ममता का मोल

आलोक ने राहत की एक गहरी सांस ली और नीता के सिर पर धीमे से हाथ रख दिया। उसने कहा, “नीता, तुमने समझदारी दिखाई, यही मेरे लिए सबसे बड़ा संबल है। मां को सिर्फ दवाइयों की नहीं, इस वक्त हम सबके प्यार और अपनेपन की सबसे ज्यादा जरूरत है। चलो, अब जाकर मां को दलिया खिला दो। और हां, बच्चों को भी उनके कमरे में जाने दो। वे दादी के पास बैठेंगे, उनका हाथ सहलाएंगे तो मां को जीने की नई ताकत मिलेगी। बस एक बात का ध्यान रखना, मां के सामने पैसों या अस्पताल के खर्च का कोई जिक्र मत करना। कोई भी मां यह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाती कि उसकी वजह से उसके बच्चों को जरा सी भी परेशानी उठानी पड़े। अगर हम वक्त की कदर करेंगे और बुजुर्गों का मान रखेंगे, तो ऊपर वाला भी हमारी झोली कभी खाली नहीं रहने देगा।”

  बैठक के एक कोने में खड़ी नीता गुस्से से कांप रही थी। उसकी नजरें अपने पति आलोक पर टिकी थीं, जो मेज पर बिखरे हुए मेडिकल बिल, टेस्ट रिपोर्ट्स और बैंक की पासबुक को बेहद बेबसी और दर्द के साथ समेट रहा था। कमरे में छाई शांति को चीरते हुए नीता की तीखी आवाज गूंजी तो बाहर खेल रहे दोनों मासूम बच्चों के कदम भी अचानक ठिठक गए।

नीता ने अपनी कमर पर हाथ रखते हुए बेहद कठोर स्वर में कहा, “बस बहुत हो गया आलोक! अब मैं और खामोश नहीं बैठ सकती। तुम समझ क्या रहे हो खुद को? क्या तुम इस पूरे संसार के अकेले ऐसे बेटे हो जिसकी मां बीमार पड़ी है? होश में आओ और अपनी हैसियत देखो। एक साधारण से स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक हो तुम। तुम्हारी तनख्वाह से महीने का राशन और बच्चों की स्कूल फीस बमुश्किल पूरी होती है। और तुम हो कि अपनी अस्सी साल की मां के दिल के उस बड़े और महंगे ऑपरेशन के लिए अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी लुटाने पर आमादा हो। डॉक्टर ने पूरे बारह से पंद्रह लाख का खर्च बताया है। कहां से लाओगे इतना रुपया? क्या हम सबको रास्ते पर लाकर भीख मंगवाने का इरादा कर रखा है तुमने?”

आलोक ने अपने हाथ में पकड़े पर्चों को वहीं मेज पर रख दिया। उसके चेहरे की नसें तन गई थीं। उसने अपनी उंगलियों को कसकर भींच लिया, मानो वह अपने अंदर उठते हुए भयंकर आक्रोश को बाहर निकलने से रोक रहा हो। उसने अपनी लाल होती आंखों से नीता की ओर देखा। आलोक का गला भर आया था, लेकिन स्वर में एक गजब की तल्खी थी। वह धीमे किंतु बेहद सख्त लहजे में बोला, “नीता, जुबान संभाल कर बात करो। मेरा मन तो ऐसा कर रहा है कि इसी वक्त तुम्हें तुम्हारे इस घिनौने बर्ताव का जवाब तुम्हारे चेहरे पर हाथ उठाकर दूं, लेकिन मेरे बाबूजी और मेरी उसी मां ने मुझे किसी भी औरत पर हाथ उठाने का संस्कार कभी नहीं दिया। पर सच कहूं, तो तुम्हारी जैसी संकीर्ण और पत्थर दिल सोच को देखकर आज भगवान भी अपनी बनाई इस इंसानियत पर शर्मसार हो जाए। तुम एक बेटे से यह कह रही हो कि वह अपनी उस मां को तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ दे, जिसने अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी मेरी एक-एक सांस को संवारने में गुजार दी?”

नीता जरा भी नहीं झिझकी। उसने अपनी आंखें तरेरते हुए उपहास भरी हंसी के साथ जवाब दिया, “हां-हां, बस मुझ पर ही अपना सारा गुस्सा उतार लो। मर्द हो ना, तो अपनी लाचारी मुझ पर चिल्लाकर छिपाना बड़ा आसान लगता है। जो सच है, उससे आंखें क्यों चुरा रहे हो? मां जी अस्सी बरस पार कर चुकी हैं। इस उम्र में तो लोग वैसे भी भगवान के चरणों में जाने की तैयारी करते हैं। अब शरीर तो एक दिन जवाब देगा ही। कुदरत का यही नियम है। जो जन्म लेता है, उसे जाना भी होता है। अब इस उम्र में उन पर पंद्रह लाख रुपये फूंकने का क्या मतलब रह गया है? क्या तुम उनकी उम्र में सौ साल और जोड़ दोगे? पिताजी पीछे गांव की जो आधी बीघा जमीन छोड़ गए थे, तुमने उसे भी तो बेचने का सौदा कर डाला। अब हमारे पास बचा ही क्या है? कल को अगर हमें कुछ हो गया या बच्चों की पढ़ाई का कोई बड़ा खर्च सामने आ गया, तो क्या हम पड़ोसियों के आगे हाथ फैलाएंगे? जरा अपने उन दोनों मासूम बच्चों का मुंह तो देखो, उनके भविष्य को अंधेरे में धकेल कर तुम कौन सा धर्म निभा रहे हो?”

आलोक का सब्र अब पूरी तरह टूट चुका था। उसकी आंखों से गर्म आंसुओं की दो बूंदें ढुलक कर उसके गालों पर बह निकलीं। उसने नीता की आंखों में सीधे देखते हुए कहा, “चुप हो जाओ, बिल्कुल चुप! एक शब्द और नहीं। जमीन… पैसा… भविष्य… तुम्हें बस यही सब दिखता है? अरे नीता, अगर मेरा बस चलता और मेरे जिस्म का कोई अंग बेचकर भी मेरी मां की सांसें बच सकतीं, तो मैं एक पल के लिए भी नहीं हिचकिचाता। तुम क्या जानती हो कि उस मां ने मेरे लिए क्या-क्या झेला है? जब बाबूजी का साया मेरे सिर से उठा था, तब मैं सिर्फ सात साल का था। मेरी मां ने कड़ाके की ठंड में लोगों के घरों में जाकर सिलाई-कढ़ाई की, अपनी कलाई की आखिरी चूड़ियां तक बेच दीं ताकि मेरी पढ़ाई की फीस भरी जा सके। जब घर में सिर्फ दो रोटियां होती थीं, तो वह खुद भूखे पेट पानी पीकर सो जाती थी और मुझसे कहती थी कि उसका आज व्रत है ताकि उसका बेटा कभी भूखा न सोए। आज जब उसी मां का दिल कमजोर पड़ गया है, उसकी सांसें उखड़ रही हैं, तो तुम मुझसे कह रही हो कि मैं हिसाब लगाऊं कि वह कितने दिन और जिएंगी?”

आलोक मेज के सहारे झुक गया और उसकी आवाज भरभरा उठी, “मेरी मां की कीमत तुम्हारे इन कागजी नोटों से कहीं ज्यादा है। अगर डॉक्टर यह कहते कि मां सिर्फ दो दिन और जिएंगी, तब भी मैं उस बेटे का फर्ज निभाने के लिए आसमान और जमीन एक कर देता। मुझे नहीं चाहिए ऐसा पैसा जो मेरी मां की अर्थी पर बचाकर रखा गया हो। और हां, तुम तो अपने मायके में अपने तीनों भाइयों की बड़ी तारीफ करती हो ना? जब तुम्हारी अपनी मां बीमार पड़ी थीं, तब तुम्हारे भाइयों ने अपनी गाड़ियां बेच दी थीं, बड़े अस्पतालों में उनका इलाज करवाया था, तब तुम गर्व से कहती थीं कि मेरे भाई श्रवण कुमार हैं। तब तुम्हें वो पैसे का नुकसान क्यों नहीं लगा? तब तुमने अपने भाइयों से क्यों नहीं कहा कि अपनी मां को किसी वृद्धाश्रम में डाल आओ या सड़क पर छोड़ दो ताकि तुम्हारा पैसा बच सके?”

नीता के चेहरे का रंग उड़ने लगा था। वह कुछ बोलने के लिए मुंह खोलने ही वाली थी कि आलोक ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

आलोक रोते हुए आगे बोला, “नीता, वक्त से डरो। आज जिस बेरहमी से तुम मेरी मां की सांसों की कीमत तय कर रही हो, याद रखना कि हमारे दोनों बच्चे, आरव और पंखुड़ी, इसी घर के उस कोने में खड़े होकर तुम्हें देख रहे हैं और तुम्हारी बातें सुन रहे हैं। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं। आज तुम मेरी मां को उनके बुढ़ापे और बीमारी की वजह से बोझ समझ रही हो, कल जब तुम और मैं बूढ़े होंगे, जब हमारे हाथ-पैर कांपेंगे और हमारी आंखों की रोशनी धुंधली हो जाएगी, तब हमारे यही बच्चे हमारे सामने खड़े होकर यही हिसाब-किताब लगाएंगे। वे भी कहेंगे कि अब मम्मी-पापा बूढ़े हो चुके हैं, इन पर डॉक्टर और दवाई का खर्च करना बेवकूफी है। सोचो, जब तुम्हारा अपना बेटा तुम्हें किसी वृद्धाश्रम के दरवाजे पर बेसहारा छोड़ आएगा, तब तुम्हारे कलेजे पर क्या बीतेगी? क्या तुम उस दिन के लिए तैयार हो?”

आलोक की यह बात नीता के सीने में किसी खंजर की तरह जा धंसी। कमरे में अचानक एक गहरा और खौफनाक सन्नाटा छा गया। खिड़की से आती ठंडी हवा ने नीता के पूरे शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी।

उसने सहमी हुई नजरों से दरवाजे की तरफ देखा। वहां सचमुच उसका दस साल का बेटा आरव और सात साल की बेटी पंखुड़ी दीवार से सटकर खड़े थे। आरव की मासूम आंखों में एक अजीब सा डर और सवाल तैर रहा था। वह अपनी मां की ओर इस तरह देख रहा था मानो वह अपनी उस मां को पहचान ही न पा रहा हो जो हमेशा उसे दया और प्रेम की कहानियां सुनाया करती थी।

नीता का दिल जोर से धड़कने लगा। आलोक के कहे एक-एक शब्द उसके दिमाग में किसी गूंजते हुए घंटे की तरह बजने लगे—‘कल जब तुम बूढ़ी होगी, तब तुम्हारे बच्चे भी यही हिसाब लगाएंगे…’

नीता की नजरें अपने दोनों बच्चों पर टिक गईं। उसने कल्पना की कि बीस-पच्चीस साल बाद वह एक खाट पर बेबस पड़ी है और उसका बेटा आरव अपनी पत्नी के साथ खड़ा होकर कह रहा है कि अब मां की उम्र हो चुकी है, इन पर पैसा खर्च करने से क्या फायदा? उस भयानक कल्पना मात्र से ही नीता की रूह कांप उठी। उसके पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई।

वह धीरे-धीरे कदमों से आगे बढ़ी और आलोक के पास आकर बैठ गई। उसका अहंकार, उसका गुस्सा और पैसे के प्रति उसका अंधा मोह आंसुओं के सैलाब में बह चुका था। उसने कांपते हाथों से आलोक का कंधा छुआ।

नीता रुंधे हुए गले से फूट-फूट कर रो पड़ी, “मुझे माफ कर दो आलोक… मुझे माफ कर दो। मैं सचमुच अपने स्वार्थ में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे सही और गलत का भान ही नहीं रहा। मेरे मन में यह लालच समा गया था कि हम आगे कैसे जिएंगे, लेकिन मैं यह भूल गई कि जिस घर में बुजुर्गों की दुआएं नहीं होतीं, वह घर कभी आबाद नहीं रह सकता। तुमने मेरी बंद आंखें खोल दीं। अगर आज हमने मां जी का साथ छोड़ दिया, तो हम अपने बच्चों को कौन सा मुंह दिखाएंगे? हम उन्हें कौन से संस्कार देंगे? नहीं आलोक, हम जमीन भी बेचेंगे और अगर जरूरत पड़ी तो मैं अपने सारे जेवर भी खुशी-खुशी बेच दूंगी। जो गहने मेरी शादी में बने थे, उन पर मां जी की जिंदगी से ज्यादा हक मेरा नहीं है।”

आलोक ने नम आंखों से अपनी पत्नी को देखा। नीता के चेहरे पर सच्चा पश्चाताप साफ झलक रहा था।

नीता ने अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछते हुए कहा, “आलोक, तुम कल ही डॉक्टर से बात करो और ऑपरेशन की तारीख तय करवाओ। पैसों की फिक्र मत करो। हम दोनों मिलकर दिन-रात मेहनत करेंगे। तुम स्कूल के बाद ट्यूशन पढ़ा लेना, मैं भी घर पर बच्चों को सिलाई सिखा दूंगी या कुछ और काम कर लूंगी। हम दोबारा से पैसे कमा लेंगे, पाई-पाई जोड़ लेंगे, लेकिन अगर मां जी का साया हमारे सिर से उठ गया, तो वह दौलत हम दोबारा किसी बाजार से नहीं खरीद पाएंगे। मैं अपने बच्चों को एक ऐसा घर देना चाहती हूं जहां रिश्तों का मोल पैसों से बड़ा हो।”

आलोक ने राहत की एक गहरी सांस ली और नीता के सिर पर धीमे से हाथ रख दिया। उसने कहा, “नीता, तुमने समझदारी दिखाई, यही मेरे लिए सबसे बड़ा संबल है। मां को सिर्फ दवाइयों की नहीं, इस वक्त हम सबके प्यार और अपनेपन की सबसे ज्यादा जरूरत है। चलो, अब जाकर मां को दलिया खिला दो। और हां, बच्चों को भी उनके कमरे में जाने दो। वे दादी के पास बैठेंगे, उनका हाथ सहलाएंगे तो मां को जीने की नई ताकत मिलेगी। बस एक बात का ध्यान रखना, मां के सामने पैसों या अस्पताल के खर्च का कोई जिक्र मत करना। कोई भी मां यह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाती कि उसकी वजह से उसके बच्चों को जरा सी भी परेशानी उठानी पड़े। अगर हम वक्त की कदर करेंगे और बुजुर्गों का मान रखेंगे, तो ऊपर वाला भी हमारी झोली कभी खाली नहीं रहने देगा।”

नीता ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसने दोनों बच्चों को प्यार से गले लगाया और फिर रसोई से गरम सूप और दलिया की कटोरी लेकर सीधे मां जी के कमरे की ओर बढ़ गई।

कमरे का दरवाजा खुला तो सामने बिस्तर पर लेटी बुजुर्ग मां ने अपनी कमजोर नजरें उठाकर देखा। नीता ने आगे बढ़कर मां जी के सिरहाने बैठकर उनके माथे को चूमा और बेहद कोमलता से कहा, “मां जी, उठिए… थोड़ा सा सूप पी लीजिए। डॉक्टर साहब ने कहा है कि आप बहुत जल्द बिल्कुल भली-चंगी होकर अपने पैरों पर चलने लगेंगी। फिर आपको हमारे साथ तीर्थ यात्रा पर भी तो चलना है।”

मां जी के मुरझाए हुए चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान खिल उठी। उन्होंने कांपते हाथों से अपनी बहू के सिर पर हाथ रख दिया। उस पल कमरे में जो रोशनी फैली थी, वह किसी भी सांसारिक दौलत से कहीं ज्यादा अनमोल थी। घर की दीवारें जो कुछ देर पहले तल्खी से तप रही थीं, अब रिश्तों की मिठास और ममता की ठंडी छांव से महक उठी थीं।

माता-पिता हमारी वह जड़ हैं जिनके दम पर हमारी जिंदगी की शाखें हरी-भरी रहती हैं। आज के इस दौर में जब भौतिक सुख-सुविधाएं और पैसा रिश्तों पर हावी होने लगे हैं, क्या हमारा यह फर्ज नहीं बनता कि हम अपने बुजुर्गों को केवल उनकी उम्र के तराजू में तौलने के बजाय उन्हें वही निःस्वार्थ प्रेम और सम्मान दें जो उन्होंने बचपन में हमें दिया था? इस कहानी के बारे में आपकी क्या राय है, और क्या सचमुच परिवार में दिए गए संस्कार ही हमारे भविष्य का आईना होते हैं? अपनी अनमोल राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

 मूल लेखिका : हेमलता गुप्ता

error: Content is protected !!