साझी छत, साझा सुकून

 “भाभी, चुपचाप खड़े क्या देख रही हैं? खाइए भी! थोड़ा नमक ज़्यादा हो सकता है, पर भैया कह रहे थे कि पराठे एकदम क्रिस्पी बने हैं,” कुणाल ने हंसते हुए प्लेट टेबल पर रख दी। स्वाति की आंखों से आंसू छलक आए, लेकिन इस बार ये आंसू अपमान या गुस्से के नहीं थे। यह एक … Read more

फर्ज की नींव

नीलिमा की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया। उसने हकबकाते हुए कहा, “इ… इस्तीफा? नौकरी छोड़नी होगी? आपका दिमाग तो ठीक है आकाश? आप यह क्या बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं? अगर आप यह नौकरी छोड़ देंगे तो कमाएंगे क्या? खाएंगे क्या? हमारे बच्चे की परवरिश कैसे होगी? हम … Read more

पराया महल या अपनी कुटिया

“अमित, क्या तुमने बाबूजी को बता दिया कि हम लोग कल ही कोठी पर शिफ्ट हो रहे हैं? मुझे मालूम है, वो कभी मना नहीं करेंगे।” तान्या ने ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर अपने बालों को सलीके से संवारते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा आत्मविश्वास था, ऐसा आत्मविश्वास जो सिर्फ दौलतमंद … Read more

दीवार के उस पार

 “भाभी, आप कहीं नहीं जाएँगी,” वीरेंद्र की दृढ़ आवाज़ गूँजी। उसने अपना क्रेडिट कार्ड और चेकबुक काउंटर पर रख दी। “डॉक्टर साहब, आप बिना किसी देरी के सर्जरी की तैयारी शुरू कीजिए। पैसों की चिंता मत कीजिए, मैं पूरा डिपॉज़िट अभी क्लियर कर रहा हूँ। और ब्लड ग्रुप ओ-पॉज़िटिव है न भैया का? मेरा भी … Read more

झूठी प्रतिष्ठा की बेड़ियाँ

 आज माथुर परिवार में उत्सव का दिन था। घर की छोटी लाडली, अवनि का ‘रोका’ और सगाई का संयुक्त समारोह था। बैंक में वरिष्ठ अधिकारी के पद पर कार्यरत पिता कैलाश माथुर खुद हर व्यवस्था का जायजा ले रहे थे, जबकि उनकी बड़ी बहन यानी अवनि की बुआ शारदा देवी घर भर में घूम-घूम कर … Read more

साये की अहमियत

 अवनि ने सिसकते हुए मानस के कंधे पर सिर रख दिया, “मानस, मुझे माफ कर दो। मैं कितनी नासमझ थी। मैंने मां जी के अनुशासन को अपनी गुलामी समझ लिया। मुझे नहीं पता था कि जिस छांव में मैं सुकून से सोती थी, उस छांव को बनाए रखने के लिए मां जी खुद धूप में … Read more

झूठी शान की दीवारें

“अदिति, रो मत मेरी बच्ची,” कल्याणी कह रही थी, “तेरे बाबूजी बुरे इंसान नहीं हैं, बस वो उस सोच के कैदी हैं जो उन्हें विरासत में मिली है। उन्होंने जिंदगी भर अपनी कमजोरियों को खानदान के उसूलों का नाम दिया। जब मेरी शादी हुई थी, मेरी आंखों में भी आसमान छूने की चाहत थी। मैं … Read more

माँ की खाली चौखट

 निशांत की इस बात ने शारदा जी के दिल के सारे संशय धो डाले। उन्होंने बड़े उत्साह से तीन बड़े संदूक और सूटकेस निकाले। पचास साल की गृहस्थी को कुछ बैगों में समेटना आसान नहीं था, पर बेटे के साथ रहने का मोह हर चीज़ पर भारी पड़ रहा था। ओंकारनाथ जी चुपचाप अपना चश्मा, … Read more

मेरा आत्मसम्मान – मंजू ओमर

हेलो हां बेटा नीरज, कहां हो पापा आप ,बेटा मैं घर आ गया हूं घर आ गया हूं, इस घर पर छोड़कर और कौन सा घर है आपका । बेटा मैं गांव आ गया हूं पर पापा गांव में भी तो कोई घर नहीं है आपका वह तो पहले ही बिक चुका है। हां बेटा … Read more

अपनी जड़ों की छाँव

 बेटों और बहुओं का इतना आग्रह देखकर गायत्री देवी भी भावुक हो गईं। उन्हें लगा कि शायद अब शरीर ढल रहा है, तो बच्चों की छत्रछाया में रहना ही ठीक रहेगा। जाने से पहले उन्होंने अपने घर के सारे गमले ऋचा को सौंप दिए, चौकीदार बहादुर को एक साल की बख्शीश एडवांस में दे दी … Read more

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