रेत के निशानों पर हौसले की उड़ान

गौरी, उम्र यही कोई पंद्रह बरस की रही होगी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी गहरी समझ थी जो उम्र से बहुत पहले आ जाती है। राजस्थानी गाँव के उस रूखे और रेतीले माहौल में भी वह किसी खिले हुए पलाश के फूल जैसी लगती थी। साँवला सलोना रंग, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, और हवा में … Read more

फासलों के बीच सिमटती दुनिया

  बरामदे में रखी आराम कुर्सी पर बैठे माधव जी के हाथों में उनका टैबलेट था और उनके चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान तैर रही थी। पास ही बैठी उनकी पत्नी, सुमित्रा, अपने फोन पर किसी को अपनी नई बुनाई का डिजाइन समझा रही थीं। जो भी उन्हें बाहर से देखता, उसे यही लगता कि उम्र … Read more

एक अधूरी विदाई

यह सुनकर काव्या के आंसू छलक पड़े थे। यह खुशी के आंसू थे। बारह सालों की तपस्या पूरी होने वाली थी। कल रात भर वह सोई नहीं। उसने पूरा घर साफ किया, विवान की पसंद का गाजर का हलवा बनाया और अपनी उस लाल साड़ी को निकालकर इस्त्री किया जो विवान को बहुत पसंद थी। … Read more

मायके की दहलीज

“मम्मी, वो जो बनारसी सिल्क की साड़ी आपने दिखाई थी, वही भिजवाना मेरे लिए। और हाँ, काजू-बादाम, पिस्ता के साथ वो इंपोर्टेड चॉकलेट्स का बड़ा वाला पैक भी रख देना। मेरी जेठानी के मायके से बहुत भारी सामान आया है इस बार दिवाली पर। उनके रिश्तेदारों के सामने मेरा इम्प्रेशन डाउन नहीं होना चाहिए। आपको … Read more

वक्त का पहिया

 पार्वती ने यह सुनकर एक पल के लिए आसमान की तरफ देखा और सुकून से मुस्कुराती हुई बोली, “ईश्वर की माया भी कितनी अजीब है न! जो अपनी रफ्तार और मशीन पर इतना इतरा रहा था, वो आज पैदल हो गया। और हम, जो सोच रहे थे कि हमारी जिंदगी अब खत्म हो गई, भगवान … Read more

अपना वजूद

सुमेधा ने सूटकेस की चेन बंद की और खड़ी हो गई। उसके सामने उसकी सास, विमला देवी, सीना ताने खड़ी थीं, जिनकी आँखों में गुस्सा और अविश्वास दोनों तैर रहे थे। पास ही सोफे पर सिर झुकाए बैठा था—निखिल। पैंतीस साल का एक हट्टा-कट्टा इंसान, जो इस वक्त किसी डरे हुए बच्चे जैसा लग रहा … Read more

पापा का घर 

“बेटा, घर तो ईंट-पत्थर का होता है। हमारा असली घर, हमारी असली जायदाद तो तू है। अगर तेरी नींव मज़बूत करने के लिए मुझे अपनी छत बेचनी भी पड़ी, तो क्या हुआ? तू खुश है, आबाद है, बस हमारी तपस्या सफल हो गई।” आर्यन ने अपने पिता के फटे हुए बनियान और माँ की सूजी … Read more

मैं भी इंसान हूँ – डॉ पारुल अग्रवाल

सावित्री जी के हाथ कांप रहे थे। फोन रखते ही उनके माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थीं। अभी-अभी उनकी ननद, सुलोचना जी का फोन आया था कि वे अपने पूरे परिवार के साथ—बेटे, बहू और नाती-पोतों समेत—दो घंटे में पहुँच रही हैं। सावित्री जी का ब्लड प्रेशर तो वैसे ही बढ़ा रहता था, … Read more

एक पिता की मुस्कान – रश्मि प्रकाश

अंधेरे कमरे के एक कोने में बैठा समीर पिछले दो सालों से सिर्फ़ दीवारों को घूरता रहता था। घर के बाकी सदस्य दबे पाँव उसके कमरे के पास से गुज़रते। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और दाढ़ी बढ़ी हुई थी। समीर, जो कभी पूरे घर की जान हुआ करता था, अपनी छोटी … Read more

उम्मीदों का उजला आकाश

 “पैसे कागज के टुकड़े हैं प्रज्ञा!” रघुनाथ जी की आवाज में एक गूंज थी। “वे मेहनत से दोबारा कमाए जा सकते हैं। मैंने जो मेहनत की, वह किसी जुए में नहीं लगाई थी, अपनी बेटी की काबिलियत पर लगाई थी। मुझे अपनी मेहनत पर गर्व है और तेरी लगन पर पूरा भरोसा है। तूने साल … Read more

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