रिश्तों की डोर

 मम्मी जी, पैसा तो हाथ का मैल है, आज है कल नहीं। पर जो इंसानियत और प्यार कमला मौसी ने हमें दिया है, उसका कर्ज तो हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते। मैं आपसे कोई झगड़ा नहीं करना चाहती। मैं आज भी आपका उतना ही आदर करती हूं जितना अपनी मां का करती। लेकिन मैं आपसे सिर्फ इतना मांगती हूं कि आप अपने दिल के दरवाजों को खोलिए। रिश्तों को केवल स्वार्थ और खून के तराजू पर मत तौलिए।”

चाय की ठंडी होती प्याली की तरफ देखते हुए सुनंदा जी के चेहरे पर गुस्से की गहरी लकीरें खिंच आई थीं। उनके हाथ में बैंक की पासबुक और सामने मेज पर रखे दो बड़े शॉपिंग बैग थे, जिनमें सुनहरी किनारी वाली रेशमी साड़ियां, नए कुर्ते-पायजामे और तरह-तरह के सूखे मेवों के डिब्बे सजे हुए थे। रसोई से निकलकर जैसे ही उनकी बहू तन्वी पानी का जग लेकर बाहर आई, सुनंदा जी के सब्र का बांध टूट गया। उनकी आवाज में तल्खी और कड़वाहट साफ महसूस की जा सकती थी।

“अरे बहू, तेरी अक्ल पर क्या पत्थर पड़ गए हैं जो तू इस तरह घर की गाढ़ी कमाई पानी की तरह बहा रही है? इस कमला को हर महीने तय वक्त से पहले पूरी पगार मिल जाती है, पिछले महीने राशन के लिए अलग से पैसे दिए जिसका कोई अता-पता नहीं, और अब इस करवाचौथ और त्योहार के नाम पर ये महंगे कपड़े, साड़ियां और साथ में पूरे दस हजार का लिफाफा? लुटाओ, खूब लुटाओ इन बाहर वालों पर! यहां मेरी बेटी निशा के बच्चों के दाखिले के लिए जब मैंने दो पैसे मदद मांगी थी, तब तुम्हारा मुंह बन गया था। मेरे बेटे नमन का खून-पसीना क्या इन कामवालियों के शौक पूरे करने के लिए है? आज नमन को दफ्तर से घर तो आने दो, अगर उसने तुम्हारी यह फिजूलखर्ची बंद नहीं करवाई तो मेरा नाम भी सुनंदा नहीं!”

सुनंदा जी का स्वभाव पूरे मोहल्ले में मशहूर था। उनके लिए दुनिया की सारी खुशियां और सुख-सुविधाएं सिर्फ उनकी अपनी बेटी निशा के इर्द-गिर्द घूमती थीं। निशा ससुराल में क्या खा रही है, उसने क्या पहना, उसके सास-ससुर पर कैसे हुकूमत चलानी है—दिन भर फोन पर यही चर्चा चलती थी। लेकिन अपने ही घर में ब्याह कर आई बहू तन्वी को वे कभी अपने परिवार का हिस्सा नहीं मान पाईं। तन्वी सुबह पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक घर के हर काम में जुटी रहती, पर सुनंदा जी के मुंह से उसके लिए कभी तारीफ का एक मीठा बोल नहीं निकलता था।

रोज-रोज के तानों को तन्वी अक्सर एक हल्की मुस्कान के साथ पी जाया करती थी। उसने हमेशा यही सोचा था कि वक्त के साथ सास का दिल पिघल जाएगा। लेकिन आज जब सुनंदा जी ने उस औरत की वफादारी और इंसानियत पर सवाल उठा दिया जिसने सचमुच तन्वी की जान बचाई थी, तो तन्वी के सब्र की दीवार ढह गई। उसने पानी का जग मेज पर रखा और बड़ी शांति लेकिन बेहद दृढ़ता के साथ सुनंदा जी की आँखों में देखा।

“मांजी, आज आप मुझे मत रोकिए। पराया कौन है और अपना कौन, यह फैसला खून के रिश्ते नहीं, बल्कि वक्त की कसौटी करती है। जिस कमला मौसी को आप सिर्फ एक नौकरानी और गरीब समझ रही हैं, उनका दिल इस दुनिया के बड़े-बड़े महलों से कहीं ज्यादा अमीर है। यह वही कमला मौसी हैं जिन्होंने उस वक्त मेरा हाथ थामा था जब मुझे अपनों की, खासकर आपकी और निशा दीदी की सबसे ज्यादा जरूरत थी। क्या आप भूल गईं वो खौफनाक दिन? आपके और दीदी के उस एक बेरहम फैसले ने मेरी जिंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल दी थी। आज अगर इस घर के आंगन में मेरा आठ महीने का बेटा कबीर किलकारियां मार रहा है और मैं अपने पैरों पर खड़ी होकर सांस ले रही हूं, तो वह सिर्फ और सिर्फ कमला मौसी की बदौलत है। वरना आप दोनों ने तो मुझे और मेरे अजन्मे बच्चे को बेसहारा मर जाने के लिए छोड़ दिया था।”

तन्वी के यह कहते ही कमरे में एक गहरा सन्नाटा छा गया। सुनंदा जी की आँखें गुस्से से चौड़ी हो गईं, पर तन्वी की आवाज में छुपा सच इतना भारी था कि सुनंदा जी चाहकर भी तुरंत पलटवार नहीं कर पाईं। तन्वी की आँखों में अतीत के वे मंजर किसी चलचित्र की तरह तैरने लगे।

भोपाल के एक प्रतिष्ठित परिवार की पढ़ी-लिखी, संस्कारी लड़की तन्वी का विवाह जब नमन से हुआ था, तो पूरे परिवार ने खुशियां मनाई थीं। नमन एक सॉफ्टवेयर कंपनी में ऊंचे पद पर कार्यरत था—सुलझा हुआ, मेहनती और अपनी मां का सम्मान करने वाला बेटा। शादी के बाद तन्वी ने घर की पूरी बागडोर अपने हाथों में ले ली। सुनंदा जी ने गृहस्थी के सारे काम—झाड़ू, पोंछा, कपड़े, चौका, मसालों की पिसाई—सब तन्वी के नाजुक कंधों पर डाल दिए और खुद आरामकुर्सी पर बैठकर दिन भर फोन पर बेटी निशा को ससुराल के गुर सिखाने लगीं। उधर से निशा भी मां को समझाती रहती कि कैसे बहू को दबाकर रखना है ताकि वह कभी सिर न उठा सके।

तन्वी ने कभी कोई शिकायत नहीं की। लेकिन शादी के दो साल बाद जब तन्वी गर्भवती हुई, तो उसके शरीर में कमजोरी आने लगी। डॉक्टर ने उसे आराम करने की सलाह दी थी। पहले तीन महीनों में उसे लगातार चक्कर आते और उल्टियां होती थीं। इसके बावजूद सुनंदा जी का हुक्म यही रहता कि सुबह का नाश्ता और दोनों वक्त का खाना समय पर मेज पर होना चाहिए। ऐसे नाजुक दौर में कमला, जो घर में बर्तन मांजने और पोछा लगाने आती थी, तन्वी के लिए फरिश्ता बनकर सामने आई। कमला एक अधेड़ उम्र की विधवा महिला थी, जिसका इस दुनिया में कोई नहीं था। जब वह तन्वी को रसोई में पसीने से तर-बतर और पेट पकड़े देखती, तो चुपके से आकर रोटियां बेल देती, सब्जियां काट देती और कहती, “बिटिया, तू बैठ जा। तू मेरी मरी हुई बेटी जैसी है, तुझसे इतना काम नहीं देखा जाता।”

फिर एक दिन वह मनहूस घटना घटी। नमन एक बेहद जरूरी प्रोजेक्ट के सिलसिले में दस दिनों के लिए विदेश के दौरे पर गया हुआ था। तन्वी को सातवां महीना चल रहा था। सुबह नहाने के बाद बाथरूम से बाहर निकलते ही गीले फर्श पर तन्वी का पैर बुरी तरह फिसल गया। वह पेट के बल गिरने ही वाली थी कि तभी कमरे में झाड़ू लगाने आई कमला ने चीख सुनकर छलांग लगाई और तन्वी के कंधे को अपनी पूरी ताकत से थाम लिया। तन्वी का पेट तो जमीन से टकराने से बच गया, लेकिन उसका दायां पैर बुरी तरह मुड़ गया और वह चीख मारकर वहीं गिर पड़ी।

आवाज सुनकर सुनंदा जी कमरे के बाहर आकर खड़ी हो गईं। जब डॉक्टर को बुलाया गया और एक्स-रे हुआ, तो पता चला कि तन्वी के टखने की हड्डी टूट गई है और साथ ही गर्भ में भी खिंचाव आ गया है। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी कि अगले एक महीने तक तन्वी बिस्तर से पैर नीचे नहीं उतारेगी। जरा सा भी तनाव या चलना-फिरना बच्चे की जान के लिए घातक हो सकता था।

उस दिन तन्वी की आँखों से बेबसी के आंसू थम नहीं रहे थे। नमन को जब फोन पर यह बात पता चली तो वह घबरा गया। उसने विदेश से ही अपनी बड़ी बहन निशा को फोन किया, जो उसी शहर के दूसरे छोर पर अपने ससुराल में रहती थी। नमन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “दीदी, सिर्फ तीन हफ्तों की बात है। जब तक मेरा प्रोजेक्ट खत्म नहीं होता और मैं लौट नहीं आता, आप घर आकर मां का हाथ बंटा दीजिए और तन्वी की थोड़ी तीमारदारी कर दीजिए। डॉक्टर ने उसे हिलने से भी मना किया है।”

लेकिन निशा, जो अपनी ससुराल में जरा सी छींक आने पर भी मायके आकर पंद्रह-पंद्रह दिन आराम फरमाती थी, उसने साफ इंकार कर दिया। फोन पर उसने बहाना बनाया, “अरे नमन, तुझे तो पता है मेरे बच्चों के इम्तिहान चल रहे हैं। मेरे सास-ससुर को समय पर खाना चाहिए। मैं अपना भरा-पूरा घर छोड़कर वहां नौकरानी बनने नहीं आ सकती। मां से कहो वो संभाले।”

उधर जब नमन ने अपनी मां सुनंदा जी से गुहार लगाई, तो सुनंदा जी ने दो टूक जवाब दे दिया, “मैंने जिंदगी भर अपने बच्चों की सेवा की है, अब इस बुढ़ापे में मुझसे बहू की तीमारदारी और उसकी गंदगी साफ नहीं होगी। मुझसे कोई उम्मीद मत रखना।”

तन्वी उस पल पूरी तरह टूट गई थी। पैर में असहनीय दर्द था, गर्भ में पल रहे बच्चे की चिंता थी और घर में पीने के पानी के लिए भी कोई पूछने वाला नहीं था। सुनंदा जी अपने कमरे का दरवाजा बंद करके बैठ गईं।

तब उस बंद दरवाजे के बाहर से कमला की आवाज आई। कमला ने तन्वी के आंसुओं को अपने आंचल से पोंछा और बोली, “बिटिया, तू फिक्र मत कर। जब तक तेरा नमन बाबू नहीं आ जाता और तू अपने पैरों पर नहीं खड़ी हो जाती, यह कमला तेरी मां बनकर यहीं रहेगी।”

उस दिन के बाद से कमला ने जो किया, वह कोई सगी मां ही कर सकती थी। कमला ने तन्वी के कमरे में ही जमीन पर अपना बिस्तर लगा लिया। सुबह चार बजे उठकर वह घर का सारा काम निपटाती। तन्वी को समय पर दलिया, फल और दूध बनाकर देती। सुनंदा जी की तीखी नजरें और ताने कमला को हर पल चुभते थे। सुनंदा जी ताने मारतीं, “बड़ी आई महारानी की दाई! मुफ्त की रोटियां तोड़ने का अच्छा जरिया ढूंढ लिया है।” लेकिन कमला ने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया।

कमला तन्वी को समय पर दवाइयां देती, अपने हाथों से उसका बदन पोंछती, उसे सहारा देकर उठाती और रात-रात भर जागकर उसके दर्द से कराहते पैरों को सरसों के तेल से सहलाती। जब तन्वी दर्द से रोने लगती, तो कमला उसे अपने सीने से चिपकाकर लोरियां सुनाती और कहती, “मेरी बच्ची, हिम्मत मत हार। भगवान सब देख रहा है, तेरे बच्चे पर कोई आंच नहीं आने दूंगा।”

तीन हफ्ते बाद जब नमन विदेश से वापस लौटा, तो घर का नजारा देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसकी मां अपने कमरे में टीवी देख रही थी और वहां दूसरी तरफ कमला तन्वी को सहारा देकर धीरे-धीरे कमरे में कदम रखना सिखा रही थी। तन्वी की हालत सुधर चुकी थी और उसका गर्भ सुरक्षित था। जब नमन को पूरी सच्चाई का पता चला, तो वह कमला के पैरों में गिर पड़ा। उसकी आँखों से पश्चाताप और कृतज्ञता के आंसू बह रहे थे। उसने देखा कि जिस रिश्ते को समाज सिर्फ पैसों और मजदूरी का रिश्ता मानता है, उस रिश्ते ने आज उसके पूरे परिवार की लाज और उसके बच्चे की जिंदगी बचा ली थी।

समय का पहिया घूमा। तन्वी ने एक स्वस्थ और सुंदर बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम कबीर रखा गया। कबीर के जन्म के बाद नमन और तन्वी के दिल में कमला के लिए सम्मान भगवान के बराबर हो गया था। कमला अब उस घर की सिर्फ कामवाली नहीं थी, बल्कि कबीर की “कमला नानी” बन चुकी थी।

तन्वी ने जब आज सुनंदा जी को वही पुराना आईना दिखाया, तो सुनंदा जी का चेहरा सफेद पड़ चुका था। तन्वी ने आगे बढ़कर सुनंदा जी के हाथ थाम लिए। उसकी आवाज में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी करुणा थी।

“मम्मी जी, आपने हमेशा यह सोचा कि बहू पराई होती है और बाहर वाले सिर्फ पैसे लूटने आते हैं। लेकिन जरा सोचिए, जिस दिन मैं लाचार पड़ी थी, उस दिन अगर कमला मौसी न होती तो क्या आज आपका यह पोता इस दुनिया में होता? क्या मैं जिंदा बचती? आपकी बेटी निशा दीदी ने उस दिन अपने हाथ पीछे खींच लिए थे। मुझे उनसे कोई गिला नहीं है, लेकिन जिस औरत ने अपने खून का कतरा बहाए बिना मुझे एक नया जीवन दिया, क्या उसके लिए यह चंद कपड़े और कुछ रुपये बहुत ज्यादा हैं?

मम्मी जी, पैसा तो हाथ का मैल है, आज है कल नहीं। पर जो इंसानियत और प्यार कमला मौसी ने हमें दिया है, उसका कर्ज तो हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते। मैं आपसे कोई झगड़ा नहीं करना चाहती। मैं आज भी आपका उतना ही आदर करती हूं जितना अपनी मां का करती। लेकिन मैं आपसे सिर्फ इतना मांगती हूं कि आप अपने दिल के दरवाजों को खोलिए। रिश्तों को केवल स्वार्थ और खून के तराजू पर मत तौलिए।”

तन्वी की कही एक-एक बात सुनंदा जी के अंतर्मन में गूंजने लगी। उनके सामने वह सारा अतीत ताजा हो गया जब उन्होंने अपनी लाचार बहू को कमरे में तड़पता छोड़ दिया था। उन्हें अपनी बेटी निशा की वह बेरुखी भी याद आई जब उसने एक बार भी मुड़कर अपनी भाभी या मां का हाल नहीं पूछा था। और वहीं दूसरी तरफ कमला थी, जिसने बिना किसी लालच के दिन-रात एक कर दिया था।

सुनंदा जी का अहंकार उस दिन भरभरा कर गिर पड़ा। उनके भीतर की मां और एक इंसान जाग उठी। आँखों से बहते आंसुओं के बीच उन्होंने अपनी नजरें उठाईं। उसी समय बाहर के दरवाजे से कमला दाखिल हुई, जिसके हाथ में कबीर के लिए घर के बने बेसन के लड्डू का डिब्बा था। कमला के चेहरे पर वही पुरानी सादगी और ममता थी।

सुनंदा जी अपनी जगह से उठीं। उनके कदम लड़खड़ा रहे थे। वे धीरे-धीरे चलकर कमला के सामने जाकर खड़ी हो गईं। कमला घबरा गई, उसे लगा कि शायद मालकिन फिर किसी बात पर डांटने वाली हैं। उसने नजरें झुका लीं और बोली, “मांजी, कबीर बिटवा के लिए लड्डू लाई थी…”

लेकिन इससे पहले कि कमला अपनी बात पूरी करती, सुनंदा जी ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए और कमला के हाथों को अपने हाथों में थाम लिया। सुनंदा जी की आँखों से पश्चाताप की अविरल धारा बह निकली।

“मुझे माफ कर दे कमला… मुझे माफ कर दे बहन,” सुनंदा जी का गला रुंध गया। “मेरी आँखों पर स्वार्थ की ऐसी पट्टी बंधी थी कि मैं इंसान और भगवान के भेजे फरिश्ते में फर्क ही नहीं कर पाई। तूने इस घर के चिराग को बचाया, मेरी बहू को अपनी बेटी की तरह संभाला, और मैं अंधी होकर तुझे सिर्फ एक नौकरानी समझती रही। आज मेरी बहू ने मेरी आँखें खोल दी हैं। तू इस घर की नौकरानी नहीं, इस घर की सबसे बड़ी रक्षक है।”

कमला की आँखें भी छलक आईं। उसने तुरंत सुनंदा जी के हाथ अपने हाथों से हटाए और बोली, “अरे मांजी, ऐसा मत कहिए। आप तो घर की बड़ी हैं। तन्वी बिटिया मेरी बच्ची जैसी है, भला कोई मां अपनी बच्ची को तकलीफ में देख सकती है क्या?”

तन्वी यह सब देखकर अपनी जगह पर खड़ी रो रही थी, लेकिन ये आंसू खुशी और सुकून के थे। उसने आगे बढ़कर सुनंदा जी और कमला दोनों को अपने आलिंगन में ले लिया। तभी भीतर के कमरे से नमन छोटे कबीर को गोद में लेकर बाहर आया। कबीर ने अपनी तोतली आवाज में “दादी… नानी…” कहकर दोनों की तरफ अपने नन्हे हाथ फैला दिए।

उस दिन उस घर की छत के नीचे बरसों से जमी कड़वाहट और परायेपन की बर्फ हमेशा के लिए पिघल गई थी। सुनंदा जी ने स्वयं आगे बढ़कर मेज पर रखे नए कपड़े और मिठाई का डिब्बा कमला के हाथों में सौंपा और मुस्कुराते हुए कहा, “कमला, इस बार त्योहार पर तू कहीं नहीं जाएगी। तू हमारे साथ बैठकर खाना खाएगी और हम सब मिलकर इस नए जीवन का जश्न मनाएंगे।”

रिश्ते केवल जन्म से नहीं बनते, बल्कि वे स्नेह, सेवा और त्याग की मिट्टी से सींचे जाते हैं। जब एक परिवार में अहंकार मिट जाता है और कृतज्ञता जन्म लेती है, तो वह घर सचमुच एक मंदिर बन जाता है। तन्वी के घर में आज एक नई सुबह की धूप खिली थी—ऐसी धूप जो किसी को जलाती नहीं, बल्कि सबको अपने आंचल में समेटकर सुकून देती है।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि खून के रिश्तों से कहीं बड़े वे रिश्ते होते हैं जो निस्वार्थ भाव से दुख की घड़ी में हमारा सहारा बनते हैं? क्या हमारे समाज में घरेलू सहायकों को केवल नौकर न समझकर उनके मानवीय योगदान का सम्मान नहीं किया जाना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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