आज माथुर परिवार में उत्सव का दिन था। घर की छोटी लाडली, अवनि का ‘रोका’ और सगाई का संयुक्त समारोह था। बैंक में वरिष्ठ अधिकारी के पद पर कार्यरत पिता कैलाश माथुर खुद हर व्यवस्था का जायजा ले रहे थे, जबकि उनकी बड़ी बहन यानी अवनि की बुआ शारदा देवी घर भर में घूम-घूम कर हुक्म चला रही थीं। शारदा देवी का स्वभाव खानदान के दकियानूसी नियमों को पत्थर की लकीर मानने वाला था। उनके लिए समाज, बिरादरी और चार लोगों की बातें ही जीवन का अंतिम सत्य थीं।
भीतर कमरे में सखियों से घिरी अवनि जब गुलाबी और सुनहरे रंग की बनारसी साड़ी पहनकर दर्पण के सामने खड़ी हुई, तो उसकी माँ वंदना की आँखें छलक आईं। वंदना ने जल्दी से काजल की डिबिया से एक टीका अवनि के कान के पीछे लगा दिया।
“माँ, आप रो क्यों रही हैं? अभी तो सिर्फ सगाई है, विदाई थोड़ी है,” अवनि ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ के हाथ थाम लिए। अवनि एक सरकारी कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका थी। शांत, गंभीर लेकिन विचारों से बेहद स्पष्ट और स्वाभिमानी।
“खुशी के आँसू हैं मेरी बच्ची। इतने बड़े और रसूखदार घराने से तेरा रिश्ता जुड़ रहा है। कुणाल का परिवार शहर के सबसे नामी बिल्डरों में गिना जाता है। चार-चार गाड़ियाँ, नौकर-चाकर, आलीशान कोठी… तू वहाँ राज करेगी,” वंदना ने उसके माथे को चूमते हुए कहा।
तभी बुआ शारदा देवी ने कमरे में कदम रखा और कड़क आवाज में बोलीं, “अरे वंदना, अब भावुक होना बंद कर। लड़के वाले अपनी भव्य गाड़ियों के काफिले के साथ आ चुके हैं। चल अवनि, नीचे मंडप जैसे सजे हॉल में सब तेरा ही इंतज़ार कर रहे हैं। याद रखना, आँखें नीची और चेहरे पर संकोच होना चाहिए। बड़े घराने की बहू बनने जा रही है, सलीका दिखना चाहिए।”
हॉल में पहुँचते ही शहनाई की मधुर धुन गूंज उठी। फूलों से सजे मंच पर अवनि को बिठाया गया। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, लेकिन दिल में एक अनजाना सा कौतूहल भी था। कुणाल से उसकी केवल एक बार औपचारिक मुलाकात हुई थी, वह भी परिवार की मौजूदगी में। उस दिन कुणाल बहुत कम बोला था, जिसे सबने उसका शालीन स्वभाव मान लिया था।
कुछ ही मिनटों बाद जब कुणाल ने मंच की ओर कदम बढ़ाए, तो हॉल में अजीब सी खामोशी छाने लगी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। उसके साथ चल रहे उसके दो दोस्त उसे सहारा देकर मंच की सीढ़ियाँ चढ़ा रहे थे। कुणाल ने बहुत महंगा सूट पहना था, बाल सलीके से बने थे, लेकिन उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर एक अजीब सी बेपरवाही और धूर्तता तैर रही थी। जैसे ही वह अवनि के बगल में सोफे पर धड़ाम से गिरा, उसके मुँह और कपड़ों से शराब की तीखी, असहनीय दुर्गंध का एक झोंका उठा।
मंच के आसपास खड़े रिश्तेदारों ने तुरंत अपनी नाक पर रुमाल रख लिया। कानाफूसी शुरू हो गई। कुणाल की जुबान पूरी तरह फिसल रही थी। उसने अवनि की तरफ हाथ बढ़ाते हुए बेहद अभद्र लहजे में कहा, “अरे… अंगूठी… लाओ भाई, जल्दी पहनाओ… मुझे दोस्तों के साथ पार्टी में जाना है…”
अवनि का पूरा शरीर सिहर उठा। एक पल को उसे लगा जैसे पैरों तले से जमीन खिसक गई हो। जिस इंसान के साथ वह सात जन्मों का सफर तय करने का सपना देख रही थी, वह अपनी ही जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर पूरी तरह मदहोश, विवेकहीन और बदहवास था। यह केवल शराब पीना नहीं था, यह सामने वाले के वजूद, उसके परिवार और इस पवित्र रिश्ते का खुला अपमान था।
अवनि एक क्षण भी गँवाए बिना सोफे से उठ खड़ी हुई। उसने अपने हाथ पीछे खींच लिए।
“मैं यह सगाई नहीं कर सकती,” अवनि की आवाज बहुत धीमी नहीं थी। हॉल के सन्नाटे में उसके शब्द हथौड़े की तरह गूंजे। शहनाई की धुन अचानक थम गई।
कैलाश जी सन्न रह गए। मेहमान अपनी जगहों पर खड़े हो गए। बुआ शारदा देवी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। वे तेजी से मंच पर चढ़ीं और अवनि की कलाई पकड़कर फुसफुसाईं, “यह क्या पागलपन है अवनि? होश में तो है? पूरा शहर यहाँ मौजूद है। खानदान के सारे नाते-रिश्तेदार सामने खड़े हैं। तेरी यह हिम्मत कि भरे समाज में तमाशा खड़ा करे?”
“बुआ जी, तमाशा मैंने नहीं, इस लड़के ने खड़ा किया है,” अवनि ने कुणाल की तरफ इशारा किया, जो अब भी सोफे पर आँखें मूँदकर झूल रहा था। “आप देख नहीं रहीं कि यह इंसान शराब के नशे में धुत है? इसे यह भी सुध नहीं कि यह कहाँ बैठा है और क्या कर रहा है। मैं अपने जीवन का फैसला ऐसे गैर-जिम्मेदार और नशेड़ी इंसान के हाथ में कभी नहीं सौंप सकती।”
“चुप कर लड़की!” शारदा देवी ने आँखें तरेरीं। “शादी-ब्याह में लड़के खुशी में थोड़ा-बहुत पी लेते हैं, इसमें कौन सा पहाड़ टूट पड़ा? इतना बड़ा खानदान है, करोड़ों का कारोबार है, रानी बनाकर रखेंगे तुझे। यह छोटी-छोटी बातें घर की चहारदीवारी में सुलझाई जाती हैं, चौराहे पर ढिंढोरा नहीं पीटा जाता। क्या तुझे शादी से पहले ही तलाक की नौबत लानी है?”
अवनि ने अपनी बुआ की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “बुआ जी, अगर आज समझौता कर लिया, तो कल रोने के सिवा कुछ नहीं बचेगा। अगर शादी के बाद मुझे पता चलता कि यह शराबी है, तो मैं उसी दिन रिश्ता तोड़कर अलग हो जाती। पर भगवान का शुक्र है कि सच आज ही सामने आ गया। पैसे और गाड़ियों से जिंदगी नहीं कटती, सम्मान और चरित्र से कटती है।”
शारदा देवी अपने भाई कैलाश की ओर मुड़ीं और चिल्लाईं, “कैलाश! देख अपनी लाडली को। ज्यादा पढ़ा-लिखा दिया तो इसके पर निकल आए हैं। आज अगर यह रिश्ता यहाँ टूटा, तो पूरे समाज में माथुर खानदान पर थू-थू होगी। कौन करेगा फिर इससे शादी? कुँवारी बैठी रहेगी घर में जीवन भर। समझा इसे, वरना कुल का नाम मिट्टी में मिल जाएगा!”
कैलाश जी की आँखें शर्म और असमंजस से झुकी हुई थीं। वे समाज के डर और बेटी के भविष्य के बीच पिस रहे थे।
तभी अवनि ने दृढ़ स्वर में कहा, “बुआ जी, समाज और कुल की मर्यादा का सारा बोझ हमेशा बेटियों के सिर पर ही क्यों लाद दिया जाता है? तीन साल पहले जब मेरे चचेरे भाई रोहन भैया ने अपने तय रिश्ते को तोड़कर भागकर शादी की थी, तब आपकी कुल-मर्यादा कहाँ सो गई थी? तब तो किसी ने नहीं कहा कि खानदान की नाक कट गई! तब सबने कहा कि लड़का है, गलती हो जाती है। तो फिर बेटी के स्वाभिमान की कोई कीमत नहीं? मैं आपकी झूठी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए अपनी जीती-जागती जिंदगी की बलि नहीं चढ़ाऊँगी।”
शारदा देवी अब अपनी भाभी वंदना की ओर मुड़ीं, “वंदना, तू अपनी इस बेटी के कान खींच। इसे समझा कि औरत का धरम समझौता करना होता है। बेटा तो कुल का चिराग होता है, वह कुछ भी करे, पर बेटी दोनों कुलों की लाज होती है। अगर यह आज मंडप से उठ गई, तो कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे हम।”
पूरे हॉल की नजरें अब वंदना पर टिकी थीं। एक माँ जो हमेशा घर के फैसलों में चुप रहती थी, जिसने जिंदगी भर बड़ों के हुक्म को ही अपनी नियति माना था। लेकिन आज, अपनी बेटी के स्वाभिमान को कुचले जाते देख, उसके भीतर की ममता एक ढाल बनकर जाग उठी।
वंदना आगे बढ़ी और उसने अवनि का हाथ अपने हाथ में ले लिया। फिर उसने नजरें उठाकर शारदा देवी और पूरे हॉल की ओर देखा। उसकी आवाज में एक अभूतपूर्व स्थिरता थी।
“दीदी, बस कीजिए,” वंदना ने स्पष्ट शब्दों में कहा। “मेरी बेटी एक भी कदम पीछे नहीं हटेगी। वह जो कर रही है, बिल्कुल सही कर रही है। एक नशेड़ी, लापरवाह और चरित्रहीन इंसान के गले में अपनी फूल सी बच्ची को बाँधने से लाख गुना बेहतर है कि मैं इसे जीवन भर अपने सीने से लगाकर अपने घर में रखूँ।”
कैलाश जी ने चौंककर अपनी पत्नी को देखा।
वंदना रुकी नहीं, वह कहती चली गई, “आप दौलत की बात करती हैं दीदी? क्या गाड़ियाँ और बंगले किसी इंसान की आत्मा की गंदी आदतों को ढक सकते हैं? जो लड़का अपने जीवन के सबसे पावन दिन पर होश में नहीं रह सकता, वह कल मेरी बेटी की सुरक्षा और सम्मान की क्या गारंटी देगा? आज शराब है, कल जुआ होगा, परसों मारपीट होगी… क्या तब आप इसकी जिम्मेदारी लेंगी? नहीं, तब भी आप यही कहेंगी कि औरत को सहना पड़ता है। मुझे ऐसा धनवान घर नहीं चाहिए जहाँ मेरी बेटी की रूह हर रोज तिल-तिल कर मरे। लड़का दो वक्त की रूखी-सूखी रोटी खिलाने वाला हो, लेकिन उसका चरित्र निर्मल होना चाहिए। मुझे और मेरे पति को यह रिश्ता किसी भी शर्त पर मंजूर नहीं है।”
वंदना के इन साहसी शब्दों ने पूरे माहौल को स्तब्ध कर दिया। कैलाश जी के चेहरे से असमंजस के बादल छँट गए। वे आगे आए और अपनी बेटी के कंधे पर हाथ रख दिया। पिता का यह मौन स्पर्श अवनि के फैसले पर मुहर था।
माहौल का रुख बदलते देख कुणाल की माँ का पारा चढ़ गया। वे भारी कदमों से आगे आईं और तमतमाते हुए बोलीं, “अरे वाह! उल्टे बाँस बरेली को! हमारे बेटे में ही खोट निकाल दिया? जरा अपने गिरेबान में झाँककर देखो। हमारे पास दौलत की कमी नहीं है, एक इशारा करेंगे तो कतारें लग जाएँगी लड़कियों की। इस घमंडी और जबान चलाने वाली लड़की के तो भाग्य ही फूटे हैं, जो इतने बड़े राजघराने को लात मार रही है। चलो कुणाल, उठाओ इसे… ऐसे भिखमंगों के घर हमें अपना बेटा ब्याहना भी नहीं है!”
कुणाल के दोस्त उसे घसीटते हुए मंच से नीचे ले गए। लड़के वाले बड़बड़ाते और ताने कसते हुए हॉल से बाहर निकल गए। कुछ मेहमान भी धीरे-धीरे खिसकने लगे। सगाई का मंडप वीरान हो गया, लेकिन उस वीराने में अवनि के परिवार का सिर गर्व से ऊँचा था।
शारदा देवी गुस्से में बड़बड़ाते हुए अपने कमरे में चली गईं, लेकिन कैलाश, वंदना और अवनि एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े रहे।
उस रात अवनि अपने कमरे की बालकनी में खड़ी ठंडी हवा के झोंकों को महसूस कर रही थी। कैलाश जी कमरे में आए और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “अवनि, मुझे गर्व है तुझ पर बेटा। अगर आज तूने यह हिम्मत न दिखाई होती, तो शायद मैं समाज के खोखले डर में तेरी खुशियों का सौदा कर बैठता। तूने आज मुझे एक कायर पिता बनने से बचा लिया।”
अवनि की आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह निकले। उसने अपने पिता को गले से लगा लिया।
इस घटना के बाद समाज ने कुछ दिन बातें बनाईं, कुछ दूर के रिश्तेदारों ने ताने भी कसे, लेकिन माथुर परिवार अपनी बेटी के साथ चट्टान की तरह खड़ा रहा। अवनि ने अपनी पढ़ाई और अध्यापन पर पूरा ध्यान केंद्रित किया। उसने अपनी पीएचडी पूरी की और कॉलेज में एक सम्मानित स्थान हासिल किया।
समय का पहिया घूमा। लगभग डेढ़ वर्ष बाद, अवनि के कॉलेज में ही इतिहास के एक युवा सहायक प्राध्यापक, सौम्य का तबादला होकर आया। सौम्य न केवल एक विद्वान और शालीन व्यक्ति था, बल्कि उसके विचार भी बेहद सुलझे हुए थे। उसका परिवार एक सामान्य मध्यवर्गीय परिवार था, लेकिन घर में संस्कारों और विचारों की अमीरी थी। जब सौम्य को अवनि के अतीत और उस सगाई के टूटने की सच्चाई का पता चला, तो उसके दिल में अवनि के प्रति सम्मान और गहरा हो गया।
सौम्य के माता-पिता खुद अवनि का हाथ माँगने कैलाश जी के घर आए। उन्होंने बिना किसी आडंबर, बिना किसी दहेज और बिना किसी झूठी शान के, केवल दोनों बच्चों के गुणों और विचारों के मेल को प्राथमिकता दी।
इस बार भी घर सजा, शहनाइयाँ बजीं, लेकिन इस बार हवा में शराब की बदबू नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और सम्मान की सुगंध थी। सौम्य ने जब अवनि की उँगली में सगाई की अँगूठी पहनाई, तो उसकी आँखों में अवनि के लिए अगाध आदर था। अवनि ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ की ओर देखा, जिनकी आँखों में आज संतोष और गर्व की चमक थी।
अवनि का यह कदम न केवल उसकी अपनी जिंदगी को बर्बाद होने से बचा गया, बल्कि उसने समाज के उस झूठे ढकोसले को भी तोड़ दिया जहाँ बेटियों की बलि देकर खानदान की नाक बचाई जाती थी। स्वाभिमान के साथ लिया गया एक सही फैसला भले ही शुरुआत में कठिन लगे, लेकिन वह जीवन को अंततः सही और सुरक्षित किनारे तक पहुँचा ही देता है।
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क्या आपको लगता है कि आज भी हमारा समाज बेटियों के स्वाभिमान से ज्यादा ‘चार लोग क्या कहेंगे’ को अहमियत देता है? अगर अवनि की जगह आप होते, तो क्या ऐसा ही फैसला लेते? अपनी राय हमें नीचे लिखकर जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : अर्चना खंडेलवाल