उनका यह दर्द सुनकर मैं अवाक रह जाता था। एक पिता, जिसने अपनी बेटी को जन्म दिया, उसे पाला, वो आज उसके लिए मौत की भीख मांग रहा था। प्रतीक्षा सचमुच बहुत थकान भरी और असह्य होती है, और जब प्रतीक्षा मौत की हो, तो वह जिंदगी से भी ज्यादा भयानक हो जाती है। लेकिन जब मैं दीनानाथ जी की इन खौफनाक बातों से घबराकर वापस आयशा की तरफ देखता,
तो मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता था। आयशा की जिंदगी कहीं से भी मौत की प्रतीक्षा करती हुई नहीं लगती थी। अगर मौत की प्रतीक्षा ऐसी होती है, तो वह इतनी खूबसूरत नहीं हो सकती। उसकी जिंदगी तो उस पूर्णिमा के चाँद जैसी थी, जो घने अंधेरे में भी अपनी गरिमा और चमक बिखेर रहा हो।
शहर के उस पुराने मोहल्ले में मेरा आना महज़ एक इत्तेफाक था। मैं अपनी जिंदगी की उधेड़बुन और करियर की नाकामी से इतना हताश हो चुका था कि मुझे एकांत की तलाश थी। लेकिन वहाँ आकर मेरी मुलाकात आयशा से हुई, और फिर मेरी जिंदगी के मायने ही बदल गए। आयशा , जो एक भयंकर सड़क हादसे में अपने शरीर का निचला हिस्सा हमेशा के लिए सुन्न कर बैठी थी। कमर के नीचे का उसका पूरा शरीर बेजान था,
और बायाँ हाथ भी पूरी तरह से काम नहीं करता था। केवल उसका दायाँ हाथ और उसकी आँखें ही जीवित होने का प्रमाण देती थीं। लेकिन उस एक हाथ से वह जो चमत्कार करती थी, वह किसी भी पूर्ण रूप से स्वस्थ इंसान के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता था। वह कैनवास पर इतने जीवंत रंग उकेरती थी कि देखने वाला ठगा सा रह जाए।
अब आयशा के घर जाना मेरी दिनचर्या का सबसे अहम हिस्सा बन गया था। ऐसा लगता था जैसे मेरी अपनी रुकी हुई साँसों को वहाँ जाकर एक नई लय मिल जाती हो। किसी दिन अगर मैं आयशा को न देखूँ, तो मेरे भीतर एक अजीब सी बेचैनी और उदासी घर कर जाती थी। उसे देखते ही मेरा मन एक नई ऊर्जा और कर्म-प्रेरणा से भर उठता था। आयशा के चेहरे पर हमेशा एक बहुत ही शांत, निर्मल और विशुद्ध मुस्कान तैरती रहती थी।
उस मुस्कान में न तो अपनी लाचारी का कोई रोना था और न ही किस्मत से कोई शिकायत। उस मुस्कान को देखे बिना मुझे लगता जैसे मेरे अपने हाथ-पैर सुन्न हो रहे हों। सच कहूँ तो, आयशा मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी प्रेरणास्रोत बन चुकी थी।
जब मैं उसकी उँगलियों को रंगों से खेलते, कैनवास पर आकृतियाँ बनाते देखता, तो मुझे लगता जैसे वह मुझे खामोशी से धिक्कार रही हो। उसकी वो कर्मरत उँगलियाँ मानो मेरी चेतना को झकझोर कर कहती थीं – “जो इंसान सब कुछ होते हुए भी कर्म करने से भागता है, असली अपाहिज तो वह है। मैं तो हिल-डुल न पाने के बावजूद न तो रोगी हूँ और न ही निठल्ली।”
लेकिन इस खूबसूरत तस्वीर का एक बहुत ही स्याह और दर्दनाक पहलू भी था। और वो थे आयशा के पिता, दीनानाथ जी। दीनानाथ जी की उम्र सत्तर के पार जा चुकी थी। चेहरे पर झुर्रियों का जाल और आँखों में एक अंतहीन खौफ साफ नजर आता था। मैं जब भी आयशा से मिलने जाता, तो कोशिश करता कि दीनानाथ जी की नजरों से बचकर निकल जाऊँ। मैं जान-बूझकर उनके सवालों और उनके उस दर्दनाक अनुरोध को टालना चाहता था, जिसे सुनकर मेरी रूह काँप जाती थी।
कई बार ऐसा होता कि आयशा अपने रंगों में मग्न होती, और दीनानाथ जी मुझे बरामदे में घेर लेते। उनकी आवाज में एक अजीब सी कठोरता और पीड़ा का मिश्रण होता था। वह सीधे मेरी आँखों में देखकर कहते, “बेटा, तुमने उस अर्जी का क्या किया? मैंने तुमसे आयशा के लिए इच्छामृत्यु (यूथेनेशिया) की दरख्वास्त तैयार करने को कहा था। क्या तुम सोच-विचार में पड़ गए हो? या डर रहे हो कि किसी कानूनी पचड़े में फँस जाओगे? तुम निश्चिंत रहो, उस दरख्वास्त पर मैं और आयशा खुद अपने हस्ताक्षर करेंगे। तुम नहीं समझते बेटा, मेरे दिन अब बहुत तेजी से ढल रहे हैं। मेरे बाद इसका क्या होगा? क्या तुमने कभी इस बारे में सोचा है? मेरे मरने के बाद इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो इसके मुँह में एक घूँट पानी भी डाल सके। क्या तुम चाहते हो कि ये बिस्तर पर पड़े-पड़े, भूख और प्यास से तड़प-तड़प कर मरे? नहीं! मैं अपनी फूल सी बच्ची को तिल-तिल कर मरते नहीं देख सकता। मैं अपने हाथों से इसे विदा करना चाहता हूँ।”
उनका यह दर्द सुनकर मैं अवाक रह जाता था। एक पिता, जिसने अपनी बेटी को जन्म दिया, उसे पाला, वो आज उसके लिए मौत की भीख मांग रहा था। प्रतीक्षा सचमुच बहुत थकान भरी और असह्य होती है, और जब प्रतीक्षा मौत की हो, तो वह जिंदगी से भी ज्यादा भयानक हो जाती है। लेकिन जब मैं दीनानाथ जी की इन खौफनाक बातों से घबराकर वापस आयशा की तरफ देखता, तो मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता था। आयशा की जिंदगी कहीं से भी मौत की प्रतीक्षा करती हुई नहीं लगती थी। अगर मौत की प्रतीक्षा ऐसी होती है, तो वह इतनी खूबसूरत नहीं हो सकती। उसकी जिंदगी तो उस पूर्णिमा के चाँद जैसी थी, जो घने अंधेरे में भी अपनी गरिमा और चमक बिखेर रहा हो।
एक दिन दोपहर के समय जब मैं उनके घर पहुँचा, तो बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। आयशा अपने व्हीलचेयर पर बैठी थी और उसके सामने एक बड़ा सा कैनवास रखा था। वह अपने दाएँ हाथ से बहुत ही बारीकी से भगवान शिव और पार्वती का एक अर्धधनारीश्वर रूप पेंट कर रही थी। कैनवास पर लाल, नीले और सुनहरे रंगों का ऐसा अद्भुत संगम था कि नजरें हटाना मुश्किल था। वह पेंट करते हुए बहुत ही धीमी आवाज में एक मधुर सा गीत गुनगुना रही थी। उसके उस आधे बेजान शरीर से जैसे संगीत की कोई पवित्र धारा बह रही थी। उस दिन उसे देखकर मुझे एक बहुत गहरा अहसास हुआ। मुझे लगा कि आयशा के भीतर कोई बहुत गहरी चाहत है, कोई ऐसा प्रेम है जो इस टूटे हुए शरीर में भी प्राण फूँक रहा है। यह चाहत ही है जो आयशा को जिंदा रखे हुए है, उसके अंदर इस संगीत को जन्म दे रही है, और उसकी उँगलियों के रास्ते कैनवास पर रंगों के रूप में खिल रही है। बिना किसी गहरे प्रेम या समर्पण के कोई भी इंसान मौत के साये में इस तरह मुस्कुरा कर नहीं जी सकता।
मेरे भीतर की उत्सुकता अब अपने चरम पर थी। मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैंने उसके करीब जाकर एक कुर्सी खींच ली और बहुत ही संकोच के साथ पूछा, “आयशा , अगर तुम बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ? तुम्हारा शरीर भले ही इस कुर्सी से बँध गया है, लेकिन तुम्हारा दिल और तुम्हारी कला किसी आज़ाद परिंदे की तरह उड़ान भरते हैं। तुम्हारी आँखों में इतने रंगीन सपने हैं। यह सब कैसे मुमकिन है? क्या तुम… क्या तुम अपने ख्यालों में किसी से प्रेम करने लगी हो? कोई है जिसने तुम्हारे अंदर इतनी रोशनी भर दी है?”
मेरी बात सुनकर आयशा के हाथ का ब्रश एक पल के लिए रुका। उसने शिव के बन रहे चेहरे पर से अपनी निगाहें नहीं हटाईं। वह कैनवास को ही निहारती रही, लेकिन उसके होठों पर एक बेहद खूबसूरत और रहस्यमयी मुस्कान फैल गई। उसने बिना मेरी ओर देखे, बहुत ही कोमल स्वर में कहा, “जब रूह में ईश्वर बस जाते हैं, तो किसी और प्रेम की जरूरत कहाँ रह जाती है? लेकिन आप… आप मेरे मन की इतनी गहरी बात कैसे जान गए?”
उस दिन मुझे समझ में आ गया कि आयशा केवल सांसें नहीं ले रही थी, वह असल मायनों में जी रही थी। उसका प्रेम उसका ईश्वर था, उसकी कला थी, जो किसी शारीरिक अक्षमता की मोहताज नहीं थी।
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#अनकही प्रेरणा: एक रंगीन खामोशी
लेखिका : महक दुआ