सिंदूरी उम्मीद की वापसी

अवंतिका को अपनी ओर देखते पाकर समर की आंखें झुक गईं। एक वीर सिपाही, जो दुश्मनों के सामने कभी नहीं झुका, आज अपनी पत्नी के सामने हीनभावना और अपराधबोध से गड़ गया। उसके कांपते होठों से सिर्फ इतना निकला, “अवंतिका… मैं पूरा नहीं लौट सका। मैं आधा होकर लौटा हूँ। मुझे कई महीनों तक दुश्मन … Read more

शीशमहल की दीवारें

अनुराधा ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आंखों में एक अपूर्व तेज था, “मंदोदरी विवश थी, उसने आगाह ज़रूर किया था पर रोक नहीं सकी। लेकिन मैं आज की स्त्री हूँ। मंदोदरी की लाचारी मेरे हिस्से नहीं आएगी। मुझमें असत्य को असत्य कहने और अन्याय के सामने सीना तानकर खड़े होने की पूरी हिम्मत है। … Read more

पंखों पर बंधी डोर

 फोन के उस पार प्रणय ने बेहद संयम से उत्तर दिया, “पिताजी, अवनी कोई गलत काम नहीं कर रही है। वह अपनी मेहनत, अपने हुनर और अपनी लगन से अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। उसने परिवार के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाई, बल्कि शास्त्री नाम को एक नई प्रतिष्ठा दी है। मैं उसका … Read more

मैली हवेली का उजला सूरज

उस अंधेरी और तूफानी रात में, बिना कोई गहना लिए, बिना कोई धन-दौलत छुए, रागिनी सिर्फ तन पर लिपटी एक साधारण साड़ी में उस विशाल हवेली का भारी दरवाजा लांघकर बाहर निकल गई। पीछे भंवर सिंह की गालियां और धमकियां गूंजती रहीं कि वह भूखों मर जाएगी, लेकिन रागिनी ने एक बार भी पीछे मुड़कर … Read more

राख में दबी चिंगारी

जानकी ने हाथ जोड़कर अत्यंत संयत स्वर में कहा, “अम्माँ जी, आप मेरी सास नहीं, मेरी माँ हैं। बापूजी मेरे पिता हैं। पिछले बारह वर्षों में मैंने इस घर की हर मर्यादा को सिर माथे रखा। पर आज आप मुझसे वह माँग रही हैं जो मेरे पास बचा ही नहीं है। जब इन्होंने एक रात … Read more

जब घर की धड़कन रूठ गई

 “भैया, मुझसे अब नहीं सहा जाता। मुझे बहुत तेज भूख लगी है और मेरा पूरा शरीर दुख रहा है। मां कैसे करती हैं यह सब? सुबह पांच बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक वह बिना रुके चलती रहती हैं। कभी हमारे लिए नाश्ता, कभी पापा का टिफिन, कभी कपड़े धोना, कभी झाड़ू-पोंछा… … Read more

मुखौटे के पीछे का सच

 सामने का नजारा उनकी सोच की धज्जियां उड़ा रहा था। जमीन पर गिरा, धूल में लथपथ, गिड़गिड़ाता हुआ वह शख्स वही सुसंस्कृत, इत्र की खुशबू वाला, सभ्य विक्रम सेठ था, जिसकी नजरें शर्म और खौफ से जमीन में गड़ी थीं। और उसके ऊपर, अपनी जान की परवाह किए बिना उस रईस को दबोचे बैठा वह … Read more

आँचल की छाँव

 सलोनी पलटी और उसने गौरव की आँखों में सीधे देखा, “तमाशा मैंने नहीं, तुम्हारी संवेदनहीनता ने खड़ा किया है भैया। जो इंसान कल तुम्हारे लिए एक गैर-जरूरी बोझ था, आज उसके जाने पर तुम्हें सिर्फ अपनी झूठी लोक-लाज की चिंता है? तुम्हें मुबारक हो यह बड़ा मकान, मैं अपने भगवान को अपने साथ ले जा … Read more

धूप-छाँव की देहरी

“सही कह रही हो मनोरमा। आज की बहुओं को सास-ससुर फूटी आँख नहीं सुहाते। ज़रूर रागिनी ने ही शर्त रखी होगी कि जब तक तुम्हारे माँ-बाप घर खाली नहीं करेंगे, मैं पाँव नहीं रखूँगी। तभी तो बेचारी सुमित्रा को भरी दुपहरी से पहले ही घर छोड़ना पड़ा। ऊपर से नाम लगा दिया बेटी का! अरे … Read more

जलन – मधु वशिष्ठ

गायत्री जब गांव से जब नौवीं क्लास में हमारे कॉन्वेंट स्कूल में आई थी , तो काली सी और लंबे दांतों वाली लड़की जिसके कि कोई पास भी नहीं बैठना चाहता था। हम सब शहरों में रहने वाले स्वत: ही उस ग्रामीण लड़की को हेय नजर से देखते थे। लंच टाइम में जब सब अपना … Read more

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