रिश्तों की नई परिभाषा: जब कमियों को मिला प्यार

 “मुझे तुम्हारी ईमानदारी बहुत पसंद आई मीरा,” सुमित्रा जी की आवाज में एक अजीब सी नरमी थी। उन्होंने अपनी जगह से उठकर मीरा के पास आकर उसके सिर पर हाथ रखा और कहा,

“तुम्हें पता है? जब मेरी शादी श्रीकांत जी से हुई थी, तब मैं अपने कॉलेज की एथलेटिक्स चैंपियन थी। दिन भर ग्राउंड में दौड़ती रहती थी। मुझे भी गैस जलाना तक नहीं आता था। शादी के बाद पहली बार जब रसोई में गई, तो दाल की जगह पूरा कुकर ही जला दिया था।”

दर्पण के सामने बैठी मीरा अपनी बिंदी ठीक कर रही थी, लेकिन उसकी आँखों में सजने-संवरने की कोई खुशी नहीं थी। बल्कि, उन आँखों में एक गहरी थकान और हल्की सी झुंझलाहट तैर रही थी। यह सातवीं बार था जब उसे एक ‘प्रदर्शनी की वस्तु’ की तरह सजा-धजा कर बैठक में बैठाया जाने वाला था।

बाहर दालान में कदमों की आहट और बर्तनों की खनक बता रही थी कि मेहमान बस आने ही वाले हैं। मीरा के पिता, श्री दीनानाथ जी, दरवाजे के पास खड़े होकर बार-बार अपनी घड़ी देख रहे थे। उनकी घबराहट पूरे घर में महसूस की जा सकती थी।

मीरा एक बहुत ही होनहार और मेहनती लड़की थी। उसने अपनी पूरी जवानी किताबों, प्रतियोगी परीक्षाओं और फिर एक सरकारी बैंक में मैनेजर के पद तक पहुँचने के संघर्ष में लगा दी थी। उसकी दिनचर्या सुबह जल्दी उठकर बैंक भागने और देर शाम थकी-हारी घर लौटने तक सीमित थी। अपनी इस सफलता से उसने अपने माता-पिता का सिर गर्व से हमेशा ऊँचा किया था।

लेकिन, जब बात शादी की आई, तो समाज के बनाए गए एक खास सांचे में वह फिट नहीं बैठ पा रही थी। उसकी सबसे बड़ी ‘कमी’ यह थी कि उसे घर का काम, विशेषकर पारंपरिक तरीके से रसोई संभालना और स्वादिष्ट पकवान बनाना नहीं आता था।

इससे पहले जो छह परिवार उसे देखने आए थे, वे उसकी नौकरी, उसके वेतन और उसकी सुंदरता से तो बहुत प्रभावित हुए, लेकिन जैसे ही यह बात सामने आती कि मीरा को खाना बनाना नहीं आता, उनका रवैया पूरी तरह बदल जाता। “अरे, तो क्या हमारा बेटा ऑफिस से आकर खुद रोटियां बेलेगा?” या “बहू चाहे कितना भी कमा ले, घर तो उसे ही संभालना पड़ता है” जैसे ताने देकर बात वहीं खत्म कर दी जाती।

इन लगातार होते तिरस्कारों ने मीरा के स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुंचाई थी। आज भी जब उसकी माँ, सरला जी, उसके बालों में गजरा लगा रही थीं, तो मीरा ने तल्ख स्वर में कहा, “माँ, क्या फायदा इन सब का? आपको पता है ना कि अंत में बात वहीं आकर अटक जाएगी। मैं कोई मशीन नहीं हूँ जो बैंक भी चला लूँ और घर आकर छप्पन भोग भी बना दूँ। मैं आज उन्हें खुद ही मना कर दूंगी। मुझे अब और किसी के सामने खुद को साबित नहीं करना।” सरला जी ने एक ठंडी आह भरी और बेटी के कंधे थपथपाते हुए बोलीं, “चुप कर पगली, समाज का जो दस्तूर है वो तो निभाना ही पड़ेगा। तू बस जाकर बैठ जाना, बाकी तेरे पापा संभाल लेंगे।”

तभी बाहर एक गाड़ी रुकने की आवाज आई। दीनानाथ जी ने जल्दी से अंदर आकर बताया, “लड़के वाले आ गए हैं, तुम लोग तैयारी रखो।”

मीरा अनमने ढंग से उठी। उसने तय कर लिया था कि आज वह किसी भी सवाल का घुमा-फिरा कर जवाब नहीं देगी। जो सच है, वही बोलेगी। अगर उन्हें जाना होगा, तो पहली फुर्सत में चले जाएंगे, कम से कम उम्मीद तो नहीं बंधेगी। थोड़ी देर बाद सरला जी ने उसे चाय और नाश्ते की ट्रे थमाई और बैठक की ओर इशारा किया।

बैठक में तीन लोग बैठे थे। लड़के का नाम समीर था। वह एक साधारण लेकिन आत्मविश्वास से भरा हुआ युवक लग रहा था। उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी। उसके बगल में उसके माता-पिता बैठे थे। मीरा ने धीरे से सबको नमस्ते किया, चाय की ट्रे मेज पर रखी और एक किनारे रखी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। उसकी नजरें जमीन पर थीं, लेकिन उसके कान आने वाले तीखे सवालों के लिए पूरी तरह तैयार थे।

दीनानाथ जी ने झिझकते हुए बात शुरू की, “जी… अगर आप लोग चाहें तो बच्चों को आपस में बात करने का मौका दे सकते हैं। या अगर आपको मीरा से कुछ पूछना हो तो…”

लड़के के पिता, श्रीकांत जी, मुस्कुराए और बोले, “दीनानाथ जी, बच्चों की बात तो होती रहेगी। पहले हम ही एक-दूसरे को जान लें। वैसे मैं आपको अपने बेटे समीर के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ।” उन्होंने समीर की ओर देखा और फिर कहा, “हमारा समीर कोई बहुत बड़ी सरकारी नौकरी नहीं करता। इसने इंजीनियरिंग करने के बाद अपना खुद का एक छोटा सा स्टार्टअप शुरू किया है, ऑर्गेनिक फार्मिंग का। शुरू में बहुत संघर्ष था, लेकिन अब काम अच्छा चल निकला है। यह अपनी मेहनत से इतना कमा लेता है कि किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है। और सबसे बड़ी बात, यह एक ईमानदार और सुलझा हुआ इंसान है।”

दीनानाथ जी ने राहत की सांस ली और गर्व से अपनी बेटी की ओर देखते हुए कहा, “हमारी मीरा भी किसी से कम नहीं है। सरकारी बैंक में ब्रांच मैनेजर है। बहुत छोटी उम्र में इसने ये मुकाम हासिल किया है। पूरे घर की जिम्मेदारी समझती है।”

तभी समीर की माँ, सुमित्रा जी, जो अब तक खामोश थीं, उन्होंने अपनी नजरें मीरा पर टिकाईं। उनके चेहरे पर एक गंभीर भाव था। उन्होंने शांत स्वर में पूछा, “मीरा बेटी, बैंक की नौकरी में तो बहुत तनाव होता है। सुबह से शाम तक काम का बोझ रहता है। ऐसे में तुम घर और रसोई की जिम्मेदारी कैसे संभालोगी? मेरा मतलब है… क्या तुम्हें खाना बनाना और घर के काम-काज करने आते हैं?”

वही सवाल। जिसका मीरा को इंतजार था। कमरे में अचानक एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। दीनानाथ जी के माथे पर पसीना आ गया और सरला जी ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया। वे दोनों कुछ बोलने ही वाले थे कि मीरा ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में अब कोई डर या झिझक नहीं थी।

“आंटी जी,” मीरा ने स्पष्ट और स्थिर आवाज में कहना शुरू किया, “अगर मैं आपसे सच कहूँ, तो मुझे खाना बनाना बिल्कुल नहीं आता। मेरे माता-पिता ने बचपन से ही मुझे सिर्फ मेरी पढ़ाई और करियर पर ध्यान देने को कहा। जब मैं स्कूल में थी तो मुझे प्रतियोगी परीक्षाओं की चिंता थी, और जब नौकरी लग गई तो दिन-रात बैंक के काम में ही उलझी रही। मैंने कभी रसोई में कदम रखा ही नहीं। मैं चाय बना सकती हूँ, या जरूरत पड़ने पर कुछ हल्का-फुल्का नाश्ता, लेकिन मुझे पारंपरिक तरीके से पूरा खाना बनाना या घर के सारे काम अकेले संभालना नहीं आता। और शायद आगे भी मेरी नौकरी मुझे इतना वक्त ना दे कि मैं यह सब सीख पाऊँ।”

कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया। दीनानाथ जी ने हताशा से अपनी आँखें बंद कर लीं। उन्हें लगा कि यह रिश्ता भी हाथ से निकल गया। उन्होंने मीरा को बीच में रोकने की कोशिश की, “अरे सुमित्रा जी, बच्ची है, धीरे-धीरे सब सीख जाएगी। आप इसकी बातों पर…”

“भाई साहब, कृपया आप बीच में मत बोलिए,” सुमित्रा जी ने हाथ उठाकर दीनानाथ जी को रोका। फिर उन्होंने मीरा को बहुत ध्यान से देखा। उनके गंभीर चेहरे पर अचानक एक बहुत ही सौम्य और प्यार भरी मुस्कान फैल गई।

“मुझे तुम्हारी ईमानदारी बहुत पसंद आई मीरा,” सुमित्रा जी की आवाज में एक अजीब सी नरमी थी। उन्होंने अपनी जगह से उठकर मीरा के पास आकर उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “तुम्हें पता है? जब मेरी शादी श्रीकांत जी से हुई थी, तब मैं अपने कॉलेज की एथलेटिक्स चैंपियन थी। दिन भर ग्राउंड में दौड़ती रहती थी। मुझे भी गैस जलाना तक नहीं आता था। शादी के बाद पहली बार जब रसोई में गई, तो दाल की जगह पूरा कुकर ही जला दिया था।”

यह सुनकर समीर और उसके पिता धीरे से हंस पड़े। मीरा हैरानी से सुमित्रा जी को देख रही थी।

सुमित्रा जी ने अपनी बात जारी रखी, “उस वक्त मेरी सासू माँ ने मुझे ताना मारने के बजाय गले से लगा लिया था। उन्होंने कहा था कि ‘बेटे, घर सिर्फ रसोई से नहीं चलता, घर चलता है समझदारी, प्यार और एक-दूसरे के साथ से।’ उन्होंने मुझे धीरे-धीरे सब सिखाया। मीरा, तुमने जो मुकाम हासिल किया है, उसके लिए तुमने बहुत त्याग किया है। तुम्हारे माता-पिता को तुम पर गर्व होना चाहिए, न कि तुम्हारी इस छोटी सी कमी के लिए शर्मिंदा होना चाहिए।”

मीरा के गले में जैसे कुछ अटक सा गया था। उसने आज तक किसी भी महिला को, खासकर एक होने वाली सास को, इतनी प्रगतिशील और सुलझी हुई बातें करते नहीं सुना था।

सुमित्रा जी ने समीर की तरफ देखते हुए कहा, “और रही बात रसोई की, तो मेरा समीर बहुत अच्छा खाना बनाता है। जब यह अपने हॉस्टल में रहता था, तब इसने सब सीख लिया था। अगर मेरी बहू बैंक संभाल सकती है, तो मेरा बेटा रसोई क्यों नहीं संभाल सकता? शादी का मतलब ही है एक-दूसरे की कमियों को पूरा करना। अगर तुम्हें कभी फुर्सत मिले और तुम्हारा मन हो, तो मैं और समीर तुम्हें खाना बनाना सिखा देंगे। लेकिन अगर तुम नहीं भी सीख पाई, तो हम कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे। मुझे एक आज्ञाकारी नौकरानी नहीं, बल्कि अपने घर के लिए एक आत्मविश्वासी और पढ़ी-लिखी बेटी चाहिए।”

यह सुनकर मीरा की आँखों से आँसू छलक पड़े। ये दुःख के नहीं, बल्कि एक गहरे सम्मान और खुशी के आँसू थे। सालों से जो बोझ वह अपने सीने पर लेकर चल रही थी, वह जैसे एक पल में पिघल गया था। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई उसकी ‘कमी’ को इतनी खूबसूरती से अपना लेगा।

समीर ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “मीरा जी, मुझे एक लाइफ पार्टनर चाहिए, कोई शेफ नहीं। अगर आप तैयार हों, तो हम इस रिश्ते को एक नई शुरुआत दे सकते हैं।”

मीरा ने भरे हुए गले से सुमित्रा जी और श्रीकांत जी के पैर छुए। सुमित्रा जी ने उसे झट से उठाकर अपने सीने से लगा लिया। उस दिन उस बैठक में सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं जुड़ा था, बल्कि दो परिवारों ने एक-दूसरे के विचारों, सम्मान और कमियों को पूरी तरह से अपना लिया था। दीनानाथ जी और सरला जी की आँखों में भी खुशी के आँसू थे, क्योंकि उनकी बेटी को आखिरकार वह घर मिल गया था, जहाँ उसकी कीमत उसकी रोटियों की गोलाई से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और उसकी मेहनत से आंकी गई थी।

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 #रिश्तों की नई परिभाषा: जब कमियों को मिला प्यार

लेखिका : निधि गुप्ता

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