साझी देहरी की दीवार
“साथी ऐसे होते हैं क्या बलवंत जी?” मैंने भीतर आते हुए कहा, “दो साल पहले जब इस कॉलोनी से लोग पलायन कर रहे थे, तो हम दोनों ने इसी सोफे पर बैठकर कसम खाई थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम अपना आशियाना छोड़कर नहीं जाएंगे। और अगर कभी जाने की नौबत आई भी, … Read more