स्वाभिमान मेरा भी। – मधु वशिष्ठ

  पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था। मुझे माल्यार्पण किया जा रहा था और बहुत सुंदर फ्रेम्ड सर्टिफिकेट से सम्मानित भी किया जा रहा था। और ऐसा हो भी क्यों ना आज मेरा सेवा निवृत्ति का दिन था। 

         पति और बच्चों के साथ जब मैंने घर वापस आने पर स्वयं को मिले हुए सारे उपहार सासू मां को दिखाएं तो वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी। अब वह भी बड़े अभिमान से अपनी सहेलियों को और रिश्तेदारों को बताती थी कि मेरी बहु भी बड़ी अफसर है। परंतु जीवन में यहां तक आना मेरे लिए इतना सरल भी ना था। 

             घर की मैं इकलौती बेटी विवाह के बाद जब दूसरे शहर में आई तो वहां सबसे अच्छी बात यह थी कि घर में चार बहने और दो भाई और थे। मुझे मायके वाले घर में जो अकेलापन महसूस होता था ,मेरा ख्याल था विवाह होने के उपरांत घर में बहुत सारे लोग होने से कितना आनंद आता होगा और घर में अकेलापन भी महसूस नहीं होगा।

ससुराल में ससुर जी का बहुत बड़ा फर्नीचर का शोरूम था। यूं तो ससुराल का घर ही बहुत बड़ा था परंतु उसके आगे बहुत सारी दुकानें भी ससुर जी की थी जिनमें कि फर्नीचर की बहुत बड़ी दुकान थी उसमें ही मेरे पति और देवर भी जाया करते थे। घर वास्तव में बहुत बड़ा था, हालांकि दो बहनों का विवाह भी हो चुका था

परंतु वह भी नजदीक ही थी और घर में अपने बच्चों के साथ आती जाती ही रहती थी। घर में भले ही अकेलापन नहीं था परंतु क्योंकि घर का सारा काम घर की औरतों को ही करना होता था और औरतों में से भी विवाहित बहनें खुद को मेहमान ही समझती थी,

अविवाहित दोनों बहने और छोटा भाई अपने स्कूल कॉलेज में ही व्यस्त होते थे तो घर का सारा काम मुझ पर ही आन पड़ा था। मुझे अकेले रहने की आदत थी ,भले ही मुझे घर का काम करना भी आता था परंतु इतने बड़े घर का काम संभालना तो लगभग मेरे लिए असंभव ही था। घर की बहु होने के नाते सबकी मेरे से बहुत उम्मीदें थी

और मैं सारा दिन घर के काम में ही व्यस्त रहती थी। धीरे-धीरे कमजोर और फिर बीमार रहने लगी। ज्यादा बीमार होने पर मायके चली जाती थी , अब तो अवसाद ग्रस्त होने के बाद मुझे तो ससुराल का घर ही डराने लगा था। काम करते हुए सबका तुनकना, लड़ना झगड़ा सब सामान्य हो गया था।

पति ससुर और देवर तो अधिकतर शोरूम में ही व्यस्त रहते थे। उनका समय पर खाना इत्यादि चाहिए ही होता था। काम सही से न होने के कारण सबका मुझे ताना देना भी सामान्य ही हो गया था। भले ही सासू मां मुझे कुछ नहीं कहती थी  परंतु यह बात भी उतनी ही सत्य है कि वह औरों को भी मुझे कुछ कहने से नहीं रोकती थी।

अवसादग्रस्त और बीमार होने की अवस्था में एक बार जब पतिदेव ने घर में सबको मेरे बारे में समझाते हुए कहा कि उससे अधिक काम मत करवाया करो वह थक जाती है, उससे काम नहीं होता  तो सासु मां और बड़ी बहनों ने गुस्से में कहा काम नहीं होता खाया तो जाता है? जब वह खाती है तो घर का काम क्यों नहीं कर सकती?

        पाठकगण, मैं पढ़ी-लिखी भी थी और शायद परमात्मा की कृपा से मैं विवाह से पहले कुछ सरकारी परीक्षाओं के पेपर देकर आई थी और उन्हीं में से ही मेरा एक सरकारी पेपर पास भी हो गया था। मैंने अपने मायके आकर सरकारी नौकरी ज्वाइन कर ली थी।

मुझे काम करने से परहेज नहीं था परंतु मुझे लगा कि अपने खाने के लिए मैं झाड़ू पोछा और घर के काम से ऊपर भी कुछ करके जी सकती हूं यहां बात मेरे आत्म सम्मान की थी, जिसका रोज-रोज जाना मुझे अवसाद ग्रस्त कर रहा था। हालांकि मेरे मायके और ससुराल और मेरी नौकरी के स्थान में बहुत दूरी थी

परंतु मेरे दृढ़ निश्चय के आगे वह दूरी कुछ भी नहीं थी। मैं बस से रिक्शा से, कैसे भी अपने कार्यालय तक पहुंचती थी। नौकरी ज्वाइन करने के बाद ससुराल में  सबको बहुत बुरा लगा, हालांकि सासु मां ने तो कहा भी था तुम्हारी सरकारी तनखा से ज्यादा तो हम अपनी दुकान में ही कारीगरों को पैसे देते हैं।

पतिदेव क्योंकि घर के ही  व्यापार में साथ थे तो वह भी बहुत अधिक तो कह नहीं सकते थे परंतु उन्होंने मेरे आत्म बल को कम नहीं होने दिया। मैंने अपने पैसों से ही घर में बच्चों को संभालने और घर का काम करने के लिए एक गृह सहायिका भी रख दी थी। शायद उसके पैसे मैं देती थी इसलिए ही सब चुप थे।

            समय बीता, घर में सब के विवाह हो गए और अब घर और दुकान भी सब भाइयों में अलग-अलग बंट चुकी थी। अब सबके काम भी अलग हो गए थे। सरकारी नौकरी में मेरी तनख्वाह भी बढ़ चुकी थी और अब सासू मां को भी मुझ पर गर्व होता था और वह घर की और बहुओं को भी कहती थी

कि हमारी बहू तो घर दफ्तर बच्चे सब अच्छे से संभाल लेती है। उन्होंने भी बाद में मेरे को यथासंभव सहयोग किया। यूं ही प्रमोशन होते होते मैं दफ्तर में भी ऑफिसर के पद पर पहुंच चुकी थी। भले ही मुझे बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ा हो परंतु आत्म सम्मान और स्वाभिमान यदि आपका बचा रहे तो अवसाद की जगह हमेशा आत्मविश्वास ले लेता है। वही मेरे साथ हुआ। 

          आज सेवानिवृत होने के बाद जब मुझे रात में फुर्सत मिली है तो मैं स्वयं को ही धन्यवाद करती हूं कि मैंने अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान को बचाए रखा और वह सब लोग जिन्होंने मेरी अब तक की यात्रा में मुझे योगदान दिया उन सब का धन्यवाद मैं मन ही मन कर रही थी।

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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