निशांत की इस बात ने शारदा जी के दिल के सारे संशय धो डाले। उन्होंने बड़े उत्साह से तीन बड़े संदूक और सूटकेस निकाले। पचास साल की गृहस्थी को कुछ बैगों में समेटना आसान नहीं था, पर बेटे के साथ रहने का मोह हर चीज़ पर भारी पड़ रहा था। ओंकारनाथ जी चुपचाप अपना चश्मा, कुछ पसंदीदा किताबें और ज़रूरी दवाइयाँ एक छोटे थैले में रख रहे थे। उनके चेहरे पर एक अजीब सी ख़ामोशी थी, जिसे शारदा जी उस वक्त समझ न सकीं।
सवेरे की हल्की गुलाबी धूप अभी आँगन में फैले तुलसी के चौतरे पर उतर ही रही थी कि बैठक में रखे टेलीफोन की घंटी अचानक घनघना उठी। शारदा जी रसोई में चाय के लिए अदरक कूट रही थीं। खरल को वहीं स्लैब पर छोड़, हाथ पल्लू से पोंछते हुए वे लगभग दौड़ती हुई बैठक की तरफ लपकीं। उनके चेहरे पर एक जानी-पहचानी अधीरता थी। जब भी फोन इस वक्त बजता, दिल की धड़कन अपने आप तेज हो जाती थी। रिसीवर उठाते ही कानों में गूंजी वह आवाज़, जिसे सुनने के लिए उनके कान दिन-रात तरसते रहते थे।
“माँ! सुन रही हो? आखिरकार काम हो गया। आज ही मैंने अपने नए फ्लैट की रजिस्ट्री करवाई है और कागज़ात पर दस्तखत कर दिए हैं!” उधर से उनके इकलौते बेटे निशांत की आवाज़ में एक अजीब सा उत्साह, गर्व और खुशी छलक रही थी।
शारदा जी का रोम-रोम खिल उठा। उन्होंने वहीं खड़े-खड़े हाथ जोड़कर मन ही मन भगवान को नमन किया और भरभराई आवाज़ में बोलीं, “सच कह रहा है लल्ला? अरे वाह! बहुत-बहुत बधाई मेरे बच्चे। इंसान के सिर पर अपनी खुद की छत होना दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है। बरसों की तेरी मेहनत भगवान ने देख ली बेटा। बहुत अच्छा किया, बहुत ही सुंदर।”
“माँ, सिर्फ बधाई से काम नहीं चलेगा,” निशांत ने लाड़ भरे अंदाज़ में टोकते हुए कहा, “अब वो जो तुम दोनों पुराने पुश्तैनी मकान में अकेले-अकेले दिन काटते हो न, वो किस्सा खत्म। मैंने यह बड़ा तीन कमरों वाला फ्लैट इसीलिए लिया है ताकि आप और बापूजी हमेशा के लिए हमारे साथ आकर रह सको। मैंने और रिया ने आपके कमरे का पूरा नक्शा भी सोच लिया है। अब कोई बहाना नहीं चलेगा। बहुत रह लिया आपने शहर से दूर उस सूने घर में।”
शारदा जी की आँखों की कोरों में नमी तैर गई। ममता से भीगा उनका गला कुछ पलों के लिए रुंध सा गया। उन्होंने भर्राए स्वर में कहा, “हाँ बेटा, क्यों नहीं… हमारा और है ही कौन तेरे और रिया के सिवा? अब तो हमारे घुटने भी जवाब देने लगे हैं, उम्र का यह ढलान है। बुढ़ापे में औलाद की छांव मिल जाए, इससे बड़ी तकदीर किसी माँ-बाप की क्या होगी? तूने कह दिया, मेरे तो आधे दर्द वैसे ही मिट गए। अच्छा सुन, अब तू दफ्तर के लिए देर मत कर, मैं भी जाकर तेरे बापूजी के लिए काढ़ा चढ़ाती हूँ।”
फोन रखकर शारदा जी कुछ पलों तक वहीं सोफे पर सुध-बुध खोए बैठी रहीं। उनके चेहरे पर एक तृप्त मुस्कान तैर रही थी। रसोई में जाकर उन्होंने जल्दी-जल्दी हाथ चलाए। आज उनका मन किसी काम में ठहर नहीं रहा था। हर काम में एक नया उत्साह, एक नई स्फूर्ति भर गई थी। स्नान करके उन्होंने अपनी सबसे सुंदर किनारी वाली बादामी साड़ी निकाली। आज शुक्रवार था। वे घर के पास स्थित माँ दुर्गा के मंदिर के लिए शुद्ध घी के बेसन के ताजे पेड़े का डिब्बा सजाने लगीं।
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए शारदा जी के पाँव जैसे ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। गर्भगृह में माता के चरणों में भोग लगाया, हाथ जोड़कर बेटे-बहू की लंबी उम्र और तरक्की की दुआएँ मांगीं, और फिर परिक्रमा करके बाहर चबूतरे पर आ बैठीं। वहाँ बैठे पंडित जी और दर्शन करने आई महिलाओं को उन्होंने मुस्कुराते हुए प्रसाद बांटा। जब डिब्बा समेटकर वे मंदिर के विशाल सिंहद्वार से बाहर निकल रही थीं, तभी सामने से उनकी पुरानी हमजोली और पड़ोसन विमला जी आती दिखाई दीं।
विमला जी ने शारदा जी के हाथ में बड़ा सा डिब्बा और चेहरे पर खिली चमक देखी तो चौंककर रुक गईं। “अरे शारदा! आज बड़ा भारी प्रसाद बांटा जा रहा है? कोई विशेष अनुष्ठान था क्या? न आज कोई तीज-त्योहार है, न भाई साहब का जन्मदिन… फिर यह खुशियों का सैलाब अचानक कैसे उमड़ पड़ा?”
शारदा जी ने स्नेह से विमला जी की हथेली पर दो बड़े पेड़े रखे और बोलीं, “अरे विमला, भगवान का दिया सब कुछ है, बस आज दिल बहुत हल्का और खुश है। निशांत का फोन आया था सुबह। उसने नया बड़ा आशियाना खरीद लिया है। अब तक तो कंपनी के दिए छोटे से किराए के मकान में सातवें माले पर रहता था। बालकनी में खड़े हो जाओ तो सिर्फ उड़ती धूल और नीचे भागती गाड़ियाँ दिखती थीं। मुझे तो वहाँ जाकर दम घुटने लगता था।”
विमला जी ने पेड़ा मुँह में रखते हुए कहा, “अरे वाह! यह तो बहुत ही नेक खबर सुनाई तुमने। औलाद अपने पैरों पर खड़ी होकर अपनी छत बना ले, तो माँ-बाप का जीवन सफल माना जाता है। पर बहन, तुम इतनी निहाल क्यों हो रही हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि अब तुम भी बोरिया-बिस्तर समेटकर उस बड़े शहर में जा बसोगी?”
शारदा जी खुलकर हंस पड़ीं, “और क्या विमला! अब यहाँ इस सन्नाटे में हम दोनों बूढ़े कब तक दीवारें ताकते रहेंगे? निशांत ने साफ़ कह दिया है कि माँ, इस बार ग्राउंड फ्लोर का फ्लैट लिया है, जिसके आगे थोड़ी सी खुली ज़मीन और हरी-भरी क्यारियाँ भी हैं। उसने कहा कि बापूजी को सीढ़ियाँ नहीं चढ़नी पड़ेंगी और आप आराम से सुबह धूप सेक सकेंगी। अब बेटा इतने मान से बुला रहा है, तो जाना ही पड़ेगा न।”
विमला जी का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया। उन्होंने शारदा जी के कंधे पर हाथ रखा और धीमे स्वर में कहा, “बात तो तुम्हारी सौ आने सच है शारदा। बुढ़ापे में औलाद के सिवा दूसरा कोई सहारा होता भी नहीं। पर एक बात कहूँ, बुरा मत मानना… यह तुम्हारा पचास साल पुराना मोहल्ला, ये खुला आँगन, नीम की छांव, मोहल्ले की सुख-दुख की सांझ… यह सब छोड़ना क्या इतना आसान होगा? फ्लैट चाहे जितना भी खुला हो, चारदीवारी तो चारदीवारी ही होती है। पर खैर, बच्चे साथ रखें, इससे बड़ा सुख क्या! बस जब भी मन ऊबे, अपनी इस सखी को याद कर लेना और चक्कर लगाती रहना।”
“हाँ विमला, यह तो अपना ही घर है, जब मन करेगा आ जाऊँगी,” शारदा जी ने आश्वस्त भाव से कहा और भारी मन से लेकिन होठों पर उम्मीद की मुस्कान लिए घर की ओर बढ़ गईं।
घर पहुँचीं तो देखा कि उनके पति ओंकारनाथ जी बरामदे की आरामकुर्सी पर बैठे चश्मा चढ़ाए अखबार उलट-पलट रहे थे। मेज़ पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी। शारदा जी ने तुरंत डिब्बे में से एक पेड़ा निकाला और ओंकारनाथ जी के आगे बढ़ा दिया।
“लीजिए, पहले मुँह मीठा कीजिए।”
ओंकारनाथ जी ने अखबार के ऊपर से झांकते हुए पूछा, “किस बात की मिठाई है भाई? सुबह से देख रहा हूँ, तुम बिना बात के ही गुनगुना रही हो।”
“खुशी की बात है जी! हमारे निशांत ने नया फ्लैट ले लिया है। अब हमें इस सूने घर में अकेले तिल-तिल कर जीने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। उसने कहा है कि पूजा होते ही वह हम दोनों को हमेशा के लिए अपने पास ले जाएगा। हमारा यह अकेलापन, बीमारियों का डर, सब अब खत्म हो जाएगा।”
ओंकारनाथ जी ने पेड़ा हाथ में लिया, पर उनके चेहरे पर वह चमक नहीं आई जो शारदा जी उम्मीद कर रही थीं। उन्होंने गहरी सांस ली और पेड़े को प्लेट में रखते हुए बोले, “शारदा, उम्मीदों के घोड़े इतनी तेज़ी से मत दौड़ाओ। आज का ज़माना हमारे ज़माने जैसा नहीं रहा। नई पीढ़ी की अपनी दुनिया होती है, अपने नियम और कायदे होते हैं। बेटे-बहू चाहे कितने भी अच्छे हों, दो पीढ़ियों का एक छत के नीचे निभना आज के दौर में बहुत कठिन साधना है। थोड़ा संयम रखो, ज़्यादा सपने मत बुनो।”
शारदा जी का माथा ठनका। वे तिनककर बोलीं, “आपकी यही पुरानी आदत है। हर अच्छी बात में मीन-मेख निकालना। निशांत हमारा इकलौता बेटा है, कोई पराया नहीं। उसने बचपन से हमारे संस्कारों को देखा है। रिया भी कितनी सुलझी हुई बच्ची है। आप तो बिना बात के ही ज़माने का रोना रोकर मन खट्टा करने लगते हैं।”
“मैं मन खट्टा नहीं कर रहा शारदा, बस तुम्हें हकीकत की ज़मीन पर रहने की सलाह दे रहा हूँ। जब बरसों की बनाई आज़ादी छिनती है, तो अपनों का वही प्यार कभी-कभी बोझ लगने लगता है। बाकी तुम्हारी जैसी मर्जी,” ओंकारनाथ जी ने शांत भाव से कहा और वापस अखबार में डूब गए।
शारदा जी बड़बड़ाती हुई आँगन में आ गईं। तभी घर की साफ-सफाई करने वाली मंगला आ पहुँची। “अरे मंगला, आ गई तू? ले, पहले हाथ धोकर यह प्रसाद खा। तेरे भैया ने नया घर ले लिया है। अब हम लोग भी वहीं जाकर रहेंगे,” शारदा जी ने अपनी खुशी बांटते हुए कहा।
मंगला ने श्रद्धा से प्रसाद माथे से लगाया और बोली, “बधाई हो अम्मा जी! बहुत भागवान हैं आप जो बेटा बुढ़ापे में छाती से लगाकर रखना चाहता है। आजकल तो शहर जाते ही बच्चे पलटकर सुध नहीं लेते। पर अम्मा, आप चली जाएँगी तो यह बड़ा घर सूना हो जाएगा। हमें भी आपकी बहुत याद आएगी।”
“अरे पगली, जब बेटा इतने प्यार से बुला रहा है, तो माँ का दिल कैसे न डोलेगा,” शारदा जी ने एक लंबी सांस भरते हुए कहा। उनकी आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने तैर रहे थे।
दिन बीतते गए और समय के पहिए के साथ छह महीने का वक्त पंख लगाकर उड़ गया। आखिरकार वह दिन आ ही गया जब निशांत का फोन आया। फ्लैट का सारा काम पूरा हो चुका था, रंग-रोगन की महक से नया घर महक रहा था। अगले हफ्ते गृह प्रवेश की पूजा मुकर्रर हुई थी।
निशांत ने फोन पर कहा, “माँ, मैंने आप दोनों के एसी कोच के टिकट भेज दिए हैं। बापूजी को कहना कि ज़रा भी लापरवाही न करें। आप अपनी ज़रूरत के सारे कपड़े, बापूजी की शुगर और बीपी की सारी दवाइयाँ, और अपने रोज़मर्रा के ज़रूरी कागज़ात सलीके से बड़े सूटकेस में रख लेना। अब आपको लौटकर इस पुराने घर में रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। जब तक आपका मन करे, तब तक क्या, अब तो उम्र भर आपको हमारे ही साथ रहना है।”
निशांत की इस बात ने शारदा जी के दिल के सारे संशय धो डाले। उन्होंने बड़े उत्साह से तीन बड़े संदूक और सूटकेस निकाले। पचास साल की गृहस्थी को कुछ बैगों में समेटना आसान नहीं था, पर बेटे के साथ रहने का मोह हर चीज़ पर भारी पड़ रहा था। ओंकारनाथ जी चुपचाप अपना चश्मा, कुछ पसंदीदा किताबें और ज़रूरी दवाइयाँ एक छोटे थैले में रख रहे थे। उनके चेहरे पर एक अजीब सी ख़ामोशी थी, जिसे शारदा जी उस वक्त समझ न सकीं।
नियत दिन वे दोनों ट्रेन से उस महानगर पहुँचे। स्टेशन पर निशांत खुद गाड़ी लेकर आया था। उसने झुककर दोनों के पाँव छुए, सूटकेस डिग्गी में रखे और गाड़ी नए आशियाने की ओर दौड़ा दी।
सोसायटी बेहद आलीशान थी। मुख्य द्वार पर सुरक्षा गार्ड, चारों तरफ सलीके से तराशे गए पौधे और चौड़ी कंक्रीट की सड़कें। ग्राउंड फ्लोर का फ्लैट वाकई बहुत खूबसूरत और आधुनिक था। दरवाज़े पर तोरण बंधा था। बहू रिया ने आरती की थाली सजाकर सास-ससुर का स्वागत किया। घर के भीतर संगमरमर का चमकदार फर्श, दीवारों पर मॉडर्न पेंटिंग्स और छत से लटकते खूबसूरत झूमर किसी महल जैसा अहसास करा रहे थे। शारदा जी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
पूजा बहुत धूमधाम से संपन्न हुई। कुछ रिश्तेदार और निशांत के दफ्तर के दोस्त आए, सबने नए घर की तारीफों के पुल बांधे। शारदा जी फूली नहीं समा रही थीं। उनका बेटा आज समाज में सर उठाकर जीने लायक बन चुका था।
लेकिन, जैसे ही मेहमान विदा हुए और गृह प्रवेश की गहमागहमी शांत हुई, घर के भीतर की असली दिनचर्या शुरू हुई। और इसी के साथ शुरू हुआ दो अलग-अलग संस्कृतियों और पीढ़ियों का मौन टकराव।
शारदा जी और ओंकारनाथ जी को जो कमरा दिया गया था, वह बहुत सुंदर था, लेकिन उसकी खिड़की बाहर की कंक्रीट की ऊंची दीवार की तरफ खुलती थी। सुबह जब शारदा जी की आँख खुली, तो उन्हें न तो चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दी और न ही मंदिर के लाउडस्पीकर से गूंजती प्रभाती। वहाँ सन्नाटा था, लेकिन वह सन्नाटा शांति का नहीं, बल्कि एक अजीब सी घुटन का था।
शारदा जी की आदत सुबह पाँच बजे उठकर नहा-धोकर आँगन में तुलसी को जल चढ़ाने और धीमी आवाज़ में भजन गाने की थी। उन्होंने उठकर जैसे ही पूजा घर का रुख किया, रिया की नींद टूट गई। रिया कॉर्पोरेट कंपनी में काम करती थी और देर रात तक लैपटॉप पर काम करने के बाद सुबह सात बजे से पहले नहीं उठती थी।
अगले कुछ दिनों में छोटी-छोटी बातें दीवार बनने लगीं। शारदा जी जब रसोई में जाकर चाय बनाने की कोशिश करतीं, तो मॉडर्न चिमनी, इंडक्शन चूल्हा और मॉड्यूलर दराजें उनके लिए पहेली बन जाते। एक दिन जब उन्होंने देसी घी का तड़का दाल में लगाया, तो पूरे घर में फैले छौंक के धुएं से निशांत को खांसी आ गई और रिया ने हल्के से माथे पर बल डालते हुए कहा, “माँ जी, प्लीज आप किचन में परेशान मत हुआ कीजिए। यहाँ का एग्जॉस्ट सिस्टम अलग है, और इतनी चिकनाई हम लोग नहीं खाते। काम वाली मेड सब बना देगी, आप बस अपने कमरे में आराम किया करें।”
“आराम” शब्द शारदा जी के कानों में हथौड़े की तरह बजने लगा। जिस औरत ने पचास साल तक पूरे घर को अपनी उंगलियों पर नचाया था, जिसके बनाए खाने की महक से पूरा मोहल्ला वाकिफ था, उसे अचानक अपने ही बेटे के घर में एक मेहमान की तरह किनारे बैठना पड़ रहा था।
ओंकारनाथ जी का हाल तो और भी बुरा था। सुबह की सैर के लिए जब वे नीचे कंपाउंड में जाते, तो वहाँ दौड़ते हुए लोग कानों में हेडफोन लगाए अपनी ही धुन में मग्न रहते। कोई किसी की तरफ देखकर मुस्कुराता तक नहीं था। वे किसी बेंच पर बैठते, तो पास बैठा व्यक्ति मोबाइल में आँखें गड़ाए रहता। अपने गाँव-कस्बे में तो सुबह की सैर का मतलब था दस लोगों से ‘राम-राम’, सुख-दुख की बातें, और चबूतरे पर बैठकर देश-दुनिया पर चर्चा। यहाँ इंसान इंसानों के बीच रहकर भी किसी द्वीप की तरह अकेला था।
दो महीने बीतते-बीतते शारदा जी की सेहत गिरने लगी। वे दिनभर उस वातानुकूलित कमरे में बैठी टीवी के चैनल बदलती रहतीं। जब वे रिया या निशांत से बात करने की कोशिश करतीं, तो दोनों के पास ‘समय की कमी’ का एक ही बहाना होता।
“माँ, अभी मेरी ज़ूम कॉल है।” “माँ जी, मुझे आज बहुत ज़रूरी प्रेजेंटेशन तैयार करनी है, आप प्लीज़ टीवी की आवाज़ थोड़ी कम कर दीजिए।”
एक शाम, ओंकारनाथ जी कमरे में आए तो देखा कि शारदा जी खिड़की की ग्रिल पकड़े चुपचाप खड़ी थीं और उनके गालों पर आँसू ढुलक रहे थे।
ओंकारनाथ जी ने उनके कंधे पर हाथ रखा और बहुत धीमे से बोले, “शारदा… क्या याद आ रहा है?”
शारदा जी अपने पति के सीने से लगकर सुबक पड़ीं, “मुझे अपनी तुलसी की चौखट याद आ रही है जी। मुझे अपने आँगन की वो कच्ची धूप याद आ रही है। यहाँ तो पंखा भी चलता है तो लगता है हवा उधार की है। बेटा-बहू बुरे नहीं हैं, वे हमारा ख्याल भी रखते हैं, फल-दवाइयाँ सब लाते हैं… लेकिन हम यहाँ उनकी जिंदगी की किताबों में जबरदस्ती ठूंसा गया वो पन्ना बन गए हैं, जिसे वे रोज़ संभालते तो हैं पर पढ़ नहीं पाते।”
ओंकारनाथ जी ने उनके सिर पर हाथ फेरा, “मैंने तुमसे कहा था न शारदा। बच्चों का अपना आकाश होता है, और बुजुर्गों की अपनी ज़मीन। जब हम जबरदस्ती उनके आकाश में उड़ने की कोशिश करते हैं, तो हमारे पर कटने लगते हैं। यहाँ उनका प्यार तो है, पर हमारा आत्मसम्मान और हमारी सदियों पुरानी पहचान कहीं खो गई है।”
उस रात खाने की मेज़ पर जब सब बैठे, तो एक अजीब सा सन्नाटा था। निशांत ने देखा कि माँ ने खाने की थाली में सिर्फ एक रोटी ली है और बापूजी भी गुमसुम हैं।
“माँ, क्या बात है? तबीयत ठीक नहीं है क्या आपकी? डॉक्टर के पास चलें?” निशांत ने फिक्र से पूछा।
ओंकारनाथ जी ने अपना पानी का गिलास नीचे रखा और बहुत ही सधे, शांत और गंभीर स्वर में कहा, “निशांत बेटा, हमें तुमसे और रिया से कुछ बात करनी है।”
निशांत और रिया दोनों चौंककर उनकी तरफ देखने लगे।
ओंकारनाथ जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, तुमने हमें बहुत प्यार से रखा। इस नए घर में हमारे आराम की हर चीज़ का इंतज़ाम किया। तुम्हारी नीयत में, तुम्हारे आदर में कोई खोट नहीं है। लेकिन बेटा, जिस तरह तुम्हें अपने करियर और अपनी इस नई ज़िंदगी को संवारने के लिए इस शहर और इस फ्लैट की ज़रूरत थी, ठीक उसी तरह हमें अपनी उम्र के इस पड़ाव को गरिमा से जीने के लिए अपनी उस पुरानी मिट्टी की ज़रूरत है।”
निशांत सन्न रह गया, “बापूजी, यह आप क्या कह रहे हैं? क्या मुझसे या रिया से कोई गलती हो गई? क्या हम आपकी सेवा ठीक से नहीं कर पा रहे?”
“नहीं मेरे बच्चे,” शारदा जी ने आगे बढ़कर निशांत का हाथ अपने कांपते हाथों में थाम लिया, “तेरी सेवा में कोई कमी नहीं है लल्ला। तूने तो श्रवण कुमार की तरह हमें पलकों पर बिठाया। लेकिन बेटा, हमारी जड़ें उस पुराने घर में, उस पुराने मोहल्ले में हैं। यहाँ के बंद कमरे, यह सन्नाटा हमारे भीतर के जीवन को सुखा रहा है। हम यहाँ ‘रह’ तो रहे हैं, पर ‘जी’ नहीं पा रहे हैं।”
रिया की आँखें भी भर आईं। वह धीमे से बोली, “माँ जी, अगर हमसे कोई अनजाने में गुस्ताखी हुई हो तो…”
“अरे नहीं बहू,” शारदा जी ने रिया के सिर पर हाथ रखा, “तू तो बहुत समझदार है। बात गलती की नहीं है बेटा, बात अपनी-अपनी जीवनशैली की है। तुम दोनों की सुबह आठ बजे से शुरू होकर रात बारह बजे तक भागदौड़ में बीतती है। तुम्हारी इस तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हम दोनों बूढ़ों की धीमी चाल रुकावट बनती है। हम चाहते हैं कि तुम दोनों अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जियो, बिना इस अपराधबोध के कि तुम हमें समय नहीं दे पा रहे हो। और हम अपनी बाकी ज़िंदगी अपनी उसी पुरानी धूप, अपने पुराने दोस्तों और अपने खुले आँगन के बीच बिताना चाहते हैं।”
निशांत की आँखों से आँसू छलक पड़े, “पर माँ, लोग क्या कहेंगे? कि बेटे ने नया फ्लैट लिया और माँ-बाप को वापस गाँव भेज दिया?”
ओंकारनाथ जी ने बेटे के कंधे को मजबूती से थपथपाया, “दुनिया क्या कहेगी, यह सोचने वाले कभी खुश नहीं रहते बेटा। समझदारी इसी में है कि रिश्ते ज़बरदस्ती के खिंचाव से टूटने की कगार पर न पहुँचें, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान के साथ हमेशा हरे-भरे रहें। हम तुमसे दूर नहीं जा रहे हैं। जब तुम्हारा मन करे, तुम छुट्टियां लेकर वहाँ आ जाना। जब हमारा मन करेगा, हम महीने-दो महीने के लिए यहाँ तुम्हारे पास आ जाया करेंगे। प्यार दूरी से कम नहीं होता निशांत, प्यार तो तब खत्म होता है जब दो पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे घुट-घुट कर जीने लगें।”
निशांत को जैसे ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक मिल गया था। उसने पहली बार अपने माता-पिता को सिर्फ ‘बुजुर्ग’ के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र इंसानों के रूप में देखा, जिनकी अपनी भी एक ज़िंदगी थी, अपनी आदतें थीं और अपनी खुशी थी। उसने झुककर दोनों के चरण स्पर्श किए और सहमति में सिर हिला दिया।
चार दिन बाद, जब ओंकारनाथ जी और शारदा जी अपनी पुरानी चौखट पर वापस पहुँचे, तो दोपहर ढल रही थी। जैसे ही टैक्सी रुकी, सामने से विमला जी भागी हुई आईं, “अरे शारदा! भाई साहब! आप लोग वापस आ गए?”
आस-पास के दो-चार पड़ोसी भी दरवाज़ों से बाहर निकल आए। आँगन में लगे नीम के पेड़ से वही जानी-पहचानी ठंडी बयार बह रही थी। तुलसी के चौतरे पर चढ़ी धूप शारदा जी का जैसे बाहें फैलाकर इंतज़ार कर रही थी।
शारदा जी ने घर का मुख्य ताला खोला। वही पुरानी जानी-पहचानी खुशबू उनके नथुनों से टकराई। उन्होंने मुड़कर ओंकारनाथ जी की तरफ देखा। दोनों के चेहरों पर बरसों बाद एक गहरी, सुकून भरी और आत्मसम्मान से भरी मुस्कान खिली थी। वे हारे हुए नहीं थे, वे अपने बच्चों से नाराज़ होकर भी नहीं लौटे थे; बल्कि वे अपने रिश्तों की मिठास और अपनी आज़ादी दोनों को एक साथ बचाकर अपने घर लौटे थे।
उसी शाम निशांत का वीडियो कॉल आया। वह स्क्रीन पर मुस्कुरा रहा था, “माँ, पहुँच गए? चाय पी ली?” “हाँ बेटा, तेरी बहू की दी हुई अदरक वाली चाय अभी-अभी तेरे बापूजी के साथ पी है। तू बता, तूने खाना खाया?” शारदा जी के स्वर में अब कोई घुटन नहीं थी, बल्कि एक सहज, स्वाभाविक वात्सल्य बह रहा था। रिश्ते अब किसी फ्लैट की चारदीवारी में कैद नहीं थे, वे खुले आसमान में आज़ाद परिंदों की तरह सांस ले रहे थे।
दोस्तों, अक्सर हम यह मान लेते हैं कि बुजुर्गों को केवल अपनी आँखों के सामने रखना ही उनका सबसे बड़ा सम्मान है। लेकिन क्या हमने कभी यह समझने की कोशिश की कि जिस तरह नई पीढ़ी को अपनी आज़ादी और स्पेस की ज़रूरत होती है, ठीक उसी तरह बुढ़ापे में हमारे माता-पिता को भी अपने जाने-पहचाने माहौल, अपनी पुरानी जड़ों और अपने आत्मसम्मान की उतनी ही ज़रूरत होती है? क्या रिश्तों को जबरदस्ती एक छत के नीचे घसीटने से बेहतर यह नहीं कि थोड़ी सी समझदारी भरी दूरी रखकर उनके प्रेम और आदर को हमेशा के लिए ज़िंदा रखा जाए? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें अपने विचार लिखकर ज़रूर बताएं।
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मूल लेखिका : मंजू ओमर