नीता ने अपने आँसू पोंछे और अपने पिता के खुरदरे हाथों को अपने गालों से लगा लिया। “बाबूजी… मैं भी उस छोटी बच्ची की तरह खो गई थी। लेकिन भगवान ने और आपके संस्कारों ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मैं वापस आपके पास लौट आई। मुझे कभी खुद से दूर मत करना बाबूजी।”
रामदीन को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पगली, तू तो मेरी जान है। तुझे मैं खुद से दूर कैसे कर सकता हूँ।”
“तो फिर पक्का रहा ना? अब कदम पीछे मत खींचना…” फोन के रिसीवर से आती हुई एक फुसफुसाती आवाज़ ने सन्नाटे को चीरा।
“हाँ… मैं तैयार हूँ। लेकिन मुझे बहुत डर लग रहा है। बाबूजी को धोखा देना…” लड़की की आवाज़ में एक कंपन था, एक झिझक जो उसके दिल के किसी कोने से उठ रही थी।
“अरे पगली, डर कैसा? प्यार में ये सब तो होता ही है। एक बार हम यहाँ से निकल गए, फिर दिल्ली की उस चकाचौंध में अपनी नई दुनिया बसाएंगे। तुम्हारे बाबूजी भी थोड़े दिन गुस्सा रहेंगे, फिर सब मान जाएंगे। आख़िरकार बेटी हो तुम उनकी।” लड़के ने बड़ी ही चालाकी से उसे सपनों के जाल में उलझाया।
“पर हम दिल्ली में रहेंगे कहाँ? क्या तुम्हारे परिवार वाले हमें…”
“तुम भी ना नीता, बिल्कुल बुद्धू हो! मेरे घरवाले अगर जान गए कि मैं पढ़ाई छोड़कर ये सब कर रहा हूँ, तो मेरी जान ले लेंगे। दिल्ली में मेरा एक बहुत ही खास दोस्त है। वो सब जुगाड़ कर देगा। बस एक बात का ध्यान रखना… शहर नया है, तो शुरुआत में खर्चे थोड़े ज्यादा होंगे। मैं तो अपने हिस्से का इंतज़ाम कर रहा हूँ, पर तुम्हें भी कुछ करना होगा।”
“मैं… मैं क्या करूँगी? मेरे पास तो कुछ नहीं है,” नीता घबराते हुए बोली।
“तुम्हारी माँ के वो पुराने गहने हैं ना? जो तुम्हारे बाबूजी ने तुम्हारी शादी के लिए सहेज कर रखे हैं? वो ले आना। और हाँ, थोड़ा कैश भी। आख़िर वो गहने तुम्हारे ही तो हैं, आज नहीं तो कल तुम्हें ही मिलने थे। बस अब और मत सोचना। कल जब तुम्हारे बाबूजी बस अड्डे पर टिकट लेने जाएं, तो तुम चुपके से खिसक लेना। मैं प्लेटफार्म नंबर चार के पीछे वाले खंभे के पास मिलूँगा। तुम अपना नंबर बंद कर देना और मैंने जो नया फोन दिया है, वो चालू रखना। ठीक है?” लड़का एक हल्की सी कुटिल हंसी हँसते हुए बोला।
फोन कट चुका था, लेकिन नीता के दिल की धड़कनें अभी भी बेतहाशा दौड़ रही थीं। शहर के एक छोटे से मोहल्ले में अपने पिता रामदीन के साथ रहकर कॉलेज की पढ़ाई करने वाली नीता अब वापस अपने गाँव जाने की कगार पर खड़ी थी। रामदीन शहर की एक कपड़ा मिल में फोरमैन थे। उन्होंने अपनी पत्नी के गुज़र जाने के बाद अपनी इकलौती बेटी को बड़े लाड़-प्यार से पाला था। वे चाहते थे कि नीता पढ़-लिखकर एक आज़ाद और समझदार लड़की बने। लेकिन कॉलेज के दूसरे साल में नीता की मुलाकात रोहन से हो गई।
रोहन की चिकनी-चुपड़ी बातें, उसके महंगे तोहफे और झूठी हमदर्दी ने नीता को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। रामदीन अक्सर नीता को समझाते थे कि शहर की हवा में एक धोखा है, यहाँ लोग मासूम चेहरों के पीछे भेड़िये का रूप छिपाए रखते हैं। लेकिन नीता को लगता था कि उसके बाबूजी पुरानी सोच के हैं। मोबाइल पर रोमांटिक फ़िल्में और वेब सीरीज़ देख-देखकर उसने अपनी ज़िंदगी की कहानी भी वैसी ही गढ़ ली थी। उसे लगता था कि वो किसी फिल्म की हीरोइन है और रोहन उसका हीरो, जो उसे हर मुश्किल से बचाकर महलों में ले जाएगा।
इधर किस्मत ने रामदीन के साथ एक क्रूर मज़ाक किया। जिस मिल में वो सालों से काम कर रहे थे, वो अचानक घाटे के कारण बंद हो गई। रामदीन ने शहर में बहुत हाथ-पैर मारे, लेकिन बढ़ती उम्र और कम होती ताकत के कारण उन्हें कोई दूसरा काम नहीं मिला। शहर का खर्च उठाना अब उनके बस की बात नहीं रही थी। थक-हारकर उन्होंने फैसला किया कि वो नीता को लेकर वापस अपने गाँव लौट जाएंगे और वहां पुश्तैनी ज़मीन पर थोड़ी बहुत खेती करके अपना गुज़ारा करेंगे। गाँव में उनके बड़े भाई का परिवार था, जो नीता को खास पसंद नहीं करता था, लेकिन रामदीन के पास अब कोई और रास्ता नहीं था।
नीता ने रोहन को जब यह बात बताई, तो उसने तुरंत नीता को भागने का यह प्लान थमा दिया। नीता ने भी सोच लिया था कि गाँव की उस घुटन भरी ज़िंदगी से बेहतर है कि वो रोहन के साथ अपने सपनों की उड़ान भरे।
अगली सुबह, नीता और रामदीन शहर के मुख्य बस अड्डे (ISBT) पर खड़े थे। बस अड्डे पर भारी भीड़ थी। बसों का धुआं, कंडक्टरों की चिल्ला-चोट, और मुसाफिरों की आपाधापी ने माहौल को बहुत बोझिल बना रखा था। रामदीन के कंधों पर दो भारी बैग थे। उनका चेहरा थका हुआ और उदास था। उन्होंने नीता को एक कोने में खड़ा किया और बोले, “बिटिया, तू यहीं रुक, मैं जाकर देखता हूँ कि हमारी बस कौन से प्लेटफार्म पर आएगी। यहाँ भीड़ बहुत है, कहीं जाना मत।”
जैसे ही रामदीन भीड़ में आगे बढ़े, नीता का दिल ज़ोर से धड़का। यही वो पल था। उसने अपना चेहरा अपने दुपट्टे से अच्छी तरह ढक लिया ताकि कोई उसे पहचान ना सके, और धीरे-धीरे अपने बाबूजी की उल्टी दिशा में बढ़ने लगी। उसके कदम कांप रहे थे, लेकिन रोहन के दिखाए सपनो ने उसकी आँखों पर पट्टी बांध रखी थी।
तभी उसे एक अजीब सी आवाज़ सुनाई दी। कोई बहुत बुरी तरह रो रहा था।
“अरे भाई साहब, किसी ने मेरी मुन्नी को देखा है? लाल रंग की फ्रॉक पहने थी… अभी तो यहीं मेरे हाथ से चिपकी हुई थी… हे भगवान, मेरी बच्ची कहाँ गई!”
एक अधेड़ उम्र का आदमी पागलों की तरह भीड़ में यहाँ-वहाँ भाग रहा था। उसके हाथों में एक छोटी सी तस्वीर थी जिसे वो हर आते-जाते इंसान को दिखा रहा था। उसकी आँखों से बहते आँसू और आवाज़ का दर्द नीता के दिल को चीर गया। लेकिन बस अड्डे की वो बेदर्द भीड़ उस आदमी को ऐसे अनदेखा कर रही थी जैसे वो कोई पागल हो। कुछ लोग उसे सांत्वना देकर आगे बढ़ जाते, तो कुछ चिढ़कर उसे रास्ते से हटा देते।
नीता के कदम एक पल के लिए ठिठके। उसे लगा कि वो उस आदमी की मदद करे, लेकिन फिर उसे रोहन का चेहरा याद आ गया। उसने अपना दुपट्टा और कसकर चेहरे पर लपेटा और तेज़ कदमों से प्लेटफार्म नंबर चार की तरफ भागने लगी।
प्लेटफार्म नंबर चार के आख़िरी छोर पर काफी सन्नाटा था। वहां कूड़े का ढेर और कुछ बंद पड़ी दुकानें थीं। नीता वहां पहुंची, लेकिन उसे रोहन सामने नहीं दिखा। वो घबराकर यहाँ-वहाँ देखने लगी। तभी उसे एक बंद दुकान के पीछे से रोहन की आवाज़ सुनाई दी। वो फोन पर बात कर रहा था। नीता ने राहत की सांस ली और दबे पांव उसे पीछे से हैरान करने के लिए आगे बढ़ी।
लेकिन रोहन की बातें सुनकर नीता के पाँव ज़मीन में ही जम गए।
“अरे हाँ भाई कालू, तू टेंशन क्यों लेता है? शिकार एकदम तैयार है। बस कुछ ही देर में वो यहाँ होगी। और सुन, मैंने उससे जेवर और कैश भी मंगवाए हैं। वो माल हम दोनों आधा-आधा बाँट लेंगे। और लड़की को तू आज रात ही उस कोठे वाली मौसी के हवाले कर देना। देख, मैंने तुझे एकदम कच्ची उम्र की और खूबसूरत लड़की ला कर दी है, मेरा कमीशन पक्का होना चाहिए… अरे रोएगी-चिल्लाएगी तो दो दिन में अपने आप लाइन पर आ जाएगी। बेईमानी मत करना वरना मैं…” कहकर रोहन एक गंदी और भयानक हंसी हँस पड़ा।
नीता के कानों में जैसे सीसा पिघलकर गिर रहा था। उसकी आँखों के सामने घुमड़ती सपनो की वो रंगीन दुनिया एक झटके में काले धुएं में बदल गई। जिस रोहन को वो अपना हीरो समझ रही थी, वो हकीकत में एक दरिंदा था जो उसे चंद रुपयों के लिए किसी नरक में धकेलने का सौदा कर रहा था। उसकी पढ़ाई-लिखाई, उसकी सारी समझदारी आज एक पल में शून्य हो गई थी। बाबूजी सही कहते थे, उसने आस्तीन के सांप को ही अपना रक्षक मान लिया था।
“छी!” नीता के मुंह से एक घृणा भरी आवाज़ निकली। वो अपने ही वजूद पर शर्मिंदा थी। बिना एक पल भी गंवाए, वो वहाँ से उल्टे पांव भागी। उसकी आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला था, लेकिन ये आँसू डर के नहीं, बल्कि उस भयानक सच के थे जिससे वो बाल-बाल बची थी।
वो पागलों की तरह बस अड्डे की उस भीड़ में अपने पिता को तलाशने लगी। उसकी साँसें फूल रही थीं और दुपट्टा कंधे से खिसक चुका था।
तभी उसकी नज़र प्लेटफार्म नंबर दो पर गई। रामदीन अपने दोनों बैग ज़मीन पर गिराए, बदहवास हालत में यहाँ-वहाँ दौड़ रहे थे। उनका चेहरा पसीने से लथपथ था और आँखों में वही खौफ था जो नीता ने थोड़ी देर पहले उस मुन्नी के पिता की आँखों में देखा था।
“नीता! ओ नीता… मेरी बच्ची…” रामदीन की आवाज़ में जो दर्द था, उसने नीता की आत्मा को झकझोर दिया।
“बाबूजी!” नीता दौड़ती हुई गई और अपने पिता के सीने से छटपटाते हुए लिपट गई।
रामदीन ने उसे कसकर अपनी बाहों में भर लिया। वो फूट-फूट कर रोने लगे। “कहाँ चली गई थी तू मेरी बच्ची? मेरी तो जान ही निकल गई थी। मैंने तुझे कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढा…”
नीता कुछ बोल नहीं पा रही थी, बस अपने पिता के पसीने और फटे पुराने कपड़ों में सुकून की वो महक महसूस कर रही थी, जिसे वो चंद झूठे सपनो के लिए छोड़ने जा रही थी।
तभी उनके पास से वही आदमी गुज़रा जिसकी बच्ची खो गई थी। लेकिन अब वो रो नहीं रहा था। उसके कंधे पर उसकी लाल फ्रॉक वाली बेटी सिर रखे बैठी थी और उस आदमी के चेहरे पर दुनिया भर का सुकून था।
“मिल गई आपकी बेटी?” रामदीन ने अपने आँसू पोंछते हुए उस अजनबी से पूछा।
“हाँ भाई साहब, भगवान की बड़ी कृपा हुई। किसी भले आदमी ने इसे पुलिस बूथ पर पहुंचा दिया था। मेरी तो जान में जान आ गई,” वो आदमी हाथ जोड़ते हुए आगे बढ़ गया।
रामदीन ने नीता की तरफ देखा और उसके माथे को चूमते हुए पूछा, “बिटिया, तू रो क्यों रही है? और तू चली कहाँ गई थी अचानक?”
नीता ने अपने आँसू पोंछे और अपने पिता के खुरदरे हाथों को अपने गालों से लगा लिया। “बाबूजी… मैं भी उस छोटी बच्ची की तरह खो गई थी। लेकिन भगवान ने और आपके संस्कारों ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मैं वापस आपके पास लौट आई। मुझे कभी खुद से दूर मत करना बाबूजी।”
रामदीन को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पगली, तू तो मेरी जान है। तुझे मैं खुद से दूर कैसे कर सकता हूँ।”
थोड़ी ही देर में उनके गाँव जाने वाली बस आ गई। नीता ने बस में चढ़ने से पहले अपने बैग से वो नया मोबाइल फोन और सिम कार्ड निकाला, उसे पूरी ताकत से ज़मीन पर पटका और पैरों से कुचल दिया। फिर वो आज़ाद परिंदे की तरह मुस्कुराती हुई अपने बाबूजी के पीछे-पीछे बस में चढ़ गई। आज उसे यह समझ आ गया था कि बाहरी दुनिया के दिखावे और प्यार के छलावे से कहीं ज़्यादा गहरा और सच्चा, एक पिता का प्यार और परिवार की छांव होती है।
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#मृगतृष्णा और बरगद की छांव