कर्मों का खाता: एक अनकही उधारी
कैलाश की आँखों में भी अब आंसू आ गए थे। उनके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। आदित्य ने कहा, “मैंने रोते हुए आपके पैर पकड़ लिए थे और खुशी के मारे आपको पच्चीस हजार रुपये इनाम के तौर पर देने चाहे थे। मेरे पास शब्द नहीं थे। लेकिन काका, क्या आपको याद है … Read more