साझी छत, साझा सुकून

 “भाभी, चुपचाप खड़े क्या देख रही हैं? खाइए भी! थोड़ा नमक ज़्यादा हो सकता है, पर भैया कह रहे थे कि पराठे एकदम क्रिस्पी बने हैं,” कुणाल ने हंसते हुए प्लेट टेबल पर रख दी।

स्वाति की आंखों से आंसू छलक आए, लेकिन इस बार ये आंसू अपमान या गुस्से के नहीं थे। यह एक ऐसा अहसास था, जिसे शब्दों में बांधना मुमकिन नहीं था। उसने कांपते हाथों से पराठे का एक निवाला तोड़ा। भूख और थकान से चूर शरीर को उस निवाले ने एक अद्भुत सुकून दिया।

खाना खत्म करके स्वाति जब अपनी प्लेट लेकर रसोई की ओर बढ़ी, तो वहां का नज़ारा देखकर उसकी आंखें फिर से भर आईं। 

  रसोई के सिंक में पड़े जूठे बर्तनों को देखकर स्वाति की आंखों से आंसू छलकने को बेताब थे। नल की टोंटी से टपकती हर बूंद जैसे उसकी टूटी हुई हिम्मत पर तमाचा मार रही थी। वह मन ही मन बुदबुदा रही थी, “अक्सर लोग कहते हैं कि पराए घर को अपना बनाना ही औरत की असली पहचान है, पर क्या सचमुच कोई घर सिर्फ एक इंसान के पसीने से अपना बन सकता है? जब तक सब ठीक रहता है, तब तक हर कोई प्यार जताता है, लेकिन जैसे ही हालात बदलते हैं, सारी मिठास गायब हो जाती है।”

विवाह के बाद पिछले तीन वर्षों में स्वाति ने इस संयुक्त परिवार को अपनी जान से ज्यादा संभाला था। ससुर जगदीश जी, पति मयंक, छोटा देवर कुणाल और कॉलेज जाती ननद तान्या—इन सबके बीच सास जानकी देवी घर की रीढ़ हुआ करती थीं। जानकी जी का स्वभाव थोड़ा सख्त ज़रूर था, पर वे स्वाति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सुबह पांच बजे से रात दस बजे तक घर के हर काम में जुटी रहती थीं। उनके सामने किसी की मजाल नहीं थी कि कोई बेफिजूल हुक्म चलाए। ननद तान्या भी मां के कड़े अनुशासन के डर से घर के छोटे-मोटे कामों में स्वाति का हाथ बंटा देती थी, चाहे वह कपड़े तह करना हो या शाम की चाय के लिए नाश्ता परोसना।

मगर बीते दस दिनों से घर की पूरी धुरी ही उलट गई थी। जानकी जी को अचानक तेज़ वायरल बुखार के साथ जोड़ों में भयानक सूजन आ गई थी। डॉक्टर ने उन्हें पूरी तरह से ‘बेड रेस्ट’ की हिदायत दी थी। अब वे कराहते हुए बिस्तर पर पड़ी रहती थीं। शुरुआत के दो दिन तो स्वाति ने पूरी हिम्मत और जज्बे से सब कुछ संभाला। सुबह चार बजे उठकर सासू मां के लिए दलिया, काढ़ा और दवाइयां तैयार करना, फिर ससुर जी की बिना चीनी की चाय और अखबार, उसके बाद मयंक और कुणाल के लिए दो अलग-अलग तरह के टिफिन पैक करना।

लेकिन चौथे दिन के बाद से परिस्थितियां असहनीय होने लगीं। जानकी देवी के बीमार होते ही तान्या का सारा डर छूमंतर हो गया था। कॉलेज से लौटते ही वह हाथ में स्मार्टफोन थाम लेती, कभी नए कपड़ों के साथ सेल्फी खींचकर इंस्टाग्राम पर रील अपलोड करती, तो कभी घंटों कान में ईयरफोन लगाए दोस्तों से बतियाती रहती। स्वाति रसोई में पसीने से तर-बतर होकर रोटी बेलती रहती, पर तान्या कभी गलती से भी एक गिलास पानी पूछने रसोई में कदम नहीं रखती थी। जब भी स्वाति ने उससे कुछ मदद के लिए कहा, उसने चेहरे पर ऐसा भाव बनाया मानो भाभी उस पर कोई भारी जुल्म ढा रही हो।

ससुराल का माहौल स्वाति को अब घुटन भरा लगने लगा था। उसे लगने लगा कि इस घर में उसकी हैसियत सिर्फ एक अवैतनिक नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं है। शाम को छह बजते ही दफ्तर से थके-हारे ससुर जी, मयंक और कुणाल घर लौटते। सासू मां ने बरसों से सबको ऐसी आदत डाल रखी थी कि तीनों पुरुषों को अपनी-अपनी थाली में गरमा-गरम, फूली हुई रोटियां ही चाहिए होती थीं। कोई यह देखने की जहमत नहीं उठाता था कि चूल्हे के सामने जो औरत लगातार खप रही है, उसके पैर दर्द से कांप रहे हैं। स्वाति के भीतर गुस्से और लाचारी का गुबार धीरे-धीरे पक रहा था। वह मन ही मन सोचती, “अगर आज मेरी शादी यहां न हुई होती, तो क्या ये सब भूखे मर जाते? क्या घर की सारी व्यवस्था का ठेका सिर्फ बहुओं के हिस्से ही आता है?”

ग्यारहवें दिन दोपहर का वक्त था। स्वाति ने सुबह से पूरे घर के पर्दे बदले थे, वाशिंग मशीन में कपड़ों के तीन राउंड धोकर छत पर सुखाए थे, फिर सासू मां को नहलाकर उनके बिस्तर की चादर बदली थी। दोपहर की धूप और लगातार भागदौड़ के कारण उसका सिर भयंकर दर्द से फटा जा रहा था। जब तान्या कॉलेज से वापस आई, तो स्वाति ने बहुत धीमी और थकी हुई आवाज़ में कहा, “तान्या, मेरी कमर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है और सिर घूम रहा है। आज शाम का खाना तुम बना लेना। मैंने दाल उबाल कर रख दी है, बस आटा गूंथ कर रोटियां सेंकनी हैं और आलू-गोभी की सब्ज़ी बनानी है।”

तान्या ने अपने चेहरे पर शिकन लाते हुए कहा, “भाभी, आज कॉलेज में लगातार तीन प्रैक्टिकल थे। मेरे पैर बिल्कुल टूट रहे हैं, मैं प्रोजेक्ट का काम भी पूरा नहीं कर पाई हूँ।” यह कहकर उसने हमेशा की तरह बात को अनसुना कर दिया और अपने कमरे में जाकर पंखा चलाकर लेट गई।

स्वाति ने रसोई की तरफ देखा। सिंक में दोपहर के बर्तन पड़े थे, सब्ज़ियों की टोकरी जस की तस रखी थी। उस वक्त स्वाति के सब्र का बांध पूरी तरह टूट गया। उसे अपने मायके की बहुत याद आई, जहां ज़रा सी तबीयत खराब होने पर मां उसके माथे पर तेल की मालिश करती थी और हाथ में दूध का गिलास थमा देती थी। गुस्से, हताशा और भारी थकान के मिले-जुले आवेग में स्वाति ने रसोई का दरवाज़ा आधा खींचा, अपने कमरे में आई और अंदर से कुंडी बंद कर ली।

बिस्तर पर गिरते ही उसके आंसू तकिए में समाने लगे। बाहर से तान्या की धीमी बड़बड़ाहट की आवाज़ आ रही थी कि “हर कोई अपने हिस्से का काम करता है, इसमें इतना नखरा दिखाने की क्या ज़रूरत है।” स्वाति ने तकिए से अपने कान ढक लिए। उसका शरीर इतना टूट चुका था कि वह यह भी नहीं सोच पाई कि शाम को क्या होगा। ख्यालों के भंवर और भारी थकावट के बीच न जाने कब उसकी आंख लग गई और वह गहरी नींद में डूब गई।

रात के तकरीबन साढ़े आठ बजे स्वाति की नींद खुली। कमरे के बाहर से बर्तनों के खटकने और गैस जलने की धीमी आवाज़ें आ रही थीं। स्वाति एक झटके में उठकर बैठ गई। उसके दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसे लगा कि शायद ससुर जी या मयंक भूख के मारे गुस्से में रसोई में सामान पटक रहे होंगे और अब बहुत बड़ा तमाशा खड़ा होगा। उसने घबराते हुए अपने बिखरे बाल बांधे और भारी मन से कमरे का दरवाज़ा खोला।

कमरे से बाहर निकलते ही उसके कदम अचानक ठिठक गए।

सामने डाइनिंग टेबल पर कुणाल एक बड़ी सी प्लेट में भाप उड़ाते हुए गरमा-गरम मेथी और पनीर के पराठे और साथ में मक्खन की डली लिए खड़ा था। उसके दूसरे हाथ में तुलसी और अदरक वाली महकती हुई चाय का कप था। कुणाल ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे भाभी! आप जाग गईं? मैं आपके कमरे में ही आने वाला था। चलिए, जल्दी से हाथ धोकर बैठ जाइए और ये पराठे खाइए। भैया, पापा और तान्या सबने खाना खा लिया है, और मां को भी दलिया खिलाकर दवाई दे दी गई है।”

स्वाति अवाक रह गई। उसकी जुबान से कोई लफ्ज़ नहीं फूटा। वह किसी पत्थर की मूरत की तरह कभी पराठों को देखती तो कभी कुणाल के चेहरे को। कुणाल, जो कभी रसोई से पानी की बोतल भी खुद नहीं भरता था, उसके हाथों में तवे की हल्की कालिख लगी हुई थी और चेहरे पर पसीना था।

“भाभी, चुपचाप खड़े क्या देख रही हैं? खाइए भी! थोड़ा नमक ज़्यादा हो सकता है, पर भैया कह रहे थे कि पराठे एकदम क्रिस्पी बने हैं,” कुणाल ने हंसते हुए प्लेट टेबल पर रख दी।

स्वाति की आंखों से आंसू छलक आए, लेकिन इस बार ये आंसू अपमान या गुस्से के नहीं थे। यह एक ऐसा अहसास था, जिसे शब्दों में बांधना मुमकिन नहीं था। उसने कांपते हाथों से पराठे का एक निवाला तोड़ा। भूख और थकान से चूर शरीर को उस निवाले ने एक अद्भुत सुकून दिया।

खाना खत्म करके स्वाति जब अपनी प्लेट लेकर रसोई की ओर बढ़ी, तो वहां का नज़ारा देखकर उसकी आंखें फिर से भर आईं। रसोई में मयंक स्लैब पर गीला कपड़ा मारकर सफाई कर रहे थे, और कुणाल बचे हुए बर्तनों को साबुन से धोकर रैक में सजा रहा था। दोनों भाई आपस में हंसी-मज़ाक कर रहे थे कि किसने ज्यादा गोल पराठा बनाया था।

स्वाति ने आगे बढ़कर संकोच से कहा, “मयंक… आप दोनों ये सब क्यों कर रहे हैं? लाइए, मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ, मैं बर्तन धो देती हूँ।”

मयंक ने मुड़कर स्वाति के कंधे पर हाथ रखा और बेहद नर्मी से बोले, “स्वाति, तुम इस घर की बहू ज़रूर हो, पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि यह घर सिर्फ तुम्हारी जिम्मेदारी है। जब मां बीमार हुईं, तो हमें लगा कि सब कुछ पहले की तरह ही चल रहा है, लेकिन आज जब तुम कमरे में बंद होकर सो गईं, तब हमें समझ आया कि तुम अकेले कितना बड़ा पहाड़ ढो रही थीं। आज शाम जब पापा घर आए और उन्होंने देखा कि तुम अस्वस्थ हो, तो उन्होंने ही कहा कि आज रसोई हम संभालेंगे।”

तभी पीछे से तान्या भी रसोई में दाखिल हुई। उसके चेहरे पर साफ़ शर्मिंदगी झलक रही थी। वह आगे बढ़ी और स्वाति का हाथ पकड़ते हुए धीमे स्वर में बोली, “भाभी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं अपनी ही दुनिया में इतनी खोई थी कि मैंने कभी आपकी थकान को समझा ही नहीं। जब भैया और कुणाल भाई ने मुझे समझाया और खुद आटा गूंथना शुरू किया, तब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। अब से ऐसा कभी नहीं होगा, मैं हर रोज़ आपके साथ काम करवाऊंगी।”

मयंक ने हंसते हुए कुणाल की तरफ देखा और बोले, “देखा कुणाल, ये औरतों की कितनी अजीब आदत होती है! जब तक काम का ढेर लगा रहता है, तब तक आपस में रूठती-झगड़ती हैं, और जैसे ही हम पुरुष काम खत्म कर देते हैं, तो इनमें ऐसा गहरा प्यार उमड़ पड़ता है मानो कभी कुछ हुआ ही नहीं था!”

यह सुनते ही रसोई में मौजूद सभी लोग ठहाका मारकर हंस पड़े। स्वाति और तान्या दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दीं।

उसी वक्त लाठी टेकते हुए जानकी जी भी धीमी चाल से रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। वे यह देखने आई थीं कि रात को चूल्हा बंद हुआ या नहीं, लेकिन बच्चों को इस तरह एक साथ हंसते और काम बांटते देखकर उनके चेहरे पर एक असीम संतोष फैल गया। बीमारी के बाद आज पहली बार उनके चेहरे पर ताज़गी नज़र आ रही थी। उन्होंने स्वाति के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बहू, जब तक परिवार के पहिए एक साथ नहीं घूमते, तब तक गाड़ी नहीं चल सकती। आज मुझे यकीन हो गया कि मेरा परिवार अब सच में एक डोर में बंध चुका है।”

स्वाति ने अपने भरे-पूरे परिवार को देखा। उसके दिल का सारा मैल, सारा गुस्सा और सारी थकान एक पल में काफूर हो चुकी थी। उसे समझ आया कि परिवार में कभी-कभी तनाव काम के बोझ और संवाद की कमी की वजह से आ जाता है, पर उस तनाव की बुनियाद में नफरत नहीं होती। जहां अपने लोग एक-दूसरे की तकलीफ को समझकर बिना कहे हाथ थाम लें, वही घर स्वर्ग होता है। सच ही तो है, मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, संयुक्त परिवार की छांव में हर धूप हल्की लगने लगती है, और आखिरकार अपना घर तो अपना ही होता है।

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परिवार में जब सारा काम किसी एक सदस्य पर छोड़ दिया जाता है, तो रिश्तों में खटास आना स्वाभाविक है; लेकिन जब हर कोई अपनी जिम्मेदारी समझकर हाथ बंटाता है, तो वही घर खुशियों का आशियाना बन जाता है। क्या आपके घर में भी कभी ऐसा हुआ है कि परिवार के सदस्यों ने मिलकर किसी मुश्किल को एक खूबसूरत याद में बदल दिया हो? अपने अनुभव और विचार हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।

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मूल लेखिका : मधु वशिष्ठ

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