मेरा आत्मसम्मान – मंजू ओमर

हेलो हां बेटा नीरज, कहां हो पापा आप ,बेटा मैं घर आ गया हूं घर आ गया हूं, इस घर पर छोड़कर और कौन सा घर है आपका । बेटा मैं गांव आ गया हूं पर पापा गांव में भी तो कोई घर नहीं है आपका वह तो पहले ही बिक चुका है। हां बेटा तेरे चाचा जहाँ  रहते हैं उन्हीं के घर में खेत पर बने हैं जो दो कमरों का घर बना है उसी में रहने के लिए जगह मांग ली है वह तैयार है।कुछ समय  मे कहीं कमरा ले लूंगा किराए पर ।

आखिर बेटे का घर छोड़कर आप वहां  क्यों चले गए  , बस ऐसे ही बेटा मेरा मन शहर में    नहीं लग रहा था।अरे पापा यहां सब सुख सुविधा थी वहां पर गांव में क्या है कितनी परेशानी होगी । नहीं बेटा कोई परेशानी नहीं होगी , बुढ़ापे में सुख सुविधा नहीं चाहिए आत्म सम्मान की दो रोटी चाहिए ।

तो क्या आपका यहां निरादर हो रहा था , मंजरी इतने अच्छे से तो रखती थी आपको , हां बेटा सब ठीक था मेरा दिल नहीं लगता था , वहाँ,सारी उम्र तो यही गांव में बगैर सुख सुविधाओं के ही काटा है अब बस इस बची जिंदगी  भी ऐसे ही कट जाएगी।अच्छा चलिए थोड़े दिन बाद   आ  जाइएगा ठीक  है बेटा। 

           इधर रघुनाथ जी के घर छोड़कर गांव चले जाने से मंजरी बहुत खुश थी।  लेकिन नीरज बहुत परेशान था ऑफिस से आकर नीरज चुपचाप सोफे  में बैठ जाता था । एक-दो दिन ऐसे ही बीत गए।तभी मंजरी एक दिन शाम को काफी बनाकर दो मग लेकर आ गई लो नीरज  काफी पिओ, ,मंजरी हां , पापा यहां से क्यों चले गए क्या तुमने कुछ कहा था

क्या उन्हें क्या ठीक से ख्याल नहीं रख रही थी क्या कोई परेशानी थी कि क्या,  अरे नहीं बाबा मैंने कुछ नहीं कहा और कोई भी परेशानी नहीं थी तुम बेकार में  परेशान हो रहे हो नीरज । पापा जिंदगी भर गांव में रहे हैं और तुम शहर मे।जब तक मां थी तब तक तो वह गांव से आना ही नहीं चाहते थे

मां के ना रहने पर तुम उन्हें जबरदस्ती यहां ले आए थे । लेकिन उनका मन नहीं लगता था यहां मैं देखती थी वह उदास बैठे रहते थे ,

गाँव को बहुत याद करते थे चाचा से बात करते थे कि मुझे यहां अच्छा नहीं  लग रहा है तुम सबकी बहुत याद आती है गांव आना है तो चले गए तुम इतना परेशान क्यों हो रहा है जब मन करे तो चले जाना मिलने सच  कह रही हो ना मंजरी हां हां बिल्कुल सच चलो अच्छा ठीक है और पापा के गांव में रहना है तो फिर ठीक है। 

             नीरज को पट्टी पढ़कर मंजरी बहुत खुश थी चलो झूठ ही सही लेकिन मेरी बात नीरज सच मान गया है। उसे नहीं पता कि पापा जी मुझसे  परेशान होकर गांव गए है, मेरी  आजादी में   खलल डाले था बुढढा।धीरे -धीरे नीरज सब बातों को भूल गया और सामान्य से जिंदगी जीने  लगा।

दो महीने बीत गए रघुनाथ जी को गए हुए,  नीरज ने सोचा की बहुत समय हो गया पापा से बात नहीं हुई बहुत व्यस्त था चलो आज फोन लगाता हूं । फिर नीरज ने कई बार पापा को फोन लगाया लेकिन फोन नहीं उठा और बात नहीं हो पाई । फिर नीरज ने गांव में अपने चाचा को फोन लगाया हेलो चाचा जी प्रणाम खुश रहो बेटा , और चाचा जी पापा को कई बार फोन लगाया लेकिन उठ नहीं रहा है कहां है वह आप जरा उनसे बात कर दें ।

लेकिन बेटा मैं कैसे बात कराi सकता हूं , अरे चाचा जी  पापा आपके पास ही तो रह रहे हैं ना । नहीं बेटा रघुनाथ भैया हमारे पास तो आए ही नहीं , मेरे पास आए नहीं तुम्हारे पास नहीं तो फिर वह कहां  गए।हमसे तो वह कह गए थे कि गांव जा रहा हूं तेरे चाचा के पास रह लूंगा नीरज बोला।

लेकिन बेटा हमारे पास तो आए ही नहीं एक दिन भैया से बात हुई थी तो बड़े परेशान थे कह रहे थे कि यहां शहर में मन नहीं लगता है। अपमान की दो रोटी खाने से तो अच्छा है मेहनत मजदूरी करके सम्मान से मरूँ तो ज्यादा अच्छा है। फिर उसके बाद से उनसे बात नहीं हुई।

मैंने कहा था कि भइया यहाँ गाँव आ जाओ हमारे पास रह लो। तो कहने लगे बड़ी गलती कर दी छोटे गाँव का मकान बेचकर।

अब शहर मे नीरज के घर निरादर सहकर तो नहीं रह पा रहा हूँ। अच्छा चाचा जी की नीरज से इतनी बात हुई तो नीरज परेशान हो गया। उसे मंजरी पर‌शक होने लगा, जरूर मंजरी ने ही कुछ किया है। नीरज ने मंजरी से पूछा मंजरी क्या तुमने पापा को घर से निकाला है, अरे नहीं नीरज तुम कैसी बात कर रहे हो। मै भला पापा को क्यों निकालूगीं। मै तो इतने अच्छे से रखती थी उन्हें। 

               इतने मे  डोरवेल बजी तो नीचे सोसाइटी का र्गाड आया था। वह मंजरी से बोला मैडम जी वो वृद्धाश्रम से फोन आया है कि बाबूजी की तबियत बहुत खराब हो गई है। तभी मंजरी ने र्गाड को चुप रहने का इशारा किया, तो नीरज ने देख लिया। कौन बाबूजी बीमार है बिहारी तुम किसकी बात कर रहे हो, बिहारी चुप रहा बोलो बिहारी डरो नहीं।

बिहारी कुछ बताने से कतरा रहा था। बोलो डरो नहीं क्या बात है, किस बाबूजी की बात कर रहे हो। वो साहब जी आपके बाबूजी, मैडम जी ने उनको घर से निकाल दिया था। आपके पीछे बाबूजी से मैडम जी बहुत गलत व्यवहार करती थी। उनको ढंग से खाने को नहीं देती थी और बहुत काम करवाती थी। और बात बात मे उनको जलील करती थी। 

      ‌      फिर एक दिन बाबूजी मेरे पास आए और बोले मुझे किसी वृद्धाश्रम का पता बता दो, पीछे पीछे मैडम जी भी आई और मुझसे कहने लगी कि इन्हें वृद्धाश्रम छोड आओ।

और ये भी कहा कि ये बात कभी साहब जी को पता न चले। और वृद्धाश्रम मे तुम अपना नबंर लिखवा कर आना वो तुम्हारे पास फोन करे जब भी कभी जरूरत हो तो मेरे पास नहीं। और आज वृद्धाश्रम से फोन आया है कि बाबूजी की तबियत बहुत खराब है, वही बताने आया था मै।

            और हाँ साहब जी मैडम जी ने बाबूजी से कहा था कि जब नीरज पूछें तो कहना गाँव आ गए है। और अब चाचा के पास ही रहेगें। क्या इतना सब कुछ हो गया मेरे बाबूजी के साथ और मुझे कुछ पता ही नहीं।

और नीरज ने खींच कर एक थप्पड़ मंजरी के गाल पर मार दिए। मंजरी मै तुमको क्या समझता रहा और तुम क्या निकली। तुमने हमारे बाबूजी के साथ इतनी नीच हरकत की। और हमारे बाबूजी अपना आत्मसम्मान बचाने की खातिर बिना कुछ बताए चुपचाप यहाँ से चले गए। मै कैसा इंसान हूँ मंजरी जो मैंने तुमपर भरोसा किया। 

       नीरज ने र्गाड को अपने साथ दिया और उस वृद्धाश्रम गया जहाँ वो रघुनाथ जी को छोड़ कर आया था। और नीरज जब वहाँ पहुंचा तो देखा बाबूजी बहुत बीमार थे। नीरज ने आगे जाकर उनके पांव पकड लिए, बाबूजी, बाबूजी मुझे माफ कर दे। आप इतना कुछ सह रहे थे मंजरी इतना कुछ कर रही थी और आपने कभी मुझे नहीं बताया।

नहीं बेटा सारी जिंदगी आत्मसम्मान से जिआ हूँ इतना तिरस्कार मै सह नहीं पा रहा था बस, इसलिए यहाँ चला आया। कम से कम यहाँ रोज रोज आत्मसम्मान तो नहीं कुचला जा रहा है न। दिन प्रतिदिन अपना आत्मसम्मान खोकर नहीं जी पा रहा था‌। तुम्हारा घर खराब न हो इसलिए चुपचाप यहाँ चला आया।

बाबूजी घर चलो अब मै यहाँ नहीं रहने दूंगा अब मै अपने सामने अच्छे से देखभाल करूँगा। नहीं बेटा अब मै तुम्हारे घर नहीं जाऊंगा, अब मुझे यही रहने दो। नीरज ने बाबूजी को मनाने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नहीं माने। फिर नीरज दोबारा मिलने की बात कहकर घर वापस आ गया। 

         नीरज घर मे बहुत उदास रहने लगा। उसने मंजरी से बात करना भी छोड दिया था। इससे मंजरी बहुत परेशान रहने लगी थी। नीरज को फिर से पा लेने के लिए मंजरी को नीरज से माफी मांगनी पड़ी

और फिर ऐसी गलती नही होगी। मनाकर नीरज को लेकर वृद्धाश्रम जाने को दोनों तैयार हो रहे थे कि तभी वृद्धाश्रम से फोन आया कि रघुनाथ जी नहीं रहे। 

     मंजरी और नीरज वृद्धाश्रम पहुंचे तो मंजरी बाबूजी के पांव पकड कर रोने लगी मुझे माफ कर दे बाबूजी मुझसे बहुत गलती हो गई। नीरज बोला अब माफी मांगने से क्या फायदा मंजरी  अब तो बाबूजी हम लोगो को छोड कर चले गए। 

          आज नीरज और मंजरी के पश्चाताप के आंसू रूक नहीं रहे थे। नीरज अपने को माफ नहीं कर पा रहा था। क्यों भरोसा किया मंजरी पर लेकिन,,,,,,,,,,। सबकुछ इतना जल्दी हो जाएगा उम्मीद न थी। मृत्यु का तो कोई भरोसा नहीं वो कब आ जाए। किसी के आत्मसम्मान को इतना भी न कुचले कि वो जीना ही छोड दे। 

मंजू ओमर

झांसी उत्तर प्रदेश

20 अक्टूबर

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