साँसों की वसीयत

माधव, जो उम्र के इस पड़ाव पर आकर थोड़े और भावुक हो गए थे, एक बच्चे की तरह जिद पर अड़ जाते। जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी मनमानी करता है, वैसे ही वे सुलोचना को समझाते हुए कहते, “सुलोचना, मेरी बात समझने की कोशिश करो। तुमने जिंदगी भर मुझे सिर्फ खुशियाँ दी हैं। तुमने मुझे … Read more

परिश्रम का अजेय सिक्का

 अपनी सारी पीड़ा, दुकान जलने का दुख और परिवार की भुखमरी की हालत अपने भाई के सामने रख दी और हाथ जोड़कर कुछ रुपयों का कर्ज मांगा। विकास ने एक ठंडी सांस ली और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “देखो रघु, आजकल हर दूसरे दिन कोई न कोई रिश्तेदार ऐसी ही मनगढ़ंत कहानी लेकर आ जाता … Read more

गुरूर की टूटती दीवारें और अपनों का प्यार

विक्रम ने कठोरता से कहा, “माफी मुझसे नहीं, पापाजी से मांगो नीलू । शायद वही तुम्हारे इस कठोर व्यवहार को माफ कर सकें, मैं तो नहीं कर सकता।” नीलू  ने महेश  जी के पैर कसकर पकड़ लिए, “पापाजी, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैं वचन देती हूं कि आज के बाद आपको मुझसे कभी … Read more

कच्चे धागों का अटूट बंधन

प्रकाश की ये बातें सुनकर मालती की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसने रोते हुए कहा, “बस कीजिए। एक शब्द और मत कहिएगा। माफी तो मुझे मांगनी चाहिए। पता नहीं मुझे क्या हो गया था जो मैं इतनी अंधी हो गई थी। मैं कैसे भूल गई कि इन मुश्किल हालातों में भी आप … Read more

स्वाभिमान मेरा भी – गीता अस्थाना

पुरुष विहीना नारी का समाज में जीना मुश्किल सा हो जाता है। खास तौर पर तब जब वह साधारण मध्यम वर्ग से होती है। इज़्जत, मान सम्मान, प्रशंसा, निंदा इन सबका बोझ मध्यम वर्ग के कंधे या सिर पर रहता है। दूसरे शब्दों में मध्यम वर्ग इन्हीं मकड़जालों में फंसा रहता है। न वह ऊपर … Read more

विश्वास की डोर

सुमित्रा ताई ने बीच में ही बात काटते हुए चीखकर कहा, “चुप कर बेशर्म! एक तो चोरी, ऊपर से सीनाज़ोरी। अगर तू उसे घास नहीं डालती तो वो तेरे पीछे क्यों पड़ता? तालियां कभी एक हाथ से नहीं बजतीं मीना। कुछ तो इसने भी इशारा किया होगा, तभी तो उस लड़के की इतनी हिम्मत हुई। … Read more

नया आँगन, वही ममता

 राधिका जब भी मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक होती थी। सुमित्रा जी खुद उसके लिए मिठाइयाँ और शगुन के कपड़े पैक करवातीं। “जा बेटा, कुछ दिन अपनी माँ के लाड़-प्यार में जी ले। यहाँ तो ज़िम्मेदारियाँ ही ज़िम्मेदारियाँ हैं,” सुमित्रा जी हँसते हुए कहतीं। और जब … Read more

दो आंगनों की धूप

स्वाति की आंखें नम हो गईं, लेकिन उसने अपने आंसुओं को होठों की मुस्कान से ढक लिया। वो एक झूठे, प्यार भरे गुस्से के अंदाज में बोली, “पापा! आप भी ना, हमेशा शिकायत करते रहते हैं। अरे, इसमें मेरी क्या गलती है? आप ही लोगों ने तो बचपन से कूट-कूट कर इतने अच्छे संस्कार दिए … Read more

देहरी की सूनी आस

 रात को घर पहुंचकर स्नेहा ने सूटकेस से कपड़े वापस निकालने शुरू किए। रिया ने मासूमियत से पूछा, “मम्मा, हम नानी के घर कब जाएंगे?” स्नेहा ने अपने आंसू छुपाते हुए उसे गले से लगा लिया और कहा, “इस बार नहीं बेटा, अगले साल जरूर जाएंगे।” लेकिन सबसे मुश्किल काम था बनारस फोन करना। स्नेहा … Read more

एक झूठा कलंक

 “साहब, यह सब सरासर झूठ है। मेरी बहन तो यहाँ रहती भी नहीं है। मेरे पिता हार्ट पेशेंट हैं, वे किसी पर हाथ कैसे उठा सकते हैं? मैंने आज तक अपनी पत्नी से एक रुपये की मांग नहीं की।” अविनाश ने पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा। लेकिन वहाँ सुनने वाला कोई नहीं … Read more

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