रोहन ने अपनी बात जारी रखी, “बाबूजी, क्या अब भी आप भाभी को उसी चौखट पर बांधे रखना चाहते हैं जहाँ से कभी कोई नहीं गुज़रेगा? अगर यही सब हमारी बहन के साथ हुआ होता… अगर आपके दामाद ने हमारी बहन को ऐसे छोड़ दिया होता, तो क्या तब भी आप यही कहते कि ‘मर्द है, लौट आएगा’? क्या तब भी आप अपनी बेटी को घुट-घुट कर मरने के लिए छोड़ देते? नहीं ना! आप आसमान सिर पर उठा लेते, कोर्ट-कचहरी करते, और उसकी दूसरी शादी करवाते। फिर मीता भाभी के लिए वो इंसाफ क्यों नहीं?”
रामनाथ जी के पुश्तैनी आंगन में आज अजीब सा सन्नाटा पसरा था, जिसे रह-रहकर उनकी भारी आवाज़ चीर रही थी। “अपनी ज़बान को लगाम दो रोहन! तुम भूल रहे हो कि तुम किसके सामने खड़े हो और किसके बारे में बात कर रहे हो। वो इस घर की बड़ी बहू है, तुम्हारे बड़े भाई समीर की पत्नी। और तुम… तुम अपने इस आवारा दोस्त को हमारे ही घर में लाकर हमारी बहू का हाथ माँगने की जुर्रत कर रहे हो? क्या इसी दिन के लिए तुम्हें पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया था?” रामनाथ जी का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था।
पास ही खड़ी उनकी पत्नी, कावेरी देवी, अपने आँसुओं को আঁচल से पोंछते हुए बोलीं, “अरे रामनाथ जी, इसे क्या कह रहे हैं, कलियुग आ गया है। बड़े भाई की पत्नी माँ के समान होती है, और ये कल का छोकरा आज अपनी ही भाभी के लिए दूसरा घर ढूँढ रहा है। शर्म से धरती क्यों नहीं फट जाती!”
आंगन के एक कोने में, एक खंभे के सहारे खड़ी मीता बस खामोशी से ज़मीन को घूरे जा रही थी। उसकी आँखों के आँसू सूख चुके थे और चेहरे पर एक ऐसी शून्यता थी जो सालों की घुटन के बाद आती है।
रोहन, जो अब तक अपने माता-पिता के गुस्से को बर्दाश्त कर रहा था, अब और शांत नहीं रह सका। उसने गहरी साँस ली और अपनी आवाज़ को दृढ़ करते हुए कहा, “माँ, आप जिसे माँ समान कह रही हैं, उसकी उम्र क्या है? महज़ छब्बीस साल! और आप लोग किस मर्यादा की दुहाई दे रहे हैं? वो मर्यादा जिसे आपके लाडले बड़े बेटे समीर ने तीन साल पहले ही तार-तार कर दिया था?”
“चुप कर!” रामनाथ जी ने अपनी छड़ी ज़मीन पर पटकते हुए कहा। “समीर जो भी है, मीता का पति है, उसका परमेश्वर है।”
“परमेश्वर?” रोहन की हंसी में एक गहरी कड़वाहट थी। “बाबूजी, आप दोनों ने मीता भाभी के गरीब पिता को मीठी-मीठी बातें बोलकर इस घर में ब्याह कर लाया था। क्या आपको नहीं मालूम था कि समीर भैया शहर में किसी और लड़की के साथ रहते हैं? क्या आपको उनका वो सच नहीं पता था जो शादी के एक हफ़्ते बाद ही पूरे घर के सामने आ गया था, जब वो रात के अंधेरे में अपनी नई-नवेली दुल्हन को सोता छोड़कर भाग गए थे?”
कावेरी देवी नज़रें चुराते हुए बोलीं, “बेटा था हमारा, हमने सोचा शादी कर देंगे तो सुधर जाएगा। और फिर मीता में ही कोई कमी रही होगी जो वो अपने पति को रिझा नहीं पाई, उसे बांध कर नहीं रख सकी। औरत का तो काम ही होता है अपने घर और पति को सहेज कर रखना। अब अगर मर्द बाहर चला गया, तो इसमें हमारा क्या दोष?”
“वाह माँ, वाह!” रोहन ने ताली बजाते हुए कहा। “क्या कमाल का न्याय है आपका। समीर भैया शहर में अपनी प्रेमिका के साथ ऐश की ज़िंदगी जी रहे हैं, और दोष मीता भाभी का? क्योंकि वो उन्हें ‘रिझा’ नहीं पाईं? बाबूजी, जब आपको पता चला था कि भैया शहर में उस लड़की के साथ रह रहे हैं, तो क्या आपने उन्हें रोका? क्या आपने उन्हें ज़ोर देकर वापस आने को कहा? नहीं! आपने बस उन्हें जायदाद से बेदखल करने की खोखली धमकी दी, जिसका उन पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि वो पहले से ही अच्छी नौकरी में थे। आपने कभी एक पिता होने का फर्ज निभाया ही नहीं।”
रामनाथ जी ने आवाज़ नीची करते हुए कहा, “रोहन, घर की बातें सड़क पर नहीं लाई जातीं। मर्द है, भटक गया है। कभी तो ठोकर खाएगा और वापस लौट आएगा। और जब वो लौटेगा, तो उसकी पत्नी यहीं उसका इंतज़ार करती मिलेगी। यही हमारे खानदान की रीत है।”
“और अगर वो कभी न लौटे तो?” रोहन ने सीधे अपनी माँ की आँखों में देखते हुए पूछा। “माँ, आप एक औरत हैं। ज़रा सोचिए, पिछले तीन सालों से भाभी इस घर में क्या जी रही हैं? वो एक ज़िंदा लाश बन चुकी हैं। सुबह उठती हैं, चक्की पीसती हैं, आप दोनों की सेवा करती हैं, आपके ताने सुनती हैं, और रात को एक सूने कमरे में जाकर अपने नसीब को कोसती हैं। क्या एक लड़की का जीवन बस यही होता है? क्या इसी दिन के लिए उनके पिता ने उन्हें विदा किया था?”
आंगन में खड़ा रोहन का दोस्त, आलोक, जो अब तक खामोश था, हाथ जोड़कर आगे आया। “माफ़ कीजिएगा रामनाथ अंकल, मेरा इरादा आप लोगों का अपमान करने का नहीं है। मैं एक डॉक्टर हूँ और पिछले कई महीनों से जब भी मैं आपकी दवाइयां देने आता हूँ, मैंने मीता जी को देखा है। मैंने उनके सम्मान, उनकी सहनशीलता को देखा है। मेरी पत्नी का देहांत दो साल पहले हो चुका है। मैं मीता जी को वो सम्मान और वो ज़िंदगी देना चाहता हूँ जिसकी वो हक़दार हैं। मैं कोई अहसान नहीं कर रहा, बल्कि मैं खुद को खुशकिस्मत समझूंगा अगर वो मेरे जीवन में आएं।”
“तुझे तो मैं…” रामनाथ जी आलोक की तरफ झपटे, लेकिन रोहन बीच में आ गया।
“बाबूजी, आलोक को मैंने बुलाया है। और मैं आज फैसला करके आया हूँ। मैं अभी-अभी शहर से होकर लौटा हूँ। मैं भैया से मिला था। उनका एक साल का बच्चा भी है उस लड़की से। उन्होंने साफ कह दिया है कि वो इस घर में और मीता भाभी की ज़िंदगी में कभी वापस नहीं लौटेंगे।”
यह सुनते ही कावेरी देवी वहीं ज़मीन पर बैठ गईं। रामनाथ जी के हाथ से छड़ी छूट गई। मीता के शरीर में एक हल्की सी कंपन हुई, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
रोहन ने अपनी बात जारी रखी, “बाबूजी, क्या अब भी आप भाभी को उसी चौखट पर बांधे रखना चाहते हैं जहाँ से कभी कोई नहीं गुज़रेगा? अगर यही सब हमारी बहन के साथ हुआ होता… अगर आपके दामाद ने हमारी बहन को ऐसे छोड़ दिया होता, तो क्या तब भी आप यही कहते कि ‘मर्द है, लौट आएगा’? क्या तब भी आप अपनी बेटी को घुट-घुट कर मरने के लिए छोड़ देते? नहीं ना! आप आसमान सिर पर उठा लेते, कोर्ट-कचहरी करते, और उसकी दूसरी शादी करवाते। फिर मीता भाभी के लिए वो इंसाफ क्यों नहीं?”
रामनाथ जी के पास कोई जवाब नहीं था। उनकी पुरुषसत्तात्मक सोच और समाज का डर उन्हें अंदर ही अंदर खा रहा था। “समाज क्या कहेगा रोहन? लोग थू-थू करेंगे कि रामनाथ की बहू किसी और के साथ भाग गई।”
“समाज आपके घर का राशन नहीं भरता बाबूजी! समाज ने आकर कभी मीता भाभी के आँसू नहीं पोंछे।” रोहन की आँखों में भी अब पानी आ गया था। “ये कोई हत्या या पाप नहीं है बाबूजी, ये एक इंसान को उसकी ज़िंदगी वापस लौटाना है। मैंने हमेशा आपको अपना आदर्श माना है, लेकिन आज अगर आपने मीता भाभी को इस नर्क से नहीं निकाला, तो मैं जीवन भर आपका सम्मान नहीं कर पाऊँगा।”
काफ़ी देर तक आंगन में एक भारी सन्नाटा छाया रहा। सिर्फ़ कावेरी देवी के सिसकने की आवाज़ आ रही थी।
तभी, वो हुआ जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। मीता, जो पिछले तीन सालों से सिर्फ़ एक परछाईं बनकर रह गई थी, धीरे-धीरे आगे आई। उसने अपने सिर से पल्लू पीछे किया और रामनाथ जी की आँखों में देखते हुए शांत लेकिन मज़बूत आवाज़ में बोली, “बाबूजी, पिछले तीन सालों में मैंने इस घर को अपना मंदिर माना और आप दोनों को भगवान। मेरे पति ने मुझे छला, लेकिन मैंने सोचा शायद मेरी सेवा से आपका दिल पिघल जाए और आप मुझे अपनी बेटी मान लें। लेकिन मैं गलत थी। बहू कभी बेटी नहीं बन सकती।”
मीता की आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गहरा सच था। “आपने मुझे हमेशा एक ऐसी अमानत समझा जिसे आप अपने बेटे को सौंप सकें। लेकिन मैं कोई निर्जीव वस्तु नहीं हूँ। मेरी भी सांसें हैं, मेरे भी कुछ सपने थे जो इस आंगन की चारदीवारी में घुटकर मर गए। रोहन सही कह रहा है बाबूजी, अगर मैं आपकी बेटी होती, तो आप मुझे इस तरह तिल-तिल कर मरने नहीं देते।”
मीता मुड़ी और उसने रोहन की तरफ देखा। “रोहन, तुमने मुझे वो सम्मान दिया है जो शायद सगे भाई भी नहीं दे पाते। तुमने मुझे इस पिंजरे से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया है।” फिर वो आलोक की ओर मुड़ी, “आलोक जी, क्या आप सच में इस समाज के तानों के बावजूद मेरा हाथ थामने को तैयार हैं?”
आलोक ने दृढ़ता से सिर हिलाया, “समाज मेरे लिए मायने नहीं रखता मीता जी, मेरे लिए एक इंसान की खुशी और उसका आत्मसम्मान सबसे ऊपर है। मैं आपके हर फैसले में आपके साथ खड़ा हूँ।”
मीता ने एक गहरी साँस ली और रामनाथ जी के पैर छुए। “मुझे माफ़ कर दीजिएगा बाबूजी। मैंने आपका घर नहीं तोड़ा, बल्कि वो तो तीन साल पहले ही टूट गया था। मैं बस अपनी बची-खुची ज़िंदगी बटोर कर ले जा रही हूँ।”
रामनाथ जी कुछ बोल नहीं पाए। उनके होंठ कांपे, पर कोई शब्द नहीं निकला। कावेरी देवी बस ज़मीन पर बैठी रोती रहीं।
रोहन ने आगे बढ़कर मीता भाभी का सूटकेस उठाया जो उसने पहले ही चुपके से पैक कर दिया था। तीनों घर की चौखट पार कर बाहर निकल गए। पीछे छूट गया था एक ऐसा घर जिसकी खोखली मर्यादाएं आज टूट चुकी थीं, और सामने थी एक नई सुबह, जहाँ एक औरत अपनी ज़िंदगी का नया अध्याय शुरू करने जा रही थी। मीता के कदम अब भारी नहीं थे, उनमें एक नई उड़ान का हौसला था, क्योंकि उसने सिंदूर की बेड़ियों को तोड़कर अपनी आज़ादी को चुन लिया था।
क्या आपको लगता है कि रोहन और मीता ने अपनी जगह सही फैसला लिया? क्या हमारे समाज में आज भी बहुओं को बेटियों जैसा हक़ नहीं मिलता? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ, हमें आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा!
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लेखिका : आरती देवी