कौशल्या जी ने कांपते हाथों से देवांश का चेहरा उठाया और उसे सीने से लगा लिया। “तू आ गया मेरे बच्चे… तू आ गया। लेकिन तू था कहाँ? हमने तुझे कितना ढूंढा। अंजलि ने तुझे हज़ारों मेल किए, सैकड़ों फोन किए, लेकिन तेरा कोई अता-पता नहीं था। क्या तू हमसे इतना खफा था कि हमारी सुध तक नहीं ली?”
दीनानाथ जी की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली, हालांकि उनके होंठ कुछ बोल नहीं पा रहे थे।
देवांश ने अपनी माँ के आँसू पोंछे और फिर अपने पिता के पास जाकर उनके घुटनों के पास बैठ गया। उसने पिता के बेजान हाथों को चूमते हुए कहा, “पिताजी, मैं आपसे नाराज़ कैसे हो सकता हूँ? आपने ही तो मुझे सपने देखना सिखाया था। मैं तो बस आपका वो कर्ज चुकाने का रास्ता ढूंढ रहा था जिसने आपकी ये हालत कर दी थी।”
सेठ करमचंद के मुनीम ने अपनी डायरी का पन्ना पलटते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “देखिए दीनानाथ जी, अब समय पूरा हो चुका है। भावनाओं से कर्ज नहीं चुकाए जाते। आप भी जानते हैं कि इस पुश्तैनी हवेली की कीमत बाजार में क्या है। चलिए, अब चाबियां सौंप दीजिए, वर्ना हमें पुलिस बुलानी पड़ेगी।” मुनीम के पीछे खड़े दो-तीन बाहुबली अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए हंस पड़े। उनकी यह हंसी उस घर के सन्नाटे में किसी खंजर की तरह चुभ रही थी।
हवेली के अंदरुनी हिस्से में, दीनानाथ जी अपनी व्हीलचेयर पर बैठे शून्य में घूर रहे थे। लकवे के कारण उनका आधा शरीर काम नहीं करता था, लेकिन उनकी आँखों से बहते आँसू उनके अंदर के दर्द को चीख-चीख कर बयां कर रहे थे। उनके पास बैठी उनकी पत्नी कौशल्या जी की आँखें पथरा गई थीं। उनकी बेटी अंजलि एक कोने में खड़ी सिसक रही थी। उनके सामने पड़े बक्सों में उनका सामान बंधा हुआ था। यह सिर्फ एक घर नहीं था, यह वह आंगन था जहां उनकी पीढ़ियों की यादें बसी थीं।
दीनानाथ जी को वो दिन याद आ रहे थे जब इस आंगन में उनके बेटे देवांश की किलकारियां गूंजी थीं। कैसे उस छोटे से बच्चे ने पहली बार उनके उंगली पकड़कर चलना सीखा था। फिर कुछ सालों बाद अंजलि के जन्म पर पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बांटी गई थीं। वो होली के रंग, वो दिवाली के दीये, वो भाई-दूज पर अंजलि का देवांश के माथे पर तिलक लगाना और दोनों भाई-बहन का एक-दूसरे से खिलौनों के लिए रूठना-मनाना।
“ये आम का पेड़ भैया ने लगाया था, इसे मैं कटने नहीं दूंगी…” कभी अंजलि जिद किया करती थी।
“और ये झूला मेरा है, इस पर सिर्फ मैं बैठूंगा…” देवांश उसे चिढ़ाता था।
त्यौहारों की वो रौनक, शादी की सालगिरह पर वो छोटी-छोटी खुशियां, वो सब आज किसी टूटे हुए शीशे की तरह बिखर रही थीं। दीनानाथ जी की बीमारी और उनके इलाज में घर की सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई थी। ऊपर से व्यापार में हुए घाटे ने उन्हें सेठ करमचंद के कर्ज के दलदल में धकेल दिया था।
अचानक बाहर से आ रही मुनीम की कर्कश आवाज़ें बंद हो गईं। एक अजीब सी खामोशी छा गई।
अंजलि ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “पिताजी… लगता है उन्हें चाबी सौंपने का वक्त आ गया है। हमें चलना चाहिए।”
कौशल्या जी ने कांपते हाथों से अपने पति के व्हीलचेयर का हैंडल पकड़ा और भारी कदमों से दरवाजे की तरफ बढ़ने लगीं।
तभी हवेली का भारी लकड़ी का दरवाजा चरमराते हुए खुला।
“इस घर से कोई कहीं नहीं जाएगा… ये हवेली सिर्फ ईंट-पत्थरों की नहीं, हमारी सांसों से बनी है।” एक भारी और परिचित आवाज़ दालान में गूंजी।
कौशल्या जी, दीनानाथ जी और अंजलि के कदम वहीं ठिठक गए। उन्होंने धीरे से नज़रें उठाईं। दरवाजे पर एक नौजवान खड़ा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान।
“देवांश…” कौशल्या जी के मुंह से बस इतना ही निकल पाया। उनकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी।
“भैया…” अंजलि दौड़कर उसके पास गई, लेकिन कुछ कदम दूर ही रुक गई।
देवांश ने अपना बैग वहीं ज़मीन पर गिरा दिया और दौड़कर अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ा। “मुझे माफ कर दीजिए माँ… मुझे माफ कर दीजिए पिताजी। मैं आपका गुनहगार हूँ।”
कौशल्या जी ने कांपते हाथों से देवांश का चेहरा उठाया और उसे सीने से लगा लिया। “तू आ गया मेरे बच्चे… तू आ गया। लेकिन तू था कहाँ? हमने तुझे कितना ढूंढा। अंजलि ने तुझे हज़ारों मेल किए, सैकड़ों फोन किए, लेकिन तेरा कोई अता-पता नहीं था। क्या तू हमसे इतना खफा था कि हमारी सुध तक नहीं ली?”
दीनानाथ जी की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली, हालांकि उनके होंठ कुछ बोल नहीं पा रहे थे।
देवांश ने अपनी माँ के आँसू पोंछे और फिर अपने पिता के पास जाकर उनके घुटनों के पास बैठ गया। उसने पिता के बेजान हाथों को चूमते हुए कहा, “पिताजी, मैं आपसे नाराज़ कैसे हो सकता हूँ? आपने ही तो मुझे सपने देखना सिखाया था। मैं तो बस आपका वो कर्ज चुकाने का रास्ता ढूंढ रहा था जिसने आपकी ये हालत कर दी थी।”
सभी हैरान थे। देवांश खड़ा हुआ और बोला, “माँ, आपको याद है तीन साल पहले मेरा एक विदेशी कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट होने वाला था? जब हम कर्ज में डूब गए थे, तो मुझे उस कंपनी से एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिला था। वो प्रोजेक्ट समुद्री शोध का था। मुझे एक ऐसी रिसर्च शिप पर जाना पड़ा जो महीनों तक गहरे समुद्र में रहती है। वहां दुनिया से संपर्क करने का कोई साधन नहीं होता, कोई नेटवर्क नहीं होता। कॉन्ट्रैक्ट की शर्त थी कि मिशन पूरा होने तक हम बीच में वापस नहीं आ सकते।”
अंजलि ने रोते हुए कहा, “लेकिन भैया, हम यहाँ पल-पल मर रहे थे। पिताजी की तबीयत…”
देवांश ने अंजलि को अपने गले से लगा लिया, “मुझे पता है मेरी गुड़िया। मैं वहाँ समंदर की लहरों के बीच हर पल सिर्फ तुम लोगों के बारे में सोचता था। कंपनी ने मुझे एडवांस देने से मना कर दिया था, लेकिन उन्होंने वादा किया था कि अगर प्रोजेक्ट सफल हुआ, तो वो मुझे भारी बोनस देंगे और भारत में अपना ऑपरेशन हेड बनाएंगे।”
उसने अपनी जेब से कुछ कागज़ निकाले। “माँ, मैंने वो प्रोजेक्ट ना सिर्फ पूरा किया, बल्कि कंपनी को करोड़ों का फायदा कराया। जैसे ही मैं किनारे पर वापस आया और नेटवर्क मिला, मैंने सबसे पहले अंजलि के सारे मैसेज पढ़े। मुझे पिताजी की बीमारी और हवेली की नीलामी के बारे में पता चला। मैं सीधा सेठ करमचंद के पास गया।”
देवांश ने वो कागज़ कौशल्या जी के हाथों में रख दिए। “ये हमारी हवेली के कागज़ात हैं माँ। मैंने सेठ का एक-एक पैसा ब्याज समेत चुका दिया है। अब कोई हमारी इस हवेली की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकता।”
दीनानाथ जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। कौशल्या जी ने कागज़ात को माथे से लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगीं।
“और पिताजी…” देवांश ने दीनानाथ जी के पैरों को सहलाते हुए कहा, “बीमारी ने भले ही आपके पैर छीन लिए हों, लेकिन मैं आपका वो पैर बनूंगा जो कभी नहीं थकेगा। अब आप इस व्हीलचेयर से ही दुनिया देखेंगे, लेकिन शान से। मैं आपको दुनिया के सबसे बेहतरीन डॉक्टरों को दिखाऊंगा।”
अंजलि अब भी सुबक रही थी। देवांश ने उसे छेड़ते हुए कहा, “और तू… मेरी शेरनी बहन। मुझे पता चला कि मेरे पीछे तूने ट्यूशन पढ़ा-पढ़ाकर घर चलाया है। तूने वो जिम्मेदारी उठाई जो एक बेटे को उठानी चाहिए थी। मैं तेरा कर्ज कभी नहीं उतार पाऊंगा।”
अंजलि ने रोते हुए उसे फिर से गले लगा लिया, “भैया, मैंने आपको कितना गलत समझा। मुझे लगा आप हमें इस हाल में छोड़कर भाग गए।”
“पागल है तू,” देवांश मुस्कुराया। फिर उसने अपने पीछे खड़े अपने एक साथी को इशारा किया, जो एक बड़ा सा डिब्बा लेकर खड़ा था।
देवांश ने डिब्बा खोला। उसमें एक बहुत ही खूबसूरत केक था। “माँ, पिताजी, आज आप दोनों की शादी की 35वीं सालगिरह है। मुझे याद है। मैं ये दिन कैसे भूल सकता हूँ?”
कौशल्या जी ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए कहा, “अब कैसा जश्न बेटा, तू लौट आया, हमारा घर बच गया, इससे बड़ा जश्न क्या होगा।”
“नहीं माँ, आज जश्न तो होगा। और हमारी इस हवेली के आंगन में होगा।”
चारों ने मिलकर केक काटा। मुनीम और उसके आदमी जो अब तक बाहर खड़े तमाशा देख रहे थे, चुपचाप अपना सिर झुकाकर वहाँ से खिसक लिए।
दीनानाथ जी ने अपनी पत्नी की तरफ देखा। उनके चेहरे पर सालों बाद वो सुकून वाली चमक लौटी थी। उनके होंठ हिले और उन्होंने बड़ी मुश्किल से लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा, “कौशल्या… मैंने कहा था ना… मेरा बेटा एक दिन हमारी सारी तकलीफें दूर कर देगा। आज उसने हमारे इस प्यार के आंगन को दोबारा सींच दिया है।”
देवांश ने अपने माता-पिता और बहन को एक साथ अपनी बाहों के घेरे में ले लिया। हवेली का वो वीरान आंगन एक बार फिर से प्यार, सम्मान और परिवार की गर्मी से महक उठा था।
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#उजड़ते आंगन में उम्मीद की वापसी
लेखिका : सीमा श्रीवास्तव