विश्वनाथ जी घुटनों के बल सरला के पार्थिव शरीर के पास बैठ गए। उन्होंने थरथराते हाथों से सिंदूर की डिब्बी उठाई और सरला की चौड़ी मांग में गहरा लाल सिंदूर भर दिया। इसके बाद, उन्होंने मखमल की डिब्बी से वह सोने का कंगन निकाला और सरला की ठंडी, बेजान कलाई में धीरे से पहना दिया। कंगन की एक हल्की सी खनक पूरे शांत आंगन में गूंज गई। वहां खड़े हर इंसान की आंखें यह दृश्य देखकर नम हो गईं। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि इस उम्र में विश्वनाथ जी का यह रूप किस दर्द की अभिव्यक्ति था।
रिश्तेदारों का आना-जाना लगा हुआ था, कुछ लोग फुसफुसा कर बातें कर रहे थे और बाहर बरामदे में सफेद चादरें बिछाई जा रही थीं। लेकिन उस पूरे हुजूम और हलचल से कोसों दूर, सीढ़ियों की सबसे निचली पायदान पर पत्थर की मूरत बने बैठे थे विश्वनाथ जी।
विश्वनाथ जी की शून्य आंखें ज़मीन की एक दरार पर टिकी थीं। उनके कानों में दुनिया की कोई आवाज़ नहीं पहुंच रही थी। न ही पंडित जी के मंत्रोच्चार का स्वर, न पड़ोसियों की तसल्ली देने वाली बातें और न ही अंदर कमरे से आ रही बेटे-बहू की रुलाई।
आज भोर के करीब चार बजे जब अचानक सरला की सांसें उखड़ने लगी थीं, तो सब कुछ इतनी तेजी से घटा कि सोचने-समझने की मोहलत ही नहीं मिली। सरला ने बस एक बार अपना हाथ सीने पर रखा था, चेहरे पर असहनीय दर्द की एक लकीर उभरी और इससे पहले कि डॉक्टर को फोन मिलाया जाता या पानी की दो घूंट पिलाई जाती, सरला की बंद होती पलकों ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। डॉक्टरों ने बाद में इसे ‘मैसिव कार्डियक अरेस्ट’ का नाम दिया, लेकिन विश्वनाथ जी के लिए तो यह किसी वज्रपात से कम नहीं था। बमुश्किल पंद्रह मिनट के भीतर बत्तीस वर्षों का साथ रेत की तरह उंगलियों से फिसल गया था।
बेटा रोहन और बहू शिखा रो-रोकर बेहाल थे। दूर शहर में ब्याही बेटी अदिति को खबर कर दी गई थी, पर उसका पहुंचना मुमकिन नहीं दिख रहा था क्योंकि वह विदेश में थी और अंतिम दर्शन की आस भी अब धीरे-धीरे दम तोड़ रही थी। घर के पुराने वफादार सेवक सुखिया ने ही हिम्मत जुटाकर रिश्तेदारों को फोन किए थे, कफ़न का इंतज़ाम किया था और अर्थी का सामान मंगवाया था।
रोहन दो बार अपने पिता के पास आया, उनके कंधे पर हाथ रखकर बोला, “बाबूजी… उठिए, मां को स्नान करा दिया है। अब विदाई की तैयारी करनी है।” लेकिन विश्वनाथ जी ने न सिर उठाया, न कोई जवाब दिया। उनके भीतर आंसुओं का सैलाब तो था, पर पलकें बिल्कुल सूखी थीं। सदमे ने उनके सारे भावों को जैसे जमा दिया था।
तभी आंगन से पुरोहित जी की भारी आवाज़ गूंजी, “विश्वनाथ जी, ज़रा आगे आइए। सुहागन का शरीर है, विदा करने से पहले पति के हाथों से मांग में महावर और सिंदूर की अंतिम रस्म पूरी होनी है। आइए भाई साहब, समय बीता जा रहा है।”
‘अंतिम रस्म’—इन दो शब्दों ने विश्वनाथ जी के सुन्न पड़े दिमाग पर हथौड़े जैसा वार किया। वे किसी सम्मोहन से जागे हुए व्यक्ति की तरह अचानक हड़बड़ाकर खड़े हो गए। लड़खड़ाते कदमों से वे आंगन की तरफ नहीं, बल्कि सीधे अपने शयनकक्ष की ओर भागे।
कमरे में पहुंचते ही उन्होंने अलमारी खोली और कांपते हाथों से ऊपर वाले लॉकर को खंगाला। वहां लाल मखमल की एक छोटी सी डिब्बी रखी थी। उन्होंने उस डिब्बी को अपने सीने से भींच लिया। डिब्बी खोलते ही उसमें रखे सोने के बारीक नक्काशीदार कंगन की चमक उनकी भीगी आंखों में कौंध गई।
यह कंगन उन्होंने ठीक दो दिन पहले धनतेरस की शाम को खरीदा था।
उस शाम की एक-एक बात विश्वनाथ जी के ज़हन में किसी चलचित्र की तरह घूमने लगी। जब वे बाज़ार से चुपचाप यह डिब्बी लेकर लौटे थे और चाय की मेज पर सरला के सामने रखी थी, तो सरला ने बड़ी मासूमियत से चश्मे के ऊपर से उन्हें देखा था।
सरला ने आश्चर्य से पूछा था, “यह क्या है? क्या छोटे भाई की बेटी के लगन का शगुन तय हो गया? उनके लिए लाए हैं क्या?”
विश्वनाथ जी ने झेंपते हुए कहा था, “नहीं, उनके लिए नहीं है। तुम्हारे लिए है… खोलकर तो देखो।”
सरला ने डिब्बी खोली, कंगन देखे और फिर फीकी सी मुस्कान के साथ डिब्बी बंद करके वापस उनकी तरफ खिसका दी थी। उसने कहा था, “अब इस उम्र में, जब चेहरे पर झुर्रियां और बालों में सफेदी उतर आई है, मुझे इन गहनों की क्या ज़रूरत? पाई-पाई जोड़कर आपने गृहस्थी संभाली है, इसे रख दीजिए, आगे बहू के काम आएगा या अदिति को दे दीजिएगा। हम दोनों के बीच अब ये सब औपचारिकताएं अच्छी नहीं लगतीं।”
उस दिन सरला की उस बात ने विश्वनाथ जी के अंतर्मन को भीतर तक कुरेद दिया था। और आज, जब सरला शांत लेटी थी, तो जीवन के बत्तीस साल उनकी आंखों के आगे एक खुली किताब की तरह बिखर गए।
शादी के शुरुआती वर्षों में विश्वनाथ जी सरकारी क्लर्क की मामूली नौकरी में थे। घर में बूढ़े माता-पिता की बीमारियां, दो छोटी बहनों की शादी का भारी बोझ और फिर बच्चों की पढ़ाई का खर्च। उस पूरे दौर में विश्वनाथ जी हमेशा तनाव, चिड़चिड़ेपन और हिसाब-किताब के पन्नों में उलझे रहे। घर लौटते तो माथे पर हमेशा एक शिकन रहती। सरला सुबह पांच बजे उठकर चूल्हा फूंकने से लेकर रात को सबके सोने के बाद तक घर के एक-एक कोने को संवारती रहती थी। लेकिन बदले में उसे क्या मिला?
विश्वनाथ जी ने कभी पलटकर यह नहीं पूछा था कि ‘सरला, तुम थक तो नहीं गईं?’ कभी किसी तीज-त्योहार पर उसे अपनी पसंद की एक साड़ी तक लाकर नहीं दी। जब कभी सरला कुछ कहना चाहती, तो वे दफ्तर की थकान का बहाना बनाकर बात टाल देते। उन्होंने हमेशा यह मान लिया था कि पत्नी तो घर की नींव है, वह तो रहेगी ही, उसे किसी जतन, किसी प्रशंसा या किसी उपहार की क्या आवश्यकता? प्रेम तो मन में होता है, उसे जताने की क्या ज़रूरत!
लेकिन आज उन्हें समझ आ रहा था कि प्रेम केवल मौन समर्पण नहीं होता; प्रेम कभी-कभी जताना भी पड़ता है, दो मीठे बोल बोलने पड़ते हैं, साथी के अस्तित्व का सम्मान करना पड़ता है। उन्होंने जिंदगी भर सरला को ‘उपलब्ध’ समझा, उसकी खामोशियों को उसकी संतुष्टि मान बैठे। और जब उन्होंने पहली बार कुछ देने की कोशिश की, तो सरला को लगा कि यह इस उम्र में बेमानी है।
“नहीं सरला… यह बेमानी नहीं है,” विश्वनाथ जी ने बंद कमरे में कंगन को अपने आंसुओं से भिगोते हुए बुदबुदाया, “मैंने तुम्हें कभी शब्दों में प्यार नहीं दिया, कभी तुम्हारे साथ बैठकर धूप नहीं सेकी, पर मेरी इस सूखी और नीरस ज़िंदगी की रीढ़ सिर्फ तुम ही थीं। अगर मैं जीते जी यह नहीं जता सका, तो आज तुम्हें अपनी यह भूल स्वीकार करके ही विदा करूंगा।”
विश्वनाथ जी दृढ़ कदमों से कमरे से बाहर निकले। आंगन में आते ही उन्होंने देखा कि सरला लाल जोड़े में लिपटी शांत सो रही थी। चेहरे पर वही चिर-परिचित सादगी और हल्का सा ठहराव था।
विश्वनाथ जी घुटनों के बल सरला के पार्थिव शरीर के पास बैठ गए। उन्होंने थरथराते हाथों से सिंदूर की डिब्बी उठाई और सरला की चौड़ी मांग में गहरा लाल सिंदूर भर दिया। इसके बाद, उन्होंने मखमल की डिब्बी से वह सोने का कंगन निकाला और सरला की ठंडी, बेजान कलाई में धीरे से पहना दिया। कंगन की एक हल्की सी खनक पूरे शांत आंगन में गूंज गई। वहां खड़े हर इंसान की आंखें यह दृश्य देखकर नम हो गईं। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि इस उम्र में विश्वनाथ जी का यह रूप किस दर्द की अभिव्यक्ति था।
अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। चिता की लपटों के साथ सरला पंचतत्व में विलीन हो गई।
शाम को जब विश्वनाथ जी श्मशान से लौटे, तो घर पहले से भी ज्यादा वीरान लग रहा था। रोहन और शिखा ने उन्हें सहारा देकर सोफे पर बैठाना चाहा, लेकिन वे सीधे सरला की उस खाली आरामकुर्सी पर जाकर बैठ गए, जहां वह अक्सर शाम को बैठकर स्वेटर बुना करती थी या तुलसी की माला जपती थी।
रोहन ने सिसकते हुए कहा, “बाबूजी, कुछ खा लीजिए। सुबह से आपने पानी की एक बूंद नहीं ली है। मां चली गईं, पर हम तो हैं… आप खुद को संभालिए।”
विश्वनाथ जी ने अपने बेटे का हाथ अपने हाथ में लिया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन चेहरे पर एक ठहराव और स्पष्टता थी।
वे बहुत धीमे स्वर में बोले, “बेटा रोहन, मैं अपनी भूख या प्यास से नहीं लड़ रहा, मैं अपने उन बत्तीस सालों के पश्चाताप से लड़ रहा हूं जो मैंने गवां दिए। तेरी मां ने पूरी ज़िंदगी इस घर को मंदिर बनाने में झोंक दी, पर मैंने कभी उसे भगवान का दर्जा तो दूर, एक साधारण इंसान की तरह खुलकर प्यार भी नहीं दिया। मैं हमेशा सोचता रहा कि पहले जिम्मेदारियां पूरी कर लूं, फिर इत्मीनान से जिंदगी जिएंगे, हंसेंगे, बोलेंगे। पर जिम्मेदारियां कभी खत्म नहीं हुईं, और ज़िंदगी आज खत्म हो गई।”
रोहन और शिखा चुपचाप अपने पिता की बात सुन रहे थे।
विश्वनाथ जी ने शिखा की तरफ देखा और फिर रोहन से कहा, “रोहन, जो गलती मैंने की, वह तुम कभी मत दोहराना। हम पुरुष अक्सर यह सोच लेते हैं कि परिवार के लिए कमाकर लाना ही हमारा पूरा फर्ज है। हम भूल जाते हैं कि हमारे साथ जो स्त्री चल रही है, उसे पैसों और जिम्मेदारियों से ज्यादा हमारे वक्त, हमारे सम्मान और हमारी मीठी बातों की भूख होती है। शिखा को कभी यह महसूस मत होने देना कि वह सिर्फ इस घर की जिम्मेदारियों का हिस्सा है। उसके सुख-दुख को बांटना, उसके छोटे-छोटे प्रयासों की सराहना करना और जब तक सांसें हैं, एक-दूसरे से प्रेम जताना मत छोड़ना। जिंदगी किसी को दूसरा मौका नहीं देती।”
पिता की यह बात रोहन के दिल में गहरे उतर गई। उसने अपनी पत्नी शिखा का हाथ थाम लिया, जिसकी आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए थे।
विश्वनाथ जी ने गहरी सांस ली और खिड़की से बाहर आसमान के तारों को देखा। उन्हें महसूस हुआ कि सरला कहीं दूर से उन्हें देख रही है और शायद अब मुस्कुरा रही है। उन्होंने फैसला किया कि वे अब शेष जीवन घुट-घुट कर या पश्चाताप में नहीं बिताएंगे, बल्कि सरला की दी हुई सीख और संस्कारों को जीवित रखेंगे। वे अपने बच्चों के जीवन में वही मिठास और खुलापन घोलेंगे, जिसकी कमी सरला ने ताउम्र सही थी। सरला भले ही चली गई थी, पर जाते-जाते वह पूरे परिवार को रिश्तों की अहमियत और एक-दूसरे को समय रहते सहेजने का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा गई थी।
क्या हम भी अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में अपने सबसे करीबी रिश्तों को ‘कल’ पर तो नहीं टाल रहे? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिम्मेदारियों के बोझ तले हम अपने जीवनसाथी को वह वक्त और प्रेम नहीं दे पा रहे जिसके वे हकदार हैं? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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