तड़ाक की आवाज से पूरा घर गूंज उठा आज फिर हिमेश ने रेनू पर हाथ उठाया ,
रेनू रोज-रोज के मारपीट और कलह से परेशान हो गयी थी आए दिन घरेलू हिंसा एवं कलह ने उसको अंदर से तोड़ कर रख दिया था।
अंदर ही अंदर वो खोखली होती जा रही थी, प्रतिरोध करने की क्षमता अभ उसके अंदर नहीं बची थी हिमेश की प्रतिदिन का यही दिनचर्या थी रात को जब वह घर आता तो अक्सर शराब पीकर आता और मारपीट करता ।
रेनू की शादी के महज 5 वर्ष बीते थे,कि यह सब कलह शुरु हो गया, वैसे तो उसके मां-बाप ने बड़े जांच- पडताल एवं सोच समझकर रेनू का रिश्ता बैंक के पी0 ओ0,,,, मिस्टर हिमेश से तय किया था, किंतु शादी के कुछ ही दिन बाद हिमेश बार- बात पर रेनू को प्रताड़ित करता और उसके गरीब परिवार का हवाला देकर ताना मारता ,
मसलन,,,,,”तुम्हारे मां -बाप ने तुझ जैसी कम पढ़ी- लिखी लड़की को मेरे पल्ले बांध दिया” । न ही पूरा दान दहेज दिया । जब गरीब भिखारी थे,,, तो उसी स्तर पर अपनी लड़की का विवाह किया होता उसकी जिंदगी बर्बाद करने से क्या फायदा हुआ ?”” जिस पद पर वह है उसके पास बंगला, गाड़ी, नौकर -चाकर सब कुछ मिलता”
आज अगर उसकी शादी हुई होती तो 30 -40 लाख रुपए दहेज आराम से मिल जाता।”” रेनू रोज – रोज की इन सब बातो से तंग आ गई थी।
कभी-कभी वह सोचती कि,,,,,,, वह इस घर को छोड़कर चली जाए,,,,,, जहां न उसका आत्मसम्मान है , न ही कोई इज्जत , किंतु फिर सोचती समाज क्या कहेगा? समाज के लोगों उसपे उंगलियां उठाएंगे ।
किसी विवाहित स्त्री का अकेले अलग रहना बहुत कठिन चुनौती है लोग तरह-तरह से लांछन लगाने से नहीं चूकते। कितनी बार उसने सोचा कि इस जिल्लत भरी जिंदगी से तो अच्छा है यहां से दूर कहीं चले जाना किंतु वह अपने फैसले पर अटल न रह सकी।
किन्तु आज तो हद ही हो गई थी वह जानती थी कि वह इतनी पढ़ी-लिखी नहीं है ,, कि अलग रह कर अपने पैरों पर खड़ी हो सके। फिर मन के किसी कोने में यह भी था कि हो सकता है कि समय के साथ हिमेश के व्यवहार में बदलाव हो। किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ,,, ,और तो और दिन -प्रतिदिन उसकी क्रूरता बढ़ती ही जा रही थी ।
आज तो हद ही हो गई उसने बिना कुछ जाने समझे रेनू के गाल पर एक तमाचा जड़ दिया । रेनू सिहर गयी बिना कुछ जाने समझे हिमेश का इस तरह हाथ उठाना, उसके शरीर को अंदर से झकझोंर दिया ,।
हिमेश ने यह भी जानना नहीं चाहा की रेनू फोन इसलिए नहीं कर पा रही थी कि फोन में बैलेंस नहीं था, अक्सर फोन में बैलेंस हिमेश ही करवाता था लेकिन कई बार कहने के बाद भी उसने बैलेंस नहीं करवाया था । इतनी छोटी सी बात पर मारपीट रेनू के लिए असहनीय था अब वह सब कुछ सहते- सहते अंदर से बहुत मजबूत हो चुकी थी ।
अब वह दृढ़ संकल्प हो चुकी थी कि अब वह इस घर में नहीं रहेगी । अपने आत्मसम्मान को रोज- रोज मरता नहीं देखेगी । चाहे इसके लिए कितना भी कठोर कदम उठाना क्यों न पडें? उसने अपने कुछ जरूरी सामानों की पैकिंग की और घर से निकल गई ।
उसने हीमेश से कहा भी कि वह जा रही है किंतु हिमेश ने हंसते हुए कहा,, ,,,, कहां जाओगी ? लौटकर तो तुम्हें इसी घर में आना है। तुम्हारे मायके की भी तो आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है । अतः सिर्फ तुम्हें लौट के इसी घर में आना , एक बार अगर चौखट लांघ कर बाहर चली गई तो दोबारा मुड़कर इस घर को मत देखना। यह कहते हुए वह हंसने लगा, ,,,, उसकी हंसी एक तीर की भांति रेनू के दिल में चुभ रही थी।
लेकिन आज वह इन सब बातों से भयभीत होकर चुप बैठने वाली नही.थी उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था, वह उसे छोङने की सोच चुकी थी ।
मायके आकर उसने अपने मां-बाप को सारी बातें बतायी, मां बाप तो पहले से ही आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे, उन्होंने कहा ,,, ‘बेटी यहां कैसे गुजारा होगा, इस पर रेनू ने कहा …आप लोग घबराइए नहीं, कोई ना कोई रास्ता जरूर दिखाई देगा,’
शुरू- शुरू में रेनू को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ा, ज्यादा पढ़ी-लिखी ना होने के कारण उसको कहीं नौकरी नहीं मिल पा रही थी और बिजनेस में लगाने के लिए उसके पास पैसे भी नहीं थे, तभी उसके दिमाग में एक विचार आया वह खाना बहुत अच्छा बनाती थी,खासकर विरियानी, घर पर बिरयानी बनाना शुरू किया, l शादी से पहले उसके हाथों से बनी बिरयानी सभी बहुत पसंद करते थे,रिश्तेदार जब भी आते तो उसके हाथों से बनी बिरयानी जरूर खाते, ।
अचानक रेनू के दिमाग में विचार आया कि क्यों न वह बिरयानी बनाने का व्यवसाय शुरू कर दें और डोर टू डोर अच्छी पैकिंग कर सप्लाई करे ।
शुरुआत उसने बड़े छोटे स्तर से की , शुरुआत अपने घर से ही की..उसने अगल-बगल मोहल्ले के लोगों को अपने हाथों द्वारा बनी हुई बिरयानी बेचना शुरु कर दिया
धीरे-धीरे उसके स्वादिष्ट बिरयानी की मांग बढ़ती गई, इतनी ज्यादा मांग को देखते हुए रेनू न
को दो चार सहयोगियों को भी रखना पड़ा। वह अपनी देख -रेख में उनसे बिरयानी बनवाती । धीरे -धीरे उसका यह व्यवसाय चल निकला ।
उसने एक बड़ा रेस्टोरेंट खोल दिया अब तो उसके बिरयानी की चर्चा चारों तरफ होने लगी। उसकी आर्थिक स्थिति भी पहले से बहुत बेहतर हो गई। उसने बहुत सी महिलाओं को जो उसकी तरह अनाथ और अबला एवं कम पढ़ी लिखी थी उन्हें अपने यहां नौकरी दी।
आज वह बड़े आत्मसम्मान के साथ समाज में अपनी एक पहचान के साथ जिंदगी जी रही थी,।
सच ! कभी- कभी जिंदगी मे अपनी चुप्पी त्याग कर कुछ अहम फैसले लेने पड़ते हैं, जो सर्वथा उचित होते हैं ।
समाप्त
आराधना श्रीवास्तव
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)