अभिनव ने पिता के आँसू पोंछते हुए कहा, “पिताजी, परेशानी तो तब होती है जब नीयत में खोट हो। आपने हमें जो संस्कार दिए हैं, जो ईमानदारी और बड़ों का सम्मान करना सिखाया है, क्या वो बस किताबी बातें थीं? आपने अपनी पूरी ज़िंदगी हमारी पढ़ाई और भविष्य के लिए कुर्बान कर दी, अब जब हमारी बारी है आपका बुढ़ापा सँवारने की, तो आप हमें पराया कर रहे हैं? विला आपके नाम पर रहेगा, और हम आपके आदेश से वहां रहेंगे। बस।”
“क्या बात है रमाकांत भाई! आजकल बहुत गुमसुम रहने लगे हो। मैंने तो पहले ही कहा था कि रिटायरमेंट का सारा पैसा, अपना पूरा प्रॉविडेंट फंड ऐसे आँख मूंदकर बेटे के हाथ में नहीं सौंपना चाहिए। पर तुम्हें तो अपने अभिनव पर बड़ा गुरूर था। कह रहे थे कि बेटा पुने में बड़ा घर ले रहा है, हम दोनों पति-पत्नी को अपने साथ रखेगा। कहाँ गया वो घर? छह महीने हो गए तुम्हारी उस बात को। आज कल के बच्चे, खासकर शहर की हवा लगने के बाद किसी के नहीं होते। लिख कर ले लो, पैसा तुम्हारी बहू मेघा ने अपने नाम से इन्वेस्ट करवा लिया होगा।” दीनानाथ ने पान चबाते हुए एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा।
रमाकांत जी ने गहरी साँस ली और शांत स्वर में बोले, “दीनानाथ, मुझे अपने बेटे और अपनी दी हुई परवरिश पर पूरा भरोसा है। अभिनव ऐसा नहीं है। उसने मुझे उस बिल्डर के ब्रॉशर भी दिखाए थे। बस कुछ कागजी कार्यवाही बाकी है, इसलिए समय लग रहा है। और वैसे भी, हम यहाँ इस पुश्तैनी मकान में अकेले कब तक रहेंगे? उम्र के इस पड़ाव पर बच्चों का साथ ही तो सबसे बड़ा सहारा होता है।”
“अरे भाई! ब्रॉशर तो मैं तुम्हें कल अमेरिका के व्हाइट हाउस का दिखा दूँ, तो क्या वो तुम्हारा हो जाएगा?” दीनानाथ ने ठहाका लगाते हुए कहा। “मान लिया उसने घर ले भी लिया, तो क्या तुम्हें लगता है वो तुम्हारे नाम पर होगा? आजकल बहुएं इतनी चालाक हैं कि सब अपने नाम करवा लेती हैं और सास-ससुर को एक कोने में पड़े रहने देती हैं। अभी भी वक़्त है, उससे अपने पैसे वापस मांग लो, वरना बाद में रोने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। शहर में तो घर मिलेगा नहीं, यहाँ का भी छिन जाएगा।”
दीनानाथ की ये चुभती हुई बातें रमाकांत जी के दिल में कहीं न कहीं एक हल्का सा खौफ पैदा कर रही थीं। हालांकि वे बाहर से शांत दिख रहे थे, लेकिन भीतर ही भीतर एक तूफान उठ खड़ा हुआ था। अभिनव ने तीन महीने पहले ही वादा किया था कि दिवाली तक वे नए घर में शिफ्ट हो जाएंगे। अब तो सर्दियां भी आ गईं, लेकिन शिफ्टिंग की कोई बात नहीं हो रही थी। जब भी रमाकांत जी फोन पर पूछते, अभिनव बात टाल देता या कहता, “पिताजी, अभी थोड़ा काम उलझा हुआ है, जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। आप बस पैकिंग शुरू कर दीजिए।” लेकिन कोई निश्चित तारीख नहीं बताता। क्या सच में दीनानाथ सही कह रहा था? क्या अभिनव ने उनके जीवन भर की पूंजी किसी और काम में लगा दी थी?
यही सब सोचते हुए रमाकांत जी भारी कदमों से घर की ओर चल दिए। घर पहुँचे तो देखा कि उनकी पत्नी सुमित्रा रसोई में व्यस्त थीं। पूरे घर में गाजर के हलवे की मीठी-मीठी महक फैली हुई थी।
“अरे सुनते हो? जल्दी से मुँह-हाथ धो लो। अभिनव का फोन आया था, वो स्टेशन पहुँच गया है। बस आधे घंटे में घर आता ही होगा। मैंने उसके पसंद का हलवा और पूड़ियां बनाई हैं।” सुमित्रा की आवाज़ में जो चहक थी, वो रमाकांत जी के कानों में पड़ी, लेकिन उनके चेहरे पर वो खुशी नहीं थी जो अमूमन बेटे के आने पर होती है।
“अकेले आ रहा है या बहू भी साथ है?” रमाकांत जी ने तौलिया उठाते हुए पूछा।
“अभी तो अकेला ही आ रहा है। कह रहा था मेघा को ऑफिस में कोई जरूरी काम है, वो कल सुबह की ट्रेन से आएगी।” सुमित्रा ने खुशी-खुशी बताया।
कुछ देर बाद दरवाजे पर सूटकेस के पहियों की आवाज़ सुनाई दी। अभिनव चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान लिए घर में दाखिल हुआ। माँ के पैर छुए, पिता को गले लगाया और सीधा रसोई की तरफ भागते हुए बोला, “माँ, पूरे रास्ते बस तुम्हारे हाथ के हलवे की खुशबू याद आ रही थी। जल्दी से एक कटोरी दे दो, बहुत भूख लगी है।”
खाना खाते हुए अभिनव घर-परिवार, गाँव और अपनी नौकरी की बातें करता रहा। सुमित्रा भी उसे निहारते हुए ऐसे बातें कर रही थीं जैसे दुनिया की सारी खुशियां उन्हें मिल गई हों। लेकिन रमाकांत जी का ध्यान कहीं और ही था। वे बस अपने खाने से खेल रहे थे। अभिनव ने पिता की इस खामोशी को भाँप लिया।
“क्या बात है पिताजी? आप कुछ परेशान लग रहे हैं। पूड़ियां ठीक नहीं बनीं क्या? या फिर गाँव में किसी ने कुछ कह दिया है?” अभिनव ने पिता का हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा।
रमाकांत जी ने एक पल के लिए सुमित्रा की ओर देखा और फिर हिम्मत जुटाते हुए बोले, “बेटा, वो… पुने वाले घर का क्या हुआ? तूने कहा था दिवाली तक शिफ्ट हो जाएंगे। अब तो दिसंबर आ गया। अगर कोई परेशानी है या वो घर हाथ से निकल गया है तो मुझे साफ-साफ बता दे। दीनानाथ कह रहा था कि बिल्डर लोग पैसे लेकर भाग जाते हैं। और तूने तो मेरे रिटायरमेंट का सारा पैसा उस घर में लगा दिया था।”
अभिनव हल्का सा मुस्कुराया, फिर गंभीर होकर बोला, “पिताजी, मैंने आपको पूरी बात इसलिए नहीं बताई थी क्योंकि मैं और मेघा आपको सरप्राइज़ देना चाहते थे। असल में, जो डुप्लेक्स हमने पहले देखा था, वो हम नहीं ले रहे हैं। हमने वो डील कैंसिल कर दी है।”
रमाकांत जी के हाथ से निवाला छूट गया। उनका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। “क्या? डील कैंसिल कर दी? लेकिन क्यों? और वो पैसा?”
“पिताजी, घबराइए मत। बात दरअसल ये है कि उस डुप्लेक्स में सीढ़ियां बहुत संकरी थीं और वो शहर के बाहरी इलाके में था, जहाँ से अस्पताल और बाज़ार काफी दूर थे। पिछले महीने जब माँ के घुटनों में दर्द की बात मेघा को पता चली, तो वो बहुत परेशान हो गई। उसने कहा कि अगर कभी रात-बिरात माँ या आपको डॉक्टर की ज़रूरत पड़ी, तो इतनी दूर से हम कैसे मैनेज करेंगे? और सीढ़ियां चढ़ना-उतरना आपके लिए इस उम्र में बहुत तकलीफदेह होगा।” अभिनव ने शांत स्वर में समझाते हुए कहा।
“तो फिर अब क्या सोचा है तुम लोगों ने?” रमाकांत जी ने गहरी साँस लेते हुए पूछा।
“हमने शहर के बीचों-बीच, एक अच्छी और सुरक्षित टाउनशिप में ग्राउंड फ्लोर का एक बड़ा सा विला देखा है। उस टाउनशिप के अंदर ही क्लीनिक है, बड़ा सा पार्क है जहाँ आप सुबह-शाम टहल सकते हैं, और आपके लिए सबसे अच्छी बात, वहाँ एक बहुत सुंदर राम मंदिर भी है। विला पूरी तरह से तैयार है और हम इसी हफ़्ते वहाँ शिफ्ट हो रहे हैं।” अभिनव की आँखों में एक चमक थी।
रमाकांत जी की आँखों में ख़ुशी तो आई, लेकिन एक और चिंता ने उन्हें घेर लिया। “बेटा, टाउनशिप का विला तो बहुत महंगा होगा। मेरे पीएफ के पैसे तो उस डुप्लेक्स के लिए भी बमुश्किल पूरे पड़ रहे थे। फिर बाकी पैसों का इंतज़ाम कैसे हुआ? कहीं तुमने कोई गलत रास्ता तो नहीं…”
अभिनव बीच में ही बोल पड़ा, “अरे पिताजी! आप भी क्या सोचते हैं। आपके दिए हुए पैसों से हमने डाउन पेमेंट कर दिया है। बाकी के बचे हुए पैसों के लिए मैंने और मेघा ने मिलकर एक जॉइंट होम लोन ले लिया है। मेरी और मेघा की सैलरी से हर महीने किश्त कटती रहेगी। आपको उसकी चिंता करने की बिलकुल ज़रूरत नहीं है।”
तभी अभिनव का फोन बज उठा। स्क्रीन पर मेघा का नाम चमक रहा था। अभिनव ने फोन स्पीकर पर डाल दिया।
“हैलो मेघा! हाँ, पहुँच गया। सब ठीक है,” अभिनव ने कहा।
मेघा की चहकती हुई आवाज़ कमरे में गूंजी, “प्रणाम पिताजी, प्रणाम माँ! आप दोनों की पैकिंग हो गई ना? और पिताजी, मैंने अभिनव को याद दिलाया था, पर वो भूलक्कड़ है। आप प्लीज अपना और माँ का पैन कार्ड और आधार कार्ड ओरिजिनल और दो-दो फोटोकॉपी निकालकर रख लीजिएगा। कल सुबह ग्यारह बजे हमें रजिस्ट्रार ऑफिस पहुँचना है।”
रमाकांत जी चौंक गए। “आधार कार्ड? पैन कार्ड? लेकिन बहू, इनकी क्या ज़रूरत है? लोन तो तुम दोनों ने लिया है, तो घर के कागज़ात भी तो तुम्हारे नाम से ही बनेंगे ना?”
फोन के उस पार से मेघा की हल्की सी हँसी सुनाई दी। “पिताजी, लोन हमने लिया है क्योंकि किश्तें हमें चुकानी हैं। लेकिन घर हमारा थोड़ी है, घर तो आपका और माँ का है। आप दोनों इस परिवार की जड़ हैं। हम तो बस आपके छाँव में रहने आ रहे हैं। विला की रजिस्ट्री आप दोनों के नाम पर ही हो रही है। आखिर हमारे घर के बड़े आप हैं, तो नेमप्लेट पर भी तो रमाकांत और सुमित्रा ही लिखा होना चाहिए ना।”
रमाकांत जी के कान सुन्न हो गए। दीनानाथ की कही हुई सारी बातें कांच के टुकड़ों की तरह उनके दिमाग में चकनाचूर हो रही थीं। उनका बेटा और बहू उनके पैसों से अपने लिए आशियाना नहीं बना रहे थे, बल्कि अपनी कमाई से अपने माता-पिता के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन खड़ा कर रहे थे।
“पर बेटा… रजिस्ट्री हमारे नाम पर… कल को तुम दोनों को कोई परेशानी हुई तो?” रमाकांत जी की आवाज़ रुंध गई थी। आँखों से आँसू छलकने लगे थे।
अभिनव ने पिता के आँसू पोंछते हुए कहा, “पिताजी, परेशानी तो तब होती है जब नीयत में खोट हो। आपने हमें जो संस्कार दिए हैं, जो ईमानदारी और बड़ों का सम्मान करना सिखाया है, क्या वो बस किताबी बातें थीं? आपने अपनी पूरी ज़िंदगी हमारी पढ़ाई और भविष्य के लिए कुर्बान कर दी, अब जब हमारी बारी है आपका बुढ़ापा सँवारने की, तो आप हमें पराया कर रहे हैं? विला आपके नाम पर रहेगा, और हम आपके आदेश से वहां रहेंगे। बस।”
यह सुनकर सुमित्रा जी भी रो पड़ीं और उन्होंने अभिनव को गले से लगा लिया। रमाकांत जी ने अपने दोनों हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दिया। उन्हें इस बात का सुकून नहीं था कि उन्हें एक आलीशान घर मिल रहा है, बल्कि उन्हें इस बात का असीम गर्व था कि उनकी परवरिश, उनके दिए हुए संस्कार दुनिया की हर नकारात्मकता और स्वार्थ पर भारी पड़े थे।
अगले दिन जब रमाकांत जी रजिस्ट्रार ऑफिस जाने के लिए निकले, तो रास्ते में दीनानाथ जी फिर मिल गए।
“कहाँ चले रमाकांत भाई, इतनी सुबह-सुबह? सूटकेस भी साथ हैं, लगता है शहर जा रहे हो?” दीनानाथ ने टोका।
रमाकांत जी ने इस बार कोई सफाई नहीं दी। उनके चेहरे पर एक आत्मसंतुष्टि भरी और गज़ब के आत्मविश्वास वाली मुस्कान थी। उन्होंने बस इतना कहा, “हाँ दीनानाथ भाई, शहर जा रहा हूँ। अपने घर की चाबी लेने, जो मेरे बच्चों ने अपनी मेहनत की कमाई से अपने माँ-बाप के नाम किया है। और हाँ, जब भी फुर्सत मिले, पुने आना, मेरे ग्राउंड फ्लोर वाले विला में चाय पियेंगे। जय राम जी की!”
दीनानाथ का मुँह खुला का खुला रह गया और रमाकांत जी अपनी पत्नी के साथ गर्व से आगे बढ़ गए। उन्हें अब किसी बात का डर नहीं था, क्योंकि वे जानते थे कि जिन बच्चों की परवरिश में प्यार, विश्वास और संस्कार बोए जाते हैं, वो कभी बबूल का पेड़ नहीं बनते।
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लेखिका : निधि गुप्ता