रिश्तों की कीमत

कार्तिक मास की हल्की-हल्की ठंड ने दस्तक दे दी थी। सुबह का धुंधलका अभी पूरी तरह छँटा भी नहीं था, लेकिन मीरा की रसोई में बर्तनों की खनक और मसालों की सोंधी महक ने पूरे घर को जगा दिया था। आज भाई दूज का पवित्र त्योहार था। वैसे तो घर में काम करने वाली बाई … Read more

सच्ची चौखट

लंदन के एक प्रतिष्ठित अस्पताल से कार्डियोलॉजी में अपनी मास्टर्स की डिग्री और गोल्ड मेडल हासिल करने के बाद, जब डॉक्टर सुशांत पूरे छह साल बाद भारत लौट रहे थे, तो उनके घर में किसी बड़े त्योहार जैसा माहौल था। सुशांत की माँ, कावेरी देवी की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी। हो भी … Read more

बरसों बाद लौटी वो शाम

हफ्ते भर की कॉर्पोरेट नौकरी, क्लाइंट मीटिंग्स और अनगिनत टारगेट्स ने मेरे दिमाग को किसी मशीन में तब्दील कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे मैं जी नहीं रहा हूँ, बस कलैंडर की तारीखों के साथ किसी अंधी दौड़ में भाग रहा हूँ। कई महीनों की इस कमरतोड़ मेहनत के बाद आज जाकर मुझे एक … Read more

**सात समंदर पार का सन्नाटा**

 पंडित शिवशंकर जी के पुश्तैनी मकान का बड़ा सा आँगन अब हमेशा खामोश रहता था। कभी इस आँगन में उनके बेटे रोहन की किलकारियां गूंजा करती थीं, लेकिन आज यहाँ सिर्फ शिवशंकर जी की सूखी खांसी और उनकी पत्नी, रमा देवी की अस्थमा से उखड़ती हुई सांसों की आवाज़ सुनाई देती है। उम्र के सातवें … Read more

सपनों की उड़ान और रिश्तों की दहलीज

शाम का धुंधलका गहराने लगा था और बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। ड्राइंग रूम में टीवी पर समाचार चल रहे थे, जहाँ विक्रम अपने मोबाइल में उलझा हुआ था, पास ही सोफे पर बैठी उसकी माँ सुमित्रा जी स्वेटर बुन रही थीं और पिता रघुनाथ जी अपने चश्मे को नाक पर टिकाए अखबार के … Read more

उड़ान : एक अनकहा सफर

दूसरी ओर, रोहन भी अपने पिता के इस हस्तक्षेप से बुरी तरह चिढ़ गया था। पिता के सामने वह पलट कर जवाब तो नहीं दे सकता था, लेकिन उसका पुरुषार्थ इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि उसकी पत्नी अब उससे एक कदम आगे निकल चुकी है। पति और पत्नी एक गाड़ी … Read more

परंपराओं की दोहरी कसौटी: एक नई बहू की अनकही कहानी

 सिद्धार्थ, जो अब तक इस पूरे मामले से अनजान था, तुरंत सारी स्थिति समझ गया। उसने अपनी भाभी का साथ देते हुए कहा, “बड़ी अम्मा, भाभी बिल्कुल सही कह रही हैं। सम्मान दिल में होता है, दिखावे में नहीं। तान्या ने हमारे घर और हमारे रीति-रिवाजों को पूरे दिल से अपनाया है। अगर मेरे ‘ताई … Read more

असली दौलत

 सुधाकर बाबू ने तुरंत बीच में टोकते हुए कहा, “अरे तो इसमें सोचने वाली क्या बात है? पागल है क्या तू? पुणे में क्या रखा है! तू अमेरिका जाएगा। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस सीलन भरे घर में और दफ्तर की घिसी हुई कुर्सियों पर बिता दी, ताकि तू खुले आसमान में उड़ सके। अपने … Read more

कर्मों की वसीयत

“हम किसी को दोष नहीं दे सकते अंजलि,” आंटी ने बड़ी सहजता से कहा। “रोहन कोई बुरा बेटा नहीं है। वह बस हमारी ही परछाईं है। उसने वही सीखा जो हमने उसे दिखाया। हम अपने माता-पिता के बुढ़ापे की लाठी नहीं बने, तो हम किस हक से उम्मीद करें कि रोहन हमारा सहारा बनेगा? प्रकृति … Read more

कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा है – चित्रलेखा व्यास ‘नीलचित्रा’

आँगन में रखी तुलसी सूखने लगी थी। सावित्री रोज उसे पानी देती, फिर भी उसकी पत्तियाँ मुरझाती जातीं। शायद पौधे को भी वही चाहिए था, जो मनुष्य को चाहिए—थोड़ी धूप, थोड़ी हवा और जीने की आज़ादी। सावित्री की बेटी नंदिनी भी पिछले कई वर्षों से भीतर ही भीतर ऐसी ही सूख रही थी। शादी के … Read more

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