“अब अफ़सोस करके कोई फायदा नहीं है, मिस्टर अर्थ! अगर वक्त रहते आपने उनका ख्याल रखा होता, तो आज वह जिंदगी और मौत के बीच नहीं झूल रही होतीं।”
डॉक्टर की बात सुनकर अर्थ का चेहरा उतर गया।
“डॉक्टर… मुझे लगा था कि बस एसिडिटी …”
“सिर्फ एसिडिटी या बदहजमी नहीं है यह!” डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा, “पेट का अल्सर फट चुका है और इन्फेक्शन पूरे पेट में फैल गया है। मैंने दो महीने पहले ही आपकी वाइफ को साफ बता दिया था कि यह दवाइयों से ठीक नहीं होगा, सर्जरी करानी होगी। तब आप दोनों किस चमत्कार का इंतजार कर रहे थे? आज जब वह दर्द से तड़पकर बेहोश हो गईं, तब आपको होश आया?”
अर्थ के पास डॉक्टर के सवालों का कोई जवाब नहीं था।
“उनकी हालत बहुत नाजुक है। हम तुरंत सर्जरी कर रहे हैं। अब आगे सब कुछ ऊपर वाले के हाथ में है।”
कहकर डॉक्टर तेजी से ऑपरेशन थिएटर की ओर चली गईं।
डॉक्टर के जाते ही अर्थ वहीं पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। उसने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया।
“काश…!”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“काश, मैंने छवि की बातों को सीरियसली लिया होता… उसकी तकलीफ को इतने हल्के में न लिया होता… तो आज…”
उसकी आवाज गले में ही अटक गई।
तभी उसकी आँखों के सामने दो महीने पहले का वह दिन घूम गया।
सुबह ब्रेकफास्ट टेबल पर छवि गुमसुम सी बैठी थी। उसके चेहरे पर परेशानी साफ दिखाई दे रही थी।
अर्थ ने अखबार से नजर उठाकर पूछा, “क्या हुआ? ऐसी मरियल सी शक्ल बनाकर क्यों बैठी हो?”
छवि ने धीरे से अपना पेट पकड़ते हुए कहा, “पिछले कुछ दिनों से पेट में बहुत तेज जलन और खिंचाव-सा हो रहा है। सुनिए ना… आज शाम थोड़ा जल्दी आ जाइएगा। मुझे डॉक्टर के पास ले चलिएगा।”
कहते-कहते उसकी आँखें भर आई थीं।
अर्थ ने उसकी तरफ देखा और भड़क उठा “यह क्या बात-बात में टसुए बहाने लग जाती हो? इसके अलावा और कुछ आता है? डॉक्टर के पास जाना है तो चली जाओ। क्या मैं हाथ पकड़कर ले जाऊँ? छोटी बच्ची हो क्या?”
छवि चुप रही।
अर्थ फिर बोला, “बाकी औरतों को देखो। घर-बाहर सब कितना अच्छे से संभालती हैं। और तुम हो कि जब देखो तब गैस, एसिडिटी और पेट दर्द!”
छवि ने कुछ नहीं कहा।
शायद इतने सालों में वह समझ चुकी थी कि इस इंसान से बहस करने का कोई फायदा नहीं है।
वह उस दिन खुद ही डॉक्टर के पास चली गई।
दो दिन बाद जब अर्थ ऑफिस से लौटा, तो छवि ने उसके सामने डॉक्टर की रिपोर्ट और प्रिस्क्रिप्शन रख दिया।
“सुनिए… मैं परसों डॉक्टर के पास गई थी। उन्होंने बताया है कि पेट में अल्सर हो गया है। अभी के लिए दवाइयाँ दी हैं, ताकि दर्द और जलन कम हो जाए। लेकिन उन्होंने कहा है कि जल्दी से जल्दी ऑपरेशन कराना होगा, नहीं तो आगे चलकर परेशानी बढ़ सकती है।”
छवि के चेहरे पर डर साफ था।
उसे उम्मीद थी कि अर्थ कम-से-कम इस बार उसकी बात को गंभीरता से लेगा।
लेकिन अर्थ ने रिपोर्ट उठाकर देखने तक की जरूरत नहीं समझी।
“बस! डॉक्टर ने कुछ कह दिया और तुम डर गईं?”
“लेकिन उन्होंने कहा है कि—”
“आजकल डॉक्टरों का काम ही यही है। कोई सीधा-साधा मरीज मिला नहीं कि ऑपरेशन के नाम पर चले लूटने। उन्हें मरीज की चिंता थोड़े ही है, अपनी पॉकेट भरने की चिंता होती है।”
छवि चुपचाप उसे देखती रही।
अर्थ ने आगे कहा, “कोई सर्जरी-वर्जरी नहीं होगी। अपना खान-पान सुधारो, सब ठीक हो जाएगा। जब देखो तब चाय, खाने के साथ अचार, मिर्च-मसाला… और फिर पेट खराब होने पर डॉक्टर के पास भागो।”
“लेकिन डॉक्टर ने कहा है कि—”
“डॉक्टर ने कहा है, डॉक्टर ने कहा है…” अर्थ ने उसकी बात बीच में ही काट दी। “हर बात में डॉक्टर की सुनना जरूरी नहीं होता। थोड़ा अपनी लाइफस्टाइल सुधारो। हरी सब्जियाँ खाओ, समय पर खाना खाओ, वॉक करो… सब ठीक हो जाएगा।”
इतना कहकर वह वहाँ से चला गया।
छवि ने मेज पर पड़ी रिपोर्ट को उठाया और धीरे से अपने हाथों में समेट लिया।
उसने कुछ नहीं कहा।
अगले दिन वह डॉक्टर की बताई दवाइयाँ ले आई और समय पर लेने लगी।
कुछ दिनों तक दवाइयाँ लेने के बाद उसका दर्द और जलन काफी कम हो गई। वह पहले से बेहतर महसूस करने लगी।
और बस अर्थ को मौका मिल गया खुद को सही साबित करने का।
एक शाम डिनर टेबल पर उसने छवि से कहा भी,
“देखा मैडम! मिर्च-मसाले और चाय से दूर रही तो दर्द भी दूर हो गया ना? उस दिन तो तुम ऑपरेशन कराने पर ही तुली हुई थीं। फालतू में लाखों रुपये का चूना लग जाता।”
छवि ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।
अर्थ मुस्कुराते हुए बोला, “कभी हमारी भी सुन लिया करो। हर बात में डॉक्टर के पास भागने की जरूरत नहीं होती। लाइफस्टाइल सुधारो, सब ठीक रहेगा।”
फिर वह छवि का मजाक उड़ाते हुए बोला , “वरना ऐसे ही डिफेक्टिव पीस बनी रहोगी।”
छवि के चेहरे पर एक पल के लिए दर्द उभरा, लेकिन इतनी कड़वी बातें सुनकर भी वह हमेशा की तरह खामोश रह गई। एक लफ्ज़ भी नहीं बोला। शायद अब उसे उससे कोई उम्मीद ही नहीं थी तो अपने शब्द भी उस पर क्यों जाया करती!
इसी तरह कुछ दिन और बीते। दवाइयां से दर्द दबता रहा।
लेकिन, आज सुबह…
अर्थ डाइनिंग टेबल पर बैठा अखबार पढ़ रहा था। छवि किचन में नाश्ता बना रही थी।
अचानक किचन से बर्तनों के गिरने की जोरदार आवाज आई।
आवाज सुनते ही अर्थ झुंझलाकर उठा।
“छवि! क्या गिरा दिया? तुमसे कोई काम ढंग से—”
लेकिन किचन में पहुँचते ही उसके शब्द उसके होंठों पर ही जम गए।
फर्श पर छवि बेहोश पड़ी थी।
उसका चेहरा पसीने से तर था और दोनों हाथ पेट पर जकड़े हुए थे।
“छवि!”
अर्थ घबरा गया।
उसने उसे अपनी बाहों में उठाया और बिना एक पल गंवाए अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा।
और अब…
जब वह ऑपरेशन थिएटर में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही थी, तब उसे उसके दर्द, उसकी तकलीफ का एहसास हो रहा था।
अर्थ को खुद के कहे शब्दों पर बहुत ही शर्म आ रही थी—’वरना ऐसे ही डिफेक्टिव पीस बनी रहोगी।’
“काश…”
“मैंने अपनी पत्नी की तकलीफ को समझा होता।”
वह खुद को कोसे जा रहा था।
“काश…”
तभी ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला।
अर्थ तुरंत उठकर डॉक्टर की ओर दौड़ा।
“डॉक्टर… छवि?”
उसका गला डर और घबराहट से रुंधा हुआ था।
डॉक्टर ने मास्क हटाते हुए कहा, “ऑपरेशन सफल रहा। इन्फेक्शन काफी फैल चुका था, इसलिए स्थिति गंभीर थी। लेकिन फिलहाल वह खतरे से बाहर हैं।”
यह सुनते ही वह बच्चों की तरह फफक-फफक कर रो पड़ा। पिछले तीन घंटों की ग्लानि, डर, घुटन सब आँसुओं के रास्ते बह रहा था।
डॉक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “मिस्टर अर्थ, रोइए मत। छवि ठीक है। लेकिन याद रखिएगा, हर बार जिंदगी दूसरा मौका नहीं देती। जब छवि को होश आएगा तो उसे दवाईयों के साथ-साथ आपके प्यार और देखभाल की भी जरूरत होगी।”
अर्थ ने चुपचाप सिर झुका लिया।
“क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?”
“अभी नहीं। आज वह आईसीयू में रहेंगी। कल अगर उनकी हालत स्थिर रही तो उन्हें केबिन में शिफ्ट कर देंगे। तब आप मिल सकते हैं।”
अगले दिन छवि को केबिन में शिफ्ट किया गया।
अर्थ धीरे-धीरे उसके पास गया।
छवि की आँखें बंद थीं। चेहरे पर कमजोरी साफ दिखाई दे रही थी।
अर्थ ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।
“छवि…”
उसकी आवाज भर्रा गई।
छवि ने धीरे से आँखें खोलीं।
अर्थ कुछ क्षण उसे देखता रहा, फिर उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
“मुझे माफ कर दो। तुम इतने दिनों से दर्द में थी और मैं… मैं तुम्हारी बात को समझ ही नहीं पाया।”
छवि उसे देखती रही।
अर्थ ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“मुझे लगा था कि सब तुम्हारे खान-पान की वजह से है। लेकिन… मैं गलत था।”
छवि ने धीरे से उसकी उँगलियाँ दबाईं।
“अब छोड़िए भी… जो हो गया, उसे बदल तो नहीं सकते।”
“लेकिन आगे मैं तुम्हारी कोई बात ऐसे नहीं टालूँगा।”
छवि के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।
कुछ पल बाद उसने धीरे से कहा,
“सुनिए ना… मेरा अभी चाय पीने का बहुत मन कर रहा है।”
अर्थ तुरंत उठने लगा।
“ठीक है, मैं अभी लेकर आता हूँ।”
छवि खिलखिलाकर हँस पड़ी।
“आप तो ले आएँगे, लेकिन अभी मुझे चाय पीनी अलाउड नहीं है।”
अर्थ भी पहली बार हल्का-सा मुस्कुराया।
“ठीक है जब डॉक्टर तुम्हें चाय पीने की परमिशन देगी। तब मैं खुद तुम्हारे लिए चाय बनाऊँगा।”
छवि ने उसे देखा।
“तुम सच में बदल चुके हो।”
फिर उसके हाथों को चूमती हुई बोली,
“हमेशा ऐसे ही रहोगे ना?”
यह सुनते ही अर्थ ने मुस्कुराकर हाँ में सिर हिलाते हुए छवि का सिर चूम लिया।
धन्यवाद।
साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता- #अफ़सोस
शीर्षक – काश!
लेखिका- श्वेता अग्रवाल, धनबाद झारखंड