रीमा वहीं बुत बनकर खड़ी रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी गलती क्या है? क्या उसका विधवा होना उसका अपराध है? या उसका किसी के आगे हाथ न फैलाकर खुद कमाना उसका गुनाह है? क्यों पुरुष वर्ग उसे बस एक इस्तेमाल की वस्तु समझता है, और जब अपनी पत्नी के सामने आता है तो सती-सावित्री होने का नाटक करता है?
फंक्शन के दौरान ही वाशरूम में शिखा और कुछ अन्य महिलाएँ खड़ी बातें कर रही थीं। रीमा अंदर गई तो शिखा ने ताना मारते हुए कहा, “कुछ औरतों को दूसरों के पतियों पर डोरे डालने की आदत होती है। खुद का तो घर बसा नहीं, दूसरों का उजाड़ने चल देती हैं।”
सुबह के सात बज रहे थे। अलार्म की आवाज़ से रीमा की नींद खुली। बगल का बिस्तर पिछले चार सालों से खाली था। एक सड़क हादसे में अपने पति कुणाल को खोने के बाद रीमा की दुनिया जैसे ठहर सी गई थी। लेकिन ज़िंदगी किसी के लिए नहीं रुकती। आंसुओं को पोंछकर, खुद को समेटकर रीमा ने एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी शुरू की और आज वह अपनी मेहनत के दम पर एक ऊंचे पद पर काम कर रही थी। वह अपने पैरों पर खड़ी थी, किसी की मोहताज नहीं थी। लेकिन समाज की नज़र में उसका यह आत्मनिर्भर होना ही सबसे बड़ा कांटा बन गया था।
बालकनी में खड़े होकर चाय पीते हुए उसने नीचे देखा, शर्मा आंटी अपनी एक पड़ोसन से बात कर रही थीं। रीमा जानती थी कि चर्चा का विषय वही है। कल शाम शर्मा आंटी ने उसे कहा था, “रीमा बेटा, तुम्हारी तो मज़े की ज़िंदगी है। न किसी के उठने की फिक्र, न किसी के लिए नाश्ता बनाने की टेंशन। अपना कमाओ, अपना खाओ और जब चाहो सो जाओ। काश! हमारी भी इतनी आज़ादी होती।” रीमा यह सुनकर बस मुस्कुरा कर रह गई थी। वह उन्हें कैसे समझाती कि रात के सन्नाटे में जब अकेलेपन का शोर कानों के पर्दे फाड़ने लगता है, तब वह आज़ादी कितनी भयानक लगती है। कैसे समझाती कि बुखार में जब पानी का एक गिलास देने वाला कोई नहीं होता, तब वह ‘मज़े की ज़िंदगी’ मौत से भी बदतर महसूस होती है।
तैयार होकर रीमा अपनी कार से ऑफिस के लिए निकल पड़ी। ऑफिस में भी माहौल कुछ अलग नहीं था। उसकी महिला सहकर्मी, जिनमें से कई शादीशुदा थीं, अक्सर रीमा को एक अजीब सी नज़र से देखती थीं। कभी-कभी लंच के समय बातें होतीं, “रीमा तो वीकेंड पर अकेले ही ट्रिप पर निकल जाती है। कितनी लकी है यार, ना सास का ताना, ना पति की रोक-टोक।” उन महिलाओं को यह नहीं दिखता था कि वह ट्रिप रीमा इसलिए करती है ताकि छुट्टियों के दिन उसे उस खाली घर में कुणाल की यादें पागल न कर दें। वह भीड़ में खुद को इसलिए धकेलती है ताकि अकेलेपन से भाग सके। महिलाओं की यह सोच हैरान करने वाली थी, लेकिन पुरुषों का रवैया इससे भी ज्यादा खतरनाक और खोखला था।
ऑफिस में एक सीनियर मैनेजर थे, सुधीर। सुधीर हमेशा रीमा के इर्द-गिर्द मंडराते रहते थे। जब भी रीमा उदास होती, सुधीर तुरंत हमदर्दी जताने पहुँच जाते। “रीमा जी, आपको कोई भी दिक्कत हो, मुझे बेझिझक बताइएगा। मैं समझ सकता हूँ कि अकेले रहना कितना मुश्किल होता है।” सुधीर की बातों में एक अजीब सी चाशनी होती थी, लेकिन उनकी आँखों में झांकने पर रीमा को कभी सम्मान नज़र नहीं आया। एक अकेली महिला बहुत जल्द समझ जाती है कि कौन उसे इज्जत दे रहा है और कौन उसे शिकार समझ रहा है।
एक दिन की बात है। ऑफिस में काम करते-करते काफी देर हो गई थी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और रीमा की कार वर्कशॉप में थी। कैब भी नहीं मिल रही थी। रात के नौ बज चुके थे। तभी सुधीर अपनी गाड़ी लेकर बेसमेंट से निकले और रीमा को देखकर रुक गए। “अरे रीमा जी, इस वक्त आपको कैब नहीं मिलेगी। चलिए, मैं आपको ड्रॉप कर देता हूँ।” रीमा ने पहले तो मना किया, लेकिन सुनसान सड़क और लगातार तेज होती बारिश को देखकर मजबूरी वश उसे सुधीर की लिफ्ट लेनी पड़ी।
कार में बैठते ही सुधीर का बर्ताव बदलने लगा। उसने अपनी शादीशुदा ज़िंदगी का रोना शुरू कर दिया। “रीमा जी, आप खुशकिस्मत हैं। मेरी पत्नी तो मुझे समझती ही नहीं। घर में हमेशा किट-किट रहती है। मुझे तो आपके जैसे एक शांत और समझदार साथी की तलाश थी।” सुधीर के शब्द रीमा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह जा रहे थे। उसने बहुत ही सख्ती से जवाब दिया, “सुधीर जी, मेरी मंज़िल आ गई है। कृपया गाड़ी रोकिए।” वह अपनी सोसाइटी के गेट से पहले ही बारिश में उतर गई।
लेकिन इस एक लिफ्ट का नतीजा रीमा को अगले ही दिन भुगतना पड़ा। ऑफिस में कानाफूसी शुरू हो चुकी थी। सुधीर ने खुद को बेदाग दिखाने के लिए कुछ पुरुष सहकर्मियों के बीच यह अफवाह फैला दी थी कि रीमा ने ही उसे लिफ्ट के लिए मजबूर किया था। अब ऑफिस के पुरुष सुधीर से अश्लील मज़ाक कर रहे थे और महिलाएँ रीमा को देखकर मुंह फेर रही थीं। रीमा की सबसे अच्छी दोस्त मानी जाने वाली शिखा ने भी उससे दूरी बना ली थी। रीमा हैरान थी कि समाज का यह कैसा न्याय है? गलती पुरुष की नीयत में होती है, लेकिन चरित्रहीन हमेशा महिला को घोषित कर दिया जाता है। एक विधवा या अकेली महिला को समाज हमेशा ‘आसानी से उपलब्ध’ (ईज़ी टारगेट) समझता है।
यह डर सिर्फ ऑफिस तक सीमित नहीं था। कई बार ट्रेन या बस में सफर करते समय रीमा खुद को गंदी नज़रों से बचाने के लिए अपने पर्स में रखा सिंदूर निकालकर मांग में भर लेती थी। कितनी बड़ी विडंबना थी! जिस सुहाग की निशानी को पहनने वाला अब इस दुनिया में नहीं था, उसी निशानी को उसे समाज के दरिंदों से बचने के लिए एक ढाल की तरह इस्तेमाल करना पड़ता था। वह सोचती थी कि आखिर क्यों एक औरत दूसरी औरत के दर्द को नहीं समझती? क्यों शादीशुदा महिलाओं को हमेशा यह डर सताता है कि कोई अकेली महिला उनके पति को फंसा लेगी?
इस पूरे ड्रामे का सबसे घिनौना रूप तब सामने आया जब ऑफिस की तरफ से एक एनुअल फंक्शन रखा गया। इसमें सभी कर्मचारियों को सपरिवार बुलाया गया था। रीमा भी वहां पहुँची। उसने देखा कि सुधीर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खड़ा है। रीमा सामान्य शिष्टाचार के नाते उनके पास गई और नमस्ते कहा। लेकिन हमदर्दी का डंका पीटने वाले, कार में अकेले अपनी पत्नी की बुराई करने वाले सुधीर ने ऐसे बर्ताव किया जैसे वह रीमा को जानता ही न हो। उसने मुंह फेर लिया और कन्नी काट कर दूसरी तरफ खिसक गया। सुधीर की पत्नी ने रीमा को ऊपर से नीचे तक एक तिरस्कार भरी नज़र से देखा और अपने पति का हाथ पकड़कर वहां से ले गई।
रीमा वहीं बुत बनकर खड़ी रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी गलती क्या है? क्या उसका विधवा होना उसका अपराध है? या उसका किसी के आगे हाथ न फैलाकर खुद कमाना उसका गुनाह है? क्यों पुरुष वर्ग उसे बस एक इस्तेमाल की वस्तु समझता है, और जब अपनी पत्नी के सामने आता है तो सती-सावित्री होने का नाटक करता है?
फंक्शन के दौरान ही वाशरूम में शिखा और कुछ अन्य महिलाएँ खड़ी बातें कर रही थीं। रीमा अंदर गई तो शिखा ने ताना मारते हुए कहा, “कुछ औरतों को दूसरों के पतियों पर डोरे डालने की आदत होती है। खुद का तो घर बसा नहीं, दूसरों का उजाड़ने चल देती हैं।”
आज रीमा के सब्र का बांध टूट गया। वह चुपचाप आंसू बहाने वाली बेचारी विधवा नहीं थी। उसने पलटकर शिखा की आँखों में आँखें डालीं और कहा, “शिखा, मेरी बात आज कान खोलकर सुन लो। मेरा घर उजड़ा है किस्मत की वजह से, मेरे चरित्र की वजह से नहीं। मैं यहां अपनी और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हूँ, तुम्हारे पतियों को फांसने नहीं आई हूँ। अगर तुम्हें अपने पतियों पर इतना ही शक है, तो उन्हें पट्टे में बांधकर रखा करो, मेरे चरित्र पर उंगली उठाने की जरूरत नहीं है।”
वाशरूम में सन्नाटा छा गया। रीमा ने आगे कहा, “तुम औरत होकर एक औरत का दर्द नहीं समझ सकतीं? तुम्हें लगता है मेरी ज़िंदगी बहुत आसान है? कभी अकेले उस अंधेरे घर में रहकर देखो, जहाँ सन्नाटा तुम्हें खाने को दौड़ता है। जब कोई पुरुष हमदर्दी के बहाने गंदी नीयत से पास आता है, तो एक अकेली औरत कितनी दहशत में जीती है, यह तुम सुहागिनें कभी नहीं समझ पाओगी। तुम अपने पतियों की कमियां नहीं देखतीं जो बाहर जाकर दूसरी औरतों के सामने गिड़गिड़ाते हैं, लेकिन उस अकेली औरत को कुलटा साबित करने में एक मिनट नहीं लगातीं। शर्म आनी चाहिए तुम सबको।”
रीमा वहां से बाहर निकल आई। उस दिन उसने तय कर लिया कि अब वह किसी भी झूठे समाज या खोखले रिश्तों के सामने सफाई नहीं देगी। पति और पत्नी जीवन की गाड़ी के दो पहिए ज़रूर होते हैं, लेकिन अगर एक पहिया टूट जाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि ज़िंदगी की गाड़ी वहीं रुक जाएगी। आज की नारी ने अपनी पहचान खुद बनाई है। वह किसी के नाम की मोहताज नहीं है।
उन सभी महिलाओं को अपनी सोच बदलने की ज़रूरत है, जो दूसरी अकेली महिलाओं को अपना दुश्मन मानती हैं। वे भी किसी की बहन, किसी की बेटी हैं। केवल उनका सुहाग उजड़ गया है, उनका स्वाभिमान नहीं। उनकी परेशानियों में अगर भागीदार नहीं बन सकते, तो कम से कम अपनी ज़ुबान से उनके चरित्र की हत्या तो मत करो। वक्त का पहिया गोल है, आज जो दुःख उनका है, कल वह किसी और का भी हो सकता है। और उन पुरुषों को भी यह समझना चाहिए कि हमदर्दी के नाम पर वासना का खेल खेलना बंद करें। अगर इतनी ही फिक्र है, तो अपनी पत्नियों के साथ वफादार रहें।
रीमा ने फंक्शन से बाहर कदम रखा। आज रात की हवा में ठंडक थी, लेकिन रीमा के अंदर एक नई आग जल रही थी। एक ऐसी आग जो अब किसी की झूठी हमदर्दी या तानों से बुझने वाली नहीं थी। वह अपनी मंज़िल की तरफ अकेले ही सही, लेकिन पूरे गर्व और सम्मान के साथ कदम बढ़ा रही थी।
दोस्तों, यह कहानी सिर्फ रीमा की नहीं, बल्कि हमारे समाज में संघर्ष कर रही हर उस अकेली महिला की है, जो हर दिन इस दोहरी मानसिकता से लड़ती है। कहानी पढ़ने के बाद आपके मन में क्या विचार आए? क्या समाज का नज़रिया कभी बदलेगा? कमेंट करके अपनी राय ज़रूर दें।
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लेखिका : रमा शुक्ला