अपने भी पराये, पराये भी अपने

 ओंकारनाथ जी ने अनिकेत की आंखों में वह सच्चाई और गहराई देख ली, जो एक पिता अपनी बेटी के जीवनसाथी में देखना चाहता है। सुमित्रा देवी को भी अनिकेत की मां की सहजता ने मोह लिया। दोपहर के खाने तक दोनों परिवारों के बीच की औपचारिक दीवारें ढह चुकी थीं। जब विदाई का समय आया, … Read more

देहरी का मान

 “अवनि बिल्कुल सही कह रही है आलोक,” सुमित्रा जी की आवाज में एक मां की ममता से कहीं ज्यादा एक स्त्री के प्रति न्याय की दृढ़ता थी। “तू हमारा बेटा है, हमारे जिगर का टुकड़ा है, पर इस बच्ची ने हमारे लिए जो किया है, वो तू सात जन्मों में नहीं कर सकता। जब तू … Read more

काश! – श्वेता अग्रवाल

“अब अफ़सोस करके कोई फायदा नहीं है, मिस्टर अर्थ! अगर वक्त रहते आपने उनका ख्याल रखा होता, तो आज वह जिंदगी और मौत के बीच नहीं झूल रही होतीं।” डॉक्टर की बात सुनकर अर्थ का चेहरा उतर गया। “डॉक्टर… मुझे लगा था कि बस एसिडिटी …” “सिर्फ एसिडिटी या बदहजमी नहीं है यह!” डॉक्टर ने … Read more

कब तक चुप रहोगे – हिमानी बंसल

निया का परिवार कभी एक खूबसूरत संयुक्त परिवार था। एक ही आँगन में त्योहार मनते, बच्चों की हँसी गूँजती और किसी एक के घर की परेशानी पूरे परिवार की परेशानी बन जाती। मनमुटाव होते थे, लेकिन रिश्तों में दरार नहीं थी। फिर एक दिन परिवार का बँटवारा हो गया। कारोबार के हिस्से अलग हुए, पैसे … Read more

कब तक चुप रहोगी… – आराधना श्रीवास्तव

तड़ाक की आवाज से पूरा घर गूंज उठा आज  फिर हिमेश  ने रेनू पर हाथ उठाया ,  रेनू रोज-रोज के मारपीट और कलह से परेशान हो गयी थी आए दिन घरेलू हिंसा एवं कलह ने उसको अंदर से तोड़ कर रख दिया था।  अंदर ही अंदर वो खोखली होती जा रही थी, प्रतिरोध करने की … Read more

रिश्तों की डोर

 मम्मी जी, पैसा तो हाथ का मैल है, आज है कल नहीं। पर जो इंसानियत और प्यार कमला मौसी ने हमें दिया है, उसका कर्ज तो हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते। मैं आपसे कोई झगड़ा नहीं करना चाहती। मैं आज भी आपका उतना ही आदर करती हूं जितना अपनी मां का करती। … Read more

इंसानियत की छांव

“अरे ओ महारानी! दिमाग ठिकाने है तुम्हारा या मायके से अक्ल बंधवा कर लाई थी? इतना सारा रुपया-पैसा तू इस कामवाली को क्यों लुटा रही है? हर महीने पहली तारीख को पूरी पगार हाथ में चाहिए होती है इसे, और ऊपर से अगले महीने का अग्रिम भी ऐंठ कर ले जाती है। पिछले हफ्ते ही … Read more

अफसोस – मधु वशिष्ठ

नीता की रिश्तेदारी में लड़कियों की ही संख्या ज्यादा थी और सभी बहनें लगभग हम उम्र ही थी। चाची जी ताई जी नीता की मम्मी और बुआ सब अपनी  अपनी लड़कियों के लिए लड़के देख रहे थे। हालांकि ताई जी और बुआ जी की लड़कियां नीता से काफी बड़ी थी। नीता के पिता को दफ्तर … Read more

बहुत अफसोस है मुझे – मंजू ओमर

संजय अजय अरुण अरे कहां हो सब लोग भाई इधर आओ एक खुशखबरी है तुम  सबके रामावतार जी बेटे को आवाज लगा रहे थे। तभी रामावतार की दोनों बहुएं कावेरी और शिखा बाहर निकाल कर आई। बड़ी बहू कावेरी बोली संजय तो बाथरूम में है कोई काम हो तो हमें बता दीजिए बाबूजी। नहीं तुम … Read more

ममता का आंगन

सत्यनारायण जी और सरस्वती देवी ने आश्चर्य से उस पैकेट को देखा। सुगंधा ने बड़े ही मनोवैज्ञानिक और अपनेपन भरे अंदाज में समझाना शुरू किया, “मां जी, जब हमारे बच्चे छोटे थे, तो हम उन्हें डायपर पहनाते थे ताकि वे रातभर गीलेपन से परेशान न हों और सुकून से सो सकें। जीवन का पहिया जब … Read more

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