अंतिम तृप्ति

मालती और नीतू भी अपनी सुध-बुध खो बैठीं। दोनों एक-दूसरे को पकड़कर रोने लगीं। जो कड़वाहट कुछ मिनट पहले आग उगल रही थी, वह माँ के उस निस्वार्थ प्रेम के समंदर में बहकर तिनके की तरह गायब हो चुकी थी। नीतू ने आगे बढ़कर शारदा भाभी के हाथ थाम लिए, “दीदी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं नादान थी, मैंने बहुत गलत बातें बोल दीं। हम कोई अलग नहीं हैं दीदी, हम सब मिलकर संभालेंगे।”

मालती ने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखें पश्चाताप की आग में जल रही थीं। उसने अपने कानों के सोने के टॉप्स उतारने के लिए हाथ बढ़ाया, “सुनिए, अगर पैसे कम पड़ रहे हैं तो यह बेच दीजिए, पर माँ के सामने हमें इतना मत गिराइए।”

अवधेश भैया ने उठकर उस लिफाफे को हाथ में लिया। उन्होंने अपने आँसू पोंछे और मयंक व मुझे अपनी बाहों में समेट लिया। बरसों बाद तीनों भाई इस तरह एक-दूसरे के सीने से लगे थे।

दरवाजे के बाहर टंगे मटके से टपकता पानी मानो घर के बीतते वक्त और उजड़ते सुकून की गवाही दे रहा था। माँ को ब्रह्मलीन हुए आज छठा दिन था। पिता हरिशंकर जी तो सात वर्ष पहले ही चल बसे थे, तब माँ ने ही इस विशाल पैतृक मकान की ईंटों को अपने स्नेह के गारे से जोड़े रखा था। अब वह वटवृक्ष भी धराशायी हो चुका था। गोरखपुर के रेलवे कॉलोनी से सटा यह पुराना इलाका वैसे तो शांत रहता था, मगर आज दालान में रिश्तेदारों, पंडितों और मोहल्ले के बुजुर्गों का जमघट लगा हुआ था।

सफेद धोती और उत्तरीय ओढ़े हम तीनों भाई—अवधेश, मैं (गिरीश), और सबसे छोटा मयंक—सामने रखे तख्त पर सिर झुकाए बैठे थे। सामने गाँव से आए पुरोहित जी एक लंबी सूची थमाए बैठे थे। तेरहवीं का भोज, ब्राह्मण-भोजन, शय्या-दान, कांसे-तांबे के बर्तन, और गाँव से आने वाले कुटुंब की विदाई। खर्च का आँकड़ा हर गुजरते मिनट के साथ लंबा खिंचता जा रहा था। मैं मन ही मन अपनी बचत का हिसाब लगा रहा था, अवधेश भैया बार-बार अपने चश्मे को पोंछते हुए माथे की लकीरों को सहला रहे थे, और मयंक बेचैनी से अपनी घड़ी देख रहा था।

तभी भीतर आँगन से बर्तनों के पटकने और तीखी नोकझोंक की आवाज दालान तक तैरती हुई आई। दालान में बैठे बुजुर्गों ने एक-दूसरे को कनखियों से देखा। अवधेश भैया का चेहरा फक पड़ गया। उन्होंने आँख के इशारे से मुझे अंदर जाने को कहा।

मैं धोती का छोर संभालते हुए जैसे ही ड्योढ़ी पार करके भीतर आँगन में पहुँचा, वहाँ का माहौल किसी सुलगते हुए अंगारे जैसा था। भाभी (शारदा जी), मेरी पत्नी मालती, और छोटे मयंक की पत्नी नीतू आमने-सामने खड़ी थीं। रसोई में चूल्हा बुझा पड़ा था और चाय के लिए चढ़ाया गया पानी खौल-खौलकर आधा हो चुका था।

“शर्म तो बची ही नहीं है तुम लोगों में! बाहर पूरा समाज बैठा है और यहाँ तुम लोग तमाशा कर रही हो!” मैंने धीमी मगर सख्त आवाज में मालती को टोकते हुए कहा।

मालती ने मुझे देखा और उसकी आँखों से आंसुओं के साथ बरसों की घुटन फूट पड़ी, “आप तो बस दुनिया के सामने भले बने रहिए! जबसे सासु माँ का देहांत हुआ है, बाहर की चाय-पानी से लेकर तेरहवीं के गद्दों तक का जिम्मा आपके ही सिर मढ़ दिया गया है। जो मँझला होता है, क्या वही सारे घर का कुली होता है? न बड़े जैसा मान, न छोटे जैसा दुलार! सब अपनी-अपनी तिजोरी पर ताला लगाकर बैठ गए हैं और कह रहे हैं कि मँझले भाई साहब सब संभाल लेंगे!”

“भाभी, बात को घुमाइए मत!” नीतू ने अपने पल्लू को कसते हुए तीखे स्वर में कहा, “मयंक की अभी प्राइवेट बैंक में नौकरी लगे दो साल ही हुए हैं। पटना में बच्चे का एडमिशन कराया है, डोनेशन और फीस में हमारी सारी जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है। अब आप लोग कह रहे हैं कि भोज में पचास हजार नकद दें और साथ में शय्या-दान का पलंग भी हम ही खरीदें? हम कहाँ से लाएँ इतना पैसा? क्या अपनी किडनी बेच दें? जिनकी जितनी हैसियत हो, वो उतना करे ना!”

तभी बड़ी भाभी शारदा जी ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए मोर्चा संभाला। उनकी आवाज में उम्र का रोब और अपनी उपेक्षा का दर्द दोनों घुले थे, “नीतू, जबान संभालकर बात करो! तुम्हारे भैया पिछले साल ही सिंचाई विभाग से क्लर्क पद से रिटायर हुए हैं। पेंशन का क्या हाल है, सबको पता है। बेटी ब्याहने योग्य बैठी है। अगर बड़े हैं तो क्या सारा बोझ हमारे ही सिर फूटेगा? माँ जब छह महीने बीमार थीं, तब किसने अपनी कमर तोड़ी थी? तब तो किसी को अपनी जिम्मेदारी याद नहीं आई! अब तेरहवीं पर पूरे शहर को खिलाने का ठेका हमारा नहीं है। जिसको अपनी वाहवाही लूटनी हो, वो अपनी जेब ढीली करे!”

“भाभी जी, बीमारी की बात मत उठाइए!” मालती चीख पड़ी, “माँ जी अंतिम दिनों में किसके कमरे में रहीं? रात-रात भर उनके पैरों की मालिश किसने की? आप तो तीर्थ यात्रा के नाम पर हरिद्वार निकल गई थीं!”

“बस करो! भगवान के लिए चुप हो जाओ!” मेरे दोनों हाथ खुद-ब-खुद जुड़ गए। मेरा गला रुंध गया था। जिस माँ ने अपनी पूरी जिंदगी इस आँगन में हँसते-हँसते खपा दी, जिसकी ममता ने हम तीनों भाइयों को कभी अलग नहीं समझा, उसकी आत्मा अभी इस घर की चौखट भी पार नहीं कर पाई थी और हम उसके नाम पर खर्च होने वाले चंद रुपयों के लिए एक-दूसरे के चीथड़े उड़ा रहे थे।

आँगन की यह आग अब दालान की दीवारों को पार कर चुकी थी। भारी कदमों की चाप के साथ अवधेश भैया और मयंक भी अंदर आ गए। उनके पीछे-पीछे गाँव से आए हमारे वयोवृद्ध चचा—विश्वंभर जी—भी लाठी टेकते हुए आँगन में दाखिल हुए।

भैया को देखकर भाभी ने अपना मुँह फेर लिया और बड़बड़ाने लगीं, “आ गए सब धर्मराज! कह दीजिए इनसे, मुझसे एक पाई की उम्मीद न रखें।”

मयंक ने गुस्से में अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा, “चलो नीतू, कमरे में चलो। यहाँ हमारी कोई इज्जत नहीं है। जब सब मिलकर हमें ही नीचा दिखाना चाहते हैं, तो हमें इस पाखंडी भोज में शामिल होने की कोई जरूरत नहीं।”

“रुक जा मयंक!” अवधेश भैया की आवाज गूंजी। उनकी आँखों में लाचारी और अपमान के आँसू थे। उन्होंने अपनी कांपती उंगलियों से चश्मा उतारा, “अगर तुम सबको लगता है कि माँ का श्राद्ध केवल मेरा बोझ है, तो ठीक है। मैं अपनी प्रोविडेंट फंड की आखिरी बची एफडी तोड़ दूंगा। बेटी की शादी के लिए जो रखा था, उसमें से खर्च कर दूंगा। तुम दोनों भाई और बहुएँ निश्चिंत रहो, किसी को एक पैसा देने की जरूरत नहीं है।”

“और फिर जिंदगी भर हमें ताना मारेंगे?” मालती पीछे नहीं हटी, “कि अकेले बड़े भाई ने माँ का तर्पण किया और बाकी दोनों कपूत निकले? समाज में हमारी क्या औकात रह जाएगी?”

बात अब पैसों से बढ़कर अहं और आत्मसम्मान की जंग बन चुकी थी। तीनों बहुओं के तेवर तने हुए थे और तीनों भाई सिर झुकाए अपनी-अपनी विवशताओं के पिंजरे में कैद थे। आँगन में पसरी वह कड़वाहट उस सफेद कफन से भी ज्यादा ठंडी और खौफनाक लग रही थी जो कल ही माँ के जिस्म पर ओढ़ाया गया था।

तभी खट-खट करती लाठी की आवाज के साथ एक सिसकी गूंजी।

हम सबने मुड़कर देखा। अस्सी वर्षीय विश्वंभर चचा आँगन के बीचों-बीच खड़े थे। उनकी दाढ़ी आंसुओं से भीग चुकी थी और लाठी थामे उनके हाथ बुरी तरह थरथरा रहे थे। वे लड़खड़ाते हुए उस तुलसी के चौतरे के पास गए, जहाँ माँ रोज सुबह जल चढ़ाया करती थीं।

चचा ने तुलसी की मिट्टी को छुआ और फिर अपनी छाती पीटते हुए फफक पड़े, “हे भगवान! यह दिन देखने से पहले मेरी आँखें क्यों नहीं फूट गईं? अरे अवधेश! अरे गिरीश! मयंक! यह किसका श्राद्ध कर रहे हो तुम लोग? किसका तर्पण करने जा रहे हो?”

चचा की दहाड़ सुनकर पूरा आँगन सन्न रह गया। औरतें सहमकर पीछे हट गईं।

चचा रोते हुए आगे बढ़े और अवधेश भैया के कंधे पकड़ लिए, “अरे मूर्खों, जिस माँ ने अपने पेट को काटकर तुम तीनों को इस काबिल बनाया कि आज तुम लोग अपनी-अपनी गृहस्थी का रोना रो रहे हो, आज उसी माँ की रूह इस आँगन में खड़ी तुम्हारे इन जहरीले बोलों से छलनी हो रही होगी! क्या इसीलिए उसने तुम तीनों को अपनी कोख में नौ-नौ महीने पाला था कि उसके मरने पर तुम उसके कफन के धागों का हिसाब लगाओ?”

चचा की आवाज आँगन की हर ईंट से टकराकर लौट रही थी। वे मालती, शारदा भाभी और नीतू की तरफ मुड़े, “बहुओं! तुम लोग आज अपनी-अपनी मजबूरियों का रोना रो रही हो। कोई बेटी की शादी का बहाना बना रहा है, कोई बच्चे की फीस का, तो कोई अपनी उपेक्षा का। पर मुझे बताओ, जब हरिशंकर भाई साहब की असमय मौत हुई थी, तब कौशल्या भाभी (माँ) के पास क्या था? टूटी हुई पेंशन और तीन नाबालिग बच्चे! उसने अपने गहने बेच दिए, अपनी जवानी इस चूल्हे के धुएँ में झोंक दी, फटी साड़ियाँ पहनकर तुम लोगों को नए कपड़े पहनाए। कभी उसने कहा कि मँझले को कम रोटी दूंगी क्योंकि उसके लिए मेरे पास प्यार नहीं है? कभी उसने कहा कि बड़े का ठेका मेरा नहीं है?”

चचा की बात सुनकर आँगन में सन्नाटा पसर गया। केवल हवा की सरसराहट और चूल्हे के पास बैठी बिल्ली की मियाऊँ सुनाई दे रही थी।

चचा ने अपने कुर्ते की जेब से एक पुराना, मुड़ा-तुड़ा मटमैला लिफाफा निकाला। उनके हाथ कांप रहे थे। उन्होंने वह लिफाफा दालान की ओर मुँह करके फर्श पर रख दिया।

“यह देखो,” चचा ने भीगी आवाज में कहा, “अस्पताल जाने से दो दिन पहले तुम्हारी माँ ने मुझे अपने पास बुलाया था। वह जानती थी कि उसके जाने के बाद तुम लोगों के अंदर का स्वार्थ बाहर आ जाएगा। उसने अपनी जिंदगी भर की बची हुई वृद्धावस्था पेंशन और अपने कुछ पुराने चांदी के सिक्के बेचकर यह पचास हजार रुपये इस लिफाफे में रखे थे। मुझसे बोली थी—’देवर जी, मेरे जाने के बाद मेरे बच्चों पर भोज का बोझ मत पड़ने देना। वे आज के जमाने के हैं, उनके अपने खर्चे हैं। अगर वे आपस में उलझें, तो यह रुपया उनके सामने रख देना और कहना कि तुम्हारी माँ अपना कफन और भोज का खर्चा खुद देकर गई है, तुम लोग बस आपस में प्रेम से रहना…'”

इतना कहकर चचा जमीन पर बैठ गए और बच्चों की तरह बिलखने लगे।

वह लिफाफा नहीं था, मानो हम तीनों भाइयों और तीनों बहुओं के गाल पर माँ का एक जोरदार, ममतामयी तमाचा था।

लिफाफे के ऊपर माँ की टेढ़ी-मेढ़ी, कांपती लिखावट में लिखा था—“मेरे तीनों बेटों और बहुओं के सुख के लिए।”

उस लिखावट को देखते ही अवधेश भैया घुटनों के बल बैठ गए और फूट-फूट कर रोने लगे। मयंक ने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया और वहीं दीवार से टिककर बैठ गया। मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। जिस माँ को हम मरा हुआ समझकर उसका श्राद्ध करने चले थे, वह मरते दम तक हमारी फिक्र में जी रही थी। वह जानती थी कि हम इतने छोटे हो चुके हैं कि उसके अंतिम संस्कार के खर्च को भी सह नहीं पाएंगे।

शारदा भाभी का घूँघट गिर गया। वे दौड़कर आईं और चचा के पैरों के पास बैठकर उस लिफाफे को अपनी छाती से लगा लिया, “हाय राम! यह हमने क्या कर दिया… माँ जी, हमें माफ कर दो! हम इतने अंधे हो गए थे कि आपके त्याग को भूल गए!”

मालती और नीतू भी अपनी सुध-बुध खो बैठीं। दोनों एक-दूसरे को पकड़कर रोने लगीं। जो कड़वाहट कुछ मिनट पहले आग उगल रही थी, वह माँ के उस निस्वार्थ प्रेम के समंदर में बहकर तिनके की तरह गायब हो चुकी थी। नीतू ने आगे बढ़कर शारदा भाभी के हाथ थाम लिए, “दीदी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं नादान थी, मैंने बहुत गलत बातें बोल दीं। हम कोई अलग नहीं हैं दीदी, हम सब मिलकर संभालेंगे।”

मालती ने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखें पश्चाताप की आग में जल रही थीं। उसने अपने कानों के सोने के टॉप्स उतारने के लिए हाथ बढ़ाया, “सुनिए, अगर पैसे कम पड़ रहे हैं तो यह बेच दीजिए, पर माँ के सामने हमें इतना मत गिराइए।”

अवधेश भैया ने उठकर उस लिफाफे को हाथ में लिया। उन्होंने अपने आँसू पोंछे और मयंक व मुझे अपनी बाहों में समेट लिया। बरसों बाद तीनों भाई इस तरह एक-दूसरे के सीने से लगे थे।

“नहीं मालती, किसी के गहने नहीं बिकेंगे, और न ही माँ के इस पैसे को हम भोज में लगाएंगे,” भैया ने रुंधे गले से कहा, “यह पैसा माँ का आशीर्वाद है। इसे हम घर के मंदिर में रखेंगे ताकि यह हमें हमेशा याद दिलाता रहे कि रिश्तों की कीमत पैसों से कहीं बड़ी होती है।”

भैया ने चचा के पैर छुए और बोले, “चचा जी, आप दालान में चलिए। पंडित जी से कहिए कि आडंबर और दिखावे का कोई भोज नहीं होगा। न हमें समाज को अपनी झूठी शान दिखानी है, न रिश्तेदारों को छप्पन भोग खिलाना है। श्राद्ध का मतलब दिखावा नहीं, बल्कि पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा है। आज तेरहवीं पर केवल सात्विक भोजन बनेगा। हम तीनों भाई अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार जितना बन पड़ेगा, मिलकर करेंगे। और जो पैसा बचेगा, उससे हम गाँव के प्राथमिक विद्यालय में माँ के नाम से गरीब बच्चों के लिए किताबें और गर्म कपड़े बँटवाएंगे। माँ को इससे बड़ी तृप्ति और क्या मिलेगी?”

मयंक ने भैया के हाथ पर अपना हाथ रखा, “भैया, पटना से जो भी थोड़ा-बहुत मैं बचा पाया हूँ, सब इस काम में लगेगा। आज मुझे समझ आया कि बड़ा भाई केवल जिम्मेदारी का नाम नहीं, पिता की छाया होता है।”

आँगन का वातावरण पूरी तरह बदल चुका था। कड़वाहट की जगह अब एक असीम शांति ने ले ली थी।

शारदा भाभी और दोनों बहुओं ने मिलकर रसोई का रुख किया। चूल्हा फिर से जलाया गया। इस बार बर्तनों के खड़कने में गुस्सा नहीं, बल्कि एक साझा दर्द और पश्चाताप की लय थी। दालान में बैठे रिश्तेदारों ने जब यह फैसला सुना, तो पहले तो कुछ लोगों ने दबी जुबान से परंपरा की दुहाई दी, लेकिन चचा विश्वंभर जी के कड़े रुख और तीनों भाइयों की अटूट एकता को देखकर सब नतमस्तक हो गए।

तेरहवें दिन कोई भव्य शामियाना नहीं लगा, न ही कोई दिखावटी उपहार बांटे गए। सादे पत्तलों पर सात्विक भोजन परोसा गया, जिसे खाने वाले हर व्यक्ति की आँखें नम थीं। जब तीनों भाइयों ने मिलकर अनाथालय और विद्यालय के बच्चों को माँ के नाम से अन्न और वस्त्र दान किए, तो बच्चों के चेहरों पर खिली मुस्कान में मानो साक्षात माँ की ममता मुस्कुरा रही थी।

शाम को जब सारा कर्मकांड समाप्त हुआ, तो घर के मुख्य द्वार पर टंगे मटके को विधि-विधान से उतारा गया। आकाश में सांझ का एक चमकीला तारा चमक रहा था। हम तीनों भाई और हमारी पत्नियां तुलसी के चौतरे के पास हाथ जोड़कर खड़े थे। हवा का एक हल्का, शीतल झोंका आया और हम सबको छूकर गुजर गया। ऐसा लगा जैसे माँ ने अपने अदृश्य हाथों से हम सबके सिर पर हाथ फेर दिया हो और कह रही हो—“अब मेरी आत्मा तृप्त हो गई, मेरे बच्चों।”

सच्चा श्राद्ध पुरोहितों की लंबी सूचियों या समाज को खिलाए गए पकवानों में नहीं, बल्कि संतानों के आपसी प्रेम और पितरों के संस्कारों को जीवित रखने में है।

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