स्नेह की छांव

  “प्रखर, जब तू इस घर में आया था, तो तू सिर्फ मेरा बेटा था। लेकिन जब तूने दृष्टि का हाथ थामा, तो तूने एक वादा किया था कि तू इसके सुख-दुख का साथी बनेगा। यह अपने मां-बाप का भरा-पूरा घर छोड़कर, अपने सारे सपने और अपनी पहचान समेटकर तेरे भरोसे इस चौखट के अंदर आई है। अगर तू ही इसे इस तरह अकेला छोड़ देगा, तो यह कहां जाएगी? क्या एक पत्नी का धर्म सिर्फ इंतजार करना है और पति का धर्म सिर्फ पैसा कमाकर ले आना?”

घड़ी की टिक-टिक करती सुइयां रात के सवा बारह बजा रही थीं। जयपुर शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक शांत और सलीके से सजे मकान की बालकनी में हल्की ठंडक के बीच दृष्टि खड़ी थी। सड़क पर पसरा सन्नाटा दूर-दूर तक फैला हुआ था, जिसे कभी-कभार कोई गुजरता हुआ वाहन तोड़ देता। दृष्टि की निगाहें सड़क के उस मोड़ पर टिकी हुई थीं जहां से अमूमन हर रोज प्रखर की सफेद कार मुड़ती थी। ठंड से उसके हाथ ठंडे पड़ रहे थे, लेकिन मन की बेचैनी उसे अंदर जाकर सुकून से बैठने नहीं दे रही थी।

शादी के तीन साल बीत चुके थे। प्रखर एक उभरती हुई सॉफ्टवेयर कंसल्टेंसी में सीनियर प्रोजेक्ट लीडर था। वह स्वभाव से बुरा नहीं था, न ही उसमें कोई बुरी आदत थी, पर काम के प्रति उसका बढ़ता जुनून और बेतरतीब दिनचर्या अब घर की शांति को धीरे-धीरे निगलने लगी थी। पिछले पंद्रह दिनों से यही सिलसिला चल रहा था। कभी किसी क्लाइंट की मीटिंग, कभी देर रात की रिलीज, तो कभी ऑफिस के दोस्तों के साथ डिनर की आड़ में समय का कोई होश न रहना। दृष्टि हर रात इसी तरह चौखट पर, बालकनी में या फिर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठे-बैठे उसकी राह तकती रहती थी।

तभी पीछे से किसी के कदमों की हल्की आहट हुई। दृष्टि संभल पाती, इससे पहले ही एक झुर्रीदार लेकिन बेहद कोमल हाथ ने उसके कंधे पर एक ऊनी शॉल ओढ़ा दिया। दृष्टि चौंककर मुड़ी, तो सामने उसकी सास सुमित्रा जी खड़ी थीं। सफेद बालों के बीच सलीके से लगी बिंदी और चेहरे पर वात्सल्य की वो चमक थी जो किसी भी थके हुए मन को सहारा दे दे।

“मां जी… आप इस वक्त? आपकी तो दवा का समय हो चुका था, आप सोई नहीं?” दृष्टि ने अपनी आवाज की थरथराहट को छुपाते हुए धीरे से कहा।

सुमित्रा जी ने दृष्टि के चेहरे को दोनों हाथों में थामा। दृष्टि की सूजी हुई आंखें और चेहरे का पीलापन उनके अनुभव से छुप न सका। उन्होंने हौले से दृष्टि के गाल को सहलाते हुए कहा, “बेटा, जब घर की रोशनी ही जाग रही हो, तो इस बूढ़ी आंखों को नींद कैसे आ सकती है? तू फिर से भूखे पेट बैठी है ना? सच बताना, आज भी तूने रात का खाना नहीं खाया?”

दृष्टि नजरें चुराने लगी। उसकी पलकें भारी हो गईं और होंठ कांपने लगे। उसने बात टालने की कोशिश की, “नहीं मां जी, ऐसी बात नहीं है… बस भूख नहीं थी। सोचा प्रखर आ जाएं तो साथ ही दो कौर खा लूंगी।”

“दो कौर खा लेगी? और वो भी रात के एक बजे?” सुमित्रा जी की आवाज में नाराजगी नहीं, बल्कि एक मां का दर्द झलक रहा था। उन्होंने दृष्टि का हाथ अपने हाथ में लिया, “दृष्टि, मैं पिछले कई दिनों से देख रही हूं। तू रात-रात भर जागती है, सुबह छह बजे फिर से उठकर आरव को स्कूल के लिए तैयार करना, मेरे लिए काढ़ा और नाश्ता बनाना, पूरे घर की जिम्मेदारी उठाना… क्या तू कोई लोहे की बनी मशीन है? प्रखर काम करता है, हम सब जानते हैं। लेकिन क्या उस काम की कीमत तेरी सेहत और तेरी खुशियों से ज्यादा है?”

दृष्टि के सब्र का बांध टूट गया। एक आंसू टपक कर सुमित्रा जी की हथेली पर जा गिरा। उसने सिर झुका लिया, “मां जी, वो कहते हैं कि करियर का बहुत नाजुक दौर है। मैं उन्हें टोकती हूं तो उन्हें लगता है कि मैं उनके काम को नहीं समझती। इसलिए मैंने कहना ही छोड़ दिया। बस इंतजार करती रहती हूं।”

सुमित्रा जी ने उसे अपने सीने से लगा लिया। “तूने कुछ गलत नहीं किया मेरी बच्ची। पर अब और नहीं। अपनी सेहत को दांव पर लगाकर किसी का इंतजार करना कोई समझदारी नहीं है। आज बात होकर रहेगी।”

उसी समय नीचे गेट खुलने और कार के रुकने की आवाज आई। दृष्टि ने फौरन अपनी आंखें पोंछीं और साड़ी का पल्लू ठीक किया। कुछ ही पलों में प्रखर हाथ में लैपटॉप बैग लटकाए, थका-हारा सा मुख्य दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ। जैसे ही उसने लिविंग रूम की बत्ती जली देखी और सामने अपनी मां व दृष्टि दोनों को खड़े पाया, उसके कदम ठिठक गए।

प्रखर ने घड़ी की ओर देखा, जहां अब साढ़े बारह बज चुके थे। उसने थोड़ा असहज होते हुए कहा, “अरे मां, आप इतनी रात को क्यों जाग रही हैं? आपको पता है ना कि डॉक्टर ने आपको समय पर सोने और तनाव न लेने की सलाह दी है? आपका बीपी बढ़ जाएगा। दृष्टि, तुमने मां को सुलाया क्यों नहीं?”

प्रखर की इस बात पर सुमित्रा जी ने कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी। वे शांत कदमों से आगे बढ़ीं, प्रखर के हाथ से उसका भारी बैग लिया और उसे सोफे पर रख दिया। फिर उन्होंने प्रखर का हाथ पकड़कर उसे सोफे पर बैठने का इशारा किया।

“बैठ प्रखर, पहले आराम से बैठ,” सुमित्रा जी ने बेहद धीमे और गंभीर स्वर में कहा।

प्रखर ने जूते उतारते हुए थोड़ा चिढ़कर कहा, “मां, बहुत थक गया हूं। सुबह से सिर में दर्द है। अगर कोई जरूरी बात है तो कल सुबह नाश्ते पर कर लें?”

“नहीं प्रखर, बात कल सुबह तक नहीं टल सकती। क्योंकि जो बात पिछले पंद्रह दिनों से रोज रात को घट रही है, उसका फैसला आज ही होना जरूरी है,” सुमित्रा जी उसी गंभीरता से बोलीं।

प्रखर ने दृष्टि की ओर देखा, जो एक कोने में चुपचाप खड़ी थी। प्रखर के माथे पर त्यौरियां चढ़ गईं। उसने थोड़ा व्यंग्य भरे लहजे में कहा, “अच्छा, तो अब समझ आया। घर आते ही यह पंचायत इसलिए बैठी है क्योंकि मैडम ने मेरी शिकायत लगाई है? दृष्टि, अगर तुम्हें कोई दिक्कत थी तो सीधे मुझसे कहतीं, मां को बीच में घसीटने और उनकी नींद खराब करने की क्या जरूरत थी?”

दृष्टि का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि सुमित्रा जी ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

सुमित्रा जी की नजरें अब प्रखर पर सीधी टिकी हुई थीं। उनकी आवाज में एक ऐसा ठहराव था जिसने प्रखर को भीतर तक हिला दिया। “प्रखर! अपनी जुबान पर लगाम लगा और जो तू सोच रहा है, उस सोच पर शर्म कर। दृष्टि ने मुझसे एक शब्द भी नहीं कहा। क्या अपनी बहू के चेहरे की उदासी, उसकी धंसी हुई आंखें और उसकी कमजोरी देखने के लिए मुझे किसी की शिकायत की जरूरत पड़ेगी? क्या मैं इतनी अंधी हूं कि मुझे अपने ही घर में घुटता हुआ दर्द नजर न आए?”

प्रखर सकपका गया। उसने सफाई देने की कोशिश की, “मां, आप गलत समझ रही हैं। ऑफिस में नया प्रोजेक्ट आया है। अमेरिकी क्लाइंट्स के साथ काम होता है, इसलिए टाइम जोन अलग है। काम का बोझ इतना है कि चाहकर भी जल्दी नहीं निकल पाता।”

सुमित्रा जी ने ठंडी सांस ली और बोलीं, “बेटा, काम का बोझ है या तेरी बेतरतीब आदतों का नतीजा? तू सुबह कितने बजे उठता है? दस बजे। ऑफिस कितने बजे पहुंचता है? दोपहर के बारह बजे। जब तू काम की शुरुआत ही दोपहर में करेगा, तो घर कब लौटेगा? तू अपनी सहूलियत से जीता है प्रखर। सुबह देर तक सोता है क्योंकि तुझे पता है कि घर की कोई जिम्मेदारी तेरे सिर पर नहीं है। तुझे बना-बनाया नाश्ता मिलता है, तेरे कपड़े प्रेस होकर मिलते हैं, तेरे बेटे की स्कूल डायरी से लेकर उसकी फीस तक का हिसाब यह दृष्टि संभालती है।”

सुमित्रा जी एक पल के लिए रुकीं, फिर उन्होंने दृष्टि का हाथ अपने हाथों में थाम लिया। “तू जब रात के एक बजे घर आता है, तो तू तो खा-पीकर सो जाता है। लेकिन यह लड़की सुबह छह बजे फिर उसी रसोई में खड़ी मिलती है। इसने पिछले एक हफ्ते से ठीक से खाना नहीं खाया क्योंकि यह तेरे साथ बैठकर दो निवाले खाना चाहती थी। तू तो बड़ा मैनेजर बन गया है ना? क्या तुझे इतना भी मैनेजमेंट नहीं आता कि अपनी जिंदगी और अपने परिवार के लिए समय कैसे निकाला जाए?”

प्रखर निरुत्तर हो गया। उसने पहली बार दृष्टि के चेहरे को गौर से देखा। वास्तव में, उसकी आंखों के नीचे काले घेरे साफ नजर आ रहे थे और उसका चेहरा उतरा हुआ था।

सुमित्रा जी ने आगे कहा, “प्रखर, जब तू इस घर में आया था, तो तू सिर्फ मेरा बेटा था। लेकिन जब तूने दृष्टि का हाथ थामा, तो तूने एक वादा किया था कि तू इसके सुख-दुख का साथी बनेगा। यह अपने मां-बाप का भरा-पूरा घर छोड़कर, अपने सारे सपने और अपनी पहचान समेटकर तेरे भरोसे इस चौखट के अंदर आई है। अगर तू ही इसे इस तरह अकेला छोड़ देगा, तो यह कहां जाएगी? क्या एक पत्नी का धर्म सिर्फ इंतजार करना है और पति का धर्म सिर्फ पैसा कमाकर ले आना?”

प्रखर का सिर झुक गया। मां के एक-एक शब्द में जो सच्चाई थी, वह उसके आधुनिक तर्कों को खोखला साबित कर रही थी।

“मां… मेरा वो मतलब नहीं था। मैं बस अपने भविष्य के लिए ही तो मेहनत कर रहा हूं,” प्रखर ने धीमी आवाज में कहा।

“भविष्य वर्तमान की नींव पर बनता है प्रखर,” सुमित्रा जी ने समझाया। “अगर आज तेरी जीवनसंगिनी तेरे साथ खुश नहीं है, अगर उसका स्वास्थ्य गिर रहा है, तो ऐसा भविष्य किस काम का? सुन ले मेरी बात कान खोलकर। अगर काम ज्यादा है, तो कल से अपनी दिनचर्या बदल। सुबह आठ बजे उठ, नौ बजे ऑफिस जा और शाम को सात बजे तक घर वापस आ। और अगर तू ऐसा नहीं कर सकता, तो कल से दृष्टि नहीं, मैं जागूंगी तेरा इंतजार करने के लिए। रोज रात को मुख्य दरवाजे पर मैं कुर्सी डालकर बैठूंगी जब तक तू नहीं आ जाता। फिर देखना मेरी तबीयत कैसे बिगड़ती है।”

मां की यह बात सुनकर प्रखर सचमुच सिहर उठा। उसे पता था कि मां जो कहती हैं, वो कर सकती हैं। वह उठकर मां के पास आया और उनके घुटनों के पास बैठ गया।

“नहीं मां, ऐसा मत कहिए। मुझे माफ कर दीजिए। मुझे सच में अंदाजा नहीं था कि मेरी इस लापरवाही का असर दृष्टि पर और आप पर इतना गहरा पड़ रहा है। मैं अपने काम में इतना मशगूल हो गया था कि अपने सबसे करीब खड़े लोगों की तकलीफ ही नहीं देख पाया।”

प्रखर ने नजरें उठाकर दृष्टि की ओर देखा। दृष्टि की आंखों में अब शिकायत नहीं, बल्कि आंसुओं के बीच एक सुकून था। प्रखर ने खड़े होकर दृष्टि का हाथ पकड़ा और बेहद ईमानदारी से कहा, “दृष्टि, मुझे माफ कर दो। मैंने हमेशा सोचा कि तुम घर पर हो तो सब ठीक ही होगा। मैंने कभी तुम्हारी खामोशी को पढ़ने की कोशिश नहीं की। मैं वादा करता हूं, कल से मेरी दिनचर्या बदलेगी। सुबह जल्दी जाऊंगा और शाम को सही वक्त पर घर लौटूंगा। हम दोनों साथ बैठकर खाना खाएंगे।”

सुमित्रा जी के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने दोनों के सिर पर हाथ रखा और कहा, “चलो, अब यह नाटक बंद करो और पहले डाइनिंग टेबल पर चलो। दृष्टि ने बड़ी मेहनत से खाना बनाया है। मैं भी बैठती हूं, आज तीनों साथ मिलकर खाना खाएंगे।”

उस रात डाइनिंग टेबल पर जो खाना परोसा गया, उसका स्वाद पहले जैसा ही था, लेकिन माहौल बदल चुका था। घर की हवाओं में घुली भारी उदासी अब छंट चुकी थी और उसकी जगह एक नई समझ और अपनेपन ने ले ली थी। प्रखर ने न सिर्फ समय पर आने की बात निभाई, बल्कि अगले ही दिन से अपने ऑफिस के घंटों को व्यवस्थित करना शुरू कर दिया।

रात को जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए, तो दृष्टि अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी होकर सुमित्रा जी के कमरे की ओर देख रही थी, जहां अब बत्ती बुझ चुकी थी और शांति का वास था। दृष्टि के मन में श्रद्धा और कृतज्ञता का समंदर उमड़ रहा था।

उसने मन ही मन सोचा कि समाज में अक्सर सास और बहू के रिश्ते को लेकर न जाने कितनी कड़वाहटें और पूर्वाग्रह पाले जाते हैं। लेकिन अगर हर घर में सुमित्रा जी जैसी सास हो—जो बहू को पराए घर से आई कोई जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनी ही बेटी समझकर उसके आत्मसम्मान और सेहत की ढाल बन जाए—तो किसी भी रिश्ते में कभी दरार नहीं आ सकती। एक समझदार और न्यायप्रिय सास पूरे परिवार को बिखरने से बचा सकती है और उस घर को सचमुच एक मंदिर बना सकती है।

अगर आपको भी लगता है कि रिश्तों में संतुलन बनाए रखने के लिए परिवार के बड़ों का निष्पक्ष और संवेदनशील होना सबसे ज्यादा जरूरी है, तो कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें। क्या आज के दौर में हर घर को ऐसी ही सोच की जरूरत नहीं है?

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मूल लेखिका : रश्मि झा मिश्रा

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