बंधन से बसेरे तक

 निशांत ने आगे बढ़कर अपने ससुर के दोनों हाथ थाम लिए और बहुत ही आदर से कहा कि बाबूजी, हमने पुणे केवल अपने करियर के लिए नहीं चुना है। हमने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि हम जानते हैं कि इस उम्र में आपको हमारी और हमें आपके साए की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। आप दोनों … Read more

अफसोस – बिमला रावत जड़धारी

‘ताऊजी हमारे रिश्ते में दूरी जरूर आई है, पर हम सब एक ही परिवार तो है। मैं आपको किसी के हाथों पिटते हुए कैसे देख सकता था। आपकी बेइज्जती का मतलब हमारे परिवार की बेइज्जती।’ किशन जी की पत्नी राधा की मृत्यु सात साल पहले हो गयी थी। किशन जी ने अपने दोनों बच्चे, बड़े … Read more

इस बार नहीं – श्वेता अग्रवाल

अपनी माँ की बात सुनते ही निरवी स्तब्ध रह गई। उसके मुँह से कोई शब्द ही नहीं निकला। वह चुपचाप बुत बनी आँखें फाड़े अपनी माँ की ओर देखती ही रह गई। तभी पास में खड़ी उसकी छोटी बहन आध्या ने उसके बगल में सोए नन्हे से प्रत्यय की ओर अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन निरवी … Read more

अफ़सोस – सीमा सिंघी

आज फिर रजत को कॉलेज छोड़ काम पर जाते देख कौशल्या जी बोल उठी। रजत यह तुम ठीक नहीं कर रहे हो। तुम अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर जो नई राह पकड़ रहे हो।  देखो तुम्हें कोई नया व्यापार करना हो या… कोई और नई राह तुम्हें अपनी और आकर्षित कर रही हो … Read more

अनकहा दर्द

“सुमित, मैं थक चुकी हूँ। मैं अपने ही परिवार की नजरों में सिर्फ एक साधन बन कर रह गई हूँ। जब भी उनका फोन आता है, मेरी रूह कांप जाती है। मुझे नहीं चाहिए ऐसा मायका जहाँ मेरी कोई कद्र नहीं, जहाँ सिर्फ पैसों से मेरे अस्तित्व की कीमत तय होती है,” शालिनी की आवाज … Read more

कोख का अभिमान

 “आलोक, यह घर तुम्हारा भी है, लेकिन अब यहां मुफ्त की रोटियां और अंधा दुलार नहीं मिलेगा। यदि तुम्हें यहां रहना है, तो मेहनत करनी होगी, पसीना बहाना होगा और अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। मां-बाप ने बेटे की चाह में हमें खो दिया था, लेकिन हमने उन्हें कभी खोने नहीं दिया। इंसान अपनी … Read more

रिश्तों का तड़का

 ओंकारेश्वर जी चुपचाप अपनी पत्नी की बातें सुन रहे थे। मालती देवी के तर्कों में ममता भी थी, अनुभव की परिपक्वता भी थी और एक नई पीढ़ी के संघर्ष के प्रति गहरी सहानुभूति भी। उन्हें महसूस हुआ कि उनका गुस्सा वाकई बेवजह और गैर-जरूरी था। उन्होंने अपनी बहू के उस समर्पण को नजरअंदाज कर दिया … Read more

काँच का घमंड और सोने का दिल

 “भाभी, मैं उसी रात, उसी पल नीचे आकर बाबूजी, माँ और अपने भैया के सामने आपकी हकीकत खोल सकती थी। मैं चीख-चीख कर सबको बता सकती थी कि जिसे वे घर की लक्ष्मी समझ रहे हैं, उसने अपने झूठे घमंड में इस घर की खुशियों में आग लगाई है। अगर मैं ऐसा करती, तो भैया … Read more

बंधन या सुकून?

“मैं यह क्या कर बैठा…” अंकुर की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया और बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोने लगा। “राधिका! हमने क्या कर दिया? वो आज़ादी किस काम की जो हमें अपने ही भगवान जैसे मां-बाप से अलग कर दे? हम इतने अंधे कैसे … Read more

रेशमी पिंजरा और खुली उड़ान

उमेश जी ने अपनी बहन की तरफ देखा, जिनकी आंखों में अपनी गलती का जरा भी पछतावा नहीं था, बल्कि सिर्फ अपनी झूठी प्रतिष्ठा की चिंता थी। उमेश जी ने हाथ जोड़कर अत्यंत कठोर शब्दों में कहा, “दीदी, आपने अपने स्वार्थ और रिश्तेदारी चमकाने के लिए मेरी फूल सी बच्ची को उस दलदल में धकेल … Read more

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