विद्याधर जी अपने बेटे के दृढ़ संकल्प और उसके आंसुओं को देखकर निःशब्द हो गए। उन्हें समझ आ गया कि जिस बेटे को वे कमजोर और नरम दिल समझ रहे थे, वह अपने बच्चों की ढाल बनने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। उन्होंने आगे बढ़कर मयंक के कंधे पर हाथ रखा और बोले, “बेटा, आज तूने एक सच्चे पिता होने का प्रमाण दिया है। अब हम कभी तुझसे उस औरत को वापस लाने की बात नहीं कहेंगे। तेरे बच्चे ही हमारे जीने का सहारा हैं।”
सोफे पर बैठे बुजुर्ग विद्याधर जी ने गहरी सांस छोड़ते हुए चाय की ठंडी हो चुकी प्याली को मेज पर रख दिया। उनके चेहरे की झुर्रियां चिंता की लकीरों से और गहरी दिख रही थीं। सामने बालकनी की रेलिंग को पकड़े उनका बेटा मयंक शून्य में घूर रहा था। मयंक एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर था, स्वभाव से बेहद शांत, जिम्मेदार और अपनी दुनिया में सिमटा रहने वाला इंसान। लेकिन आज उसकी मुट्ठियां खिंची हुई थीं और जबड़ों में एक अजीब सा तनाव था।
विद्याधर जी ने धीमी, कंपकंपाती आवाज में चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “मयंक बेटा… एक बार फिर सोच ले। गुस्सा किसी बात का हल नहीं होता। चार दिन हो गए हैं उसे मायके गए हुए। पड़ोस में, रिश्तेदारों में तरह-तरह की बातें बनने लगी हैं। तू अगर कहे तो मैं खुद जाकर बात कर लेता हूँ। थोड़ा बहुत झुकना तो हर रिश्ते में पड़ता है न? तू जिंदगी भर अकेला कैसे रहेगा? हमारा क्या है, हम तो आज हैं, कल नहीं रहेंगे। इन नन्हें बच्चों के सिर से साया उठ जाएगा, उनका भविष्य कौन संभालेगा?”
मयंक ने तेजी से मुड़कर अपने पिता की तरफ देखा। उसकी लाल आँखों में गुस्सा कम, बल्कि वर्षों की घुटन और टूटन ज्यादा थी। वह आगे बढ़ा और भारी आवाज में बोला, “नहीं बाबूजी! उस दहलीज पर अब मेरे कदम कभी नहीं पड़ेंगे। वह अपनी मर्जी से अपना सामान समेटकर उस घर की चौखट लांघकर गई है, जहाँ उसे सिर्फ सम्मान और सुरक्षा दी गई थी। यदि उसे अपनी गलतियों का रत्ती भर भी अहसास होगा, तो वह खुद आकर इन बच्चों के कदमों में माफी मांगेगी, वरना मेरे जीते जी उस औरत की परछाई भी इस घर पर नहीं पड़ेगी। कृपया आप मुझसे उसे मनाकर लाने की बात दोबारा मत कहिएगा!”
विद्याधर जी ने असहाय होकर अपने बेटे को देखा। मयंक ने हमेशा बड़ों का आदर किया था, कभी ऊंची आवाज में बात नहीं की थी। आज उसका यह रूप देखकर विद्याधर जी का कलेजा कांप गया। मयंक ने अपने आंसुओं को रोकते हुए कहना शुरू किया, “बाबूजी, आप तो सब जानते हैं। तीन साल पहले जब एक सड़क हादसे में अनुराधा मुझे और इन दोनों फूलों जैसे बच्चों को बिलखता छोड़कर इस दुनिया से चली गई थी, तब मेरी पूरी जिंदगी जैसे बंजर हो गई थी। मैंने तो खुद को सिर्फ अपने काम और बच्चों की परवरिश में झोंक दिया था। मेरा अपना कोई वजूद बचा ही नहीं था। तब आप सबने ही तो कहा था कि सात साल के समर और बारह साल की अवनी को एक माँ की जरूरत है। मैंने कभी अपने लिए कोई साथी नहीं चाहा था। मैंने तो सिर्फ यह सोचा था कि एक औरत की ममता मेरे बच्चों के सूने पड़े बचपन में फिर से रंग भर देगी।”
मयंक सोफे पर बैठ गया और अपने दोनों हाथों से सिर थाम लिया। उसकी आवाज में पुरानी टीस उभर आई, “जब वैदेही का रिश्ता सामने आया, तो मुझे सबने बताया कि वह तलाकशुदा है और उसका एक आठ साल का बेटा भी है। उसने मुझसे पहली मुलाकात में रोते हुए कहा था कि उसके पहले पति ने उस पर बहुत जुल्म ढाए, बात-बात पर हाथ उठाया और इसी वजह से उसे अलग होना पड़ा। उसने कहा था कि वह एक टूटे हुए दिल की कीमत जानती है और अपने बेटे के लिए एक जिम्मेदार पिता और खुद के लिए एक सुरक्षित छत चाहती है। बाबूजी, मैं एक अच्छी पोस्ट पर था, मेरी अच्छी खासी आमदनी थी, रहन-सहन का स्तर बहुत ऊंचा था। वैदेही ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं थी और न ही उसका कोई बड़ा पारिवारिक आधार था। लेकिन मैंने इन बातों की कोई परवाह नहीं की। मैंने सोचा कि जो खुद दर्द से गुजरी है, वह दूसरों के दर्द को सबसे बेहतर समझ पाएगी। मैंने सोचा कि मेरे समर और अवनी को एक माँ की ममता मिल जाएगी और उसके बेटे रुद्राक्ष को एक पिता का सहारा और नाम मिल जाएगा। हमने एक भरे-पूरे परिवार का सपना देखा था बाबूजी, लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस हाथ को मैं बच्चों के सिर पर आशीष की तरह रख रहा था, वह जहरीला नाग बनकर डसने लगेगा!”
मयंक की आँखों से आंसू बह निकले। उसने अपनी कमीज की आस्तीन से उन्हें पोंछते हुए आगे कहा, “शादी के शुरुआती कुछ महीने तो सब ठीक रहा, लेकिन धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। मेरे ऑफिस जाते ही घर की दीवारें घुटन से भर जाती थीं। मुझे कभी भनक तक नहीं लगी कि जब मैं घर से बाहर होता था, तब मेरे अपने ही घर में क्या नरक रचा जा रहा था। सबसे पहले मुझे तब झटका लगा जब मेरा मासूम बेटा समर, जो हमेशा चहकता रहता था, अचानक गुमसुम रहने लगा। वह रात को सोते-सोते अचानक चीखकर उठ बैठता और बिस्तर गीला करने लगा। जब मैं उसे चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट के पास ले गया, तो डॉक्टर ने मुझे अकेले में बुलाकर साफ कहा कि इस बच्चे के अवचेतन मन में किसी भयानक सजा या मार-पीट का खौफ बैठ गया है। बच्चा किसी बात से बुरी तरह आतंकित है।”
कमरे में सन्नाटा और गहरा गया। मयंक का गला रुंधने लगा, “बाबूजी, मेरी बेटी अवनी… जो अपनी माँ की मौत के बाद मुझसे भी अपनी कई बातें छिपाने लगी थी, क्योंकि बढ़ती उम्र में एक बच्ची को माँ की ही सबसे ज्यादा जरूरत होती है। मैंने सोचा था कि वैदेही उसे संभालेगी, समझाएगी। लेकिन अवनी की आँखों से उसकी मासूम हंसी गायब हो गई थी। वह स्कूल से आते ही अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेती थी। जब भी मैं बच्चों से पूछता कि क्या बात है, तो वे वैदेही की तरफ एक सहमी हुई नजर डालते और गर्दन झुकाकर कहते कि कुछ नहीं हुआ पापा। मुझे दाल में कुछ काला लगा। मैंने किसी को बताए बिना, अपने एक दोस्त की मदद से घर के ड्राइंग रूम, लॉबी और बच्चों के स्टडी रूम में हिडन कैमरे लगवा दिए।”
मयंक की आँखों में अचानक नफरत और गुस्से की चमक कौंध गई। उसने अपनी मुट्ठी मेज पर दे मारी, “और बाबूजी, जो सच उन कैमरों की रिकॉर्डिंग में सामने आया, उसे देखकर मेरी आत्मा तक कांप गई! वह औरत… जिसे मैं अपने बच्चों की माँ बनाकर लाया था, मेरे ऑफिस की दहलीज पार करते ही एक जल्लाद बन जाती थी। वह समर को बात-बात पर चिमटे से डराती थी। उसे भूखा रखती थी और मेरे बच्चों को यह धमकी देती थी कि अगर उन्होंने मुझसे एक लफ्ज भी कहा, तो वह उनके पापा को जान से मार देगी और फिर उन्हें किसी अनाथालय में फेंक आएगी। इस मासूम डर के कारण वे दोनों बच्चे घुट-घुट कर जी रहे थे।”
विद्याधर जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने कांपती आवाज में पूछा, “हे भगवान! क्या सच में ऐसा हुआ? तूने हमसे कभी कुछ क्यों नहीं बताया?”
“कैसे बताता बाबूजी?” मयंक ने तड़पकर कहा, “जिस दिन मैंने उस रिकॉर्डिंग को देखा, मेरा खून खौल उठा। मैंने उसी शाम वैदेही के सामने वे सारे फुटेज रख दिए और उससे पूछा कि क्या यही तुम्हारी ममता है? क्या इसीलिए मैं तुम्हें और तुम्हारे बेटे को अपने घर में पूरे मान-सम्मान के साथ लाया था? क्या तुम्हें इन बेकसूर बच्चों पर जरा भी दया नहीं आई? तब जानते हैं उसने क्या तमाशा किया? उसने एक पल के लिए भी शर्मिंदगी महसूस नहीं की। उसने उल्टे मेरे ही बच्चों पर घटिया इल्जाम लगाने शुरू कर दिए! उसने कहा कि आपका बेटा समर चोर है, वह घर से पैसे चुराता है, जबकि सच्चाई यह थी कि अलमारी से पैसे उसके अपने बेटे रुद्राक्ष ने निकाले थे और उसने सारा दोष मेरे बेटे पर मढ़ दिया। और तो और, उसने मेरी तेरह साल की मासूम अवनी के चरित्र पर उंगली उठाई। उसने कहा कि आपकी बेटी का चाल-चलन ठीक नहीं है, वह पड़ोस के लड़कों से बात करती है। बाबूजी, उस मासूम बच्ची के बारे में ऐसी घिनौनी सोच रखते हुए उसकी जुबान नहीं कांपी!”
मयंक ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात जारी रखी, “उसने साफ शब्दों में मुझसे कहा कि अगर इस घर में शांति चाहिए, तो आपके दोनों बच्चों को किसी दूर के बोर्डिंग स्कूल या हॉस्टल भेज दिया जाए, तभी यह घर चल सकता है। वह चाहती थी कि मैं अपने खून को, अपनी स्वर्गीय पत्नी की आखिरी निशानियों को घर से बाहर फेंक दूँ, ताकि वह और उसका बेटा इस पूरे घर और मेरी संपत्ति पर राज कर सकें। अब भी जब वह मायके गई है, तो उसने यही संदेश भिजवाया है कि वह तभी वापस लौटेगी जब मैं समर और अवनी को हॉस्टल भेजने के कागजात पर दस्तखत कर दूंगा। क्या इसीलिए मैंने दूसरी शादी की थी बाबूजी? मैंने रुद्राक्ष को अपने सगे बेटे से बढ़कर चाव से रखा, उसे बड़े स्कूल में दाखिला दिलाया, उसके नाम पर कभी कोई कमी नहीं आने दी। लेकिन उसने मेरे बच्चों के साथ जो किया, उसके बाद मेरे सीने में उसके लिए कोई जगह नहीं बची है। मैं अब उसके लिए पूरी तरह पत्थर दिल हो चुका हूँ।”
मयंक उठकर खड़ा हुआ और उसने अपने पिता के घुटनों को छूते हुए कहा, “बाबूजी, मुझे अपनी जिंदगी के लिए किसी औरत के सहारे की जरूरत नहीं है। मुझे सिर्फ अपने बच्चों की सुरक्षा और उनकी खोई हुई मुस्कान वापस चाहिए। मेरी आधी जिंदगी बीत चुकी है, बाकी की आधी जिंदगी मैं अपने बच्चों के भविष्य को संवारने में गुजार दूंगा। जब अनुराधा के जाने के बाद मैंने माँ और बाप दोनों का फर्ज निभाया था, तो आगे भी निभा लूंगा। आपका और माँ का आशीर्वाद मेरे साथ है। मुझे बस मेरे बच्चे खुश और सुरक्षित चाहिए, इसके अलावा मुझे इस दुनिया से कुछ नहीं चाहिए।”
विद्याधर जी अपने बेटे के दृढ़ संकल्प और उसके आंसुओं को देखकर निःशब्द हो गए। उन्हें समझ आ गया कि जिस बेटे को वे कमजोर और नरम दिल समझ रहे थे, वह अपने बच्चों की ढाल बनने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। उन्होंने आगे बढ़कर मयंक के कंधे पर हाथ रखा और बोले, “बेटा, आज तूने एक सच्चे पिता होने का प्रमाण दिया है। अब हम कभी तुझसे उस औरत को वापस लाने की बात नहीं कहेंगे। तेरे बच्चे ही हमारे जीने का सहारा हैं।”
समय का पहिया आगे बढ़ा। मयंक ने अपनी जिंदगी को एक नई दिशा देने का फैसला किया। उसने कानूनी तौर पर उस रिश्ते को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी ताकि भविष्य में कोई उसके बच्चों पर गलत दावा न कर सके। शुरुआत के कुछ महीने बच्चों के लिए बेहद कठिन थे। समर अब भी रात को डर जाता था और अवनी का आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा चुका था। लेकिन मयंक ने हार नहीं मानी।
मयंक ने अपने काम के घंटों को इस तरह व्यवस्थित किया कि वह शाम को पूरा वक्त बच्चों के साथ बिता सके। उसने बच्चों के साथ खेलना, उनके लिए खुद खाना बनाना, उनकी पढ़ाई में मदद करना और रात को उन्हें कहानियां सुनाकर सुलाना अपनी दिनचर्या बना लिया। घर में दादी-दादा का दुलार और पिता का अटूट संबल पाकर धीरे-धीरे बच्चों के मन का डर पिघलने लगा।
एक दिन शाम को जब मयंक ऑफिस से लौटा, तो घर के आंगन से बच्चों के खिलखिलाने की आवाज आ रही थी। समर ड्राइंग शीट पर रंग भर रहा था और अवनी अपनी दादी के साथ रसोई में बैठकर पूरियां बेलने की कोशिश कर रही थी। मयंक को दरवाजे पर देखते ही समर दौड़कर आया और उसकी टांगों से लिपट गया, “पापा! देखिए मैंने आज स्कूल में बेस्ट पेंटिंग का प्राइज जीता है!”
मयंक ने झुककर अपने बेटे को गोद में उठा लिया और उसके माथे को चूम लिया। अवनी भी हाथ में बेलन लिए मुस्कुराते हुए बाहर आई और बोली, “पापा, आज मैंने दादी से सीखकर आपके लिए आलू की सब्जी बनाई है, बिल्कुल वैसी जैसी माँ बनाती थीं।”
उस पल मयंक की आँखों से जो आंसू गिरे, वे किसी दर्द के नहीं बल्कि तृप्ति और सुकून के थे। उसने दोनों बच्चों को अपने सीने से लगा लिया। घर के मंदिर में जलता हुआ दीया हवा के झोंकों के बावजूद अपनी पूरी रोशनी के साथ जगमगा रहा था, मानो यह गवाही दे रहा हो कि सच्चा प्यार, धैर्य और अपने बच्चों के प्रति अटूट समर्पण किसी भी काले साए को मिटाकर जीवन में नई सुबह ला सकता है।
एक बच्चे के लिए माता-पिता केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि उनकी पूरी दुनिया का सुरक्षा कवच होते हैं। जब कोई रिश्ता उस भरोसे को तोड़ने लगे, तो एक पिता या माँ का कठोर फैसला ही बच्चों की ढाल बनता है। क्या आपको लगता है कि मयंक ने अपने बच्चों के आत्मसम्मान और सुरक्षा के लिए जो फैसला लिया, वह पूरी तरह सही था? यदि कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में हो, तो उसे समाज की परवाह करनी चाहिए या अपने मासूम बच्चों के भविष्य की? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : हेमलता गुप्ता