अवनि ने सिसकते हुए मानस के कंधे पर सिर रख दिया, “मानस, मुझे माफ कर दो। मैं कितनी नासमझ थी। मैंने मां जी के अनुशासन को अपनी गुलामी समझ लिया। मुझे नहीं पता था कि जिस छांव में मैं सुकून से सोती थी, उस छांव को बनाए रखने के लिए मां जी खुद धूप में जलती थीं। मुझसे यह घर नहीं संभल रहा मानस, मुझे मां जी की ज़रूरत है।”
कल्याणी जी सरकारी इंटर कॉलेज से वाइस प्रिंसिपल के पद से सेवानिवृत्त हुई थीं। बरसों तक सैकड़ों छात्राओं को अनुशासन, समय की पाबंदी और सलीका सिखाते-सिखाते यह आदत उनके खून में इस कदर रच-बस गई थी कि रिटायरमेंट के बाद भी उनका यह शिक्षक रूप कभी शांत नहीं हुआ। घर का कोना-कोना आईने की तरह चमकना चाहिए, तकिए के गिलाफ पर एक सिलवट तक न दिखे, और रसोई के मसाले के डिब्बे अपनी-अपनी तयशुदा कतार में ही रखे हों—यह सब उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था।
कल्याणी जी के दिल में किसी के लिए कोई कड़वाहट या दुर्भावना नहीं थी। उनका स्वभाव कठोर ज़रूर था, मगर भीतर से वह ममता और फिक्र से भरी हुई थीं। पर दिक्कत तब शुरू हुई जब उनके इकलौते बेटे मानस की शादी अवनि से हुई। अवनि चंडीगढ़ के एक बेहद लाड़-प्यार वाले रईस परिवार की इकलौती बेटी थी। बचपन से लेकर शादी के दिन तक उसने कभी घर की जिम्मेदारियों का बोझ नहीं उठाया था। किताबें पढ़ना, दोस्तों के साथ घूमना, पेंटिंग करना और देर तक सोना—बस यही उसकी दुनिया थी। वह स्वभाव से चुलबुली, थोड़ी भुलक्कड़ और पूरी तरह बेपरवाह थी।
शादी के ठीक सवा साल बाद अवनि ने एक नन्हे से बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया कबीर। अभी अवनि खुद एक अल्हड़ लड़की जैसी थी, और इतनी जल्दी मातृत्व की भारी-भरकम जिम्मेदारियों का आ जाना उसके लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। वह बच्चे को संभालने में ही इतनी थक जाती कि घर के बाकी तौर-तरीकों की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता था।
इधर कल्याणी जी के लिए अवनि एक ऐसी नई छात्रा की तरह थी, जिसे जीवन की वर्णमाला सिखाना वह अपना सबसे बड़ा कर्तव्य समझती थीं। सुबह के छह बजते ही कल्याणी जी की दिनचर्या शुरू हो जाती। यदि अवनि ने रात को सोफे पर अपनी शॉल यूं ही छोड़ दी होती, तो कल्याणी जी की आवाज़ गूंज उठती, “अवनि, चीज़ें अपनी जगह पर रखने की आदत डालो, घर कोई धर्मशाला नहीं है।” कमरे का पंखा या बाथरूम का नल खुला छूट जाता, तो तुरंत नसीहत मिलती, “संसाधनों की बर्बादी इंसान को दरिद्र बनाती है।”
हैरत की बात यह थी कि कल्याणी जी केवल टोकती ही नहीं थीं, बल्कि टोकने के बाद खुद ही आगे बढ़कर उन कपड़ों को करीने से तह करके अलमारी में रखतीं, बर्तनों को सही स्थान पर सजातीं और रसोई संभाल लेतीं। अवनि को इन सब बातों से चिढ़ होने लगी थी। उसे लगता था कि सास उस पर हर पल नज़र रखे हुए हैं और उसे नीचा दिखाने का मौका ढूंढती हैं।
हालांकि, यह कल्याणी जी के अनुशासन और पौष्टिक खान-पान की निगरानी का ही असर था कि प्रसव के बाद भी अवनि का स्वास्थ्य एकदम उत्तम था। कब उसे दलिया देना है, कब मेवे का दूध और कब ताजे फल, यह सब कल्याणी जी के तयशुदा नियम से चलता था। इतना ही नहीं, नन्हे कबीर की पूरी दिनचर्या भी दादी ने साध रखी थी। नौ महीने का कबीर गीला होने से पहले ही खास तरह की आवाज़ें निकालकर संकेत दे देता था, क्योंकि कल्याणी जी ने उसे घड़ी की सुई के मुताबिक शौचालय की आदत डाल दी थी।
मगर अवनि इन सब बातों के पीछे छिपे प्यार को नहीं देख पा रही थी। उसे सास का यह सख्त रूप एक जेलर की भांति लगता था। एक रविवार की दोपहर अवनि ड्राइंग रूम में बैठकर फोन पर अपनी सहेली से बात कर रही थी। तभी कल्याणी जी हाथ में झाड़न लिए वहां आईं और दीवार की एक ऊंची पेंटिंग के पीछे लगे हल्के से जाले की तरफ उंगली उठाते हुए बोलीं, “अवनि, धूल और जाले सिर्फ दीवारों को ही नहीं, बल्कि घर की सकारात्मक ऊर्जा को भी खा जाते हैं। फोन से फुरसत मिले तो ज़रा ऊपर नज़र घुमा लेना।”
उस दिन अवनि के सब्र का बांध टूट गया। उसने गुस्से में अपना फोन सोफे पर पटका और पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई। कल्याणी जी ने उसकी तनी हुई भृकुटियां और गुस्से से लाल हुआ चेहरा साफ देख लिया। उन्होंने उस वक्त तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंची। उन्होंने मन ही मन एक फैसला कर लिया।
शाम को कल्याणी जी ने अपने पति हरिशंकर जी से कहा, “हरिशंकर जी, अंबाला में आपकी छोटी बहन कब से हमें बुला रही हैं। तीर्थ यात्रा का भी मन है। क्यों न हम कल ही कुछ हफ्तों के लिए अंबाला निकल जाएं?” हरिशंकर जी ने हैरान होकर देखा, क्योंकि कबीर के जन्म के बाद कल्याणी जी ने एक दिन के लिए भी घर नहीं छोड़ा था। मगर पत्नी की आंखों की गंभीरता देखकर वह चुपचाप मान गए।
अगली सुबह कल्याणी जी ने मानस और अवनि को नाश्ते की मेज पर अपने जाने की सूचना दी। अवनि ने चेहरे पर औपचारिकता का पर्दा डालकर विदाई दी, मगर भीतर ही भीतर उसके मन में आतिशबाज़ी फूट रही थी। उसे लग रहा था मानो बरसों की कैद के बाद आज उसे खुली हवा में सांस लेने की आज़ादी मिल गई हो। सास-ससुर के टैक्सी में बैठते ही अवनि ने एक लंबी राहत भरी सांस ली और मन ही मन बुदबुदाई, “चलो, अब न कोई टोकने वाला है और न ही कोई अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाला!”
उस दिन अवनि ने तय किया कि वह अपनी आज़ादी का पूरा लुत्फ़ उठाएगी। रात को उसने देर तक टीवी पर अपनी पसंदीदा वेब सीरीज़ देखी। नन्हे कबीर को उसने रात का दूध बस औपचारिकता में थोड़ा-सा पिलाया और खुद आधी रात के बाद गहरी नींद में सो गई।
अगली सुबह जब उसकी आंख खुली, तो कमरे की खिड़की से धूप की तेज़ किरणें सीधे उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। उसने दीवार घड़ी की तरफ देखा तो उसके होश उड़ गए—सुबह के सवा नौ बज चुके थे! हड़बड़ाकर वह बिस्तर से उठी। आमतौर पर सुबह सात बजे आने वाली कामवाली सरोज आठ बजे तक उसका इंतज़ार करके जा चुकी थी, क्योंकि बाहर का दरवाज़ा अंदर से बंद था और बेल बजने पर भी किसी ने नहीं खोला था।
अवनि ने देखा कि कबीर बिस्तर पर गीला हुआ पड़ा रो रहा था। उसने रातभर में बिस्तर का बुरा हाल कर दिया था और भूख के मारे बिलख रहा था। उसी वक्त मानस बदहवास सा कमरे में दाखिल हुआ। उसकी दाढ़ी आधी बनी थी और चेहरे पर घबराहट थी। “अवनि! आज मेरी बोर्ड मीटिंग थी साढ़े नौ बजे! तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं? और मेरी नीली शर्ट कहां है? प्रेस भी नहीं है! नीचे नाश्ता तो दूर, एक कप चाय तक नहीं बनी है!”
अवनि का सिर चकरा गया। उसने कबीर को गोद में उठाया, जो लगातार चीखे जा रहा था। मानस गुस्से में बिना कुछ खाए, बाज़ार से बिस्कुट खाकर काम चलाने की बात कहकर गाड़ी की चाबी ढूंढने लगा। तभी याद आया कि गाड़ी धोने वाला लड़का सात बजे आकर वापस जा चुका था क्योंकि गाड़ी की चाबी बाहर रखी ही नहीं गई थी। मानस गंदी गाड़ी लेकर बिना नाश्ते के ही ऑफिस के लिए निकल गया।
अवनि कबीर को चुप कराने रसोई में गई। वहां का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। रात के जूठे बर्तनों का पहाड़ सिंक में पड़ा सड़ रहा था। दूध का पतीला चूल्हे पर खुला पड़ा था, जिसमें मक्खियां भिनभिना रही थीं। कबीर के लिए दूध गर्म करने के लिए उसे एक साफ बर्तन तक नहीं मिला। पहले उसने रोते हुए बच्चे को एक हाथ से संभाला और दूसरे हाथ से एक पैन धोकर दूध चढ़ाया। जल्दबाज़ी में गैस तेज़ रह गई और दूध उबलकर पूरे गैस स्टोव पर फैल गया।
दोपहर होते-होते अवनि के आंसुओं का बांध टूट गया। कबीर भूख और गीलेपन की वजह से चिड़चिड़ा होकर लगातार रो रहा था। उसे संभालने के चक्कर में अवनि पूरे दिन में एक निवाला भी नहीं खा पाई थी। घर का कोना-कोना बिखर चुका था। ड्राइंग रूम में खिलौने फैले थे, रसोई में गंदे बर्तनों से बदबू उठने लगी थी, और बेडरूम की चादरें बदहाल थीं। अब तक जो घर स्वर्ग जैसा लगता था, वह किसी कबाड़खाने में तब्दील हो चुका था।
अवनि थक-हारकर सोफे पर गिर पड़ी। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे और कमर में भयानक दर्द हो रहा था। अचानक उसकी नज़र उसी दीवार पर पड़ी, जहां कल कल्याणी जी ने जाला दिखाया था। आज वह जाला वहीं था, बल्कि उसके साथ-साथ पूरे घर पर अव्यवस्था का एक बहुत बड़ा जाला तन चुका था।
उस पल अवनि के दिमाग में बिजली सी कौंधी। उसे समझ आया कि जिसे वह अब तक ‘सास की हुकूमत’ और ‘बेवजह की रोक-टोक’ समझती थी, वह दरअसल इस घर को सुचारू रूप से चलाने वाला एक अदृश्य सुरक्षा कवच था। कल्याणी जी सिर्फ टोकती नहीं थीं, बल्कि सुबह पांच बजे उठकर हर काम को इतनी सहजता से निपटा देती थीं कि अवनि को कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि एक घर को संभालने में कितनी मेहनत, अनुशासन और ऊर्जा लगती है। कल्याणी जी के साये में वह बेफिक्र थी, और उसने उस बेफिक्री को अपनी आज़ादी मान लिया था।
शाम को जब मानस थका-हारा, भूखा और तनावग्रस्त होकर घर लौटा, तो उसने घर की हालत देखी। मगर अवनि पर गुस्सा करने के बजाय उसने देखा कि अवनि ज़मीन पर बैठकर रो रही थी और उसका शरीर थकान से कांप रहा था। मानस चुपचाप उसके पास बैठा और बोला, “अवनि, मां जब घर में होती थीं, तो हमें लगता था कि सब कुछ अपने आप हो रहा है। आज समझ आया कि उनके उस अनुशासन के पीछे कितना बड़ा त्याग था।”
अवनि ने सिसकते हुए मानस के कंधे पर सिर रख दिया, “मानस, मुझे माफ कर दो। मैं कितनी नासमझ थी। मैंने मां जी के अनुशासन को अपनी गुलामी समझ लिया। मुझे नहीं पता था कि जिस छांव में मैं सुकून से सोती थी, उस छांव को बनाए रखने के लिए मां जी खुद धूप में जलती थीं। मुझसे यह घर नहीं संभल रहा मानस, मुझे मां जी की ज़रूरत है।”
अगले ही पल अवनि ने अपना फोन उठाया और कांपते हाथों से कल्याणी जी का नंबर मिलाया। दूसरी तरफ से जैसे ही कल्याणी जी की ममतामयी और गंभीर आवाज़ गूंजी, “हेलो अवनि, सब ठीक है न बहू? कबीर दूध पी रहा है समय से?”, अवनि अपने आंसू नहीं रोक पाई।
“मां जी…” अवनि की आवाज़ रुंध गई, “मां जी, आप वापस आ जाइए। यह घर आपके बिना बिखर गया है। और सबसे ज़्यादा मैं बिखर गई हूँ। मुझे आपका अनुशासन नहीं चुभता मां, मुझे समझ आ गया है कि वो आपकी डांट नहीं, आपका तजुर्बा और प्यार था जिसने इस घर को मंदिर बना रखा था। मुझे सिखा दीजिए मां जी, मुझे भी आपकी तरह एक अच्छी गृहणी और मां बनना है। प्लीज वापस आ जाइए।”
फोन के उस पार कल्याणी जी की आंखें भी भर आईं। एक शिक्षक की सबसे बड़ी जीत तब होती है जब उसका विद्यार्थी गलती का मर्म समझ जाए। कल्याणी जी के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने बेहद कोमल स्वर में कहा, “पगली, रोते नहीं हैं। घर की लक्ष्मी ऐसे रोए तो घर कभी खुशहाल नहीं रहता। हम कल सुबह की पहली ट्रेन से देहरादून लौट रहे हैं। कबीर को संभालो, बाकी सब हम आकर देख लेंगे।”
अगले दिन दोपहर जब दरवाज़े की घंटी बजी, तो अवनि ने दौड़कर दरवाज़ा खोला। सामने कल्याणी जी खड़ी थीं। अवनि ने बिना एक पल गंवाए झुककर उनके पैर छू लिए। कल्याणी जी ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया। उस आलिंगन में न कोई शिकायत थी, न कोई ताना, बस एक मां का अपार स्नेह और एक बहू का सच्चा सम्मान था।
उस दिन के बाद से घर की आबोहवा पूरी तरह बदल गई। अब कल्याणी जी सिखाती थीं और अवनि सीखने के लिए उत्सुक रहती थी। टोकने पर अब अवनि का चेहरा लाल नहीं होता था, बल्कि उसके होठों पर एक कृतज्ञता भरी मुस्कान आ जाती थी। उसने समझ लिया था कि अनुशासन कोई बंधन नहीं, बल्कि जीवन को खूबसूरती और गरिमा से जीने का सबसे सुंदर मार्ग है। घर एक बार फिर खुशियों और सुकून की महक से खिल उठा था।
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हर परिवार में बड़ों का अनुशासन कभी-कभी नई पीढ़ी को कड़वा या बंधन लग सकता है, लेकिन सच यही है कि जब तक बड़े-बुजुर्ग घर की कमान संभाले रहते हैं, तब तक आने वाली पीढ़ियां कई अदृश्य तूफानों से बची रहती हैं। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि किसी अपने के दूर जाने के बाद ही आपको उसकी असली कीमत समझ आई हो? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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मूल लेखिका : मधु वशिष्ठ