मयंक और सुमित जब अपनी पत्नियों के साथ घर पहुंचे, तो वे अपने पिता की हालत देखकर सहम गए। उन्हें लगा था कि माँ के जाने के बाद पिता पूरी तरह बिखर जाएंगे, चीखेंगे, छाती पीटेंगे या शायद खुद भी इस आघात को सहन न कर पाएंगे। लेकिन विश्वंभर जी तो बिल्कुल शांत खड़े थे। उन्होंने आगे बढ़कर दोनों बेटों के कंधों पर हाथ रखा और कहा, “रोओ मत बच्चों। तुम्हारी माँ कोई हार कर नहीं गई है। उसने एक मुकम्मल, संतुष्ट और खुशहाल जिंदगी जी है। उसका जाना एक पवित्र विदाई है, मातम नहीं।”
उम्र के बहत्तरवें पड़ाव पर आकर इंसान अक्सर अतीत की पगडंडियों पर ठहरकर देखने लगता है। उस दिन भी बाहर हल्की-हल्की फुहारें गिर रही थीं और हवा में मिट्टी की भीनी खुशबू तैर रही थी। जबलपुर की नर्मदा घाटी की नम हवा जब खिड़की के शीशों से टकरा रही थी, तब बैठक की आरामकुर्सी पर बैठे विश्वंभर जी की नजरें सामने दीवार पर टंगी पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर पर जा टिकीं। तस्वीर में एक घूंघट काढ़े लजाती हुई युवती खड़ी थी और उसके बगल में सूट-बूट पहने आत्मविश्वास से भरे खड़े थे वे खुद। आज उस बात को पूरे छियालीस बरस बीत चुके थे। तभी रसोई से पीतल के गिलास में सौंठ और तुलसी की चाय लेकर प्रभावती कमरे में दाखिल हुईं। उनके चेहरे की झुर्रियों में ममता और थकावट का एक ऐसा संगम था जिसे विश्वंभर जी दुनिया की सबसे खूबसूरत तस्वीर मानते थे। चाय की चुस्की लेते हुए विश्वंभर जी ने एक गहरी सांस भरी और प्रभावती का हाथ थामते हुए बोले, “प्रभावती, कई दिनों से एक बात मेरे सीने पर भारी पत्थर की तरह रखी है। तुमसे कहूँगा तो शायद तुम मेरी नादानी समझकर हंस पड़ोगी।”
प्रभावती ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए मुस्कराकर कहा, “भला मैं आप पर क्यों हंसूंगी? कहिए न, क्या बात है? पिछले महीने जब मुझे तेज चक्कर आकर बेहोशी आई थी, तब से देख रही हूँ आप गुमसुम से रहने लगे हैं। डॉक्टर ने साफ कहा था कि वह केवल कमजोरी और बीपी का उतार-चढ़ाव था। अब तो मैं पूरी तरह से भले-चंगे अंदाज में सारे काम कर रही हूँ। फिर आपके मन में यह कैसी बेचैनी समा गई है?”
विश्वंभर जी की आँखों में एक अजीब सा सूनापन तैर गया। उन्होंने प्रभावती की कांपती उंगलियों को अपनी हथेलियों में समेटते हुए कहा, “यही तो असली डर है प्रभावती। जब तुम उस दिन अचानक फर्श पर गिरी थीं, तो मुझे लगा जैसे इस पूरे ब्रह्मांड की जमीन मेरे पैरों तले से खिसक गई हो। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मेरा वजूद एक सूखे पत्ते से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएगा। तुमने छियालीस साल तक मुझे एक बच्चे की तरह पाला है। मेरे चश्मे का नंबर याद रखने से लेकर मेरी किस बीमारी की कौन सी गोली कब खानी है, अलमारी में कौन सा कुर्ता कहाँ रखा है, बैंक के कागजात कहाँ हैं, यहाँ तक कि मुझे प्यास लगने से पहले पानी का गिलास मेरे सामने आ जाता है। तुमने मुझे जिंदगी की हर जिम्मेदारी से इतना महफूज रखा कि आज मैं तुम्हारे बिना बिल्कुल अपाहिज और असहाय महसूस करता हूँ। कभी-कभी जी में आता है कि भगवान मुझे तुमसे पहले अपनी पनाह में बुला ले, क्योंकि तुम्हारे बिना यह सूना संसार मुझसे झेला नहीं जाएगा।”
प्रभावती ने तुरंत अपनी उंगली अपने होठों पर रखते हुए उन्हें डांटने के लहजे में समझाया, “कैसी अशुभ बातें मुँह से निकालते हैं आप! भगवान आपको लंबी उम्र दे। हर भारतीय स्त्री यही कामना करती है कि उसकी मांग का सिंदूर सलामत रहे और वह सुहागन रहते हुए इस दुनिया से विदा हो। और फिर आप क्यों अकेले रहने की बात सोचते हैं? हमारे दो-दो बेटे हैं, मयंक और सुमित। माना कि दोनों अपनी नौकरियों के सिलसिले में पुणे और बेंगलुरु बस गए हैं, लेकिन उनके दिल में हमारे लिए अगाध श्रद्धा है। दोनों बहुएं, नेहा और अंजलि, जब भी फोन करती हैं तो घंटों हाल-चाल पूछती हैं। क्या वे हमें बेसहारा छोड़ देंगे? बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं, नाती-पोते छुट्टियों में घर आते हैं तो सारा आँगन चहक उठता है। आप व्यर्थ की चिंताओं में अपना स्वास्थ्य मत बिगाड़िए।”
प्रभावती की यह दिलासा विश्वंभर जी के भीतर के उथल-पुथल को शांत न कर सकी। उस शाम के बाद से विश्वंभर जी के स्वभाव में एक अनोखा बदलाव दिखने लगा। जो इंसान अपनी चाय की खाली प्याली भी मेज से उठाकर रसोई में नहीं रखता था, वह सुबह उठकर प्रभावती से पहले झाड़ू पकड़ने की कोशिश करता। जब प्रभावती दाल छौंकने जातीं, तो विश्वंभर जी चुपचाप उनके पीछे जाकर खड़े हो जाते और पूछते, “प्रभावती, यह जीरा कितना डालना होता है? राई कब चटकती है? मुझे भी सिखाओ।” प्रभावती हंसकर उन्हें रसोई से बाहर कर देतीं, “अरे आप क्यों इस उम्र में बर्तन-मसालों के चक्कर में पड़ते हैं, बाहर जाकर अखबार पढ़िए।” लेकिन विश्वंभर जी हार नहीं मानते। वे बाजार जाकर खुद ताजी सब्जियाँ छांटकर लाते, धोबी को दिए जाने वाले कपड़ों की गिनती खुद डायरी में दर्ज करते, बिजली और पानी के बिल ऑनलाइन जमा करने का तरीका अपने पुराने पड़ोस के लड़के से सीखते। उनके मन में सिर्फ एक ही जुनून सवार था—अगर किसी दिन प्रभावती अस्वस्थ हो गई, तो उसे किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े और वह उसकी पूरी तीमारदारी कर सकें।
मगर इसी के साथ एक दूसरा पहलू भी उनके मन को छलनी कर रहा था। कभी रात के सन्नाटे में जब वे छत पर टहलते, तो उनका दिल बैठ जाता। वे सोचते, “अगर परमात्मा ने मेरी ही प्रार्थना सुन ली और मैं प्रभावती से पहले विदा हो गया, तब इस बेचारी का क्या होगा? पेंशन तो इसे मिल जाएगी, घर भी इसके नाम है, लेकिन इस उम्र में जब घुटनों का दर्द सताता है, जब रात को अचानक छाती में दर्द उठ जाए, तब यह आधी रात को किसे पुकारेगी? दूर परदेस में बैठे बेटे क्या रातों-रात आ पाएंगे? बहुओं की अपनी गृहस्थी है, बच्चों की पढ़ाई की दौड़धूप है। आजकल के इस भागदौड़ भरे जमाने में क्या कोई बुजुर्ग माँ-बाप के पास महीनों बैठकर उनकी सेवा कर सकता है? क्या प्रभावती अपने ही आंसुओं को पीकर इस विशाल मकान के किसी कोने में घुट-घुट कर जीने पर मजबूर हो जाएगी? क्या इससे बेहतर यह नहीं होगा कि हम दोनों किसी अच्छे वरिष्ठ नागरिक आश्रम में अपना ठिकाना बना लें, जहाँ हमारे जैसे दर्जनों लोग हों, जहाँ डॉक्टर और दवाइयों की चौबीसों घंटे सुविधा हो और हमें किसी पर बोझ बनकर न जीना पड़े?”
ये विचार विश्वंभर जी को भीतर ही भीतर दीमक की तरह चाटने लगे। उनका चेहरा मुरझाने लगा और भूख गायब हो गई। वे जो हर शाम अपने पुराने साथियों के साथ नर्मदा तट पर ग्वारीघाट जाकर सत्संग सुनते थे, उन्होंने बाहर जाना बिल्कुल बंद कर दिया। प्रभावती उनके इस अंतर्मुखी होते रूप को देखकर अंदर तक चिंतित हो उठीं। उन्होंने कई बार उनसे हँसकर, दुलारकर और कभी नाराज होकर पूछा, लेकिन विश्वंभर जी बस यही कहते, “कुछ नहीं प्रभावती, बस उम्र का तकाजा है।”
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। छह महीने बाद प्रभावती की सालाना स्वास्थ्य जांच का दिन आया। विश्वंभर जी उन्हें शहर के बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले गए। वहाँ तमाम तरह के खून के टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन करवाए गए। तीन दिन बाद जब विश्वंभर जी अकेले रिपोर्ट लेने पहुंचे, तो वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. माथुर ने उन्हें अपने केबिन में बुलाकर दरवाजा बंद कर लिया। डॉक्टर के चेहरे की गंभीरता देखकर विश्वंभर जी का दिल किसी अनहोनी की आशंका से तेजी से धड़कने लगा। डॉक्टर माथुर ने चश्मा उतारते हुए कहा, “विश्वंभर जी, प्रभावती जी की आंतों में एक गंभीर गांठ का पता चला है। बायोप्सी के अनुसार यह तीसरे चरण का ट्यूमर है। इस उम्र में और उनकी कमजोर शारीरिक स्थिति को देखते हुए कोई भी बड़ी सर्जरी या भारी कीमोथेरेपी उनके शरीर के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। दवाइयों से हम दर्द को नियंत्रित कर सकते हैं, लेकिन हमारे पास बहुत ज्यादा वक्त नहीं है। शायद छह महीने या एक साल। अब सबसे बड़ी दवा यह है कि आप उन्हें मानसिक रूप से बेहद खुश रखें। उनकी हर उस ख्वाहिश को पूरा करें जो जिंदगी की आपाधापी में अधूरी रह गई हो।”
यह सुनते ही विश्वंभर जी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। अस्पताल के गलियारे में बैठकर वे फूट-फूट कर रोना चाहते थे, लेकिन उन्होंने अपनी हथेलियों को भींच लिया। उन्होंने खुद से कहा, “नहीं विश्वंभर, अगर तू टूट गया तो प्रभावती को कौन संभालेगा? अब रोने का नहीं, उसके लिए जीने का वक्त है।” उन्होंने अपने आंसुओं को अपनी ही पलकों के भीतर सुखा लिया और उस दिन के बाद से उनका पूरा जीवन एक तपस्या में बदल गया। उन्होंने प्रभावती को इस बीमारी की भनक तक नहीं लगने दी। घर लौटकर उन्होंने बड़े सहज भाव से कहा, “प्रभावती, डॉक्टर ने कहा है पेट में हल्का सा संक्रमण है, बस कुछ नियमित दवाइयां चलेंगी और तुम बिल्कुल तंदुरुस्त रहोगी।”
उस दिन के बाद विश्वंभर जी ने अपनी जीवनशैली पूरी तरह बदल डाली। एक दिन वे प्रभावती के पास एक बड़ा सा सूटकेस लेकर पहुंचे और बोले, “प्रभावती, चलो बैग तैयार करो। हम घूमने जा रहे हैं।” प्रभावती हैरान रह गईं, “घूमने? इस उम्र में? और घर-गृहस्थी कौन देखेगा?” विश्वंभर जी मुस्कुराए, “गृहस्थी ने हमें छियालीस साल तक देखा, अब हम एक-दूसरे को देखेंगे। जब हमारी नई-नई शादी हुई थी, तब तुम हमेशा कहती थीं कि तुम्हें दक्षिण भारत के विशाल मंदिर देखने हैं, कन्याकुमारी के समंदर में डूबता सूरज देखना है, ऋषिकेश की गंगा आरती में बैठना है। लेकिन मेरी नौकरी, बच्चों की स्कूल की फीस, मकान की किश्तें और रिश्तेदारों की शादियों के बीच तुम्हारी हर इच्छा दबी रह गई। अब हमारे पास सिर्फ हमारा वक्त है।”
प्रभावती ने जब मना करने की कोशिश की, तो विश्वंभर जी का दृढ़ निश्चय देखकर वे नतमस्तक हो गईं। अगले आठ-नौ महीनों में विश्वंभर जी ने प्रभावती को भारत के उन सभी रमणीक और आध्यात्मिक स्थलों की यात्रा करवाई जिनकी उन्होंने कभी कल्पना की थी। मदुरै के मीनाक्षी मंदिर की चौखट पर प्रभावती के चेहरे पर जो भक्ति का नूर था, केरल के शांत बैकवाटर्स में शिकारे पर बैठते समय उनकी आँखों में जो बच्चों जैसी चमक थी, और हरिद्वार की हर की पौड़ी पर आरती की लौ को निहारते हुए उनके चेहरे पर जो अलौकिक शांति थी—विश्वंभर जी उन सभी पलों को अपने सीने में किसी अमूल्य निधि की तरह सहेज रहे थे। यात्रा के दौरान वे प्रभावती की एक-एक सांस का ध्यान रखते। कब उन्हें गुनगुना पानी चाहिए, कब उनकी दर्द निवारक गोली का समय हुआ, सब कुछ विश्वंभर जी खुद अपनी निगरानी में करते। प्रभावती कभी-कभी मजाक में कहतीं, “सुनिए जी, आजकल आप मेरी इतनी खातिरदारी कर रहे हैं, मुझे रानी बनाकर रख रहे हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि डॉक्टर ने आपको मेरी कोई गुप्त बीमारी बता दी हो?” तब विश्वंभर जी का दिल अंदर से सिहर उठता, लेकिन वे तुरंत अपने चेहरे पर एक बनावटी गुस्सा लाकर कहते, “हर बात में मजाक मत ढूंढा करो। इतने बरसों बाद मुझे अपनी गलतियों का प्रायश्चित करने का मौका मिला है कि मैंने तुम्हें कितना कम समय दिया, अब चुपचाप इस सफर का आनंद लो।”
सफर से लौटने के बाद प्रभावती का स्वास्थ्य धीरे-धीरे शिथिल होने लगा। उनका शरीर कमजोर होता गया, लेकिन उनकी आत्मा तृप्त थी। उनके चेहरे पर किसी बात का मलाल नहीं था। एक सर्द रात को जब बाहर कड़ाके की ठंड थी, प्रभावती ने विश्वंभर जी का हाथ अपने सीने पर रखा और धीरे से कहा, “सुनिए, अगर मुझे कुछ हो जाए तो आप कभी अकेलेपन से मत डरना। आपने मुझे पिछले एक साल में इतनी खुशियाँ दी हैं जितनी शायद कोई सात जन्मों में भी नहीं पाता। आपने मुझे केवल पत्नी नहीं, अपनी आत्मा माना। मुझे वचन दीजिए कि आप मेरे बाद टूटेंगे नहीं, बल्कि इस घर को और अपनी जिंदगी को उसी जिंदादिली से संभालेंगे जैसे आपने मुझे संभाला है।” विश्वंभर जी ने अपनी भीगी आँखों से उनकी ओर देखा और खामोशी से उनके माथे को चूम लिया।
उसी रात, भोर के चार बजे, प्रभावती ने विश्वंभर जी की गोद में अपना सिर रखे-रखे चुपचाप अपनी अंतिम सांस ली। उनके चेहरे पर एक ऐसी शांत मुस्कान तैर रही थी जैसे कोई थका हुआ मुसाफिर एक सुंदर और सफल यात्रा पूरी करके गहरी, मीठी नींद में सो गया हो। सुबह जब विश्वंभर जी ने उन्हें चाय के लिए जगाना चाहा, तो प्रभावती का शरीर शांत और शीतल हो चुका था। उस पल घर में कोई कोहराम नहीं मचा। विश्वंभर जी की आँखों से आंसू की एक बूंद टपकी, लेकिन उनका कलेजा पत्थर का हो चुका था। उन्होंने अत्यंत आदर और प्रेम से प्रभावती के दोनों हाथ जोड़े। उन्होंने वही कांजीवरम की लाल और सुनहरी किनारी वाली साड़ी निकाली जो वे रामेश्वरम से प्रभावती के लिए लाए थे, और आस-पड़ोस की महिलाओं की मदद से प्रभावती का दुल्हन जैसा सोलह श्रृंगार करवाया।
मयंक और सुमित जब अपनी पत्नियों के साथ घर पहुंचे, तो वे अपने पिता की हालत देखकर सहम गए। उन्हें लगा था कि माँ के जाने के बाद पिता पूरी तरह बिखर जाएंगे, चीखेंगे, छाती पीटेंगे या शायद खुद भी इस आघात को सहन न कर पाएंगे। लेकिन विश्वंभर जी तो बिल्कुल शांत खड़े थे। उन्होंने आगे बढ़कर दोनों बेटों के कंधों पर हाथ रखा और कहा, “रोओ मत बच्चों। तुम्हारी माँ कोई हार कर नहीं गई है। उसने एक मुकम्मल, संतुष्ट और खुशहाल जिंदगी जी है। उसका जाना एक पवित्र विदाई है, मातम नहीं।”
शमशान घाट पर जब प्रभावती की पार्थिव देह पंचतत्व में विलीन हो रही थी, तब विश्वंभर जी ने अग्नि को साक्षी मानकर एक मौन संकल्प लिया। क्रिया-कर्म के सारे रीति-रिवाज जब संपन्न हो गए, तो तेरहवीं के बाद दोनों बेटों ने एक शाम पिता को अपने बीच बिठाया। मयंक ने संकोच करते हुए कहा, “बाबूजी, अब आप यहाँ अकेले इस बड़े मकान में कैसे रहेंगे? हमने आपस में फैसला किया है कि छह महीने आप मेरे पास पुणे में रहेंगे और छह महीने सुमित के पास बेंगलुरु में। हम दोनों मिलकर आपका पूरा ख्याल रखेंगे।”
विश्वंभर जी ने अपने दोनों बेटों और बहुओं को स्नेह भरी दृष्टि से देखा। फिर अत्यंत सौम्य और दृढ़ आवाज में बोले, “मेरे प्यारे बच्चों, तुम दोनों का यह प्रस्ताव मेरे प्रति तुम्हारे प्रेम और संस्कारों का प्रमाण है। लेकिन मैंने अपनी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू करने का फैसला किया है। तुम्हारी माँ हमेशा चाहती थी कि मैं किसी पर निर्भर न रहूँ। उसने मुझे छियालीस साल तक चलना सिखाया और आखिरी दिनों में मैंने खुद अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा। अगर आज मैं अपना घर छोड़कर तुम्हारे पास किसी आश्रित की तरह रहने लगा, तो तुम्हारी माँ की आत्मा को ठेस पहुंचेगी। यह घर कोई ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं है, इसमें तुम्हारी माँ की खुशबू बसी है, उसके जीवन की साधना बसी है। मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।”
सुमित ने घबराकर कहा, “लेकिन बाबूजी, आप अकेले कैसे सब कुछ संभालेंगे? खाना, दवाई, घर का काम…?”
विश्वंभर जी के होठों पर एक संतोषी मुस्कान खिल उठी। वे बोले, “बेटा, तुम्हारी माँ ने मुझे रसोई के बर्तनों से लेकर जिंदगी के सबसे बड़े दर्शन तक सब कुछ सिखा दिया है। मैंने इस शहर के एक अनाथालय और वृद्धाश्रम की संयुक्त संस्था से बात की है। मैं अपने पेंशन का एक हिस्सा और अपने बचे हुए जीवन के सारे दिन वहाँ के बच्चों को गणित और विज्ञान पढ़ाने में लगाऊंगा। मैं उन बुजुर्गों का साथी बनूंगा जिनके पास कोई बात करने वाला नहीं है। जब तक मेरे शरीर में सांस है, मैं प्रभावती के दिए हुए प्रेम को समाज में बांटूंगा। जब मैं दूसरों के चेहरों पर मुस्कान लाऊंगा, तो मुझे लगेगा कि मेरी प्रभावती मेरे पास ही खड़ी मुस्कुरा रही है। तुम दोनों अपनी गृहस्थी को प्रेम और समझदारी से चलाओ, जब भी छुट्टियां मिलें, अपने बच्चों को लेकर इस आँगन में आओ। तुम्हारा पिता लाचार या अकेला नहीं है, वह अपने जीवनसाथी की यादों के उजाले में एक नया सवेरा जी रहा है।”
पिता के इन प्रेरक और आत्मविश्वासी शब्दों को सुनकर बेटों का सिर श्रद्धा से झुक गया। बहुओं की आँखें भर आईं। जिस पिता को वे कमजोर और असहाय समझ रहे थे, वह तो अपने असीम प्रेम और आत्मबल से एक विशाल वटवृक्ष बन चुका था। विश्वंभर जी ने दिखा दिया कि सच्चा प्रेम किसी के चले जाने के बाद इंसान को अवसाद की गहराइयों में धकेलने के लिए नहीं होता, बल्कि वह तो इंसान को अकेलेपन के अंधकार से निकालकर समाज के कल्याण के लिए एक जलता हुआ दीपक बना देता है।
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मूल लेखिका : हेमलता गुप्ता