गुरूर की टूटती दीवारें और अपनों का प्यार

विक्रम ने कठोरता से कहा, “माफी मुझसे नहीं, पापाजी से मांगो नीलू । शायद वही तुम्हारे इस कठोर व्यवहार को माफ कर सकें, मैं तो नहीं कर सकता।”

नीलू  ने महेश  जी के पैर कसकर पकड़ लिए, “पापाजी, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैं वचन देती हूं कि आज के बाद आपको मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं मिलेगी।

आपको जो पसंद होगा, वही होगा इस घर में। मुझे कोई संपत्ति, कोई बंगला नहीं चाहिए। बेशक आप सब कुछ अपने पास रखिए, लेकिन मेरी इस गलती की सज़ा के लिए विक्रम को और मुझे खुद से दूर मत कीजिए। मैं सच में बदल जाऊंगी।”

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। सिर्फ नीलू  के रोने की आवाज़ आ रही थी।

तभी महेश  जी ने धीरे से झुककर नीलू  के सिर पर हाथ रखा और उसे उठाया। उनकी बूढ़ी आंखों में भी नमी थी।

शहर के  पॉश इलाके में खड़ा ‘आशीर्वाद’ बंगला सिर्फ ईंट और पत्थर का मकान नहीं था, बल्कि वह महेश  जी की जीवन भर की मेहनत का जीता-जागता सुबूत था। महेश  जी ने अपना पूरा जीवन अपने कपड़े के व्यापार और अपने इकलौते बेटे विक्रम को संवारने में लगा दिया था।

जब विक्रम की शादी एक बेहद अमीर और आधुनिक ख्यालों वाली लड़की, नीलू  से हुई, तो महेश  जी ने खुशी-खुशी अपने व्यापार और घर की सारी चाबियां अपने बेटे और बहू को सौंप दीं। उन्हें लगा कि अब उनके आराम के दिन आ गए हैं। लेकिन, वक्त के साथ इस घर की आबोहवा बदलने लगी थी।

नीलू  को अनुशासन और आधुनिक जीवनशैली का बहुत शौक था, लेकिन उसके इस शौक के पीछे एक गहरा अहंकार छिपा था। वह इस घर की मालकिन बन चुकी थी और उसे यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि कोई भी उसके बनाए नियमों के खिलाफ जाए। महेश  जी, जिन्हें सुबह-सुबह कड़क मसालेदार चाय और नाश्ते में गर्मागर्म कचौड़ियां पसंद थीं,

उन्हें अब डॉक्टर की हिदायत का हवाला देकर उबली हुई सब्जियां और फीका दलिया परोसा जाने लगा। नीलू  का तर्क होता था कि “पापाजी की उम्र हो गई है, उन्हें यही सब खाना चाहिए।”

लेकिन विक्रम जानता था कि यह फिक्र कम और अपनी सत्ता जताने का तरीका ज्यादा था। बात सिर्फ खाने की नहीं थी, महेश  जी के पुराने दोस्तों का घर आना बंद करवा दिया गया था, उनका पुराना ट्रांजिस्टर स्टोर रूम में फेंक दिया गया था, और उन्हें घर के एक कोने वाले कमरे में सीमित कर दिया गया था।

विक्रम सब कुछ देखता था, लेकिन वह हमेशा चुप रहता। नीलू  को लगता था कि विक्रम उसके प्यार में अंधा है और वह कभी अपनी पत्नी के खिलाफ नहीं जाएगा। इस घर में एक और सदस्य थी, अंजलि। अंजलि विक्रम की दूर के रिश्ते की बहन थी, जिसके माता-पिता के गुजर जाने के बाद महेश  जी ने ही उसे अपनी बेटी की तरह पाला और पढ़ाया था। अंजलि फिलहाल अपनी आगे की पढ़ाई कर रही थी और घर के हालात देखकर अक्सर उसका मन रोता था, लेकिन नीलू  के तीखे स्वभाव के कारण वह भी चुप रहने पर मजबूर थी।

एक रविवार की सुबह, घर में अजीब सी शांति थी। विक्रम ने नाश्ते की टेबल पर सभी को बुलाया। नीलू  हमेशा की तरह अपने गुरूर में बैठी थी। तभी विक्रम ने अपने ब्रीफकेस से कुछ कानूनी कागजात निकाले और उन्हें महेश  जी के सामने रखते हुए बहुत ही शांत स्वर में बोला, “पापाजी, मैंने हमारे कपड़े के सारे शोरूम्स, फैक्टरी और इस ‘आशीर्वाद’ बंगले को वापस आपके नाम ट्रांसफर कर दिया है। आज से आप इस पूरी संपत्ति और इस घर के इकलौते मालिक हैं।”

यह सुनकर नीलू  के हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। उसकी आंखें फटी रह गईं।

विक्रम ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “और अंजलि, मेरी प्यारी बहन, आज से तुम पापाजी के साथ इस मुख्य घर में रहोगी। तुम उनकी हर ज़रूरत का ध्यान रखोगी। पापाजी को जो पसंद है—चाहे वह मसालेदार चाय हो, कचौड़ियां हों या उनका पुराना संगीत—सब कुछ उन्हें मिलना चाहिए। तुम उनका पूरा ख्याल रखोगी ना?”

अंजलि की आंखों में आंसू आ गए। उसने तुरंत कहा, “हां विक्रम भैया। बचपन से पापाजी ने मुझे पिता का प्यार दिया है। आज ईश्वर ने मुझे उनकी सेवा करने का मौका दिया है, तो मैं कैसे पीछे रह सकती हूं। मैं पापाजी की हर खुशी का ध्यान रखूंगी।”

नीलू  का चेहरा लाल हो चुका था। उसका अहंकार तिलमिला उठा। उसने तमतमाते हुए कहा, “वाह! बहुत खूब! यह सब क्या नाटक चल रहा है विक्रम? और अगर यह सब पापाजी का है, तो हमारा क्या? हम कहां जाएंगे? और मैं इस घर में हूं तो इस अंजलि की क्या जरूरत है?”

विक्रम ने बहुत ही सर्द आवाज़ में जवाब दिया, “तुम गलतफहमी में मत रहो नीलू । आज से हम दोनों इस मुख्य बंगले में नहीं, बल्कि पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में रहेंगे। मैंने अपनी सारी सुख-सुविधाएं छोड़ने का फैसला किया है। और रही बात अंजलि की, तो वह अपनी शादी होने तक यहीं पापाजी के साथ रहेगी और इस घर की देखभाल करेगी।”

नीलू  ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा, “और जब इस अंजलि की शादी हो जाएगी, तब क्या? तब तो तुम्हें मेरी ही खुशामद करनी पड़ेगी ना? आखिर बुढ़ापे में देखभाल के लिए मेरी ही जरूरत पड़ेगी।”

विक्रम ने नीलू  की आंखों में सीधे देखते हुए कहा, “जानती हो नीलू , हमारी फैक्टरी में पांच सौ से ज्यादा मजदूर और कर्मचारी काम करते हैं। उन पांच सौ परिवारों में से कम से कम दो सौ घरों में ऐसी बेटियां हैं जो मेरी बहनों जैसी हैं। एक अंजलि की विदाई होगी, तो मैं दूसरी बहन को ले आऊंगा, उसके बाद तीसरी को। इस दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो बड़ों का सम्मान करना जानते हैं। तुम्हारे अंदर जो यह अहम है ना नीलू , कि तुम्हारे बिना कुछ नहीं हो सकता… यही अहम रावण में भी था। रावण को भगवान राम के तीरों ने नहीं, बल्कि उसके खुद के अहंकार ने मारा था। तुम्हारा गुरूर तुम्हें यह देखने ही नहीं दे रहा कि तुम उस इंसान का अपमान कर रही हो जिसने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं तुम्हें ये सुख दे सकूं। खैर, तुम अपना सामान बांध लो। हमें अब यह बंगला खाली करना है। पापाजी, मैं पीछे क्वार्टर में ही हूं, जब भी जरूरत हो, मुझे आवाज़ दे दीजिएगा।”

विक्रम के ये शब्द नीलू  के लिए किसी बिजली से कम नहीं थे। उसका सारा घमंड, उसका सारा रुतबा एक झटके में चकनाचूर हो गया था। उसे अचानक इस बात का अहसास हुआ कि उसने अपनी झूठी शान के लिए क्या कुछ दांव पर लगा दिया था। सर्वेंट क्वार्टर में रहने की बात ने उसके पैरों तले से ज़मीन खिसका दी थी। उसे समझ आ गया कि विक्रम चुप जरूर था, लेकिन अंधा नहीं था।

नीलू  के कांपते कदम आगे बढ़े और वह सीधे महेश  जी के पैरों में गिर पड़ी। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली।

“मुझे माफ कर दीजिए पापाजी… मुझे माफ कर दीजिए!” नीलू  सिसकते हुए बोली। “मैं अपने घमंड में अंधी हो गई थी। विक्रम, मुझे माफ कर दो…”

विक्रम ने कठोरता से कहा, “माफी मुझसे नहीं, पापाजी से मांगो नीलू । शायद वही तुम्हारे इस कठोर व्यवहार को माफ कर सकें, मैं तो नहीं कर सकता।”

नीलू  ने महेश  जी के पैर कसकर पकड़ लिए, “पापाजी, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैं वचन देती हूं कि आज के बाद आपको मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं मिलेगी। आपको जो पसंद होगा, वही होगा इस घर में। मुझे कोई संपत्ति, कोई बंगला नहीं चाहिए। बेशक आप सब कुछ अपने पास रखिए, लेकिन मेरी इस गलती की सज़ा के लिए विक्रम को और मुझे खुद से दूर मत कीजिए। मैं सच में बदल जाऊंगी।”

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। सिर्फ नीलू  के रोने की आवाज़ आ रही थी।

तभी महेश  जी ने धीरे से झुककर नीलू  के सिर पर हाथ रखा और उसे उठाया। उनकी बूढ़ी आंखों में भी नमी थी। उन्होंने अत्यंत वात्सल्य भरे स्वर में कहा, “उठो बहू… बेटा, क्या तुम्हें लगता है कि मुझे पता नहीं था कि तुम मुझे उबली हुई लौकी और फीका दलिया जानबूझकर देती हो? मैं तो सालों से व्यापार कर रहा हूं, इंसानों की फितरत बहुत अच्छे से समझता हूं। मैं सब कुछ जानकर भी इसलिए चुप था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से तुम्हारे और विक्रम के बीच कोई झगड़ा हो। मैं तुम दोनों का बसा-बसाया घर नहीं तोड़ना चाहता था। और बहू, मैं यह भी देख रहा हूं कि आज तुम्हारी इन आंखों से जो आंसू बह रहे हैं, वे किसी डर के नहीं, बल्कि सच्चे पछतावे के हैं। इंसान से गलती होती है, और जब उसे अपनी गलती का अहसास हो जाए, तो उसे दूसरा मौका जरूर मिलना चाहिए। मैंने तुम्हें दिल से माफ किया।”

महेश  जी फिर विक्रम की तरफ मुड़े और डांटते हुए लहजे में बोले, “और तू… नालायक! तू मुझे छोड़कर जाएगा? इस घर को छोड़कर सर्वेंट क्वार्टर में रहेगा? पगले, तुम बच्चे ही तो मेरी जीवन भर की कमाई हो, मेरी सांसें हो। तुम्हारे बिना मैं इस बड़े से बंगले का क्या करूंगा? एक पल भी नहीं जी पाऊंगा मैं तुम लोगों के बिना।”

यह सुनते ही विक्रम की आंखों से आंसू छलक पड़े। वह दौड़कर अपने पिता के गले लग गया। “पापाजी… मुझे लगा मैं एक बेटे के रूप में हार गया हूं।”

महेश  जी ने विक्रम की पीठ थपथपाते हुए सामने मेज पर रखे उन संपत्ति के कागजातों की ओर इशारा किया, “तो फिर अब इन वसीयत के कागजों का क्या करना है विक्रम बाबू?”

“फाड़ दीजिए इन्हें पापाजी,” विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा।

महेश  जी ने उन कागजों को फाड़कर किनारे रख दिया। फिर उन्होंने अंजलि की तरफ देखकर कहा, “और रही बात मेरी इस बेटी अंजलि की… तो विक्रम ने बिल्कुल सही कहा। मेरी इस बच्ची की डोली इसी घर से, इसी आंगन से बहुत धूमधाम से उठेगी।”

नीलू  ने आगे बढ़कर अंजलि को अपने गले से लगा लिया और रोते हुए कहा, “और अपनी इस ननद की शादी में, उसकी यह भाभी दुनिया की कोई भी कमी नहीं रहने देगी। यह मेरा वादा है।”

उस दिन ‘आशीर्वाद’ बंगले ने सच में अपना नाम सार्थक कर दिया था। दीवारें वही थीं, लेकिन आज उन दीवारों के बीच अहंकार नहीं, बल्कि प्यार, सम्मान और रिश्तों की वह मिठास बस गई थी, जो अब ताउम्र रहने वाली थी।

क्या आपको लगता है कि आधुनिकता और अनुशासन के नाम पर बुजुर्गों पर अपने नियम थोपना सही है? आपके विचार में एक खुशहाल परिवार का सबसे बड़ा रहस्य क्या है? अपने विचार हमें ज़रूर बताएं!

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#गुरूर की टूटती दीवारें और अपनों का प्यार

लेखिका : पुष्पा खंडेलवाल 

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