“अरे ओ महारानी! दिमाग ठिकाने है तुम्हारा या मायके से अक्ल बंधवा कर लाई थी? इतना सारा रुपया-पैसा तू इस कामवाली को क्यों लुटा रही है? हर महीने पहली तारीख को पूरी पगार हाथ में चाहिए होती है इसे, और ऊपर से अगले महीने का अग्रिम भी ऐंठ कर ले जाती है। पिछले हफ्ते ही तूने इसे पंद्रह हजार रुपये अलग से थमा दिए, जिसका आज तक कोई अता-पता नहीं। और अब दीवाली के नाम पर यह मिठाइयों के डिब्बे, नए ब्रांडेड कपड़े, ड्राई फ्रूट्स और ऊपर से अलग से बोनस का लिफाफा? वाह री मालकिन! खूब लुटाओ पराए लोगों पर मेरे बेटे की खून-पसीने की कमाई। यहां मेरी बेटी जब भी मायके आती है, तो तुम्हारी जान निकलती है उसे एक अदद साड़ी देने में। और इन नौकर-चाकरों पर जैसे कुबेर का खजाना खुला हुआ है। शाम को विनीत को घर आने दे, आज तो मैं उससे साफ-साफ कहूंगी कि या तो इस फिजूलखर्ची पर लगाम कसे, वरना इस घर में मेरा रहना मुहाल है।”
कमला देवी अपनी बहू नलिनी पर सुबह से ही तानों की बौछार कर रही थीं। कमला देवी का स्वभाव उनके नाम के बिल्कुल विपरीत था। उनका सारा ध्यान, सारा प्यार और सारी चिंता बस अपनी विवाहित बेटी रोहिणी के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। बेटी के ससुराल में क्या चल रहा है, उसे क्या भेजना है, उसका मान कैसे बढ़े, बस यही उनके दिन-रात का चिंतन था। बाकी दुनिया जहान भाड़ में जाए, उन्हें कोई सरोकार नहीं था। और घर की बहू नलिनी तो उनकी आँखों में हमेशा एक खटकते हुए कांटे की तरह चुभती थी।
आमतौर पर नलिनी सास की कड़वी बातों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया करती थी। घर की शांति की खातिर वह अक्सर अपने आंसुओं को पीकर मुस्कुरा देती थी। लेकिन आज कमला देवी के शब्द मर्यादा की हर सीमा लांघ चुके थे। नलिनी ने हाथ में पकड़ी हुई थाली मेज पर रखी। उसकी आँखों में आज कोई डर या संकोच नहीं था, बल्कि एक ऐसा ठहराव और स्वाभिमान था, जिसे देखकर कमला देवी एक पल के लिए सहम गईं।
“पराया कौन है मम्मी जी?” नलिनी की आवाज़ में गजब की दृढ़ता थी। “अगर इस पूरे चौखट के भीतर मेरा कोई सच्चा अपना है, जिसने बिना किसी स्वार्थ के मेरी जान बचाई, तो वह सिर्फ और सिर्फ यशोदा मौसी है। और जिसे आप हिकारत से गरीब और नौकरानी कहकर दुत्कार रही हैं न, उसका दिल आपके उस संकीर्ण मन से लाखों गुना बड़ा और अमीर है। उसने उस वक्त मेरा हाथ थामा था, जब मुझे अपनों के सहारे की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी—विशेषकर आपकी और आपकी लाडली बेटी रोहिणी दीदी की। भूल गईं आप? या फिर आपकी याददाश्त को उस दिन का सच याद दिलाऊं? आपके और दीदी के उस अमानवीय और स्वार्थी फैसले ने मेरी पूरी ज़िंदगी को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था, जहाँ मैं मौत के मुंह में थी। आज अगर मैं इस घर में जिंदा खड़ी हूँ, अपने पैरों पर चल सकती हूँ और मेरी गोद में मेरा फूल सा बच्चा खेल रहा है, तो वह केवल यशोदा मौसी की बदौलत है। आपने तो मुझे उस दिन तिल-तिल कर मरने के लिए लावारिस छोड़ दिया था।”
नलिनी की यह बात सुनते ही कमला देवी के चेहरे का रंग उड़ गया। अतीत का वह भयावह मंजर किसी चलचित्र की भांति उनकी आँखों के सामने तैरने लगा।
चार साल पहले की ही तो बात थी। जयपुर के एक प्रतिष्ठित परिवार की पढ़ी-लिखी, संस्कारी और सुलझी हुई लड़की नलिनी को कमला देवी ने खुद अपने होनहार बैंक मैनेजर बेटे विनीत के लिए पसंद किया था। शादी के पहले दिन से ही कमला देवी ने घर का सारा तामझाम, रसोई का झंझट, चौका-बर्तन सब नलिनी के नाजुक कंधों पर डाल दिया था। खुद दिन भर सोफे पर पैर पसारकर टीवी देखतीं या फिर फोन पर घंटों बेटी रोहिणी को ससुराल में दबदबा बनाने के गुर सिखातीं। उधर से रोहिणी भी अपनी मां को सिखाती रहती कि बहू को कभी सिर पर मत चढ़ाना, उस पर हमेशा रोब जमा कर रखना, वरना वह पूरे घर पर राज करने लगेगी।
नलिनी ने कभी उफ तक नहीं की। वह सुबह पांच बजे उठती, विनीत का टिफिन बनाती, सास की चाय-नाश्ते का ख्याल रखती और रात को ग्यारह बजे तक खटती रहती। जब तक वह सामान्य थी, तब तक तो सब कुछ उनकी मर्जी के मुताबिक घिसटता रहा। लेकिन शादी के दो साल बाद जब नलिनी गर्भवती हुई, तब उसके लिए शारीरिक मुश्किलें बढ़ गईं। शुरुआत के महीनों में उसे भयंकर कमजोरी, चक्कर आना और उल्टियों की समस्या रहती थी। शरीर साथ नहीं देता था, लेकिन घर के कामों की फेहरिस्त में कोई कमी नहीं आई थी।
ऐसे मुश्किल दिनों में घर में साफ-सफाई और बर्तन के लिए आने वाली अधेड़ उम्र की यशोदा मौसी नलिनी के लिए किसी देवदूत की तरह बनकर उभरी। यशोदा गरीब थी, बस्तियों में रहती थी, लेकिन उसके सीने में एक मां का धड़कता हुआ दिल था। जब वह देखती कि नलिनी पीली पड़ चुकी है और रसोई में पसीने से लथपथ होकर आटा गूंथ रही है, तो वह चुपके से उसके हाथ से परात ले लेती। झाड़ू-पोछा खत्म करके भी वह घंटा-दो घंटा रुक जाती और नलिनी के हिस्से की रोटियां सेंक देती, कभी चुपके से उसके लिए अजवाइन का पानी उबाल देती, तो कभी उसके सिर में तेल की मालिश कर देती। यशोदा नलिनी को कहती, “बिटिया, तुम मेरी बेटी जैसी हो। इस हाल में इतना बोझ मत उठाया करो।”
गर्भावस्था के सातवें महीने में एक दोपहर नियति ने एक भयानक मोड़ लिया। विनीत ऑफिस के किसी आवश्यक काम से अजमेर गया हुआ था। घर में केवल कमला देवी और नलिनी थीं। नलिनी कपड़े सुखाने के लिए आंगन की तरफ जा रही थी कि अचानक फर्श पर गिरे पानी की वजह से उसका पैर बुरी तरह फिसल गया। वह चीख पड़ी और पेट के बल गिरने ही वाली थी कि ठीक उसी वक्त बर्तन मांजने आई यशोदा ने अपनी जान की बाजी लगाकर नलिनी को पीछे से कसकर थाम लिया। यशोदा के पकड़ लेने से नलिनी का पेट तो ज़मीन से टकराने से बच गया, जिससे उसके गर्भस्थ शिशु पर सीधी चोट नहीं आई, लेकिन संतुलन बिगड़ने के कारण नलिनी का दायां पैर मुड़ गया और ‘कड़क’ की आवाज़ के साथ उसकी हड्डी टूट गई।
नलिनी दर्द से कराहती हुई बेहोश होने लगी। यशोदा ने जोर-जोर से कमला देवी को आवाज़ दी। कमला देवी कमरे से बाहर निकलीं, लेकिन बहू को दर्द से तड़पते देख मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने के बजाय चिल्लाने लगीं, “अरे सत्यानाश! देखकर नहीं चला जाता क्या? अब यह नया बखेड़ा खड़ा कर दिया।”
यशोदा ने हाथ जोड़कर कहा, “माजी, डांटने का समय नहीं है, बिटिया का पैर टूट गया है और दर्द बहुत ज्यादा है। जल्दी से गाड़ी बुलाइए, अस्पताल ले जाना पड़ेगा।”
यशोदा ने किसी तरह पड़ोस के एक ऑटो वाले को बुलाया और नलिनी को अपनी गोद में सहारा देकर अस्पताल पहुंचाया। कमला देवी बेमन से साथ गईं। अस्पताल में डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि पैर की हड्डी में मल्टीपल फ्रैक्चर है। प्लास्टर चढ़ाया गया और डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी, “मरीज को पूरी तरह बेड रेस्ट की ज़रूरत है। कम से कम छह हफ्ते तक यह बिस्तर से नीचे पैर नहीं रखेंगी। अगर ज़रा सा भी दबाव पड़ा, तो पैर हमेशा के लिए खराब हो सकता है और गर्भस्थ शिशु की जान को भी भारी खतरा हो सकता है।”
यह सुनते ही कमला देवी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई, लेकिन किसी चिंता या ममता के कारण नहीं, बल्कि अपने आराम में खलल पड़ने के डर से। घर लौटते ही उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। उन्होंने साफ कह दिया, “मुझसे बुढ़ापे में इस बीमार बहू की तीमारदारी नहीं होगी। मैं न तो बिस्तर पर खाना दूंगी और न ही इसके कपड़े धोऊंगी।”
शाम को जब विनीत बदहवास सा अस्पताल और फिर घर पहुंचा, तो अपनी पत्नी की यह हालत देखकर उसकी आँखों में आंसू आ गए। उसने अपनी मां से हाथ जोड़कर विनती की, “मां, नलिनी की हालत आप देख रही हैं। वह अपने दम पर करवट भी नहीं ले सकती। मैं बैंक की नौकरी छोड़ नहीं सकता। आप कुछ दिन इसकी देखभाल कर लीजिए।”
लेकिन कमला देवी ने मुंह फेर लिया, “मुझसे नहीं होता यह सब। तू अपनी दीदी रोहिणी को फोन कर। वह कुछ दिन आकर रह लेगी तो काम संभल जाएगा।”
विनीत ने बड़ी उम्मीद से अपनी बहन रोहिणी को फोन लगाया और रोते हुए कहा, “दीदी, आपकी भाभी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है। डॉक्टर ने हिलने तक से मना किया है। बस तीन हफ्तों की बात है, आप आकर घर और भाभी को संभाल लीजिए।”
वही रोहिणी, जो ज़रा सा सिरदर्द होने पर या पति से मनमुटाव होने पर महीनों मायके आकर ऐश फरमाती थी, उस दिन उसका असली स्वार्थी चेहरा सामने आ गया। फोन पर उसने रूखे स्वर में कहा, “अरे विनीत, तू भी कैसी बातें करता है! मेरे ससुराल में कितनी जिम्मेदारियां हैं, तुझे पता है? बच्चों के इम्तिहान सिर पर हैं, सास की सेवा करनी होती है। मैं अपनी गृहस्थी छोड़कर वहां तुम्हारी तीमारदारी करने कैसे आ सकती हूँ? कोई नर्स रख लो या अपनी सास यानी नलिनी की मां को बुला लो।” और इतना कहकर उसने फोन काट दिया। विनीत सन्न रह गया। नलिनी के माता-पिता का बहुत पहले देहांत हो चुका था, उसका एक छोटा भाई था जो विदेश में पढ़ाई कर रहा था। उसके पास मायके के नाम पर कोई सहारा नहीं था।
उस रात घर में अजीब सी वीभत्स खामोशी थी। नलिनी दर्द से कराह रही थी, उसे प्यास लगी थी, लेकिन पास में पानी देने वाला कोई नहीं था। कमला देवी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करके खर्राटे ले रही थीं। विनीत दवाइयां लेने शहर गया हुआ था।
ठीक उसी समय, रात के नौ बजे, यशोदा अपने फटे हुए आंचल को समेटे वापस आई। उसने देखा कि नलिनी दर्द और बेबसी के आंसुओं में भीगी हुई है। यशोदा ने बिना एक पल गंवाए आगे बढ़कर नलिनी के माथे को चूमा और पानी पिलाया।
उस रात यशोदा ने जो फैसला लिया, उसने इंसानियत का एक ऐसा इतिहास लिख दिया जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। यशोदा ने विनीत और कमला देवी के सामने हाथ जोड़कर कहा, “बाबूजी, बिटिया की हालत मुझसे देखी नहीं जाती। इसके मायके में कोई नहीं है न, तो आज से मैं इसकी मां हूँ। जब तक मेरी बिटिया अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती और इसका बच्चा सुरक्षित इस दुनिया में नहीं आ जाता, मैं यहीं इसी कमरे के कोने में जमीन पर सोऊंगी। मैं इसका हर काम करूंगी—दवा देने से लेकर इसके कपड़े धोने और बिस्तर की सफाई तक।”
कमला देवी ने उस वक्त भी ताना मारा था, “हां-हां, बड़ा सेवा का नाटक कर रही है। पगार चौगुनी मांगने के चक्कर में होगी।”
लेकिन यशोदा ने उन तानों पर ध्यान नहीं दिया। अगले दो महीने यशोदा ने नलिनी की वह सेवा की, जो शायद कोई सगी मां भी अपनी जान जोखिम में डालकर करती। वह रात-रात भर जागकर नलिनी के पैरों को सहलाती, डॉक्टर द्वारा बताई गई कसरत करवाती, उसे दलिया और सूप बनाकर अपने हाथों से खिलाती। जब नलिनी को असहनीय प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तब भी एंबुलेंस में यशोदा ही उसका हाथ थामे बैठी थी।
अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर के बाहर जब विनीत अकेला घबराया हुआ टहल रहा था और कमला देवी घर पर आराम कर रही थीं, तब यशोदा फर्श पर बैठकर नंगे पांव भगवान से मन्नतें मांग रही थी। जब डॉक्टर ने बाहर आकर कहा, “बधाई हो, बेटा हुआ है और जच्चा-बच्चा दोनों बिल्कुल सुरक्षित हैं,” तो सबसे पहले फूट-फूट कर रोने वाली यशोदा ही थी।
जब नलिनी स्वस्थ होकर अपने पैरों पर चलने लगी, तब जाकर यशोदा अपने घर लौटी। उस दिन नलिनी ने विनीत के सामने रोते हुए कहा था, “विनीत, अगर आज मेरे जिस्म में जान है और मेरी गोद में तुम्हारा अंश मुस्कुरा रहा है, तो यह केवल यशोदा मौसी का कर्ज़ है। दुनिया की कोई दौलत इस कर्ज़ को नहीं चुका सकती।”
वर्तमान में लौटते हुए, नलिनी ने अपनी सास कमला देवी की आँखों में आँखें डालकर कहा, “अब बताइए मम्मी जी! जिस यशोदा मौसी ने अपनी रातों की नींद, अपनी देह का सुख और अपना मान-सम्मान दांव पर लगाकर मेरी और आपके पोते की जान बचाई, क्या उसे दीवाली पर कुछ खुशियाँ, कुछ उपहार और पैसे देना गुनाह है? पिछले हफ्ते उनके बेटे का एक्सीडेंट हुआ था, अस्पताल में भर्ती था। अगर मैंने पंद्रह हजार रुपये देकर उनकी मदद कर दी, तो क्या मैंने कोई पाप किया? जिस औरत ने मेरे लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी, उसके सामने यह पंद्रह-बीस हजार रुपये की क्या बिसात है? और आपकी बेटी रोहिणी, जो हर रक्षाबंधन और भाईदूज पर हजारों के गहने और कपड़े समेट कर ले जाती है, उसने उस दिन एक गिलास पानी देने से भी इनकार कर दिया था। आप मुझे पराया कहती हैं, लेकिन सच तो यह है कि उस दिन आपकी और दीदी की ममता मर चुकी थी।”
कमला देवी के पास नलिनी के एक भी सवाल का कोई जवाब नहीं था। वे खामोश, सिर झुकाए खड़ी थीं। उनकी अंतरात्मा उन्हें कचोट रही थी।
तभी मुख्य द्वार से विनीत ने घर में प्रवेश किया। वह पिछले दस मिनट से दरवाजे पर खड़ा सब कुछ सुन रहा था। उसकी आँखों में आंसू थे। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और अपनी मां के सामने जाकर खड़ा हो गया।
“मां,” विनीत की आवाज़ बहुत भारी थी। “नलिनी आज जो कुछ भी कह रही है, उसका एक-एक शब्द सौ टके खरा सच है। उस दिन जब नलिनी तड़प रही थी, मैंने दीदी के आगे गिड़गिड़ाया था, आपके सामने हाथ जोड़े थे। लेकिन आप दोनों के सीने में ममता का एक कतरा भी नहीं था। उस दिन अगर यशोदा मौसी ने मां बनकर इस घर को न संभाला होता, तो आज न मेरा बेटा इस दुनिया में होता और न ही नलिनी। मां, खून का रिश्ता सिर्फ जन्म लेने से नहीं बनता, रिश्ते तो वो होते हैं जो वक्त की कसौटी पर निस्वार्थ भाव से साथ निभाएं।”
विनीत ने आगे बढ़कर नलिनी के हाथ से वह थाली ली जिसमें नए कपड़े और मिठाइयां रखी थीं। उसने अपनी जेब से एक चेक निकाला और उस थाली में रख दिया।
“नलिनी,” विनीत ने अपनी पत्नी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “यशोदा मौसी सिर्फ तुम्हारी मां नहीं, इस परिवार की रक्षक हैं। आज से उनका मान-सम्मान इस घर में किसी सदस्य से कम नहीं होगा।”
कमला देवी ने जब अपने बेटे की आँखों में अपने लिए तिरस्कार और गहरी पीड़ा देखी, तो उनका घमंड चकनाचूर हो गया। उन्हें अपनी संकीर्ण सोच और स्वार्थ पर इतनी आत्मग्लानि हुई कि वे वहीं सोफे पर बैठकर फफक-फफक कर रो पड़ीं।
“मुझे माफ कर दे बहू…” कमला देवी ने पहली बार नलिनी के आगे हाथ जोड़ दिए। उनकी आवाज़ थरथरा रही थी। “मेरी आँखों पर स्वार्थ की ऐसी पट्टी बंधी थी कि मुझे अपनी ही बेटी का खोखलापन और इस पराई औरत की महानता दिखाई नहीं दी। मैंने तुझे बहू नहीं, हमेशा एक पराई लड़की समझा। लेकिन आज तूने मेरी आँखें खोल दीं। यशोदा ने जो किया, वह तो शायद मैं भी अपनी सगी बेटी के लिए न कर पाती। मैं बहुत पापिनी हूँ।”
नलिनी का दिल तो पहले से ही मोम जैसा था। सास को रोते और पश्चाताप करते देख वह खुद को रोक न सकी। उसने तुरंत आगे बढ़कर कमला देवी के हाथ पकड़ लिए और उन्हें गले से लगा लिया।
“मम्मी जी, ऐसा मत कहिए। आप मेरी सास हैं, मां समान हैं। मैं आपसे नफरत नहीं करती, बस चाहती थी कि आप सच को पहचानें। जो इंसानियत यशोदा मौसी ने दिखाई, वही ममता मैं आपसे पाना चाहती थी।”
उस दोपहर घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था। दिलों में जमी कड़वाहट और अविश्वास की मैल धुल चुकी थी। ठीक उसी समय दरवाजे की घंटी बजी। यशोदा मौसी अपना पुराना थैला लिए संकोच के साथ चौखट पर खड़ी थीं।
कमला देवी खुद उठकर दरवाजे तक गईं। उन्होंने यशोदा का हाथ पकड़ा और पूरे आदर के साथ उसे घर के भीतर ड्राइंग रूम में सोफे पर बिठाया। यशोदा घबरा गई, “अरे माजी, यह क्या कर रही हैं? मैं तो कामवाली हूँ, नीचे बैठ जाऊंगी।”
“नहीं यशोदा,” कमला देवी ने रुंधे गले से कहा और अपने पल्लू से यशोदा के हाथ पोंछे। “तू कामवाली नहीं, इस घर की तारणहार है। मेरी बहू और पोते की असली मां तू है। आज तक मैंने तुझे जो भी कड़वे बोल बोले, उसके लिए मुझे अपने बड़े दिल से माफ कर दे।”
कमला देवी ने खुद अपने हाथों से नए कपड़े, मिठाइयों का डिब्बा और शगुन का लिफाफा यशोदा की झोली में डाला। यशोदा की आँखों से कृतज्ञता और आनंद के आंसू बह निकले। उस घर में उस दिन सचमुच दीवाली का आगमन हुआ था—अंधेरे पर उजाले की जीत, स्वार्थ पर निस्वार्थ प्रेम की विजय और खून के रिश्तों से ऊपर उठकर इंसानियत के नए रिश्ते की स्थापना।
पाठकों से एक विचारणीय प्रश्न:
आज के आधुनिक समाज में अक्सर देखा जाता है कि अपने कहे जाने वाले खून के रिश्ते मतलब और स्वार्थ पर टिके होते हैं, जबकि कभी-कभी कोई अनजान इंसान हमारे जीवन में फरिश्ता बनकर आ जाता है। क्या किसी इंसान का मूल्य उसके रुतबे और जाति से तय होना चाहिए या उसके दिल की अच्छाई और कर्मों से? क्या कमला देवी की तरह अपनी संकीर्ण मानसिकता को त्याग कर पश्चाताप करना हर इंसान के बस की बात है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमसे जरूर साझा करें।
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