अपने भी पराये, पराये भी अपने
ओंकारनाथ जी ने अनिकेत की आंखों में वह सच्चाई और गहराई देख ली, जो एक पिता अपनी बेटी के जीवनसाथी में देखना चाहता है। सुमित्रा देवी को भी अनिकेत की मां की सहजता ने मोह लिया। दोपहर के खाने तक दोनों परिवारों के बीच की औपचारिक दीवारें ढह चुकी थीं। जब विदाई का समय आया, … Read more