मीरा ने उनके पैर छुए और बहुत ही कोमलता से कहा, “माँ जी, अगर आप उस दिन मुझे उस गाजर के हलवे पर ताना न मारतीं, अगर आप मुझे यह एहसास न दिलातीं कि बिना कमाए इस दुनिया में कोई इज्जत नहीं है, तो शायद मैं अपनी डिग्रियों को अलमारी में दीमक लगने के लिए छोड़ चुकी होती। आपने और रोहन ने अनजाने में ही सही, मुझे मेरी काबिलियत याद दिला दी। आपके तानों ने मुझे अंदर से जगा दिया। यह साड़ी उसी जगाने वाले पल का शुक्रिया है।”
सावित्री जी की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उन्हें अपनी गलती का गहरा अहसास हो रहा था। उन्होंने आगे बढ़कर मीरा को गले लगा लिया और रोते हुए बोलीं, “मुझे माफ कर दे बेटी। मैंने हमेशा तुझे एक बोझ समझा, जबकि तू तो इस घर की नींव है। मुझे नहीं पता था कि मेरे कड़वे शब्द तुझे इतनी गहरी चोट दे रहे थे। आज तूने मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।”
सुबह के छह बजे थे। बाहर हल्की-हल्की ठंड थी, लेकिन रसोई में पसीने से लथपथ मीरा एक साथ तीन गैस बर्नर पर काम कर रही थी। एक तरफ ससुर जी के लिए बिना चीनी की चाय उबल रही थी, दूसरी तरफ पति रोहन का लंच बॉक्स तैयार हो रहा था, और तीसरी तरफ वह अपने पांच साल के बेटे अयान के लिए ओट्स बना रही थी। आज रविवार का दिन था और घर में सब आराम के मूड में थे। मीरा ने सोचा कि आज सबको खुश करने के लिए नाश्ते में कुछ खास बनाया जाए। उसने पनीर के पराठे, हरी चटनी और गाजर का हलवा तैयार किया। उसे लगा कि डाइनिंग टेबल पर जब सब यह नाश्ता देखेंगे तो बहुत खुश होंगे।
लेकिन जैसे ही उसकी सास, सावित्री देवी, ने डाइनिंग टेबल पर इतना सारा खाना देखा, उनके माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उन्होंने मुंह बनाते हुए कहा, “मीरा, ये सुबह-सुबह इतना भारी नाश्ता बनाने की क्या जरूरत थी? और ये हलवा? तुम्हें पता भी है आजकल बाजार में मेवे और घी किस भाव आ रहे हैं? जब देखो बस पैसे फूंकने का बहाना चाहिए। बेटा दिन रात एक करके पैसे कमाता है, और तुम हो कि बस दोनों हाथों से लुटाने में लगी हो। कभी खुद कमाकर देखो, तब पता चलेगा कि एक-एक पैसा कैसे जुड़ता है।”
मीरा के हाथ में पकड़ी हुई चाय की ट्रे वहीं ठिठुर गई। वह बस अपनों के चेहरों पर एक मुस्कान देखना चाहती थी, लेकिन बदले में उसे फिर वही ताना मिला जो पिछले कई सालों से उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह डाला जा रहा था—कि वह कमाती नहीं है। उसने नजरें झुका लीं और चुपचाप वहां से अपने कमरे में आ गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक गृहणी होना क्या कोई अपराध है? क्या घर के लोगों की पसंद का ख्याल रखना फिजूलखर्ची है?
समय अपनी गति से बीतता रहा। अयान अब थोड़ा बड़ा हो गया था, लेकिन मीरा की जिम्मेदारियां कम होने का नाम नहीं ले रही थीं। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, वह एक मशीन की तरह काम करती। घर की सफाई, कपड़े, बर्तन, खाना, बच्चे की पढ़ाई, सास-ससुर की दवाइयां—सब कुछ उसके ही कंधों पर था। एक दिन थकान के मारे उसके पैरों में भयंकर दर्द हो रहा था। रात को जब रोहन ऑफिस से लौटा, तो मीरा ने हिम्मत करके कहा, “रोहन, आजकल काम बहुत बढ़ गया है और मेरी तबीयत भी ठीक नहीं रहती। क्या हम बर्तन और झाड़ू-पोछे के लिए एक बाई रख सकते हैं?”
बाई का नाम सुनते ही रोहन ने हाथ में पकड़ा हुआ मोबाइल बिस्तर पर फेंक दिया और झुंझलाते हुए बोला, “तुम्हें क्या लगता है, मेरे पास पैसों का कोई पेड़ लगा है? दिन भर घर में रहती हो, आराम से टीवी देखती हो, तुमसे एक घर का काम नहीं संभलता? मैं बाहर जाकर दस घंटे खटता हूँ, तब जाकर ये घर चलता है। अगर एक बाई रख ली, तो तुम पूरा दिन करोगी क्या?”
रोहन के ये शब्द मीरा के दिल को चीर गए। जिस पति के लिए उसने अपने करियर, अपनी इच्छाओं और अपनी पहचान को पीछे छोड़ दिया था, आज वही पति उसकी मेहनत को शून्य मान रहा था। मीरा फूट-फूट कर रो पड़ी। उसे गहराई से यह अहसास हो गया कि इस समाज में और इस घर में सम्मान सिर्फ उसी का है जो पैसा कमा कर लाता है। बिना वेतन के दिन-रात गधे की तरह काम करने वाली गृहणी की कोई कीमत नहीं है। लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी मजबूरी यह थी कि अयान अभी छोटा था, और वह उसे छोड़कर ऑफिस की नौकरी करने बाहर नहीं जा सकती थी।
मीरा धीरे-धीरे डिप्रेशन का शिकार होने लगी थी। उसका आत्मविश्वास पूरी तरह से टूट चुका था। एक दोपहर वह अपनी पुरानी अलमारी साफ कर रही थी, तभी उसके हाथ में एक फाइल लगी। यह उसकी एमबीए की डिग्रियों और सर्टिफिकेट्स की फाइल थी। कभी वह अपनी यूनिवर्सिटी की टॉपर हुआ करती थी। उसे याद आया कि कैसे शादी से पहले उसके कितने बड़े-बड़े सपने थे। वह अपनी फाइल को सीने से लगाकर रोने लगी। तभी अचानक उसका फोन बजा। स्क्रीन पर उसकी कॉलेज की सबसे करीबी सहेली, शालिनी का नाम फ्लैश हो रहा था।
मीरा ने जैसे ही फोन उठाया, उसकी रुलाई फूट पड़ी। शालिनी घबरा गई। उसने पूछा, “क्या हुआ मीरा? तू रो क्यों रही है?” कई सालों से अपने अंदर दर्द का समंदर दबाए बैठी मीरा के सब्र का बांध आज टूट गया। उसने शालिनी को अपनी सास के ताने, रोहन की बेरुखी और अपनी घुटन के बारे में सब कुछ बता दिया। उसने रोते हुए कहा, “शालिनी, मैं बहुत अकेली पड़ गई हूँ। मेरी इस घर में कोई वैल्यू नहीं है क्योंकि मैं कमाती नहीं हूँ।”
शालिनी ने उसकी पूरी बात बहुत ध्यान से सुनी। फिर उसने एक गहरी सांस ली और कहा, “मीरा, रोने से कुछ नहीं होगा। दुनिया उसी को पूजती है जो खुद अपनी कीमत समझता है। तू भूल गई कि तू हमारे बैच की सबसे होनहार स्टूडेंट थी? तेरे पास डिग्री है, दिमाग है। अगर घर वाले तुझे सिर्फ पैसों के तराजू पर तौल रहे हैं, तो तू अपना वजन बढ़ा ले। रही बात बाहर जाकर काम करने की, तो आज के डिजिटल युग में तुझे घर से बाहर जाने की जरूरत ही क्या है? तू फ्रीलांसिंग क्यों नहीं शुरू करती? तू कंटेंट राइटिंग और डिजिटल मार्केटिंग में इतनी अच्छी थी, घर बैठे ही वर्क फ्रॉम होम वाली नौकरी ढूंढ।”
शालिनी की बातों ने मीरा के अंदर बुझ चुकी आग में घी का काम किया। उस रात मीरा सोई नहीं। उसने अपनी फाइल से अपना पुराना रिज्यूमे निकाला, उसे अपडेट किया और इंटरनेट पर घर से काम करने वाली नौकरियों की तलाश शुरू कर दी। अगले कुछ हफ्तों तक मीरा का रूटीन बदल गया। वह घर का काम पहले से भी ज्यादा तेजी से निपटाती और फिर चुपचाप अपने लैपटॉप पर काम करने बैठ जाती। उसने कई ऑनलाइन इंटरव्यू दिए। कई जगह से निराशा मिली, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
आखिरकार, उसकी मेहनत रंग लाई। एक मल्टीनेशनल डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी ने उसके पुराने पोर्टफोलियो और इंटरव्यू से प्रभावित होकर उसे एक बेहतरीन पैकेज पर ‘वर्क फ्रॉम होम’ जॉब ऑफर कर दी। मीरा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसने यह बात अभी घर में किसी को नहीं बताई। वह अपनी नौकरी के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां भी बखूबी निभाती रही। सुबह जल्दी उठकर काम खत्म करती और फिर अपने लैपटॉप पर ऑफिस का काम करती।
एक महीने बाद, मीरा के बैंक अकाउंट में उसकी पहली सैलरी क्रेडिट हुई। वह रकम रोहन की सैलरी से बहुत कम नहीं थी। मैसेज देखते ही मीरा की आंखों से आंसू छलक पड़े। यह सिर्फ पैसा नहीं था, यह उसका खोया हुआ आत्मसम्मान था। शाम को जब सब लोग हॉल में बैठे चाय पी रहे थे, तो मीरा अपने कमरे से एक सुंदर सा डिब्बा लेकर आई।
उसने वह डिब्बा अपनी सास सावित्री देवी के हाथों में रख दिया। सावित्री जी ने हैरानी से डिब्बा खोला, तो उसमें एक बहुत ही खूबसूरत बनारसी साड़ी थी, जो उन्हें बहुत समय से पसंद थी लेकिन महंगी होने के कारण उन्होंने कभी खरीदी नहीं थी।
“ये क्या है मीरा? और ये साड़ी लाने के पैसे तुम्हारे पास कहाँ से आए? तुमने फिर से रोहन के क्रेडिट कार्ड से फिजूलखर्ची की?” सावित्री जी ने तल्ख स्वर में पूछा।
मीरा ने इस बार नजरें नहीं झुकाईं। उसके चेहरे पर एक शांत लेकिन गर्व भरी मुस्कान थी। उसने कहा, “नहीं माँ जी, ये रोहन के पैसों से नहीं आई है। ये मेरी पहली सैलरी से आपकी बहू की तरफ से आपके लिए एक छोटा सा तोहफा है। मैंने पिछले महीने ही एक कंपनी में डिजिटल मैनेजर की नौकरी जॉइन की है, और मैं घर से ही काम करती हूँ।”
यह सुनते ही रोहन और सावित्री जी, दोनों सन्न रह गए। रोहन की आंखें फटी की फटी रह गईं। सावित्री जी के हाथ कांपने लगे। उन्होंने झिझकते हुए कहा, “तूने नौकरी कर ली? लेकिन ये साड़ी… मुझे क्यों?”
मीरा ने उनके पैर छुए और बहुत ही कोमलता से कहा, “माँ जी, अगर आप उस दिन मुझे उस गाजर के हलवे पर ताना न मारतीं, अगर आप मुझे यह एहसास न दिलातीं कि बिना कमाए इस दुनिया में कोई इज्जत नहीं है, तो शायद मैं अपनी डिग्रियों को अलमारी में दीमक लगने के लिए छोड़ चुकी होती। आपने और रोहन ने अनजाने में ही सही, मुझे मेरी काबिलियत याद दिला दी। आपके तानों ने मुझे अंदर से जगा दिया। यह साड़ी उसी जगाने वाले पल का शुक्रिया है।”
सावित्री जी की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उन्हें अपनी गलती का गहरा अहसास हो रहा था। उन्होंने आगे बढ़कर मीरा को गले लगा लिया और रोते हुए बोलीं, “मुझे माफ कर दे बेटी। मैंने हमेशा तुझे एक बोझ समझा, जबकि तू तो इस घर की नींव है। मुझे नहीं पता था कि मेरे कड़वे शब्द तुझे इतनी गहरी चोट दे रहे थे। आज तूने मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।”
रोहन भी अपनी जगह से उठा और उसने मीरा का हाथ पकड़ लिया। “मुझे भी माफ कर दो मीरा। मैं अपने घमंड में यह भूल ही गया था कि तुम मुझसे कहीं ज्यादा काबिल हो। तुमने घर भी संभाला और खुद को भी साबित किया।”
मीरा की आंखों में भी आंसू थे, लेकिन ये खुशी के आंसू थे। सावित्री जी ने अपने आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “अरे रोहन, जा जल्दी से मिठाई लेकर आ! आज मेरी होनहार बहू की पहली कमाई आई है, आज तो घर में जश्न मनेगा।”
उस दिन के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। रोहन और सावित्री जी अब घर के कामों में मीरा का हाथ बंटाने लगे थे। मीरा अब सिर्फ एक पत्नी या बहू नहीं थी, वह अपनी एक अलग पहचान बना चुकी थी। उसने समझ लिया था कि सम्मान मांगने से नहीं मिलता, उसे अपनी काबिलियत से हासिल करना पड़ता है।
कहानी के पात्रों की तरह, हम सभी की जिंदगी में ऐसे पल आते हैं जब हम खुद को खोया हुआ महसूस करते हैं, लेकिन अगर हम ठान लें, तो कोई भी ताना हमारे लिए तरक्की की सीढ़ी बन सकता है।
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#स्वाभिमान की उड़ान: एक गृहणी की अनकही दास्तान
लेखिका : गरिमा चौधरी