साझी देहरी की दीवार

“साथी ऐसे होते हैं क्या बलवंत जी?” मैंने भीतर आते हुए कहा, “दो साल पहले जब इस कॉलोनी से लोग पलायन कर रहे थे, तो हम दोनों ने इसी सोफे पर बैठकर कसम खाई थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम अपना आशियाना छोड़कर नहीं जाएंगे। और अगर कभी जाने की नौबत आई भी, … Read more

स्वाभिमान की कीमत

हरिशंकर जी अपनी जगह से उठे और अंकिता के सिर पर हाथ रखते हुए बोले, “बेटा, जब मेरे उस परिचित ने मुझे फोन पर यह बात बताई थी, तो उसने सोचा था कि मैं रिश्ता तोड़ दूंगा। लेकिन उसने जैसे ही कहा कि उस लड़की ने मालिक के बेटे को थप्पड़ मारा और पुलिस में … Read more

स्वाभिमान का तराजू

 “उसके पास वो सब है जो मुझे चाहिए—शानो-शौकत, महंगी गाड़ियां और रुतबा। और तुम बेकार हो। साफ सुन लो, जिसके पास दौलत नहीं, उससे कोई समझदार लड़की प्यार नहीं कर सकती। पैसा ही सब कुछ होता है, समझे!” उसी वक्त धनराज की चमचमाती खुली गाड़ी हॉर्न बजाते हुए आकर रुकी थी। कावेरी ने मुझे एक … Read more

विश्वास की छांव – मैथिली मिश्रा

 बुआ जी का हर एक शब्द मेरे सीने में लोहे की कील की तरह चुभ रहा था। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे शरीर से सारा खून निचोड़ लिया हो। मेरी मुट्ठियां भींच गईं, आंखें डबडबा आईं। सबसे ज्यादा डर मुझे इस बात का था कि भाभी क्या जवाब देंगी। आखिर बुआ की बात में … Read more

रिश्तों के घाव

“बाबूजी, आपसे कितनी बार कहा है कि डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाया कीजिए। बिस्तर पर फिर से दाल गिरा दी आपने। अब यह चादर कौन धोएगा? सुमन तो नौकरानी है नहीं, और मुझे ऑफिस से आकर इतनी फुर्सत नहीं कि आपकी गंध साफ करता रहूं।” रजत की आवाज़ में कड़वाहट थी, इतनी कड़वाहट कि … Read more

सच्चा साथी

“आज जब मेरे पास गाड़ियाँ हैं, बांग्ला है, शोहरत है, तो आप सब यहाँ गुलदस्ते लेकर खड़े हैं। आप कह रहे हैं कि आप मेरे साथ थे? नहीं। आप मेरे ‘वक्त’ के साथ हैं, मेरे साथ नहीं। जब मेरा वक्त बुरा था, तो मैं आपके लिए अजनबी था। आज मेरा वक्त अच्छा है, तो मैं … Read more

झूठी शान

“मुझे माफ़ कर दे बेटा,” दीवानचंद जी रो पड़े, “मैं चकाचौंध में अंधा हो गया था। मैंने तेरे पसीने की कमाई की कद्र नहीं की और उसके झूठ पर अपना सब कुछ लुटा दिया।” कमल ने पिता के आँसू पोंछे, “पापा, विमल भैया ने जो किया वो उनकी समझ थी। पर परिवार का मतलब ही … Read more

बुरी बहू

“रवि, अब बस बहुत हुआ। मुझसे तुम्हारी माँ की सेवा नहीं होती। आज के बाद मैं उनके कमरे में पानी का एक गिलास लेकर भी नहीं जाऊंगी।” स्नेहा ने यह बात इतने सपाट और ठंडे लहजे में कही कि डायनिंग टेबल पर बैठे रवि के हाथ से निवाला छूटकर प्लेट में गिर गया। कमरे में … Read more

संस्कारों की कमी 

अंजलि की आँखों में आँसू आ गए। वही गुस्सा जब रमन ने किया तो ‘काम का तनाव’ था। जब प्रिया ने किया तो ‘बचपन की आदत’ थी। लेकिन जब उसने अपनी जायज़ तकलीफ बताई, तो वह ‘बदतमीज़ी’ और ‘संस्कारों की कमी’ बन गई। तभी घर के मुखिया, शर्मा जी, जो चुपचाप अखबार पढ़ रहे थे, … Read more

दिल पर पड़े बोझ

सावित्री देवी के घर में आज कोहराम मचा हुआ था। शहर की प्रतिष्ठित ‘महिला समिति’ की मासिक बैठक आज उन्हीं के घर पर थी। यह सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि सावित्री देवी के लिए अपनी नाक का सवाल था। शहर की मेयर की पत्नी और कई बड़े अधिकारियों की पत्नियां आने वाली थीं। सावित्री देवी … Read more

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