थे कि रिश्तों की असली और भयानक सच्चाई मीरा के सामने आ गई। एक शाम, मीरा के ससुर केदार प्रसाद और जेठ सुरेश ने उसे अपने कमरे में बुलाया। मीरा को लगा कि शायद वे इस दुख की घड़ी में उसे कोई ढांढस बंधाएंगे, लेकिन वहां तो जैसे कोई और ही योजना बन चुकी थी। केदार प्रसाद ने बड़ी बेरुखी से कहा, “मीरा, समीर ने बैंक से एक बड़ा लोन लिया था, जो वह चुका नहीं पाया। अब इस घर को बेचकर हमें वो कर्ज़ उतारना होगा। सुरेश की अपनी नौकरी छूट गई है, इसलिए हम लोग पुश्तैनी गांव लौट रहे हैं।”

मीरा ने घबराकर पूछा, “बाबूजी, तो मैं और मेरे बच्चे कहाँ जाएंगे?”

इस पर उसकी जेठानी रागिनी ने बीच में ही बात काटते हुए तंज कसा, “जहाँ तुम्हारा मन करे! क्या जीवन भर हम तुम्हारे बच्चों का बोझ उठाएंगे? अपने पति को तो निगल गई, अब क्या हमारी भी जान लेगी? वैसे भी समीर ने हमारे लिए छोड़ा ही क्या है?”

मीरा फूट-फूट कर रोई। उसने अपने ससुर के पैर पकड़े, जेठ के आगे हाथ जोड़े, बच्चों के भविष्य की दुहाई दी। लेकिन संपत्ति और लालच की पट्टी आंखों पर ऐसी बंधी थी कि किसी का दिल नहीं पसीजा। उसी रात, मीरा को उसके दो सूटकेस और दोनों बच्चों के साथ उस घर से निकाल दिया गया, जिसे उसने इतने प्यार से सजाया था।

रात का अंधेरा, पुणे की अनजान सड़कें और दोनों हाथों से अपनी उंगलियां पकड़े दो सहमे हुए बच्चे। मीरा को समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ जाए। रात बिताने के लिए वह एक बस स्टैंड पर बैठ गई। पूरी रात वह बच्चों को सीने से लगाए रोती रही। अगले दिन, एक पुरानी सहेली की मदद से शहर के एक बहुत ही पिछड़े और गरीब इलाके में उसे एक छोटा सा टिन की छत वाला कमरा किराए पर मिल गया।

वह कमरा एक भट्टी की तरह तपता था। पहली रात, जब ज़मीन पर एक पुरानी चादर बिछाकर मीरा ने बच्चों को लिटाया, तो उसकी हिम्मत जवाब दे गई। तारा भूख से बिलख रही थी और रोहन गुमसुम छत को घूर रहा था। मीरा के पास राशन खरीदने के लिए एक रुपया नहीं था। उस भयानक रात में मीरा को लगा कि वह हार गई है। उसने सोचा कि इस घुटन और रोज़-रोज़ की जिल्लत से अच्छा है कि वह बच्चों के साथ अपनी जान दे दे। निराशा ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था।

वह इसी उधेड़बुन में थी कि अचानक नींद में रोहन का हाथ मीरा के गाल पर पड़ा। बच्चे ने आंखें खोलीं और अपनी माँ के आंसू पोंछते हुए कहा, “माँ, आप मत रो। जब मैं बड़ा हो जाऊंगा न, तो मैं काम करूंगा और आपके लिए बहुत सारे पैसे लाऊंगा।”

उस सात साल के बच्चे की इस बात ने मीरा के अंदर जैसे बिजली दौड़ा दी। उसका मातृत्त्व चीख उठा। उसने खुद को धिक्कारा कि वह इतनी कमज़ोर कैसे हो सकती है? जो बच्चे उस पर निर्भर हैं, उन्हें छोड़कर वह हार कैसे मान सकती है? उस रात मीरा ने कसम खाई कि अब उसकी आंखों से एक भी आंसू नहीं गिरेगा।

अगली सुबह मीरा उठी, उसने अपनी शादी की आखिरी निशानी, अपनी सोने की बालियां बाज़ार में बेच दीं। उन पैसों से वह बच्चों के लिए दूध, कुछ राशन और थोक बाज़ार से कुछ खड़े मसाले ले आई। मीरा को मसाले पीसने और उन्हें सही अनुपात में मिलाने का बहुत शौक था, समीर हमेशा उसके बनाए मसालों की तारीफ करते थे। बस, इसी हुनर को उसने अपना हथियार बना लिया।

शुरुआती दिन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। मीरा सुबह चार बजे उठती, सिलबट्टे और ओखली में घंटों तक भारी पत्थर से मसाले कूटती। लाल मिर्च पीसते-पीसते उसके हाथों में गहरे लाल रंग के छाले पड़ जाते, आंखों से पानी बहता रहता, लेकिन वह रुकती नहीं। फिर वह उन मसालों को छोटे-छोटे पैकेट में भरती और कड़ी धूप में पैदल घर-घर जाकर बेचने लगती।

लोग अक्सर उसे दुत्कार देते। कई बार लोग दरवाज़ा मुंह पर बंद कर देते, तो कई औरतें ताना मारतीं कि ज़रूर इसका चरित्र ठीक नहीं होगा, तभी तो पति के मरते ही सड़क पर आ गई। एक बार तो एक दुकानदार ने उसके मसाले ज़मीन पर फेंक दिए और कहा कि वह किसी सड़क छाप औरत का माल नहीं बेचेगा।

मीरा चुपचाप ज़मीन से अपने मसाले उठाती और आगे बढ़ जाती। उसके पैरों में बिवाइयां फट गई थीं, चेहरा धूप से झुलस गया था, लेकिन उसके अंदर की आग बाहर की धूप से कहीं ज्यादा तेज़ थी। धीरे-धीरे, जिन लोगों ने तरस खाकर या मजबूरी में उसके मसाले खरीदे थे, उन्हें वो स्वाद इतना पसंद आया कि वे दोबारा मीरा का इंतज़ार करने लगे। बाज़ार के मिलावटी मसालों के बीच मीरा के हाथ से पिसे शुद्ध और खुशबूदार मसालों ने अपना जादू दिखाना शुरू कर दिया।

कुछ महीनों में, 10 पैकेट की बिक्री 100 तक पहुंच गई। मीरा ने कुछ और बेसहारा महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। टिन की छत वाले उस कमरे से शुरू हुआ काम अब एक छोटे से शेड में बदल गया था। उसका नाम रखा गया – ‘मीरा मसाले’।

उसने रात-दिन एक कर दिया। वह एक माँ भी थी और एक पिता भी। बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी न आए, इसके लिए वह खुद भूखी सो जाती, लेकिन उनकी फीस हमेशा समय पर भरती। जो औरत कभी घर की चौखट लांघने से डरती थी, वो अब बाज़ारों में बड़े-बड़े व्यापारियों से मोलभाव करती थी, ट्रांसपोर्टरों से लड़ती थी और अपने हक के लिए आवाज़ उठाना सीख गई थी।

देखते ही देखते बीस साल गुज़र गए।

पुणे शहर की एक बहुत बड़ी व्यावसायिक इमारत की सबसे ऊपरी मंज़िल पर आज ‘मीरा ऑर्गेनिक्स एंड स्पाइसेस’ का मुख्य कार्यालय था। मीरा का कारोबार अब पूरे देश में फैल चुका था और विदेशों में भी उनके उत्पादों का निर्यात होता था। रोहन अब एक मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट बन चुका था और तारा ने एक बड़े संस्थान से एमबीए करके अपनी माँ का बिज़नेस संभाल लिया था।

मीरा अब वो डरी-सहमी औरत नहीं थी। वह खादी की खूबसूरत साड़ी पहने, चेहरे पर एक बेहद शांत लेकिन मज़बूत तेज़ लिए अपनी कुर्सी पर बैठी एक सशक्त महिला थी। शहर के बड़े-बड़े लोग उससे मिलने के लिए वक्त मांगते थे।

एक दिन बारिश हो रही थी। मीरा अपने केबिन में बैठी एक बड़ी डील के कागज़ात देख रही थी, तभी तारा ने केबिन का दरवाज़ा खोला।

“माँ, रिसेप्शन पर दो लोग आपसे मिलने की ज़िद कर रहे हैं। सिक्योरिटी उन्हें बाहर निकाल रही थी, लेकिन वो आपका नाम ले-लेकर रो रहे हैं,” तारा ने कहा।

मीरा ने बाहर आकर देखा, तो उसके कदम ठिठक गए। सामने दो फटेहाल, कमज़ोर और लाचार इंसान खड़े थे। वो उसके ससुर केदार प्रसाद और जेठ सुरेश थे। सुरेश के कपड़े मैले थे और केदार प्रसाद एक पुरानी व्हीलचेयर पर बैठे थे, उनका आधा शरीर लकवे का शिकार हो चुका था।

मीरा को देखते ही सुरेश की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह दौड़कर मीरा के पैरों में गिर पड़ा। “मीरा… हमें माफ़ कर दे बहू! भगवान ने हमें हमारे किए की बहुत बड़ी सज़ा दी है। लालच में आकर मैंने जो बिज़नेस शुरू किया था, उसमें सब कुछ डूब गया। घर, ज़मीन सब नीलाम हो गया। बाबूजी को सदमे से पैरालिसिस हो गया है। मेरे पास इन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने तक के पैसे नहीं हैं। हमें बस कहीं कोई भी छोटी सी नौकरी दे दे, ताकि हम ज़िंदा रह सकें।”

मीरा वहीं खड़ी रही। कुछ पलों के लिए उसके दिमाग में वो काली रात घूम गई। वो बस स्टैंड, तारा की भूख से रोती आवाज़, जेठानी के वो ज़हरीले ताने, और पैरों के वो छाले जो आज भी ठंड के मौसम में दर्द करते थे। अगर मीरा चाहती तो आज उन पर अपना पूरा गुस्सा निकाल सकती थी। वह उन्हें बेइज़्ज़त करके उसी सड़क पर फेंक सकती थी, जहाँ उन्होंने उसे फेंका था।

लेकिन मीरा के चेहरे पर कोई नफरत नहीं थी। उसने धीरे से अपने पैर पीछे किए। उसने तारा को इशारा किया और कहा, “तारा, इन्हें उठने में मदद करो।”

फिर उसने अपने मैनेजर को बुलाया और बहुत ही शांत और सधे हुए स्वर में कहा, “गुप्ता जी, शहर के सबसे अच्छे अस्पताल में बाबूजी के इलाज का इंतज़ाम करवाइए। सारा खर्च कंपनी के अकाउंट से जाएगा। और सुरेश जी के लिए हमारी पैकेजिंग यूनिट में सुपरवाइज़र की एक नौकरी पक्की कर दीजिए, जिससे इनके परिवार का सम्मानजनक गुज़ारा हो सके।”

सुरेश और केदार प्रसाद अवाक रह गए। केदार प्रसाद के कांपते हाथों ने हाथ जोड़ लिए, और उनके मुंह से टूटे हुए शब्द निकले, “तू इंसान नहीं… भगवान है बहू। हमने तुझे बर्बाद कर दिया था, और तूने हमें जीवनदान दे दिया।”

मीरा ने उनकी तरफ देखते हुए बहुत ही सहजता से कहा, “बाबूजी, मैं कोई भगवान या महान आत्मा नहीं हूँ। मैं बस समीर की पत्नी और अपने बच्चों की माँ हूँ। मैंने आपकी मदद इसलिए नहीं की कि मैं आपके किए गए उस अन्याय को भूल गई हूँ। वो ज़ख्म कभी नहीं भर सकते। मैंने आपकी मदद इसलिए की है क्योंकि मैं आप जैसी नहीं बन पाई। अगर आज मैं भी आपको धक्के मार कर निकाल देती, तो उस दिन के सुरेश जी और आज की मीरा में क्या फर्क रह जाता?”

मीरा थोड़ा रुकी और फिर बोली, “आप लोगों ने जब मुझे निकाला था, तब आपको लगा था कि आप मेरा अंत कर रहे हैं। पर सच कहूँ तो, आपने उस कमज़ोर और डरी हुई मीरा को मार दिया था। आज जो मीरा आपके सामने खड़ी है, वो आपके दिए गए उन्हीं ज़ख्मों और ठोकरों से बनी है। आपने मुझे मजबूर किया था, पर मैंने अपनी मजबूरी को अपनी ताकत बना लिया। आप काम पर जा सकते हैं, सुरेश जी।”

यह कहकर मीरा अपने केबिन की तरफ मुड़ गई। पीछे ससुर और जेठ अपने पश्चाताप के आंसुओं में डूबे खड़े थे।

मीरा ने अपने केबिन की बड़ी सी कांच की खिड़की से बाहर देखा। बारिश रुक चुकी थी और बादलों के बीच से सूरज की सुनहरी किरणें शहर पर पड़ रही थीं। मीरा के होंठों पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। उसे पता था कि ज़िंदगी ने उसे एक भयंकर आग में झोंका था, लेकिन वह राख बनकर उड़ी नहीं, बल्कि एक सोने की तरह तपकर बाहर निकली थी। उसने साबित कर दिया था कि एक औरत का वजूद सिर्फ किसी के सहारे पर नहीं टिका होता, बल्कि उसके भीतर एक ऐसा ब्रह्मांड छिपा होता है, जो अगर ठान ले, तो शून्य से भी शिखर का निर्माण कर सकता है।

क्या आपको भी लगता है कि विपरीत परिस्थितियां इंसान को तोड़ने के बजाय उसकी असली ताकत से उसका परिचय करवाती हैं? क्या मीरा ने अपने ससुराल वालों की मदद करके एक बड़ी मिसाल कायम की या उसे उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए था? अपने विचार कमेंट में ज़रूर बताएं।

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 लेखिका : निर्मला साहू

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