“अदिति, रो मत मेरी बच्ची,” कल्याणी कह रही थी, “तेरे बाबूजी बुरे इंसान नहीं हैं, बस वो उस सोच के कैदी हैं जो उन्हें विरासत में मिली है। उन्होंने जिंदगी भर अपनी कमजोरियों को खानदान के उसूलों का नाम दिया। जब मेरी शादी हुई थी, मेरी आंखों में भी आसमान छूने की चाहत थी। मैं भी कुछ बनना चाहती थी, अपनी एक पहचान बनाना चाहती थी। लेकिन जब तेरे बाबूजी ने मुझे रोका, तो मैंने यह सोचकर समझौता कर लिया कि शायद यही एक अच्छी पत्नी का धर्म है। मैंने अपनी डिग्रियां, अपने मेडल एक पुराने बक्से में बंद कर दिए ताकि तुम्हारे बाबूजी का मान बना रहे। मैंने सोचा था कि मेरी खामोशी इस घर को खुश रखेगी।
“नहीं… हमारे खानदान की बहू-बेटियों ने कभी चारदीवारी लांघकर बाहर कदम नहीं रखा। और जब तक मेरी सांस चल रही है, मैं अपने जीते-जी अपनी चौखट की मर्यादा को नीलाम नहीं होने दूंगा!” मेरी आवाज की गड़गड़ाहट हमेशा की तरह पूरे घर को सहमा देने के लिए काफी होनी चाहिए थी। हर बार की तरह मैंने अपनी दबंग आवाज और तनी हुई भृकुटियों से सबको खामोश कर देने की पूरी कोशिश की थी।
लेकिन उस शाम फिजाओं में तैरता सन्नाटा कुछ अलग ही बगावत की गवाही दे रहा था। पच्चीस बरसों के गृहस्थ जीवन में आज पहली बार मुझे अपने ही बनाए नियमों के खिलाफ एक संगठित विरोध की फुसफुसाहट नहीं, बल्कि सीधी चुनौती महसूस हो रही थी। मेरी बड़ी बेटी अदिति अपनी आंखों में आंसू लिए नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प लिए खड़ी थी।
“लेकिन बाबूजी, आप बिना सोचे-समझे फैसला सुनाने से पहले कम से कम मेरी बात सुन तो लीजिए! आज जमाना बदल चुका है, सिर्फ एक बार मेरे नजरिए से…” अदिति ने अपने कदम आगे बढ़ाते हुए कुछ कहना चाहा, उसकी आवाज में तर्क था, जिद नहीं।
मगर तर्क और संवाद तो हमेशा से मेरे लिए हार का दूसरा नाम रहे थे। मैं किसी भी ऐसे तर्क के सामने ठहरना ही नहीं चाहता था जो मेरे खोखले पुरुषत्व पर सवाल खड़ा कर दे। जब भी घर में कोई ऐसी आंधी उठती, मैं अपनी जिद्द की छतरी तानकर बाहर निकल जाता था। क्योंकि हमारी परवरिश में यह कूट-कूट कर भरा गया था कि परिवार में बराबरी की बातचीत का मतलब अपनी सत्ता सौंप देना होता है। मैं बिना उसकी पूरी बात सुने, पैर पटकता हुआ मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ गया।
पीछे से निकलते वक्त मेरी छोटी बेटी श्रेया की सिसकती और आक्रोश में डूबी आवाज मेरी पीठ पर चाबुक की तरह पड़ी थी, “अम्मा, तुम हर बार बाबूजी के सामने घुटने क्यों टेक देती हो? क्यों कभी उनका विरोध नहीं करतीं? देखो न, बाबूजी की इस बेमतलब की तानाशाही ने हमारे सपनों का गला घोंट कर रख दिया है!”
उसकी बात सुनकर मेरे कदम दहलीज पर एक पल के लिए ठिठके जरूर, मगर मैंने पलटकर देखना अपनी शान के खिलाफ समझा। अम्मा यानी मेरी पत्नी कल्याणी… कल्याणी आखिर कहती भी तो क्या कहती? उसके पास शब्द थे भी कहां? उसके शब्द और इच्छाएं तो मैंने शादी के पहले साल में ही उस वक्त कुचल दी थीं जब उसने अपनी जिंदगी को एक नया आयाम देने की मासूम सी कोशिश की थी।
मुझे अच्छी तरह याद है, शादी के महज छह महीने बाद ही जब कल्याणी ने शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में अर्थशास्त्र की व्याख्याता बनने के लिए आवेदन करने की इच्छा जताई थी। उसने स्वर्ण पदक के साथ स्नातकोत्तर किया था। मगर उस दिन मैंने पूरे घर के सामने खानदान की नाक और प्रतिष्ठा का ऐसा तांडव रचा था कि वह कांप उठी थी। मैंने सीधे शब्दों में कह दिया था कि हमारे घराने की औरतें पराए मर्दों के बीच जाकर काम नहीं करतीं।
फिर कुछ बरसों बाद, जब दोनों बेटियां स्कूल जाने लगी थीं और कल्याणी के पास दोपहर का कुछ खाली वक्त बचने लगा था, तब उसने बड़े संकोच के साथ एक दिन मुझसे कहा था, “सुनिए, पड़ोस के कुछ बच्चे गणित और हिसाब-किताब में कमजोर हैं। उनके माता-पिता कह रहे थे कि अगर मैं उन्हें रोज एक-दो घंटे घर की बैठक में ही पढ़ा दूं, तो बच्चों की मदद हो जाएगी और मेरा मन भी लगा रहेगा।”
उस दिन तो जैसे मेरे स्वाभिमान पर किसी ने तेजाब फेंक दिया था। मैं आगबबूला होकर उस पर बरस पड़ा था, “अब यही कसर बाकी रह गई थी हमारे खानदान की इज्जत को चौराहे पर नीलाम करने की! क्या मेरे अनाज के थोक व्यापार की कमाई इतनी कम पड़ रही है जो तुम मोहल्ले के बच्चों की ट्यूशन फीस पर नजर गड़ाए बैठी हो? बाहर जाकर क्या मुंह दिखाऊंगा मैं अपने दोस्तों को कि मेरी बीवी दो कौड़ी की ट्यूशन पढ़ा रही है? बाबूजी अगर यह सुन लेंगे तो जीते-जी मर जाएंगे और मुझे घर से बेदखल कर देंगे!”
और जब यह बात मेरे स्वर्गीय पिता विश्वनाथ जी के कानों तक पहुंची थी, तो उनका गुस्सा मुझसे भी चार गुना ज्यादा भयंकर था। उन्होंने अपनी लाठी फर्श पर पटकते हुए मुझे डांटा था, “देवेंद्र! अपनी लुगाई को कायदे में रखना सीख। हमारे पुरखों की चौखट पर आज तक किसी औरत की कमाई का एक सिक्का नहीं आया। इस खानदान के मर्द अपनी बाजुओं की कमाई पर पूरे कुनबे को पालते हैं, मेहरारू की कमाई पर पलने वाले नामर्द कहलाते हैं!”
पिताजी की उस फटकार के बाद कल्याणी की जुबान पर जैसे हमेशा के लिए ताला लग गया था। उसने फिर कभी अपने दिल की कोई साध मेरे सामने जाहिर नहीं की। वह चुपचाप रसोई, बच्चों के पालन-पोषण और घर के अंतहीन कामों में खुद को खपाती चली गई।
उस वक्त मैं अपनी जीत पर फूला नहीं समाता था। मुझे लगता था कि मैंने एक मर्द होने का असली फर्ज निभाया है और अपनी सत्ता को सुरक्षित रखा है। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं थी। सच्चाई का एक बेहद घिनौना और कड़वा पहलू यह भी था जो केवल मेरे अंतर्मन के किसी अंधेरे कोने में छिपा हुआ था। सच तो यह था कि कल्याणी मुझसे कहीं ज्यादा पढ़ी-लिखी, प्रखर और समझदार थी। मैं बमुश्किल साधारण स्नातक पास था, जबकि कल्याणी जब हिसाब-किताब या दुनियादारी की बात करती थी, तो उसकी समझ और प्रतिभा मुझे अपने भीतर एक गहरी हीन भावना से भर देती थी।
मुझे हमेशा यह डर सताता रहता था कि अगर कल्याणी बाहर निकल गई, अगर उसने मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया या कॉलेज में पढ़ाने लगी, तो लोग उसकी विद्वता के कसीदे पढ़ेंगे। सारा मोहल्ला उसका सम्मान करेगा और उसके सामने मेरी हैसियत एक साधारण व्यापारी से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएगी। लोग हमारी तुलना करेंगे और मुझे उससे कमतर आंकेंगे। अपने इस छिपे हुए डर, ईर्ष्या और असुरक्षा को छिपाने के लिए मैंने ‘खानदान की इज्जत’ नाम का एक मजबूत मुखौटा अपने चेहरे पर चढ़ा लिया था।
मगर आज… आज वही इतिहास मेरी बेटियों के सामने आकर खड़ा हो गया था। अदिति ने कंप्यूटर साइंस में अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी और उसे बेंगलुरु की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बहुत बड़े पैकेज पर नौकरी का प्रस्ताव मिला था। वह अपने दम पर अपने करियर की शुरुआत करना चाहती थी, लेकिन मेरे भीतर का वही पुराना पुरुष अहंकार फिर से फन उठाकर खड़ा हो गया था। दूसरे शहर जाकर नौकरी करना तो दूर, मैं उसे कानपुर में भी दफ्तर जाने की इजाजत देने को तैयार नहीं था।
उस शाम मैं गुस्से में घर से निकलकर अपने दोस्त आनंद के साथ गंगा बैराज की तरफ चला गया। हवा ठंडी थी, मगर मेरे भीतर गुस्से की भट्टी जल रही थी। मैं आनंद के सामने अपनी बेटियों की कथित ‘बगावत’ का रोना रोने लगा। मुझे उम्मीद थी कि आनंद, जो खुद एक पारंपरिक परिवार से आता था, मेरी हां में हां मिलाएगा।
लेकिन आनंद ने मेरी पूरी बात बहुत खामोशी से सुनी। फिर उसने एक गहरी सांस ली और मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा, “देवेंद्र, तू आज जिसे अपनी जीत और खानदान की शान समझ रहा है ना, असल में वह तेरी सबसे बड़ी हार है। कल्याणी भाभी कितनी प्रतिभाशाली थीं, हम सब जानते थे। तूने अपनी असुरक्षा की खातिर उनके सपनों को चूल्हे में झोंक दिया। भाभी ने तो तेरे अहंकार के आगे सिर झुका लिया, लेकिन क्या तू सच में चाहता है कि तेरी बेटियां भी उसी घुट-घुट कर जीने वाली जिंदगी को अपना मुकद्दर मान लें? अपनी बेटियों के हुनर को अपनी झूठी मर्दानगी की वेदी पर मत चढ़ा मेरे भाई। जमाना बहुत आगे निकल चुका है।”
आनंद की बातें मेरे कानों में हथौड़े की तरह बज रही थीं। मैं वहां से चिढ़कर उठ आया, मगर उसका कहा हर एक शब्द मेरे सीने में चुभने लगा था।
रात के करीब ग्यारह बजे जब मैं घर लौटा, तो बैठक में सन्नाटा था। मुख्य द्वार कल्याणी ने खोला। उसकी आंखों में कोई शिकवा नहीं था, बस एक अजीब सा खालीपन था—वही खालीपन जो मैंने पिछले पच्चीस बरसों में कई बार देखा था और जिसे देखकर मुझे सुकून मिलता था, लेकिन आज वही खालीपन मुझे डराने लगा था।
मैं दबे पांव अपने कमरे की तरफ जा रहा था कि तभी बेटियों के कमरे से कुछ सिसकियों की आवाज सुनाई दी। कमरे का दरवाजा आधा खुला हुआ था। अंदर एक मद्धम रोशनी जल रही थी। मैंने अनजाने में ही ठिठक कर अंदर झांका।
अदिति फर्श पर बैठी अपना सिर कल्याणी की गोद में रखकर रो रही थी। श्रेया पास ही बैठी थी। अदिति हिचकियों के बीच कह रही थी, “अम्मा, मैंने कॉलेज के चार साल दिन-रात एक करके पढ़ाई की ताकि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकूं। मैंने सोचा था कि जब मेरा सेलेक्शन होगा तो बाबूजी गर्व से सबका मुंह मीठा कराएंगे। लेकिन बाबूजी को मेरी काबिलियत से ज्यादा इस बात की चिंता है कि चार रिश्तेदार क्या कहेंगे! अम्मा, क्या एक लड़की होना कोई गुनाह है? क्या हमारे सपनों की कोई कीमत नहीं होती?”
कल्याणी बहुत धीरे से अदिति के बालों को सहला रही थी। उसकी अपनी आंखों से भी आंसू बहकर उसके आंचल में समा रहे थे। कल्याणी की आवाज बेहद शांत मगर रूह को कंपा देने वाली थी।
“अदिति, रो मत मेरी बच्ची,” कल्याणी कह रही थी, “तेरे बाबूजी बुरे इंसान नहीं हैं, बस वो उस सोच के कैदी हैं जो उन्हें विरासत में मिली है। उन्होंने जिंदगी भर अपनी कमजोरियों को खानदान के उसूलों का नाम दिया। जब मेरी शादी हुई थी, मेरी आंखों में भी आसमान छूने की चाहत थी। मैं भी कुछ बनना चाहती थी, अपनी एक पहचान बनाना चाहती थी। लेकिन जब तेरे बाबूजी ने मुझे रोका, तो मैंने यह सोचकर समझौता कर लिया कि शायद यही एक अच्छी पत्नी का धर्म है। मैंने अपनी डिग्रियां, अपने मेडल एक पुराने बक्से में बंद कर दिए ताकि तुम्हारे बाबूजी का मान बना रहे। मैंने सोचा था कि मेरी खामोशी इस घर को खुश रखेगी।”
कल्याणी एक पल के लिए रुकी, उसने अदिति का चेहरा अपने हाथों में उठाया और कहा, “लेकिन आज मुझे अपनी उस खामोशी पर सबसे ज्यादा पछतावा हो रहा है। अगर उस दिन मैंने अपनी पहचान के लिए थोड़ी सी हिम्मत दिखाई होती, अगर मैंने अपने वजूद के लिए आवाज उठाई होती, तो आज मेरी बेटियों को अपने ही घर में अपने हक के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता। मैंने झुक कर तुम्हारे बाबूजी को यह यकीन दिला दिया कि वो जो कर रहे हैं वही सही है। मेरी कायरता ने आज तुम्हें इस मोड़ पर ला खड़ा किया है। लेकिन अदिति, तुम मत रुकना। अगर आज तुम अपने हक के लिए नहीं लड़ीं, तो कल तुम्हारी आने वाली पीढ़ी भी इसी चहारदीवारी में घुटकर रह जाएगी।”
दरवाजे की ओट में खड़ा मैं पत्थर की मूरत बन चुका था। कल्याणी के एक-एक शब्द ने मेरे बरसों पुराने अहंकार के महल को पल भर में ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया था। जिस खामोशी को मैं अपनी जीत समझता आया था, वह असल में एक औरत का अपने सपनों के साथ किया गया सबसे बड़ा समझौता था।
मैंने अपने कमरे में जाकर अपनी अलमारी का वह पुराना दराज खोला, जहां पुराने कागजात रखे रहते थे। सबसे नीचे कल्याणी की पुरानी फाइल दबी पड़ी थी। मैंने कांपते हाथों से उसकी स्नातकोत्तर की डिग्री निकाली। विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान पाने का वह चमकता हुआ प्रमाण पत्र आज मेरी आंखों में चुभ रहा था। उस कागज के पन्ने पर कल्याणी की युवावस्था की तस्वीर थी, जिसकी आंखों में एक गजब का आत्मविश्वास और चमक थी। फिर मेरी नजर ड्रेसिंग टेबल के आईने पर पड़ी, जहां से मुझे अपना ही अक्स दिखाई दे रहा था। मुझे अपने ही चेहरे से घिन आने लगी। मैं कितना संकीर्ण, कितना असुरक्षित और कितना कमजोर इंसान था, जो अपनी ही पत्नी की रोशनी से डरता रहा, इस खौफ में कि कहीं उसकी चमक मेरी फीकी पहचान को निगल न ले!
उस पूरी रात मेरी आंखों से नींद गायब थी। हर घड़ी का कांटा मेरे सीने पर भारी बोझ बनकर चल रहा था। पहली बार मुझे अपनी मर्दानगी पर गर्व नहीं, बल्कि अपने पुरुष होने के खोखलेपन पर रोना आ रहा था।
सुबह की पहली किरण जब खिड़की से छनकर आई, तो घर में हमेशा की तरह चाय के बर्तनों की धीमी आवाजें आने लगीं। कल्याणी रसोई में थी, उसका चेहरा हमेशा की तरह भावहीन था। दोनों बेटियां अपने कमरे में चुपचाप बैठी थीं, जैसे किसी अंतिम फैसले के इंतजार में हों।
मैंने अपने कपड़े बदले और बैठक में जाकर बैठ गया। फिर मैंने एक गहरी सांस ली और आवाज लगाई, “कल्याणी! अदिति, श्रेया… जरा बाहर आओ।”
मेरी आवाज सुनते ही घर का माहौल एकदम तनावपूर्ण हो गया। कल्याणी पल्लू संभालती हुई रसोई से निकली, उसके पीछे-पीछे सहमी हुई अदिति और श्रेया भी आकर खड़ी हो गईं। अदिति की आंखें रात भर रोने के कारण सूज गई थीं। उसे लग रहा था कि आज फिर वही डांट-फटकार और फरमान सुनाया जाएगा।
मैंने तीनों को देखा। मेरे गले में जैसे कोई कांटा सा अटक गया था। मैंने अपने जीवन में कभी किसी से माफी नहीं मांगी थी, कभी किसी के सामने सिर नहीं झुकाया था। मगर आज अगर मैं नहीं झुकता, तो मैं हमेशा के लिए एक पिता और एक इंसान के रूप में मर जाता।
मैंने मेज पर वह फाइल रख दी जो मैं कमरे से लेकर आया था। कल्याणी ने उस फाइल को देखा और चौंक गई। वह उसकी अपनी डिग्रियों की फाइल थी।
“अदिति,” मेरी आवाज में आज वह पुरानी गर्जना नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी कंपकंपी और नमी थी, “बेंगलुरु जाने के लिए फ्लाइट का टिकट बुक करना है या ट्रेन का? और वहां रहने के लिए कंपनी हॉस्टल दे रही है या तुम्हें अलग से फ्लैट देखना पड़ेगा?”
कमरे में सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि घड़ी की टिक-टिक भी साफ सुनाई देने लगी। अदिति ने अविश्वास से अपनी अम्मा की तरफ देखा, फिर मेरी तरफ।
“बाबूजी… आप… आप सच कह रहे हैं?” अदिति के मुंह से बमुश्किल शब्द निकले।
मैं अपनी कुर्सी से उठा और धीरे-धीरे चलकर अदिति के करीब गया। मैंने उसके कांपते हुए सिर पर अपना हाथ रखा। मेरी आंखों से एक आंसू की बूंद फिसलकर मेरे गाल पर आ गिरी।
“हां मेरी बच्ची, मैं सच कह रहा हूं,” मैंने रूंधे हुए गले से कहा, “तुझे जहां जाना है, तू जा। अपने सपनों को जितनी ऊंची उड़ान दे सकती है, दे। अब यह घर, यह चौखट और यह झूठा खानदान तेरे परों की बेड़ी कभी नहीं बनेगा। मुझे माफ कर दे बेटा… मुझे अपनी हीन भावना और अपने खोखले अहंकार से बाहर निकलने में पच्चीस साल लग गए।”
अदिति की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। वह बिना कुछ सोचे आगे बढ़ी और मुझसे लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगी। पच्चीस बरसों में आज पहली बार मेरी बेटी ने मुझे एक शासक नहीं, बल्कि अपना सच्चा पिता समझकर गले लगाया था। उस स्पर्श में जो सुकून था, वह मुझे दुनिया के किसी भी झूठे मान-सम्मान में कभी नहीं मिला था।
इसके बाद मैं मुड़ा और कल्याणी के सामने जाकर खड़ा हो गया। कल्याणी अपनी जगह पर बुत बनी खड़ी थी, उसकी आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे।
मैंने कल्याणी के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। उसका हाथ छूते ही मुझे महसूस हुआ कि कितनी मेहनत और कितने त्याग से इसने इस घर को सींचा था।
“कल्याणी, मुझे माफ कर देना,” मैंने भारी दिल से कहा, “मैंने खानदान की पगड़ी बचाने के नाम पर तुम्हारी पूरी शख्सियत को कुचल दिया। मैं मर्द कहलाने लायक नहीं था क्योंकि एक सच्चा मर्द अपनी औरत की कामयाबी से डरता नहीं, बल्कि उस पर गर्व करता है। मैंने तुम्हारी जिंदगी के पच्चीस साल छीन लिए, उसका प्रायश्चित तो मैं शायद इस जन्म में नहीं कर पाऊंगा… लेकिन आज से यह घर तुम्हारा भी उतना ही है जितना मेरा। अगर तुम आज भी बच्चों को पढ़ाना चाहती हो, या अपने दम पर कुछ शुरू करना चाहती हो, तो यह पूरा घर, यह बैठक तुम्हारी है। अब यहां कोई बंदिश नहीं होगी।”
कल्याणी ने अपने कांपते हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। पच्चीस साल का दबा हुआ दर्द, अपमान और घुटन आज आंसुओं के जरिए बहकर उस आंगन को धो रही थी। श्रेया दौड़कर आई और उसने हम तीनों को अपने आगोश में समेट लिया।
उस दिन हमारे पुश्तैनी मकान की वह सदियों पुरानी दीवारें टूटी नहीं थीं, बल्कि उन दीवारों में पहली बार रोशनी और ताजी हवा के आने के लिए खिड़कियां खुल गई थीं। खानदान की असली इज्जत औरतों को कैद रखने में नहीं, बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का संबल देने में है—यह बात समझने में मुझे देर जरूर हुई, मगर देर आए दुरुस्त आए।
दोस्तों, यह कहानी सिर्फ देवेंद्र और कल्याणी की नहीं है, बल्कि हमारे समाज के उन तमाम परिवारों का आईना है जहां आज भी ‘खानदान की इज्जत’ और ‘मर्दानगी’ के झूठे खोल में बेटियों और बहुओं के सपनों की आहुति दे दी जाती है। असली मान-सम्मान किसी को दबाकर रखने में नहीं, बल्कि अपने अपनों की खुशियों और उनके पंखों को मजबूती देने में होता है।
क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में भी हमारे समाज में कई पुरुष अपनी हीन भावना को ‘परंपरा’ और ‘खानदान की नाक’ का नाम देकर घर की स्त्रियों की प्रतिभा को दबा देते हैं? क्या कल्याणी की तरह चुप रहकर समझौता करना सही था या उसे शुरुआत में ही अपनी आवाज उठानी चाहिए थी? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : लतिका श्रीवास्तव