रिश्तों की उलझी डोर और एक मीठी पहल

 “देख बेटा, विशाखा अभी नादान है। नई-नई इस घर में आई है। तू उसकी जेठानी है, बड़ी बहन जैसी है। अगर वो कोई काम अच्छा करे, तो उसकी तारीफ कर दिया कर। मीठे बोल बोलने में हमारे पैसे तो खर्च नहीं होते, लेकिन सामने वाले का दिल जरूर जीत लिया जाता है। अगर तू उसकी किसी काम के लिए तारीफ कर देगी, तो तेरा बड़प्पन कम नहीं हो जाएगा, बल्कि उसके मन में तेरे लिए इज्जत और बढ़ जाएगी। एक बार कोशिश करके देख।” इतना कहकर सुमित्रा देवी रसोई से बाहर चली गईं।

शहर के शोर-शराबे से दूर, एक शांत सी कॉलोनी में बना ‘शांति निवास’ हमेशा से अपनी इसी शांति के लिए जाना जाता था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से इस घर की दीवारों के भीतर एक अजीब सी खामोशी का शोर गूंजने लगा था। यह शोर था बर्तनों के टकराने का, दरवाजों के जोर से बंद होने का और बिना कुछ कहे एक-दूसरे को दी जाने वाली तीखी नजरों का। इस घर की मालकिन, सुमित्रा देवी, एक सुलझी हुई और शांत स्वभाव की महिला थीं। उनके दो बेटे थे, आकाश और विकास। दोनों भाइयों में राम-लक्ष्मण जैसा प्यार था। बचपन से लेकर बड़े होने तक, दोनों ने हर खुशी और गम साथ बांटा था। लेकिन वक्त के साथ घर में दो नई सदस्यों का प्रवेश हुआ—आकाश की पत्नी राधिका और विकास की पत्नी विशाखा। शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा लगा, लेकिन धीरे-धीरे राधिका और विशाखा के बीच अहम का टकराव शुरू हो गया।

दोनों स्वभाव से बिल्कुल अलग थीं। राधिका, जो जेठानी थी, उसे लगता था कि घर के हर काम में उसकी ही चलनी चाहिए क्योंकि वह बड़ी है। वहीं विशाखा, जो नई और आधुनिक विचारों वाली थी, उसे राधिका का हर बात में टोकना अपनी आजादी पर हमला लगता था। बात-बात पर दोनों के बीच शीत युद्ध छिड़ जाता। कभी खाने में नमक कम होने पर, तो कभी घर की सफाई को लेकर। इन दोनों की इस खींचतान में अगर कोई सबसे ज्यादा पिस रहा था, तो वो थे आकाश और विकास। दोनों भाई अपनी-अपनी पत्नियों को समझाकर हार चुके थे। उन्हें डर था कि कहीं इन दोनों की लड़ाई के कारण उनका बरसों का भाईचारा न टूट जाए और उन्हें अलग-अलग न रहना पड़े, जो कि दोनों ही नहीं चाहते थे।

एक रविवार की सुबह, आकाश और विकास ने एक योजना बनाई। उन्होंने अपनी माँ सुमित्रा देवी से कहा कि बहुत दिन हो गए हैं, चलिए आज आपको आपकी पसंद के मंदिर ले चलते हैं और फिर गंगा किनारे थोड़ी देर बैठेंगे। सुमित्रा देवी को थोड़ा आश्चर्य तो हुआ, क्योंकि दोनों बेटे अमूमन छुट्टी के दिन घर पर ही आराम करना पसंद करते थे। फिर भी वह तैयार होकर उनके साथ चल पड़ीं। मंदिर में दर्शन करने के बाद, तीनों गंगा किनारे एक शांत सी जगह पर आकर बैठ गए। नदी की कलकल बहती धारा के बीच एक सुकून भरी शांति थी, लेकिन सुमित्रा देवी भांप गई थीं कि उनके बेटों के मन में कोई बड़ा तूफान चल रहा है।

“अब बता भी दो, क्या बात है? तुम दोनों के चेहरे देखकर ही लग रहा है कि मंदिर दर्शन तो बस एक बहाना था,” सुमित्रा देवी ने आकाश के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।

आकाश ने एक गहरी सांस ली और नदी के पानी को देखते हुए बोला, “माँ, आप तो सब जानती हैं। घर में आजकल जो माहौल है, उससे हम दोनों बहुत परेशान हो गए हैं। राधिका और विशाखा के बीच दिन-ब-दिन दूरियां बढ़ती जा रही हैं। दोनों में से कोई भी एक-दूसरे को समझने की कोशिश नहीं करता। मैं राधिका को समझाता हूँ तो उसे लगता है कि मैं विशाखा की तरफदारी कर रहा हूँ।”

विकास ने भी बड़े उदास स्वर में अपनी बात जोड़ी, “हाँ माँ, और अगर मैं विशाखा से कुछ कहता हूँ, तो वो रोने लगती है और कहती है कि इस घर में उसकी कोई अहमियत ही नहीं है, सब राधिका भाभी की ही सुनते हैं। माँ, हम दोनों भाई एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। हम नहीं चाहते कि इन रोज-रोज के झगड़ों की वजह से हमारे बीच कोई दीवार खड़ी हो जाए या हमें अलग होना पड़े। हम घर का बंटवारा नहीं चाहते माँ। लेकिन हमें समझ नहीं आ रहा कि इस रोज की चिक-चिक को कैसे खत्म करें। अगर हम घर में उन्हें आपके सामने कुछ कहते हैं, तो वो उल्टा हम पर ही भड़क जाती हैं।”

सुमित्रा देवी ने बहुत ही धैर्य से अपने दोनों बेटों की बातें सुनीं। उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। उन्हें अपने बेटों की समझदारी और उनके आपसी प्यार पर गर्व महसूस हुआ। उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा, “मुझे पता था कि तुम दोनों इसी बात को लेकर परेशान हो। मैंने भी घर में यह सब महसूस किया है। लेकिन मैं चुप इसलिए थी क्योंकि मैं देखना चाहती थी कि तुम दोनों इसे कैसे संभालते हो। खैर, तुम दोनों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। इस समस्या का हल मेरे पास है, लेकिन एक शर्त है।”

“क्या शर्त है माँ? आप जो कहेंगी हम करेंगे,” दोनों भाइयों ने एक साथ कहा।

“शर्त यह है कि तुम दोनों घर जाकर इस बारे में किसी से कोई बात नहीं करोगे। एकदम सामान्य रहोगे जैसे कुछ हुआ ही न हो। तुम दोनों बिल्कुल भी बीच-बचाव नहीं करोगे। बाकी जो करना है, वो मैं खुद कर लूंगी। बस उन दोनों को यह भनक न लगे कि तुमने मुझसे उनकी शिकायत की है, वरना बात सुलझने के बजाय और उलझ जाएगी।”

आकाश और विकास ने हामी भरी। दोनों को अपनी माँ पर पूरा भरोसा था। थोड़ी देर बाद तीनों घर लौट आए। घर में सब कुछ वैसे ही चल रहा था। राधिका और विशाखा अपने-अपने कामों में लगी थीं, लेकिन उनके बीच वही खामोश तनाव बरकरार था।

अगली सुबह, सुमित्रा देवी नहा-धोकर पूजा-पाठ से निवृत्त हुईं। उन्होंने देखा कि राधिका रसोई में काम कर रही है और विशाखा बाहर बरामदे में कपड़े सुखा रही है। सुमित्रा देवी धीरे से रसोई में गईं। राधिका उन्हें देखकर थोड़ी झिझकी।

“राधिका बेटा, एक बात कहनी थी तुमसे,” सुमित्रा देवी ने बहुत ही प्यार से राधिका के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

“जी माँ जी, कहिए ना। कोई गलती हो गई क्या मुझसे?” राधिका ने घबराते हुए पूछा।

“नहीं बेटा, गलती नहीं। तू तो इस घर की बड़ी बहू है, समझदार है। मैंने हमेशा तुझमें अपनी परछाई देखी है। तू जानती है ना कि बड़ों का काम सिर्फ छोटों को टोकना नहीं होता, बल्कि उन्हें प्यार से सही रास्ता दिखाना भी होता है।” सुमित्रा देवी ने बहुत ही ठहराव के साथ बात शुरू की।

राधिका चुपचाप सुनती रही।

“देख बेटा, विशाखा अभी नादान है। नई-नई इस घर में आई है। तू उसकी जेठानी है, बड़ी बहन जैसी है। अगर वो कोई काम अच्छा करे, तो उसकी तारीफ कर दिया कर। मीठे बोल बोलने में हमारे पैसे तो खर्च नहीं होते, लेकिन सामने वाले का दिल जरूर जीत लिया जाता है। अगर तू उसकी किसी काम के लिए तारीफ कर देगी, तो तेरा बड़प्पन कम नहीं हो जाएगा, बल्कि उसके मन में तेरे लिए इज्जत और बढ़ जाएगी। एक बार कोशिश करके देख।” इतना कहकर सुमित्रा देवी रसोई से बाहर चली गईं।

राधिका वहीं खड़ी सोच में पड़ गई। उसकी जेठानी वाली अहम् को थोड़ी ठेस तो लगी। उसने मन ही मन सोचा, ‘मैं क्यों करूँ उसकी तारीफ? वो क्या कम है मुझे ताने मारने में? अगर मैं उसके काम की तारीफ करूँगी, तो उसका तो दिमाग ही सातवें आसमान पर पहुँच जाएगा। वैसे भी, वो मेरे किसी काम में नुक्स निकाले बिना तो मानती नहीं है। कोयले को कितना भी धो लो, वो सफेद थोड़े ही हो जाता है।’

राधिका ने अपनी सास की बात को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देने का मन बना लिया। उसे लगा कि सुमित्रा देवी विशाखा का पक्ष ले रही हैं। लेकिन फिर भी, माँ जी की बात उसके दिमाग में कहीं न कहीं गूंज रही थी— ‘मीठे बोल बोलने में क्या जाता है…’

दोपहर का वक्त था। घर के बाकी सभी लोग अपने-अपने कामों पर जा चुके थे। घर में सिर्फ सुमित्रा देवी, राधिका और विशाखा थीं। राधिका किसी काम से वापस रसोई में आई। उसने देखा कि विशाखा ने गैस के पास रखे मसालों के डिब्बों को बहुत ही करीने से साफ करके सजा कर रखा है। आमतौर पर राधिका इन डिब्बों को अपनी सहूलियत के हिसाब से रखती थी, लेकिन आज जिस तरह से विशाखा ने उन्हें सजाया था, वो देखने में बहुत अच्छा लग रहा था और इस्तेमाल करने में भी आसान था।

राधिका की आदत थी कि अगर विशाखा कुछ भी करती, तो वह उसमें कोई न कोई कमी जरूर निकालती। आज भी उसके गले तक एक ताना आ चुका था, ‘ये डिब्बे यहां क्यों रख दिए? मुझे काम करने में परेशानी होती है।’ लेकिन तभी उसे सुबह कही गई सुमित्रा देवी की बात याद आ गई— ‘तारीफ करने से तुम्हारा बड़प्पन कम नहीं होगा।’

राधिका ने एक गहरी सांस ली। उसने अपने अहम को थोड़ा किनारे रखा और रसोई के दरवाजे पर खड़ी विशाखा की तरफ देखकर कहा, “विशाखा… ये मसालों के डिब्बे तुमने लगाए हैं?”

विशाखा एकदम से सतर्क हो गई। उसे लगा कि अब फिर से कोई बहस शुरू होने वाली है। उसने रुखेपन से जवाब दिया, “हाँ, मैंने ही लगाए हैं। गंदे हो रहे थे, तो साफ करके रख दिए। अगर आपको पसंद नहीं आए तो मैं वापस वैसे ही रख देती हूँ।” विशाखा बचाव की मुद्रा में आ गई थी।

राधिका ने हल्का सा मुस्कुराने की कोशिश की, जो उसके लिए थोड़ा मुश्किल था, लेकिन उसने कहा, “नहीं… मैं तो बस यह कह रही थी कि तुमने बहुत अच्छे से इन्हें सजाया है। देखने में भी साफ लग रहे हैं और खाना बनाते समय हाथ में भी आसानी से आ जाएंगे। अच्छा किया तुमने।”

विशाखा पल भर के लिए जड़ हो गई। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। राधिका भाभी, जो हमेशा उसके काम में कमियां निकालती थीं, आज उसकी तारीफ कर रही थीं? वह भी बिना किसी ताने के? विशाखा का जो रक्षात्मक आवरण था, वह अचानक से पिघलने लगा।

“स… सच में भाभी? आपको अच्छा लगा?” विशाखा ने हिचकिचाते हुए पूछा, उसके चेहरे पर एक अचरज भरी खुशी थी।

“हाँ, सच में। मैंने तो कभी इस तरह से रखने का सोचा ही नहीं था,” राधिका ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कहा।

विशाखा की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। वह जो हर समय लड़ने के लिए तैयार रहती थी, अचानक शांत हो गई। उसने धीरे से कहा, “धन्यवाद भाभी। दरअसल, मैंने देखा था कि आपको खाना बनाते समय बार-बार पीछे मुड़ना पड़ता है, इसलिए मैंने इन्हें यहाँ रख दिया ताकि आपको आसानी हो।”

राधिका भी यह सुनकर हैरान रह गई। उसे पहली बार एहसास हुआ कि विशाखा भी उसके बारे में सोचती है। यह सिर्फ एक छोटी सी तारीफ थी, बस कुछ मीठे शब्द। लेकिन इन शब्दों ने उस बर्फ को पिघला दिया था जो पिछले कई महीनों से उन दोनों के रिश्तों के बीच जमी हुई थी।

सुमित्रा देवी दरवाजे के पीछे से यह सब देख और सुन रही थीं। उनके चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान थी। उन्हें पता था कि एक बार जब शुरुआत हो जाती है, तो रास्ता खुद-ब-खुद बन जाता है।

उस शाम जब आकाश और विकास घर लौटे, तो उन्होंने एक बहुत ही अलग नजारा देखा। राधिका और विशाखा एक साथ बैठकर चाय पी रही थीं और किसी बात पर हंस रही थीं। दोनों भाइयों ने एक-दूसरे की तरफ हैरानी से देखा और फिर अपनी माँ की तरफ। सुमित्रा देवी ने उन्हें आँख मारकर मुस्कुराने का इशारा किया।

उस रात खाने की मेज पर कोई खामोशी नहीं थी, कोई तनाव नहीं था। राधिका ने विशाखा द्वारा बनाई गई सब्जी की दिल खोलकर तारीफ की और बदले में विशाखा ने अगली सुबह राधिका की पसंद का नाश्ता बनाने की बात कही।

आकाश और विकास को समझ आ गया था कि उनकी माँ ने वह जादू कर दिया है जो वे महीनों से नहीं कर पा रहे थे। रिश्तों में दरारें अक्सर गलतफहमियों और अहम के टकराव से आती हैं, लेकिन प्यार के कुछ मीठे शब्द और थोड़ी सी समझदारी उन दरारों को भर सकती है। सुमित्रा देवी की उस छोटी सी सीख ने न सिर्फ दो देवरानी-जेठानी को करीब ला दिया था, बल्कि दो भाइयों को हमेशा के लिए अलग होने के दर्द से भी बचा लिया था। ‘शांति निवास’ में एक बार फिर से सच्ची शांति लौट आई थी।

क्या आपके घर में भी कभी ऐसे छोटे-मोटे झगड़े बड़े तनाव का कारण बने हैं? आपको क्या लगता है, क्या मीठे बोल सच में कड़वाहट को दूर कर सकते हैं? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ जरूर बांटें!

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

 लेखिका : नेहा पटेल 

error: Content is protected !!